प्रेम न हाट बिकाय - भाग 35 DrPranava Bharti द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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प्रेम न हाट बिकाय - भाग 35

35-

     फेरों पर  साची अजीब सी उत्सुकता से शीनोदा और रंजु को चक्कर लगाते  देखते रहे थे | वे पति पत्नी फेरों पर से उठे ही तो नहीं, यज्ञ की लपटों को देखकर बड़े असमंजस में रहे जैसे कोई अजूबा देख रहे हों | 

     शादी पूरी होने के बाद शीनोदा के सभी मित्र, रंजु, उसका परिवार, आना का परिवार और करीबियों  के लिए  एक लम्बी सी मेज़ पर भोजन की व्यवस्था की गई थी | उस पर  खाने के लिए सब  साथ ही बैठे, बातों का सिलसिला शुरू हुआ, साथ में मज़ाक भी चलते रहे | 

      शादी देखकर साची बड़ी प्रफुल्लित थी | वह अपनी भाषा में बहुत सी ऎसी बातें बताने की कोशिश कर रही थी जो यहाँ के लोगों को भी आश्चर्य में डाल  रहा था | वह इतनी उत्साहित थी जैसे  खाने की जगह बातों से ही पेट भरने से उसका काम चल जाएगा |अभी रंजु  को कुछ समझ नहीं आ रहा था जो स्वाभाविक भी था लेकिन बेचारे दूल्हे  शीनोदा को  उसके कारण एक प्रकार से खाना छोड़कर उसकी बातों का अपनी अँग्रेज़ी-हिंदी में मिश्रित भाषा में समझाने की कोशिश करना पड़  रहा था | 

    साची ने इस शादी में शुरू से ही ऐसी बहुत सी धार्मिक विधियाँ देखीं थीं कि वह उनके साथ जापान के बहुत से धार्मिक रिवाजों का मिलान करने लगी थी | आखिर कैसे अपने मन की भावनाओं को सबके सामने प्रस्तुत करे ?वह सबमें अपनी बातें साझा करना चाहती थी लेकिन उसकी एक ही मुसीबत थी –आखिर किस भाषा में अपनी बात कहे ?समझाए ?उसके पेट में भयंकर खुदर-बुदर हो रही थी | वह बताना चाहती थी कि उसके देश में भी गणेश जी, लक्ष्मी जी, ब्रह्मा जी, शिव जी यहाँ तक कि यमराज को भी लोग जानते हैं | बेशक बहुत मंदिर नहीं हैं और लोग मंदिरों में हमेशा नहीं जाते हैं लेकिन जापान में इनके मंदिर हैं तो सही | साची को बहुत अच्छा लगता है मंदिरों में जाना, वह कभी-कभी समय मिलने पर जाती है और जैसे कर पाती है, करती है |वह मंदिर की मूर्तियों के सामने बैठकर उनका सौन्दर्य निहारती है | 

फिर वह बुद्ध की बात पर उतरने लगी | 

    साची के मन की सब बातें शीनोदा सबके सामने अनुवाद करके रख रहा था | ऐसा भला कहाँ होता है कि जहाँ शादी जैसा जश्न हो रहा हो वहाँ पर इस प्रकार देवी-देवता व आध्यात्म की बातें होने लगें लेकिन वहाँ होने लगीं थीं |साची का पति अपनी पत्नी के व्यवहार से क्षुब्ध हो रहा था लेकिन सबके सामने उसको कुछ कहने में संकोच भी कर रहा था |   

     वैसे सभी थक चुके थे लेकिन  जीजा जी और मि.बासु -- ये दोनों नौजवान अगर किसी बात के बीच में न बोलें, ऐसा तो होना मुमकिन था ही नहीं --सो उस कोने से आवाज़ आ ही गई ;

 “माध्यम मार्ग  यानि कोई भी मार्ग अति उच्च  या अति निम्न न हो | तथागत का मार्ग किसी भी प्रकार की अति का नहीं है | इट शुड बी बैलेंस्ड ---जैसे किसी तराजू के पलड़े एक स्तर पर हों तभी उसका तोल सही माना जाता है इसी प्रकार से जीवन के पलड़े भी बराबर हों तो जीवन की गाड़ी सुचारु रूप से चलती है |”बासु साहब अपना ज्ञान छोड़  देते तो कैसे चलता?  

ये कोई महात्म-ज्ञान का अखाड़ा था क्या ?वहाँ सभी को अजीब लग रही थीं इन सबकी बातें लेकिन साची मस्त थी और उसका पति जीरो मुँह बाए उसकी बातें सुन रहा था | 

“अरे भई विवेक, यह खाना  तो पानी हो गया ---कुछ करो, ये कहाँ खाया जाएगा –?”जीजा जी बोर हो रहे थे और सच में ही बातों में खाना इतना ठंडा  हो चुका था कि खाने लायक रह ही नहीं गया था | 

“अब या तो खाना खा लो या भगवान में ध्यान लगा लो ---” जीजा जी ने मज़ाक करते हुए कहा ;

“भूखे पेट न होय भजन गोपाला–और हाँ, तुम लोग कमाल हो, उस बेचारी दुल्हन को तो देखो जो सूख के पपड़ी हुई जा रही है | उसे आराम नहीं करने देना –?” सारे अतिथि तितर-बितर हो चुके थे, रंजु बेचारी दुल्हन के लिबास में फँसी अपने सामने प्लेट में सजे हुए विभिन्न प्रकार के स्वादिष्ट लगने वाले भोजन को देखकर अब थक चुकी थी | नींद के कारण उसकी आँखें बुरी तरह बंद हुई जा रही थीं लेकिन वह थी कि न उठने की, न ही बैठने की, न खाने की ! बेचारी की भूख भी मर गई होगी | 

जीजा जी की ज़ोरदार भारी  आवाज़ सुनकर सब एकदम चुप हो गए | आखिर दूल्हा-दुल्हन के मिलन की यह पहली रात थी जो बेहद थकी हुई और ऊब से भर चुकी थी |