पागलपन Raju kumar Chaudhary द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

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पागलपन

पागलपन – भाग 1: आरव की दुनिया
आरव की सुबह हमेशा एक जैसी होती थी। हल्की धूप उसके कमरे की खिड़की से टकराकर दीवारों पर गोल-गोल धब्बे बना देती, और चाय की खुशबू पूरे घर में फैल जाती। पड़ोस के बच्चे खेलते हुए हँसी में उलझे रहते, और कभी-कभी उनके कुत्ते की आवाज़ उसकी नींद को हल्का-सा खींचकर बाहर की दुनिया में ले आती। आरव इस नियमितता को पसंद करता था। यही उसकी दुनिया थी। यही उसकी पहचान।
लेकिन आज कुछ अलग था।
आरव ने जैसे ही उठकर अपना कमरा देखा, उसे लगा कि हर चीज़ कुछ अजीब ढंग से बदल गई है। कपड़ों की रंगत, जो हमेशा हल्की भूरी और सफेद थी, आज धुंधली और फीकी लग रही थी। किताबें जो उसके शेल्फ़ पर व्यवस्थित रहती थीं, उनकी जगह बदल गई थी, और उनके पन्नों की खुशबू में एक अजीब सी कड़वाहट घुली हुई थी। आरव ने गहरी सांस ली, और सोचा, “शायद मैं बस थक गया हूँ। यह सब कल्पना है।”
लेकिन मन कहीं और ही बताने की कोशिश कर रहा था। उसका दिल तेजी से धड़कने लगा। कमरे की छाया जैसे हल्की-हल्की फड़फड़ाहट में बदल रही थी। उसने सोचा कि यह सिर्फ उसकी आँखों का भ्रम है, लेकिन जब उसने अपने हाथों को देखा, तो वह भी अजीब लग रहे थे – उनके अंगुलियों की लंबाई कुछ ज्यादा जैसी, और हाथ की रेखाएं जैसे अलग-अलग दिशाओं में फैल रही हों।
आरव ने अपने दिमाग को समझाने की कोशिश की। उसने सोचा, “आरव, यह सब सामान्य है। यह सिर्फ सुबह की नींद की उबासी है। सब ठीक है।” लेकिन अंदर का डर लगातार बढ़ रहा था।
सिया उसकी बचपन की मित्र थी। वह हमेशा उसके पास रहती, और कभी-कभी उसकी अजीब हरकतों पर मुस्कुराकर कहती, “आरव, तुम बहुत संवेदनशील हो। सब चीज़ें वैसी ही हैं जैसी थीं, तुम ही कुछ अलग देख रहे हो।”
आज भी उसने वही कहा। सिया ने उसे देखकर हल्की मुस्कान दी और कहा, “आरव, चाय पी लो, सुबह का नाश्ता तैयार है।”
लेकिन आरव ने महसूस किया कि वह मुस्कान भी किसी नकली परत की तरह है। वह जानता था कि सिया उसे समझ रही है, लेकिन उसका मन खुद की ही दुनिया में उलझा हुआ था।
आरव ने अपना कप उठाया। चाय में हल्का कड़वा स्वाद था। वह चाय पीते हुए खिड़की की ओर देखने लगा। बाहर की दुनिया उसकी नजरों में धुंधली और असली से अलग लग रही थी। पेड़ की पत्तियाँ, जो हमेशा हरे रंग की चमकदार दिखती थीं, आज स्याह और मुरझाई लग रही थीं। पक्षियों की चहचहाहट में एक अजीब सी चीख़ शामिल थी।
आरव को अचानक याद आया कि कुछ दिन पहले उसने एक किताब पढ़ी थी – “मन और भ्रम की गहराइयाँ”। वह किताब अब उसके दिमाग में जिंदा हो गई थी। उसने खुद से पूछा, “क्या मैं भी किसी भ्रम की दुनिया में फँस गया हूँ?”
सिया ने उसका ध्यान खींचा। “आरव, तुम ठीक हो? तुम काफी बेचैन लग रहे हो।”
आरव ने सिर हिलाया, लेकिन मन कह रहा था कि यह बेचैनी सिर्फ शुरुआत है। वह अपने कमरे में घूमने लगा। हर वस्तु उसके लिए अजीब लग रही थी। कुर्सी की टाँगें लंबी, टेबल की सतह झूलती हुई। वह खुद को रोक नहीं पा रहा था।
आरव ने महसूस किया कि वह धीरे-धीरे अपने ही दिमाग में खो रहा है। वह बाहर जाना चाहता था, हवा में साँस लेना चाहता था, लेकिन बाहर की दुनिया भी अब उसी तरह अजीब लग रही थी।
वह अपने फोन पर नोट्स खोलकर लिखने लगा।
“मैं देख रहा हूँ कि सब कुछ बदल रहा है। मुझे लगता है कि यह केवल मेरी कल्पना नहीं है। कुछ गलत है। कुछ… बहुत गलत।”
आरव ने महसूस किया कि डर अब सिर्फ उसका नहीं था – यह कमरे, घर, और बाहर की दुनिया में फैल चुका था। वह खुद को संभालने की कोशिश करता रहा, लेकिन हर कदम के साथ उसे लगता कि वह गहरे अंधेरे में खिसक रहा है।
तभी अचानक कमरे का दरवाज़ा धीमे से खुला। सिया आई। उसकी मुस्कान अब भी वही थी, लेकिन आरव को लगा कि वह मुस्कान अब वास्तविक नहीं रही। सिया की आँखों में कुछ छिपा हुआ था, कुछ जिसे केवल वही जानती थी।
सिया ने धीरे से कहा, “आरव… मैं जानती हूँ कि तुम अजीब महसूस कर रहे हो, लेकिन मैं तुम्हारे साथ हूँ। सब ठीक होगा।”
आरव ने उसकी ओर देखा। उस पल उसे लगा कि सिया ही उसकी हकीकत की आख़िरी कड़ी थी। लेकिन अंदर का डर उसे बता रहा था कि यह कड़ी भी टूट सकती है।
आरव ने महसूस किया कि अब से उसकी जिंदगी पहले जैसी नहीं रहने वाली। उसकी दुनिया अब बदल चुकी थी – और वह खुद उस बदलाव का हिस्सा बनने वाला था।