लाल दाग़ ARTI MEENA द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

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लाल दाग़




कक्षा में अचानक ठहाकों की आवाज़ गूँज उठी।

Sneha ने इधर-उधर देखा तो पाया कि सब बच्चे उसी की ओर घूर-घूरकर देख रहे थे और हँस भी रहे थे।



लड़कियाँ Sneha को देख कर अजीब-सी मुस्कान लिए खड़ी थीं, मानो किसी राज़ को पकड़ लिया हो।

तभी Sneha को लगा—“क्या सब मेरी बातें कर रहे हैं? ऐसा अचानक क्या हो गया?”



वह अभी सिर्फ़ 12 साल की ही तो थी—दुबली-पतली सी, काले घुँघराले बालों में दो चोटी बनाए हुए। उसकी आँखों में मासूमियत झलकती थी और पतले होंठ डर से सिमटे हुए थे।



घबराकर उसने पीछे हाथ लगाया तो उसकी उंगलियाँ खून से लाल हो गईं। यह देख मानो उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

उसके हाथ काँपने लगे, साँसें तेज़ हो गईं। वह बुदबुदाई—“हे भगवान… ये क्या हो गया?”



पूरी कक्षा की निगाहें उसी पर टिकी थीं। हर कोई उसे ऐसे घूर रहा था, जैसे उसने कोई बड़ी गलती कर दी हो।

वह असहाय-सी खड़ी रह गई। समझ ही नहीं पा रही थी कि करे तो क्या करे।



आख़िरकार Sneha कक्षा से बाहर निकली और सीधे वॉशरूम की ओर भागी।

उसके कदम थरथरा रहे थे और दिल की धड़कन इतनी तेज़ थी कि मानो सीने से बाहर निकल जाएगी।



वॉशरूम में पहुँचकर उसने शीशे में अपना चेहरा देखा।

चेहरा डर और शर्म से झुका हुआ था। आँखों में आँसू थे और होंठ काँप रहे थे।



वह रो पड़ी। उसके मन में सवाल उमड़ने लगे—“क्या मुझे भी वही बीमारी हो गई, जो पिछले महीने Radha को हुई थी?”



तभी बाहर से किसी ने आवाज़ दी—

“Sneha… मैं Radha हूँ।”



यह वही Radha थी, जो उससे एक क्लास आगे पढ़ती थी। उनके घर पास-पास थे और दोनों एक-दूसरे को अच्छी तरह जानती थीं।

Radha वॉशरूम में आई और सब समझ गई—Sneha की स्कर्ट खून से लाल हो चुकी थी।



उसने धीरे से दरवाज़ा बंद किया और Sneha के पास आकर बोली—

“डर मत… ये कोई बीमारी नहीं है। ये तो हर लड़की के साथ होता है।”
“Radha ने उसके सिर पर हाथ रखा और कहा—
‘डर इसलिए लगता है क्योंकि हमें सिखाया ही नहीं जाता।’”


Sneha हैरान थी। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। आँसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे।

Radha ने अपना दुपट्टा उतारा और कहा—

“ऐसे कर, ये पीछे बाँध ले और सीधे घर चली जा। शाम को मैं आकर तुझसे बात करूँगी।”



Sneha काँपते हाथों से दुपट्टा बाँधते हुए बाहर निकली।

रास्ते में हर कदम पर उसे लगता मानो सबकी नज़रें उसी पर टिक गई हों।“उसे समझ नहीं आ रहा था कि अगर ये सब ‘हर लड़की के साथ होता है’,
तो फिर इसके बारे में किसी ने उसे पहले क्यों नहीं बताया?”

हर हँसी, हर फुसफुसाहट उसे अपनी ओर इशारा करती सी लग रही थी।



वे लाल दाग़ उसे भीतर तक डरा गए थे।

Sneha इतनी सहम गई थी मानो कहीं खो गई हो।

धीरे-धीरे उसके पेट में दर्द भी शुरू हो गया और उसका डर और गहरा हो गया।



अब वह उन लाल दाग़ों को देखना भी नहीं चाहती थी।

हर बार नज़र पड़ते ही उसका मन काँप उठता।

वह बस चाहती थी कि किसी तरह ये सब मिट जाए और सब कुछ पहले जैसा हो जाए.......“आज Sneha को डर तो लग रहा था,
लेकिन पहली बार उसे लगा कि वह अकेली नहीं है।
शायद ये लाल दाग़ शर्म नहीं,
बल्कि किसी नए बदलाव की शुरुआत थे।”