खामोशी का इकरार - CH-3 - जुड़वाँ का खेल Dragon Heart द्वारा थ्रिलर में हिंदी पीडीएफ

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खामोशी का इकरार - CH-3 - जुड़वाँ का खेल

मीरा की गवाही ने पूरे कोर्टरूम को हिला दिया। वो विटनेस स्टैंड पर खड़ी थी, शांत और संयमित, जैसे उसने इस पल के लिए पूरी ज़िंदगी तैयारी की हो।

"मिस सिन्हा," प्रोसिक्यूटर ने पूछा, "आप मायरा सिन्हा से कैसे संबंधित हैं?"

"हम जुड़वाँ बहनें हैं," मीरा ने जवाब दिया। "मैं तीन मिनट पहले पैदा हुई थी।"

मेरा दिल तेज़ी से धड़क रहा था। मायरा ने कभी नहीं बताया कि उसकी एक जुड़वाँ बहन है। क्यों?

"और आप अब तक कहाँ थीं?"

"विदेश में। मैं पिछले दस साल से अमेरिका में रह रही थी। लेकिन जब मुझे विक्रांत की मौत की खबर मिली, तो मैं भारत वापस आई।"

"आप डॉक्टर आरव मल्होत्रा को जानती हैं?"

मीरा ने मुझे देखा। उसकी नज़र में कोई पहचान नहीं थी, सिर्फ एक ठंडी उदासीनता।

"नहीं। मैं उन्हें पहली बार देख रही हूँ।"

"लेकिन आपकी बहन, मायरा, उनसे मिलती थीं?"

"हाँ। वो उनके पास थेरेपी के लिए जाती थीं।"

"क्या आपको पता है कि डॉक्टर मल्होत्रा और आपकी बहन के बीच एक रोमांटिक रिलेशनशिप थी?"

मीरा ने एक पल के लिए रुककर सोचा। "हाँ। मायरा ने मुझे बताया था। फोन पर। उसने कहा था कि वो किसी से प्यार करने लगी है।"

प्रोसिक्यूटर ने एक फाइल खोली। "और क्या आपको पता है कि आपकी बहन ने अपने पति, विक्रांत सिन्हा, को मारने की योजना बनाई थी?"

कोर्टरूम में फिर से हलचल मची।

"ऑब्जेक्शन!" राजीव चीखा। "ये स्पेकुलेशन है!"

"ओवररूल्ड," जज ने कहा। "गवाह जवाब दे सकती हैं।"

मीरा ने गहरी साँस ली। "हाँ, मुझे पता था। मायरा ने मुझे सब कुछ बताया था।"

मेरा मुँह खुला का खुला रह गया। ये क्या हो रहा था?

"उसने क्या बताया था?" प्रोसिक्यूटर ने आगे बढ़ते हुए पूछा।

"उसने बताया कि विक्रांत उसके साथ बुरा व्यवहार करते थे। मारते थे। प्रताड़ित करते थे। और वो बाहर नहीं निकल पा रही थी। उसने कहा कि उसने एक प्लान बनाया है - वो डॉक्टर मल्होत्रा को इस्तेमाल करेगी ताकि विक्रांत से छुटकारा पा सके।"

"इस्तेमाल करेगी? कैसे?"

मीरा ने मुझे फिर से देखा, और इस बार उसकी आँखों में दुख था। "उसने डॉक्टर मल्होत्रा से झूठा अफेयर किया। उन्हें इमोशनली मैनिपुलेट किया। और फिर उनसे विक्रांत को मरवा दिया।"

"नहीं!" मैं फिर से खड़ा हो गया। "ये सब झूठ है! मीरा, तुम ऐसा क्यों कर रही हो?"

"मिस्टर मल्होत्रा!" जज ने चेतावनी दी। "एक और बार, और मैं आपको कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट में ले लूँगा।"

राजीव ने मुझे बिठाया। "शांत रहिए," उसने फुसफुसाया। "हम क्रॉस-एग्जामिनेशन में उसे पकड़ेंगे।"

लेकिन मुझे पता था कि कुछ बहुत गलत हो रहा था। मीरा झूठ बोल रही थी, लेकिन क्यों? वो मायरा की बहन थी। उसे तो मायरा का पक्ष लेना चाहिए, मेरे खिलाफ नहीं।

जब तक कि...

जब तक कि मीरा असल में मायरा न हो।

ये विचार मेरे दिमाग में कौंधा जैसे बिजली की तरह। क्या मायरा ने अपनी पहचान बदल ली थी? क्या वो अब मीरा बनकर मुझे फँसा रही थी?

लेकिन क्यों? अगर वो मुझसे छुटकारा पाना चाहती थी, तो वो बस गायब हो सकती थी। उसे कोर्ट में आने की क्या ज़रूरत थी?

जब तक कि उसका कोई और मकसद न हो।

प्रोसिक्यूटर ने अपनी पूछताछ जारी रखी। "तो आप कह रही हैं कि आपकी बहन ने इस पूरे अपराध की योजना बनाई थी?"

"हाँ।"

"और डॉक्टर मल्होत्रा सिर्फ एक मोहरा थे?"

"हाँ।"

"तो असली मुजरिम कौन है - डॉक्टर मल्होत्रा या मायरा सिन्हा?"

मीरा ने एक पल के लिए चुप रही। फिर उसने कहा, "दोनों। लेकिन अगर मुझे चुनना पड़े, तो मैं कहूँगी कि असली मुजरिम मायरा है। उसने ये सब प्लान किया। डॉक्टर मल्होत्रा तो बस... बस एक कमज़ोर दिल वाले आदमी थे जो प्यार में पड़ गए।"

मुझे नहीं पता था कि मुझे गुस्सा आना चाहिए या राहत महसूस करनी चाहिए। वो मेरा बचाव कर रही थी, लेकिन साथ ही मुझे एक बेवकूफ भी बना रही थी।

"और अब मायरा कहाँ है?" प्रोसिक्यूटर ने पूछा।

"मुझे नहीं पता। उसने मुझसे आखिरी बार दो महीने पहले बात की थी। उसने कहा कि वो कहीं दूर जा रही है, जहाँ कोई उसे ढूँढ नहीं पाएगा।"

"क्या आप हमें उस जगह तक पहुँचने में मदद कर सकती हैं?"

"मैं कोशिश करूँगी।"

प्रोसिक्यूटर ने सिर हिलाया। "थैंक यू, मिस सिन्हा। कोई और सवाल नहीं।"

अब राजीव की बारी थी। उसने खड़े होकर मीरा की ओर देखा।

"मिस सिन्हा, आपने कहा कि आप पिछले दस साल से अमेरिका में थीं। क्या आप हमें प्रूफ दे सकती हैं?"

"जी हाँ। मेरे पास वीज़ा रिकॉर्ड्स, पासपोर्ट, सब कुछ है।"

"और आपने अपनी बहन से कितनी बार मिलने के लिए भारत आई थीं इन दस सालों में?"

मीरा ने थोड़ा सोचा। "तीन बार।"

"सिर्फ तीन बार? दस सालों में? अपनी जुड़वाँ बहन से मिलने?"

"हम... हमारे बीच कुछ मतभेद थे।"

"कैसे मतभेद?"

मीरा असहज लग रही थी। "निजी।"

"मिस सिन्हा, ये एक मर्डर ट्रायल है। यहाँ कुछ भी निजी नहीं है।"

मीरा ने गहरी साँस ली। "ठीक है। सच ये है कि मायरा और मेरा रिश्ता बचपन से ही जटिल था। हम जुड़वाँ थे, लेकिन बहुत अलग। वो हमेशा... अधिक मैनिपुलेटिव थी। अधिक ताकतवर। मुझे हमेशा लगता था कि वो मुझे कंट्रोल करने की कोशिश कर रही है।"

"तो आप अमेरिका भाग गईं?"

"मैं अमेरिका अपनी पढ़ाई के लिए गई। और फिर वहीं रह गई क्योंकि... क्योंकि मायरा से दूर रहना आसान था।"

"लेकिन फिर भी उसने आपको फोन किया? अपनी सबसे गहरी बातें शेयर कीं?"

मीरा ने सिर हिलाया। "हम बहनें हैं। चाहे हमारे बीच कितने भी मतभेद हों, खून का रिश्ता नहीं टूटता।"

राजीव ने एक कागज़ उठाया। "मिस सिन्हा, क्या आप ये पहचानती हैं?"

वो कागज़ वही तस्वीर थी जो सुरेश ने मुझे दी थी - छोटी बच्ची वाली तस्वीर।

मीरा का चेहरा पीला पड़ गया।

"ये... ये कहाँ से मिली आपको?"

"जवाब दीजिए। क्या आप इसे पहचानती हैं?"

"हाँ। ये मैं हूँ। बचपन की तस्वीर।"

"आप? या मायरा?"

मीरा ने होंठ काटे। "मुझे याद नहीं। हम जुड़वाँ थे। एक जैसी दिखती थीं।"

"और तस्वीर के पीछे जो नाम लिखा है? 'मीरा सिन्हा'?"

"तो वो मैं ही हूँ।"

"लेकिन अगर आप और मायरा एक जैसी दिखती थीं, तो कैसे पक्का है कि ये आप हैं, मायरा नहीं?"

मीरा कुछ नहीं बोली।

राजीव ने आगे बढ़ते हुए कहा, "मिस सिन्हा, क्या ये संभव नहीं है कि आप असल में मायरा हैं, और आप अपनी पहचान बदलकर यहाँ अपनी बेगुनाही साबित करने आई हैं?"

"ऑब्जेक्शन!" प्रोसिक्यूटर चीखा। "स्पेकुलेशन!"

"सस्टेन्ड," जज ने कहा।

लेकिन बीज बो दिया गया था। अब सबके दिमाग में सवाल था - कौन असली मीरा थी, और कौन मायरा?

ट्रायल उस दिन के लिए स्थगित हो गया। मुझे वापस जेल ले जाया गया।

रात को, मैं अपनी सेल में लेटा हुआ सोच रहा था। मीरा की गवाही ने मामले को और जटिल बना दिया था। अब दो संभावनाएँ थीं:

एक - मीरा असल में मीरा थी, और मायरा कहीं छुपी हुई थी।

दो - मीरा असल में मायरा थी, जो अपनी पहचान बदलकर मुझे और फँसाने की कोशिश कर रही थी।

लेकिन एक तीसरी संभावना भी थी, जिसके बारे में सोचकर मेरी रूह काँप गई।

क्या होगा अगर मायरा और मीरा दोनों एक ही व्यक्ति हों? क्या होगा अगर वो एक डिसोसिएटिव आइडेंटिटी डिसऑर्डर से पीड़ित हो - एक ऐसी बीमारी जिसमें एक ही शरीर में दो अलग व्यक्तित्व होते हैं?

मैं एक मनोचिकित्सक था। मैंने ऐसे केस पढ़े थे। लेकिन कभी सोचा नहीं था कि मैं खुद एक में फँस जाऊँगा।

तभी मुझे एक आवाज़ सुनाई दी।

"आरव।"

मैं उठ बैठा। सेल के बाहर, अँधेरे में, कोई खड़ा था।

मीरा।

या मायरा।

"तुम यहाँ कैसे आई?" मैंने फुसफुसाया।

"मुझे तुमसे बात करनी है," उसने कहा। "बहुत कम समय है।"

"किसने तुम्हें अंदर आने दिया?"

"इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। सुनो, आरव। जो मैंने आज कोर्ट में कहा, वो सब सच नहीं था।"

"मुझे पता है। तुम मायरा हो, है ना?"

उसने मुस्कुराया। वो दुखद, टेढ़ी मुस्कान जो मुझे इतनी अच्छी तरह याद थी।

"हाँ। और नहीं भी।"

"इसका क्या मतलब है?"

"इसका मतलब है कि सच इतना सीधा नहीं है जितना तुम सोचते हो। मीरा और मायरा... हम दोनों असली हैं। और हम दोनों नकली भी।"

मेरा सिर घूमने लगा। "तुम मुझे पागल बनाने की कोशिश कर रही हो।"

"नहीं, आरव। मैं तुम्हें बचाने की कोशिश कर रही हूँ। लेकिन उसके लिए तुम्हें मुझ पर भरोसा करना होगा। एक आखिरी बार।"

"तुम पर भरोसा? तुमने मुझे बर्बाद किया है! मुझे एक हत्यारा बना दिया है!"

"क्योंकि मुझे कोई और रास्ता नहीं दिख रहा था," उसकी आँखों में आँसू आ गए। "लेकिन अब... अब मैं इसे ठीक कर सकती हूँ। अगर तुम मुझे एक मौका दो।"

"कैसे?"

"कल, जब फिर से सुनवाई हो, तो मैं कोर्ट में कुछ ऐसा कहूँगी जो सब कुछ बदल देगा। लेकिन उसके बाद... उसके बाद तुम्हें मुझसे नफरत हो जाएगी। हमेशा के लिए।"

"मुझे पहले से ही नफरत है।"

उसने सिर हिलाया। "नहीं। तुम मुझसे प्यार करते हो। अब भी। मैं तुम्हारी आँखों में देख सकती हूँ। और इसीलिए ये इतना मुश्किल है।"

वो पीछे हटने लगी।

"रुको!" मैंने कहा। "कम से कम मुझे बताओ - विक्रांत को सच में किसने मारा?"

उसने मुड़कर मुझे देखा, अँधेरे में उसका चेहरा आधा छुपा हुआ।

"तुमने," उसने कहा। "लेकिन तुम अकेले नहीं थे।"

और वो अँधेरे में गायब हो गई।

मैं वहीं खड़ा रह गया, काँपता हुआ, उसके शब्दों को समझने की कोशिश करता हुआ।

अगले दिन, कोर्ट में फिर से भीड़ थी। मीरा विटनेस स्टैंड पर थी, और प्रोसिक्यूटर उससे आखिरी सवाल पूछ रहा था।

"मिस सिन्हा, क्या आप कोर्ट को बता सकती हैं कि आपकी बहन अब कहाँ है?"

मीरा ने गहरी साँस ली। फिर उसने कुछ ऐसा कहा जिसने पूरी दुनिया हिला दी।

"मायरा मर चुकी है।"

कोर्टरूम में अफरा-तफरी मच गई।

"मेरा मतलब है," मीरा ने जारी रखा, "असली मायरा। वो बीस साल पहले मर गई थी। जब हम दस साल की थीं।"

मेरा दिल रुक गया।

"मैंने उसे मारा था।"