परछाइयों का शहर Jeetendra द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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परछाइयों का शहर

"क्या तुम्हें सच में लगता है कि तुम यहाँ से वापस जा पाओगे?"

अंधेरे कमरे में यह आवाज़ किसी सूखे पत्ते के रगड़ने जैसी थी। राघव ने टॉर्च जलाई। रोशनी के घेरे में धूल के कण नाच रहे थे, लेकिन आवाज़ कहाँ से आई, इसका पता नहीं चला। घड़ी में रात के तीन बज रहे थे, लेकिन इस हवेली के भीतर वक्त जैसे जम गया था।

"कौन है? मिसेज डिसूजा, आप हैं क्या?" राघव की आवाज़ कांप रही थी।

जवाब में सिर्फ एक ठंडी हवा का झोंका आया जिसने कमरे की इकलौती मोमबत्ती बुझा दी।

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तीन दिन पहले।

"बेटा, इस शहर की तासीर अलग है। यहाँ शाम के बाद साये लंबे हो जाते हैं।" टैक्सी ड्राइवर ने राघव का सामान उतारते हुए कहा था।

राघव ने हँसकर जवाब दिया था, "भैया, मैं इतिहासकार हूँ। मुझे पुरानी चीज़ों और सायों से डर नहीं लगता।"

"डरने की बात नहीं है साहब, समझने की बात है। यहाँ लोग मरते नहीं हैं, बस ओझल हो जाते हैं।" ड्राइवर ने बिना पीछे मुड़े गाड़ी आगे बढ़ा दी थी।

राघव ने सामने खड़ी 'मूनलाइट विला' की ओर देखा। झुलसी हुई दीवारों और टूटी हुई खिड़कियों वाली वह हवेली किसी बूढ़ी औरत की तरह झुकी हुई लग रही थी। दरवाजे पर मिसेज डिसूजा खड़ी थीं, हाथ में एक पुरानी लालटेन लिए।

"राघव? आओ, तुम्हारा इंतज़ार था," उनकी आवाज़ में एक अजीब सी खनक थी।

"नमस्ते। आपको कैसे पता चला कि मैं आज ही आ रहा हूँ? मैंने तो कोई पक्का समय नहीं बताया था।" राघव ने अपना सूटकेस उठाते हुए पूछा।

"यहाँ की हवाएं खबरें जल्दी लाती हैं। अंदर आओ, चाय ठंडी हो रही है।"

राघव अंदर दाखिल हुआ। अंदर की गंध बहुत पुरानी थी। जैसे बरसों से किसी ने खिड़कियां न खोली हों। 

"चाय? पर मैंने तो अभी कदम ही रखा है," राघव ने रसोई की ओर झांकते हुए कहा।

"तैयारी पहले से करनी पड़ती है। इस शहर में वक्त हाथ से रेत की तरह फिसलता है।" मिसेज डिसूजा ने प्याला मेज पर रख दिया। प्याले से धुआँ नहीं निकल रहा था, पर वह छूने में बर्फीला ठंडा था।

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वर्तमान। रात के 3:15 बजे।

राघव सीढ़ियों की ओर भागा। उसे यहाँ से निकलना था। हर कदम के साथ उसे महसूस हो रहा था कि कोई उसके पीछे चल रहा है। 

"ठहरो, राघव! इतनी जल्दी क्या है?" 

उसने पीछे मुड़कर देखा। ऊपर वाली मंजिल की रेलिंग पर एक परछाईं झुकी हुई थी। वह मिसेज डिसूजा जैसी लग रही थी, लेकिन उसका आकार बदल रहा था। वह कभी लंबी हो जाती, कभी बिल्कुल छोटी।

"मुझे बाहर जाना है! दरवाजा खोलिए!" राघव चिल्लाया।

"दरवाजा तो कभी बंद था ही नहीं। बस तुम्हारी हिम्मत बंद हो गई है," परछाईं ने जवाब दिया।

राघव मुख्य द्वार की ओर झपटा। उसने कुंडा खींचा, पर वह हिला तक नहीं। उसने लात मारी, पर लकड़ी लोहे जैसी सख्त महसूस हुई।

"चीखने से कुछ नहीं होगा," एक भारी आवाज़ उसके ठीक कान के पास आई।

वह झटके से पलटा। वहां कोई नहीं था। सिर्फ दीवार पर टंगी एक पुरानी तस्वीर थी। तस्वीर में वही हवेली थी, और खिड़की में एक लड़का खड़ा था। राघव ने करीब जाकर देखा। लड़के का चेहरा... वह बिल्कुल राघव जैसा था। उसके कपड़े भी वही थे जो राघव ने अभी पहने थे।

"यह... यह कैसे मुमकिन है? यह तस्वीर तो सालों पुरानी लग रही है," राघव की सांसें फूलने लगीं।

"याद करो राघव, तुम यहाँ पहली बार नहीं आए हो," तस्वीर के भीतर से आवाज़ आई।

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दो साल पहले। दिल्ली की एक लाइब्रेरी।

"सर, इस कस्बे का कोई रिकॉर्ड नहीं मिल रहा है। नक्शे में भी यह जगह धुंधली है," राघव के असिस्टेंट ने कहा था।

"इसीलिए तो जाना है। गुमनाम जगहों का अपना एक आकर्षण होता है," राघव ने अपनी डायरी में कुछ लिखते हुए कहा था।

"पर लोग कहते हैं वहां जो जाता है, वह अपनी परछाईं खो देता है।"

"बकवास! परछाईं कोई बटुआ नहीं है जो खो जाए। विज्ञान पर भरोसा रखो, कहानियों पर नहीं।"

राघव ने उसी दिन टिकट बुक कराई थी। पर उसकी डायरी के पिछले पन्नों पर पहले से ही उस कस्बे का नक्शा बना हुआ था। वह नक्शा उसने कब बनाया, उसे याद नहीं था।

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हवेली का हॉल। रात के 3:45 बजे।

"विज्ञान... विज्ञान कहाँ है अब?" राघव खुद से बड़बड़ाया।

दीवारों से काली स्याही जैसा कुछ रिसने लगा था। वह फर्श पर फैल रहा था। राघव ने देखा कि उसकी अपनी परछाईं फर्श पर नहीं थी। टॉर्च की रोशनी उसके पैरों के नीचे पड़ रही थी, पर वहां कोई अक्स नहीं था।

"मेरी परछाईं... कहाँ गई?" वह बदहवास होकर अपने हाथ-पांव देखने लगा।

"वह यहाँ है, मेरे पास," मिसेज डिसूजा सीढ़ियों से नीचे उतर रही थीं। उनके हाथ में एक कांच की बोतल थी। बोतल के भीतर एक काला धुआँ छटपटा रहा था।

"आपने यह क्या किया? मुझे वापस जाना है!" राघव ने उनकी ओर बढ़ने की कोशिश की, पर उसके पैर फर्श से चिपक गए थे।

"वापस कहाँ जाओगे? दिल्ली? उस लाइब्रेरी में? जहाँ तुम पहले ही एक परछाईं बन चुके हो?" मिसेज डिसूजा की आवाज़ अब भारी और मर्दाना हो गई थी।

"झूठ! मैं इंसान हूँ! मुझे महसूस हो रहा है... मेरा दिल धड़क रहा है!"

"धड़कन महसूस करो राघव। गौर से सुनो।"

राघव ने अपने सीने पर हाथ रखा। वहां खामोशी थी। कोई हलचल नहीं। कोई धड़कन नहीं। उसने अपनी कलाई पकड़ी। नाड़ी शांत थी।

"नहीं... यह नहीं हो सकता। मैं अभी कल ही तो आया हूँ।"

"तुम यहाँ सौ साल से आ रहे हो। हर बार तुम यही कहते हो। हर बार तुम अपनी एक याद यहाँ छोड़ जाते हो। इस बार तुम्हारी आखिरी याद की बारी है।"

मिसेज डिसूजा ने बोतल का ढक्कन खोल दिया। काला धुआँ बाहर निकला और राघव के चारों ओर लिपटने लगा। 

"क्या आप भी... मेरी तरह ही यहाँ फंसी हैं?" राघव ने अंतिम कोशिश करते हुए पूछा। उसकी आवाज़ अब बहुत धीमी हो गई थी।

मिसेज डिसूजा ने एक फीकी मुस्कान दी। "मैं इस शहर की पहली मुसाफिर थी, राघव। अब मैं इसकी चौकीदार हूँ। और तुम... तुम इस हवेली की अगली दीवार बनोगे।"

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अगली सुबह।

कस्बे में सूरज निकला, पर उसकी रोशनी में कोई तपिश नहीं थी। टैक्सी ड्राइवर ने अपनी गाड़ी रोकी और एक नए युवक का इंतज़ार करने लगा। 

हवेली के भीतर, मिसेज डिसूजा ने एक नई तस्वीर दीवार पर टांगी। तस्वीर में एक युवक चश्मा पहने खड़ा था, उसकी आँखों में गहरी उदासी थी। 

"चाय ठंडी हो रही है, आर्यन," मिसेज डिसूजा ने बाहर से आ रहे नए युवक को देखकर कहा।

आर्यन ने हवेली की ओर देखा। उसे लगा जैसे खिड़की पर खड़ा कोई युवक उसे रुकने का इशारा कर रहा है। या शायद वह सिर्फ एक परछाईं थी।

"जी, आ रहा हूँ," आर्यन ने मुस्कुराते हुए कहा और मौत की उस दहलीज के भीतर कदम रख दिया।

हवेली के पिछले हिस्से में, राघव की परछाईं अब फर्श पर एक पत्थर बनकर जम चुकी थी। वह चिल्लाना चाहती थी, पर पत्थरों की कोई ज़बान नहीं होती। संघर्ष खत्म नहीं हुआ था, बस उसका स्वरूप बदल गया था। शहर को एक नया हिस्सा मिल गया था, और राघव को एक अनंत इंतज़ार।

समाप्त