सुबह की हल्की धूप खिड़की से कमरे में आ रही थी।
राधा की नींद सबसे पहले खुली।
उसने करवट लेकर सीमा की तरफ देखा।
सीमा अभी भी सो रही थी — लेकिन उसके चेहरे पर एक अलग सी शांति और हल्की चिंता दोनों साथ दिख रही थीं।
राधा धीरे से उठी और खिड़की के पास जाकर खड़ी हो गई।
बाहर गली में रोज़ की तरह लोगों की आवाज़ें शुरू हो चुकी थीं।
तभी माँ की आवाज़ आई —
“राधा… उठ गई क्या? आ जा, चाय बना ली है।”
राधा नीचे आ गई।
रसोई में माँ चाय डाल रही थीं, और पापा अख़बार पढ़ रहे थे।
घर का माहौल आज थोड़ा अलग था —
जैसे सब कुछ सामान्य भी था… और नहीं भी।
थोड़ी देर बाद सीमा भी नीचे आई।
माँ ने उसे देखकर मुस्कुराने की कोशिश की —
लेकिन माँ की आँखों में हल्की चिंता साफ दिखाई दे रही थी।
पापा बोले —
“शाम को वो लोग फिर बात करने के लिए फोन करेंगे।”
सीमा ने बस हल्का सा सिर हिला दिया।
नाश्ते के बाद राधा और सीमा अपने कमरे में आ गईं।
राधा बोली —
“दीदी… आप खुश हो?”
सीमा कुछ देर चुप रही।
फिर बोली —
“पता नहीं… खुश भी हूँ… और डर भी लग रहा है।”
राधा पास आकर बैठ गई।
सीमा धीरे से बोली —
“ज़िंदगी का इतना बड़ा फैसला…
किसी और को देखकर लेना… आसान नहीं होता।”
राधा बोली —
“लेकिन दीदी… अगर आपको लगे कि आप तैयार नहीं हो…
तो मना भी तो कर सकती हो ना?”
सीमा मुस्कुराई —
“हर चीज़ इतनी आसान नहीं होती राधा…”
कमरे में कुछ देर शांति रही।
सीमा खिड़की के बाहर देखते हुए सोच रही थी —
क्या ज़िंदगी सच में अपनी मर्ज़ी से जी जा सकती है?
या कुछ रास्ते ऐसे होते हैं… जो हमें चलने ही पड़ते हैं?
उसी पल सीमा ने मन ही मन तय किया —
वह इस रिश्ते को समझेगी…
जल्दबाज़ी में कोई फैसला नहीं लेगी।
क्योंकि अब वह सिर्फ किसी की बेटी या बहन नहीं थी —
वह खुद भी एक इंसान थी…
जिसके अपने सपने थे।सीमा समझदार और पढ़ी-लिखी लड़की थी।
इसलिए उसने सबसे पहले यही सोचा —
क्या माँ-पापा मेरे लिए कभी बुरा सोच सकते हैं?
उसे पता था —
जो भी फैसला होगा, वो उसके भले के लिए ही होगा।
फिर उसने मन ही मन तय किया —
शाम को जब फोन आएगा,
तो वह माँ से कहेगी —
“माँ… अगर एक बार उनसे मिलना हो जाए,
तो शायद दोनों के लिए अच्छा रहेगा।
कम से कम हम एक-दूसरे को समझ तो पाएँगे।”
यह सोचकर सीमा के मन का बोझ थोड़ा हल्का हो गया।
उसे लगा —
फैसले लेने से पहले समझना भी ज़रूरी होता है।शाम को फोन आया।
पापा ने फोन उठाया और ध्यान से बात करने लगे।
कुछ देर बातचीत के बाद पापा बोले —
“अगर बाहर कहीं मिल लिया जाए…
तो बच्चे भी एक-दूसरे से मिल पाएँगे
और एक-दूसरे को थोड़ा जान भी पाएँगे।”
उधर से भी सहमति मिल गई।
फिर तारीख तय हुई —
15 मार्च।
यानी आज से ठीक चार दिन बाद।
फोन रखने के बाद पापा ने सबको यह बात बताई।
घर में हल्की सी घबराहट… और हल्की सी उत्सुकता फैल गई।
सीमा चुपचाप बैठी थी —
लेकिन उसके मन में कई सवाल और उम्मीदें दोनों साथ चल रही थीं।हमारे समाज में शादी को ऐसा रिश्ता बना दिया गया है,
जिसका ज़िंदगी में होना ज़रूरी माना जाता है —
खासतौर पर एक लड़की के लिए।
हमारी परंपराओं और सोच ने शुरू से ही महिला को देवी बनाकर देखा है।
काश… महिला को सिर्फ एक महिला रहने दिया जाता,
तो शायद हमारा समाज आज एक लड़की को अलग नज़रों से नहीं देखता।
इसी बीच घर में मिलने की तैयारियाँ शुरू हो गईं।
दिन धीरे-धीरे निकल रहे थे।
सीमा को अच्छा भी लग रहा था —
लेकिन अपनी आने वाली ज़िंदगी को लेकर वह थोड़ा चिंतित भी थी।
क्योंकि अक्सर एक लड़की को अपना सब कुछ छोड़कर
एक ऐसे घर जाना होता है,
जहाँ वह किसी को ठीक से जानती भी नहीं।
यह रिश्ता अक्सर ऐसे इंसान से जुड़ता है
जिसे हमने पहले कभी जाना ही नहीं होता,
और फिर उसी के साथ पूरी ज़िंदगी बितानी होती है।
देखते ही देखते 15 मार्च भी आ गया।
सबने मिलने की तैयारी की।
शहर के एक होटल में मिलने का तय हुआ —
ताकि दोनों परिवार आराम से बैठकर
एक-दूसरे को अच्छे से समझ सकें और जान सकें।
सीमा शांत थी…
लेकिन उसके दिल की धड़कनें थोड़ी तेज़ थीं।
शायद —
नई शुरुआत हमेशा थोड़ी घबराहट लेकर ही आती है।लड़का देखने में आकर्षक था।
उसके घुँघराले बाल थे, लंबा कद था और व्यक्तित्व सधा हुआ लग रहा था।
पहली नज़र में वह सहज और आत्मविश्वासी लगा।
उसका परिवार भी बातचीत और व्यवहार में अच्छा लगा।
आर्थिक रूप से भी वे सुदृढ़ थे।
लड़का बैंक में नौकरी करता था।
उसका बड़ा भाई सरकारी नौकरी में था — पेशे से शिक्षक।
भाभी भी अध्यापिका थीं।
उनका एक छोटा बेटा भी था।
सास-ससुर भी सामान्य, सादगी से रहने वाले लोग लगे।
कुल मिलाकर एक खुशहाल और व्यवस्थित परिवार कहा जा सकता था।
धीरे-धीरे सब लोग एक-दूसरे से मिलने लगे।
हँसी-मज़ाक शुरू हो गया।
शुरुआती झिझक धीरे-धीरे कम होने लगी।
सीमा चुपचाप सब देख और समझ रही थी —
और राधा हमेशा की तरह माहौल को हल्का बनाने में लगी थी।राधा स्वभाव से बहुत चंचल थी,
इसलिए वह होने वाले जीजाजी से हँसते-मुस्कुराते सवाल-जवाब करने लगी।
लड़के का नाम अशोक था।
कुछ देर बाद दोनों परिवार वालों ने सोचा कि
सीमा और अशोक को अकेले में बात करने का मौका दिया जाए।
इसलिए उन्हें बाहर भेज दिया गया —
“तुम दोनों थोड़ा घूमते हुए बात कर लो।”
दोनों धीरे-धीरे साथ चलने लगे।
सीमा पढ़ी-लिखी और समझदार लड़की थी,
लेकिन उसके जीवन में ऐसा मौका पहले कभी नहीं आया था।
इसलिए वह थोड़ी झिझक रही थी।
उसे समझ नहीं आ रहा था —
बात कहाँ से शुरू करे… और क्या पूछे।
हल्की हवा चल रही थी।
दोनों कुछ कदम बिना बोले चलते रहे।
सीमा अपने हाथों की उँगलियाँ आपस में पकड़कर चल रही थी —
जैसे अपने मन की घबराहट को छिपाने की कोशिश कर रही हो।कुछ देर तक दोनों बिना कुछ बोले चलते रहे।
आखिर अशोक ने ही बात शुरू की —
“आप… पढ़ाई कर रही हैं ना अभी?”
सीमा ने हल्का सा सिर हिलाया —
“हाँ… मैंने केमिस्ट्री में एम.एससी. की है।”
अशोक मुस्कुराया —
“अच्छा है… पढ़ाई करना और अपने पैरों पर खड़ा होना बहुत ज़रूरी होता है।”
सीमा को उसकी बात सुनकर थोड़ा अच्छा लगा।
उसे लगा — शायद वह समझने वाला इंसान है।
थोड़ी हिम्मत जुटाकर सीमा ने भी पूछा —
“आपको बैंक की नौकरी कैसी लगती है?”
अशोक बोला —
“जिम्मेदारी वाली है… लेकिन अच्छी है।
और मैं चाहता हूँ कि जो भी मेरे साथ हो… वो अपने सपने भी पूरे करे।”
यह सुनकर सीमा ने पहली बार उसकी तरफ सीधे देखा।
उसके मन की घबराहट थोड़ी कम हुई।
दोनों धीरे-धीरे चलते रहे —
और अब बातचीत थोड़ा सहज होने लगी थी।दोनों बाहर गार्डन में जाकर बैठ गए।
काफी देर तक वे एक-दूसरे से बातें करते रहे।
धीरे-धीरे दोनों की झिझक कम होने लगी थी।
तभी अचानक राधा वहाँ आ गई और हँसते हुए बोली —
“बस करो अब… बहुत बातें हो गईं।
क्या आज ही एक-दूसरे को पूरा जान लोगे?”
फिर उसने मज़ाक में कहा —
“चलो, माँ-पापा बुला रहे हैं।”
तीनों हँसते हुए अंदर चले गए।
अंदर आकर दोनों परिवारों ने फिर से बैठकर बात की।
सबको लगा कि बात आगे बढ़ाई जा सकती है।
फिर सगाई की तारीख भी तय हो गई —
25 मार्च को सगाई होगी।
और शादी का मुहूर्त बाद में निकलवाने का तय हुआ।
घर में खुशी का माहौल था —
लेकिन सीमा के मन में अब भी हल्की सी घबराहट और नई शुरुआत की उम्मीद दोनों साथ थीं।