कोर्टरूम में सन्नाटा छा गया था। मीरा के शब्द हवा में तैर रहे थे, हर किसी को चौंका रहे थे।
"आर्डर! आर्डर!" जज ने हथौड़ी बजाई। "मिस सिन्हा, क्या आप जानती हैं कि आप क्या कह रही हैं?"
मीरा ने सिर हिलाया। उसके चेहरे पर एक अजीब शांति थी, जैसे एक बोझ उतर गया हो।
"जी हाँ, योर ऑनर। मैं पूरी तरह से जानती हूँ। और मैं अपने अपराध का इकबाल करना चाहती हूँ।"
प्रोसिक्यूटर अचंभित था। "मिस सिन्हा, आप किस अपराध की बात कर रही हैं? विक्रांत सिन्हा की हत्या की?"
"नहीं। मायरा सिन्हा की हत्या की। मेरी बहन की।"
"लेकिन आपने अभी-अभी कहा कि मायरा ज़िंदा है, कहीं छुपी हुई है।"
मीरा ने कड़वी हँसी हँसी। "मैंने झूठ बोला था। सच ये है कि जो औरत सबको मायरा के रूप में जानती थी - वो मैं थी। मीरा।"
मैं अपनी सीट से उछल पड़ा। "क्या? ये... ये कैसे संभव है?"
जज ने मुझे चुप रहने का इशारा किया।
मीरा ने अपनी कहानी जारी रखी।
"बीस साल पहले, जब हम दस साल की थीं, एक रात कुछ हुआ। हम अपने पुराने घर में थे, शिमला में। माँ-पिताजी बाहर गए हुए थे। बस हम दोनों थे।"
उसकी आवाज़ काँपने लगी, लेकिन वो रुकी नहीं।
"मायरा हमेशा से ज़्यादा चालाक थी। ज़्यादा खूबसूरत। ज़्यादा प्यारी। हर कोई उसे चाहता था। और मैं... मैं बस उसकी छाया थी। लोग हमें अलग नहीं कर पाते थे, लेकिन जब करते थे, तो हमेशा मायरा को चुनते थे।"
"उस रात, हमारे बीच झगड़ा हुआ। एक खिलौने को लेकर - कितना मूर्खतापूर्ण, है ना? लेकिन बच्चों के लिए छोटी चीज़ें बड़ी हो जाती हैं। मैंने उसे धक्का दिया। बस एक छोटा सा धक्का। लेकिन हम सीढ़ियों के पास थे।"
मीरा रुक गई, आँसू उसके गालों पर बह रहे थे।
"वो गिर गई। सीढ़ियों से नीचे। और जब मैं नीचे पहुँची, तो वो... वो हिल नहीं रही थी। साँस नहीं ले रही थी।"
कोर्टरूम में सिसकियों की आवाज़ें आने लगीं।
"मैं डर गई। मैं नहीं चाहती थी कि कोई जाने। मैं नहीं चाहती थी कि मेरे माँ-पिताजी मुझसे नफरत करें। तो मैंने... मैंने एक फैसला किया।"
"मैंने मायरा की लाश को छुपाया। पुराने घर के बेसमेंट में। और फिर... फिर मैं मायरा बन गई।"
सब हक्के-बक्के थे।
"ये कैसे हो सकता है?" प्रोसिक्यूटर ने पूछा। "आपके माता-पिता को कैसे पता नहीं चला?"
"क्योंकि हम जुड़वाँ थे," मीरा ने समझाया। "बिल्कुल एक जैसी दिखती थीं। और मैंने मायरा की नकल करना सीख लिया - उसके बोलने का तरीका, उसकी हँसी, उसकी आदतें। पहले कुछ दिन मुश्किल थे, लेकिन फिर... फिर ये आसान हो गया।"
"और मीरा? आपके माता-पिता ने नहीं पूछा कि मीरा कहाँ गई?"
"मैंने उन्हें बताया कि हम एक नया खेल खेल रहे थे - 'स्वैप'। कि हमने तय किया था कि कुछ दिनों के लिए मैं मीरा बनूँगी और मायरा मीरा बनेगी। माँ-पिताजी ने हँसकर टाल दिया। उन्हें लगा ये बच्चों का मासूम खेल है।"
"और जब आप बड़ी हुईं? तब भी आपने ये रहस्य जारी रखा?"
मीरा ने सिर हिलाया। "हाँ। क्योंकि तब तक, मायरा बनना मेरी आदत बन गई थी। मायरा की ज़िंदगी बेहतर थी। उसे ज़्यादा प्यार मिलता था, ज़्यादा ध्यान। और असली मीरा... वो तो मर ही गई थी, है ना? मेरे अंदर।"
मैं सब कुछ समझने की कोशिश कर रहा था। तो जो औरत मुझे मायरा के रूप में मिली थी, वो असल में मीरा थी? और असली मायरा बीस साल पहले ही मर गई थी?
"लेकिन," प्रोसिक्यूटर ने पूछा, "अगर आप मायरा बन गईं, तो मीरा के रूप में यहाँ कौन आया?"
मीरा ने एक जटिल मुस्कान दी। "मैं। मैं दोनों हूँ। समझिए ना - मैंने मायरा के रूप में ज़िंदगी जी, लेकिन मीरा कभी पूरी तरह से मरी नहीं। वो मेरे अंदर ज़िंदा थी, अपराध-बोध की तरह, डर की तरह। और जब विक्रांत से शादी हुई, जब सब कुछ गलत होने लगा, तो मीरा वापस आने लगी।"
"मीरा एक व्यक्तित्व है?" जज ने पूछा। "आप डिसोसिएटिव आइडेंटिटी डिसऑर्डर की बात कर रही हैं?"
"शायद," मीरा ने कहा। "मुझे नहीं पता। मैं कोई डॉक्टर नहीं हूँ। लेकिन मैं जानती हूँ कि कभी-कभी मैं मायरा थी, और कभी-कभी मीरा। और दोनों के अलग इरादे थे, अलग योजनाएँ।"
वो मुझे देखने लगी।
"जब मैं आरव से मिली, तो मैं मायरा थी। और मायरा को उनसे प्यार हो गया। असली प्यार। लेकिन मीरा... मीरा डर गई। क्योंकि प्यार का मतलब था सच सामने आना। और सच का मतलब था सब कुछ खोना।"
"तो मीरा ने एक योजना बनाई। एक ऐसी योजना जो विक्रांत से छुटकारा दिलाएगी और साथ ही आरव को भी दूर कर देगी, ताकि सच कभी सामने न आए।"
मेरे हाथ मुट्ठियाँ बन गए। "तो तुमने मुझे इस्तेमाल किया। शुरू से अंत तक।"
"नहीं!" मीरा ने कहा, उसकी आवाज़ में दर्द था। "मायरा ने तुम्हें इस्तेमाल नहीं किया। मायरा ने तुमसे प्यार किया। लेकिन मीरा... मीरा ने सब कुछ बर्बाद कर दिया।"
जज ने हस्तक्षेप किया। "मिस सिन्हा, क्या आप यह कह रही हैं कि आपने विक्रांत सिन्हा की हत्या की?"
मीरा ने गहरी साँस ली। "हाँ। और नहीं भी। मैंने गोली चलाई, लेकिन मेरे हाथ में बंदूक आरव ने रखी थी।"
"क्या मतलब?"
"उस रात, जब मैंने आरव को ड्रग दिया, तो मैंने उन्हें विक्रांत के घर लेकर गई। मैंने उनके हाथ में बंदूक दी। और फिर... फिर मैंने उनके हाथ को गाइड किया। हम दोनों ने ट्रिगर दबाया। साथ में।"
मैं पूरी तरह से स्तब्ध था। तो मैंने सच में गोली चलाई थी? लेकिन मीरा के साथ?
"लेकिन क्यों?" मैंने चीखकर पूछा। "अगर तुम खुद गोली चला सकती थीं, तो मुझे क्यों शामिल किया?"
मीरा ने मेरी ओर देखा, उसकी आँखों में एक अजीब सा दुःख था।
"क्योंकि मैं नहीं चाहती थी कि मैं अकेली रहूँ इस अपराध में। मैं चाहती थी कि कोई मेरे साथ हो। कोई जो... जो समझे कि ये कितना मुश्किल है।"
"तुम पागल हो।"
"हाँ," उसने स्वीकार किया। "शायद हूँ। लेकिन अब सच सामने आ गया है। और मैं इसके लिए तैयार हूँ।"
जज ने फैसला सुनाया। "मिस सिन्हा, आप जो कह रही हैं, उसके आधार पर, मैं आपको हिरासत में ले रहा हूँ। आप पर विक्रांत सिन्हा की हत्या का आरोप लगाया जाएगा।"
"और मैं?" मैंने पूछा। "मेरा क्या होगा?"
जज ने मुझे देखा। "डॉक्टर मल्होत्रा, आपका केस जटिल है। आप ड्रग के प्रभाव में थे, और आपको धोखा दिया गया था। मैं इस केस को रीव्यू के लिए भेज रहा हूँ। लेकिन अभी के लिए, आप भी हिरासत में रहेंगे।"
जैसे ही पुलिस मीरा और मुझे ले जाने आई, मीरा ने मुझे देखा।
"आरव," उसने कहा, "मुझे माफ कर देना। मायरा की तरफ से।"
मैं कुछ नहीं बोला। मैं सिर्फ उसे देखता रहा, उस औरत को जिसने मेरी ज़िंदगी बर्बाद कर दी थी, लेकिन जिसे मैं अब भी नफरत नहीं कर पा रहा था।
क्योंकि एक हिस्सा - एक बहुत छोटा हिस्सा - अब भी उससे प्यार करता था।
और शायद ये सबसे बड़ी त्रासदी थी।
***
छह महीने बाद
मेरा केस खारिज हो गया। कोर्ट ने फैसला सुनाया कि मैं मीरा के मैनिपुलेशन का शिकार था, और मुझे पता नहीं था कि मैं क्या कर रहा हूँ। मुझे रिहा कर दिया गया।
मीरा को उम्रकैद हो गई। विक्रांत की हत्या के लिए, और असली मायरा की हत्या को छुपाने के लिए।
मैं मुंबई वापस आ गया, अपने क्लिनिक में। लेकिन सब कुछ बदल गया था। मेरे मरीज़ मुझसे दूर हो गए। मेरा नाम बदनाम हो गया। "वो डॉक्टर जो अपनी मरीज़ के प्यार में पड़ गया और हत्यारा बन गया।"
मैंने क्लिनिक बंद करने का सोचा। शायद शहर छोड़ने का।
लेकिन फिर एक दिन, एक चिट्ठी आई।
जेल से।
मीरा ने लिखा था।
मैंने लिफाफा खोला, दिल धड़कता हुआ।
अंदर एक पन्ना था, उसकी साफ हैंडराइटिंग में:
"प्यारे आरव,
मुझे पता है तुम ये क्यों पढ़ रहे हो। क्योंकि एक हिस्सा तुम्हें अब भी जवाब चाहिए। अब भी समझना चाहता है।
सच ये है कि मैं तुम्हें पूरा सच नहीं बता सकी। कोर्ट में जो मैंने कहा, वो सच था, लेकिन पूरा नहीं।
असली मायरा सच में मर गई थी। लेकिन उसकी मौत एक एक्सीडेंट नहीं थी।
मैंने उसे मारा था। जान-बूझकर।
क्योंकि मैं वो बनना चाहती थी जो वो थी। मैं उसकी ज़िंदगी चाहती थी।
और जब मैं तुमसे मिली, तो मैंने सोचा शायद मैं बदल सकती हूँ। शायद मायरा बनकर, मैं एक अच्छा इंसान बन सकती हूँ।
लेकिन मैं गलत थी। मीरा हमेशा वापस आती है। वो राक्षस जो मैं सच में हूँ।
मुझे माफ कर देना, आरव। मायरा के लिए नहीं। उसके लिए जो मैं कभी नहीं बन सकी।
अलविदा,
मीरा"
मैंने चिट्ठी को तोड़ा नहीं। मैंने उसे अपनी डायरी में रख लिया।
क्योंकि शायद एक दिन, मैं इस सबको समझ पाऊँगा। शायद एक दिन, मैं माफ कर पाऊँगा।
लेकिन आज नहीं।
आज मैं बस जीना चाहता था। आगे बढ़ना चाहता था।
भले ही मायरा - या मीरा - की यादें हमेशा मेरे साथ रहेंगी।
एक खामोशी की तरह।
एक इकरार की तरह।
जो कभी पूरा नहीं होगा।