प्रेम न हाट बिकाय - भाग 32 DrPranava Bharti द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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प्रेम न हाट बिकाय - भाग 32

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     पता ही नहीं चलता एक के साथ एक रिश्ता कैसे खिंचता चला आता है और भरने लगता है एक सूनेपन को अपने मीठे अहसासों से !शीनोदा ने न केवल रंजु के साथ बातचीत की वरन एक परिवार के सदस्यों के साथ जैसे बैठकर कार्यक्रम बनाए जाते हैं, वैसे ही उसके परिवार व गौड परिवार के साथ सारे रीति-रिवाज़ों पर चर्चा की व विवाह की सारी रस्में   चीज़ें फ़ाइनल कीं |पक्के भारतीयता भरे माहौल में शादी ! 

इस बार शीनोदा की शादी पक्की हो ही गई | लड़की व परिवार लगभग एक सप्ताह रहे | लड़की व लड़का मिलते रहे, अपने-अपने विचारों का आदान –प्रदान करते रहे और अंत में शादी की तारीख तय करके वापिस लौट गए |दिन थे ही कहाँ शादी के ज़्यादा ? मुश्किल से पंद्रह दिन –और उन पंद्रह दिनों में काम की लिस्ट देखो तो ---बाबा रे! इस लंबे जापानी को क्या और कैसे पता भारतीय शादियाँ क्या होती हैं ?

        अब आना के सिर पर और भी ज़िम्मेदारी आ गई थी | बेशक ! शादी के सारे खर्चे शीनोदा ही उठाने वाला था किन्तु भारतीय शादी के लंबे रीति-रिवाज़ों के साथ शादी करने का उत्साह दोनों ही तरफ के लोगों में भरा हुआ था | शीनोदा तो अनभिज्ञ था किन्तु रंजु का परिवार अपनी बेटी की अंतर्राष्ट्रीय शादी के बारे में उत्साह के साथ गौरवान्वित  भी था | उनकी अपनी सोच थी, उनके अपने विचार थे, उनका अपना बजट था जिसमें उन्हें सब-कुछ पूरी शानोशौकत से करना था | सलाह के लिए उनके पास विवेक व अनामिका थे ही ! कोई ऊँच-नीच हो जाए तो डाल दो उनके कंधों पर ! ये तो बड़ी मामूली सी बात होती है | दूसरे के दिलोदिमाग पर क्या और कितना फ़र्क पड़ता है, उसके बारे में कोई कहाँ सोचता है ? आना ने अपने ससुराल के बड़े से परिवार में देखा था, जितना काम करो, वो ठीक है –लेकिन किसी की नज़र में एक कमी रह जाय तो देखो कैसे उसकी ख़बर ली जाती है !

    आना को याद आई अपने देवर की शादी की बात ! सगाई की रस्म के लिए उसे साड़ियाँ, ज़ेवर खरीदने थे | इतने बड़े परिवार में किसी के लिए लड़का या लड़की देखने जाना हो, किसी भी रस्मोरिवाज़ से ताल्लुक कुछ बातें हों, खरीदारी हो या शादी के लिए तैयारी हो विदेश में ईसाई पत्नी के पति विवेक के बड़े भाई साहब या बड़ी दीदियों के आदेश आना के लिए शिरोधार्य होते | अपने घर से  कोई रस्मोरिवाज़ न जानने वाली, आर्य समाज का पालन करने वाले छोटे से परिवार में से आई हुई आना को बहुत सी बातें समझ में भी नहीं आती थीं| जो करना होता उसे अपनी बुद्धि से करना होता | सब उस पर इतना विश्वास करते जैसे वह जो करेगी, और कोई कर ही नहीं सकता | उसकी पसंद के चर्चे पूरे परिवार में होते | आना अपने मन की बात कहे तो वह उन सब चीज़ों से थक जाती थी लेकिन मना करना तो स्वभाव में था ही नहीं–सच पूछो तो उसको अच्छा भी लगता ! देवर की सगाई के लिए अहमदाबाद से ही एक बहुत प्रतिष्ठित ‘शो-रूम’से उसने बहुत प्यारी साड़ी खरीदी |इतने सालों से रहने से जगह, लोगों से स्वाभाविक रूप से परिचय हो ही जाता है | तनिष्क से सुंदर सी हीरे की अंगूठी भी आ गई |सगाई के लिए स्वाभाविक था घर जाना हुआ | बड़ी बहनों  को खूब पसंद आई खरीदारी लेकिन एक ननद बोलीं –“अरे अनामिका !इतनी पढ़ी-लिखी समझदार है, पता नईं चलता काला रंग है साड़ी में ? “ 

    सच तो यह था कि वह साड़ी देखते ही आना और  विवेक दोनों को इतनी पसंद आई थी कि जब मरून और काले चैक की, वो भी  सुनहरे काम से सजी साड़ी  देखी, एकदम उस पर मन आ गया | ध्यान ही नहीं दिया कि काले चैक हैं ! वैसे वह इन सब बातों की कभी भी कहाँ परवाह करती थी ? वह यह सब कुछ मानती भी नहीं थी इसलिए जब साड़ी देखी तब एक ही दृष्टि में उस पर फ़िदा हो गए और  बस उसे पैक करवा ही लिया | एक ने कहा फिर  औरों की नज़र भी पड़ी | फिर तो कई निगाहों में वह अपराधिन सी हो गई | बड़ा अफ़सोस हुआ, कितने चाव से सब सामान लिया था, काम किया था| अब वो बेकार लगने लगा | इस शादी की तैयारी करते समय आना को देवर की शादी याद आई और अचानक  उसका मन बुझने लगा |वैसे काम करने वालों को ही अधिकतर दुत्कार पड़ती है, जो कोई कुछ न करे उसे कोई कह क्या सकता है भला ?यहाँ तो कोई था भी नहीं जिससे वह कुछ कह सकती और जापानी दूल्हे राज्य को ठेठ भारतीय ब्याह करना था | शादी की  शॉपिंग करने वह दूल्हे को अपने साथ लेकर गई | वैसे भी उसे न तो कुछ पता था, न ही वह कुछ कहने वाला था—लेकिन फिर भी ---         

      कोई भी बात होती विवेक से पूछा जाता | वास्तव में कुछ ऐसा था मानो इसी परिवार के बड़े बच्चे का विवाह हो |अब तक आना और विवेक के बच्चे भी किशोरावस्था में आ चुके थे | घर के बड़े बच्चे की शादी का सा वातावरण बन रहा था | अनिल व शीनोदा के रिश्तेदारों के अतिरिक्त विवेक के संबंधियों को भी निमंत्रित किया गया था |पूरी सोसाइटी की शादी थी जैसे, क्या माहौल था ! शीनोदा अपने प्यारे स्वभाव व प्यारी सी हिन्दी बोलने के कारण सबके दिलों में अपना घर बना चुका था |गौड्स के बंगले के सामने वाला बंगला ख़ाली था, किसी का खरीदा हुआ था लेकिन तब तक लोग रहने नहीं आए थे | इसलिए बिना किसी परेशानी के वह पूरा बंगला लड़की वालों के लिए मिल गया | चार कमरे थे उसमें और बाहर काफ़ी जगह भी | वैसे पड़ौसियों ने अपने-अपने घरों में से एक-एक कमरा शीनोदा के नाम कर दिया था जिसको ठहराना हो, ठहरा लो |    

      भारतीय पद्धति के अनुसार विवाह होना था इसलिए हो गईं ज़ोरदार तैयारियाँ शुरू! सारे में घूमते रहे आना और विवेक, साये इतने ज़बर्दस्त कि कोई पार्टी-प्लॉट ही न मिले | विवेक ने बहुत से लोगों से कह रखा था | पता चला ‘बगल में छोरा, शहर में ढिंढोरा’ ! उसी सोसाइटी में मि.वाघेला थे जिनकी पत्नी आना को दीदी पुकारने लगी थीं और उनके दोनों बच्चे दृष्टि और दृष्टान्त के दोस्त बन चुके थे | न जाने कैसे उन पति-पत्नी तक बात पहुँच गई और शादी के दिन से कुछ दिन पहले ही वे दोनों घर आ गए | 

“आप शादी के लिए पार्टी–प्लॉट के लिए परेशान हो रहे हैं ?” मि.वाघेला ने पूछा | गुजराती परिवार, बंबई से आए थे और इसी सोसाइटी में पहला नं का बंगला उनका ही था| चाय पीते-पीते ही उन्होंने कहा ;

“भाई साहब ! आपको तो पता है, मैं ‘रंगोली’ रेस्टोरेंट का मैनेजर हूँ | कितना बड़ा पार्टी-प्लॉट है | वो नहीं चलेगा क्या ? “

“अरे ! क्यों नहीं चलेगा भई –दौड़ेगा –मुझे तो ध्यान ही नहीं रहा था |” विवेक को अब और कहीं जाने की ज़रूरत ही नहीं थी | शीनोदा को लेजाकर विवाह-स्थल पर एक चक्कर मार आए | बड़ा खुश हो गया लड़का ! बैंड-बाजा भी पक्का हो गया और डेकोरेशन की तस्वीरें दिखाकर मि.वाघेला को बता दिया गया कि कैसा डेकोरेशन होगा |मि.वाघेला ने कहा कि वो सब अपने स्टाफ़ से करवा लेंगे |वे भी तो सपरिवार बराती थे | उस समय तक काफ़ी कम लोग सोसाइटी में आए थे सो अधिकतर वहाँ के सारे निवासी ही इस अंतर्राष्ट्रीय विवाह में जाने के लिए उत्सुक थे |         

   जापान से पाँच-दस बरातियों के आने की बात तो पक्की थी ही | आना के घर  के अलावा आस-पास के दो-एक बँगलों में इंतज़ाम करना ज़रूरी था | वो सब हो गया और बरात के लिए बैंड-बाजा भी ! सब कुछ विवेक ऐसे करते हुए घूम रहे थे जैसे उनके ही परिवार   के किसी बच्चे या भाई की शादी हो रही हो |विवाह की तारीख पास ही आ गई थी | शीनोदा के भाई –भाभी, एक अंकल और दो दोस्त जापान से आए |उनके लिए होटल में बुकिंग करवा दी गईं | बेशक वे सब रात में होटल में सोने जाते लेकिन पूरे दिन तो घर पर ही रहते थे या फिर बुकिंग की गई गाड़ियों में बच्चों के साथ दर्शनीय स्थल देखते | आए भी थे एक सप्ताह के लिए | उनके गुजरात घूमने के इंतज़ाम भी कर दिये थे लेकिन  उनके साथ किसी न किसी को साथ जाना होता | अनिल के माता-पिता भी गुजरात के लिए अनजान ही थे | इसलिए आना के परिवार की ज़िम्मेदारी बहुत बढ़ गई थी  | बच्चों को तो खूब मज़ा आ गया|खूब शॉपिंग, खूब बाहर खाना-पीना, सबके साथ बस मज़ाक के दौर, बच्चों को और क्या चाहिए ?पढ़ाई-लिखाई सब एक तरफ रह गई |वैसे तो सबके लिए लेकिन ख़ास तौर से उनके लिए रात-दिन क्या उत्सव जैसे दिन बन गए थे !! आखिर शादी का दिन भी आ ही गया | अनिल का पूरा परिवार आ ही चुका था |सबके ठहरने के लिए व्यवस्था भी ठीक-ठाक थी | असली बात ये थी कि सब शादी को पूरी तरह एंजॉय करना चाहते थे | मतलब सारे टहले ‘फंक्शन्स’ नाचना-गाना सब में हिस्सा लेने के लिए उन्हें आना के परिवार के पास ही रहना पड़ता |कैसा माहौल था, न एक देश, न भाषा, न बिरादरी, न किसी के बारे में कोई समझ---बस, एक बात –और वह प्यार, संवेदना ! शीनोदा की भाभी को न अंग्रेज़ी समझ आती, थोड़े-बहुत अक्षरों के अलावा तो हिन्दी और गुजराती का तो प्रश्न ही नहीं था |