अनजान मददगार-The Stranger fiza saifi द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

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अनजान मददगार-The Stranger

माया अपनी नाइट शिफ्ट पूरी करके कॉल सेंटर से निकली थी। नाइट शिफ्ट का ड्राइवर कैब के साथ बाहर उसका इंतज़ार कर रहा था। नाइट शिफ्ट में कॉल सेंटर की तरफ़ से ड्रॉप सर्विस मिलती थी और एक ही समय में खत्म हुई शिफ्ट के कर्मचारी एक साथ कैब में घर के लिए निकल जाते थे।

माया कैब के पास आई तो देखा सिर्फ मधव काका, कैब ड्राइवर ही ड्राइविंग सीट पर बैठे थे, सारी कैब खाली थी। वह चौंक कर हैरत से मधव से बोली,
“काका, क्या हुआ? बाकी लोग कहाँ हैं? रात के 3 बज रहे हैं, क्या मैं अकेले जाऊँगी?”

मधव काका ने कहा,
“मैडम, बाकी लोग शायद दूसरी शिफ्ट के लिए रुक गए हैं और एक-दो अपनी बाइक से चले गए हैं। आज तो आपको अकेले ही चलना पड़ेगा।”

मधव काका उतर कर पीछे का दरवाज़ा उसके लिए खोल दिया। माया ने चारों तरफ़ देखा। रात के तीन बजकर 15 मिनट हो रहे थे, दूर-दूर तक सन्नाटा और हाईवे नजर आ रहा था। माया के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आईं।

मधव काका एक पुराना और भरोसेमंद ड्राइवर था, पर रात के इस समय बाहर कुछ भी हो सकता था। माया को चिंता सत रही थी। यह हाईवे वैसे भी काफी बदनाम था, आए दिन लूट-पाट और रेप की खबरें आम थीं। मजबूरी थी कि माया को नाइट शिफ्ट कम से कम महीने में एक हफ़्ते तो करनी ही पड़ती थी।

“मैडम, आप चिंता मत कीजिए, मैं आपको सेफली घर तक पहुँचा दूँगा। भरोसा रखिए।”
माधव काका माया की परेशानी समझ रहे थे। उसे भरोसा दिलाते हुए उन्होंने कहा।

तो माया ने कहा,
“काका, मुझे आप पर भरोसा है। चलिए।”

माया मुस्कुरा कर कैब की पिछली सीट पर बैठ गई और अपना बैग साथ वाली सीट पर रख दिया। उसने फोन निकाला और हेडफोन में गाने चला लिए। माधव काका ड्राइविंग सीट पर आकर बैठे और गाड़ी स्टार्ट कर दी।

माया ने म्यूज़िक ऑन किया और सिर सीट की बैक पर टिका कर आँखें मूँद लीं। माया के पापा उसकी कॉल सेंटर की नौकरी से इसी लिए खुश नहीं थे, क्योंकि नाइट शिफ्ट हर हाल में करनी ही होती थी, जो आज के समय में किसी लड़की के लिए सेफ नहीं मानी जाती।

माया ने बड़ी मिन्नतों से अपने पापा को इस जॉब के लिए राज़ी किया था। उसका कॉलेज का लास्ट ईयर चल रहा था और पढ़ाई पूरी करने तक यही पार्ट‑टाइम वर्क उसे फाइनेंशियल हेल्प कर रहा था। अपनी मास्टर्स की पढ़ाई का सारा खर्च वह खुद उठा रही थी।

मम्मी‑पापा को उसकी चिंता लगी रहती थी। कैब चल रही थी। माधव काका बहुत संभल‑संभल कर रास्ता देखते हुए आगे बढ़ रहे थे। रात का समय था, वैसे भी इस रोड पर ट्रैफिक बहुत कम होता था।

अचानक कैब एक झटके से रुक गई… पिछली सीट पर बैठी माया ने उस झटके की वजह से चौंक कर आँखें खोली… गाड़ी सड़क के बीचोबीच सुनसान सड़क पर खड़ी थी… मधव काका ने कार की चाबी इग्निशन में दुबारा घुमाई तो गाड़ी घर्र घर्र की आवाज़ करके बंद हो गई…

माया ने चिंता से पूछा, “क्या हुआ काका?”
मधव काका ने सर घुमाकर परेशानी से कहा, “पता नहीं मैडम, अचानक इंजन बंद पड़ गया है। मैं एक बार उतर कर चेक करता हूँ, आप बाहर मत निकलना।”

मधव गाड़ी से उतरकर बोनट खोलकर चेक करने लगे… माया परेशानी से कार की खिड़की से सर निकालकर देखने की कोशिश कर रही थी, पर सिवाय धुएँ के कुछ दिखाई नहीं दे रहा था…

वो उतरकर मधव के पास चली आई।
“अरे मैडम, आप अंदर बैठो… गाड़ी गर्म हो गई है। मैं देखता हूँ, शायद कहीं पानी मिल जाए। और साथ ही ऑफिस को फ़ोन कर देता हूँ ताकि रिप्लेसमेंट कैब आ जाए और आपको पिक करके घर तक ले जाए।”

मधव ने बोनट बंद करके डिक्की से पानी का डब्बा निकाल लिया।
“पर काका, हुआ क्या है?”
“पता नहीं, अभी समझ में नहीं आ रहा। आज सुबह ही सर्विस करवाई थी मैडम… आप प्लीज अंदर बैठो, मैं आता हूँ।”

मधव काका ने जेब से फ़ोन निकाला और कैब के लिए कॉल लगाते हुए पानी की तलाश में आगे की तरफ चले गए…

माया की चिंता हद से बढ़ गई। घड़ी में देखा तो 4 बज चुके थे… मम्मी-पापा इंतजार कर रहे होंगे…
“इसे भी अभी खराब होना था।”

माया ने चिंता से गाड़ी पर एक थपथपाई… मधव को गए 5 मिनट हो चुके थे और वो सुनसान सड़क पर गाड़ी के पास घर का नंबर मिलाते हुए मधव काका का इंतजार कर रही थी, पर नेटवर्क नहीं था। फ़ोन में माया झुँझला गई…

तभी पीछे से उसने एक गाड़ी की आवाज़ और हॉर्न सुना…
वो घबरा कर पलटी।

माया ने जैसे ही पलटकर देखा, घबराहट के मारे उसकी जान ही निकल गई। सामने एक थार गाड़ी खड़ी थी, जिसमें चार मनचले लड़के बैठे थे। उनका हुलिया अजीब था—सिर पर रुमाल बंधे हुए, और शराब के नशे में धुत, गाड़ी के अंदर शोर मचा रहे थे।

माया को देखते ही उन्होंने उसके पास गाड़ी रोक दी और चारों नीचे उतर आए।

“अरे वाह… व्हाट ए ब्यूटी!”
चारों में से एक लड़का लड़खड़ाते हुए, शराब के नशे में चूर, माया के बिल्कुल करीब आ गया और बदतमीज़ी से उसके चेहरे पर हाथ फेरते हुए बोला।

माया घबराकर कैब का दरवाज़ा खोलकर अंदर बैठना चाहती थी, तभी दूसरे लड़के ने दरवाज़ा ज़ोर से बंद कर दिया और उसका हाथ पकड़ लिया।

“क्या हुआ, हमारी ही वेट कर रही थी बेबी?”
“चलो, जहाँ जाना है, साथ चलते हैं…”

उनके मुँह से शराब की गंदी बदबू आ रही थी। माया ने अपने दुपट्टे से मुँह ढकते हुए पीछे हटकर कहा,
“तुम लोग कौन हो? मुझे छोड़ो… यहाँ से चले जाओ!”

“चले जाएँ? कहाँ चले जाएँ?”
“तुम्हें यहाँ अकेला छोड़कर कैसे चले जाएँ?”
“चलो, हमारे साथ चलो…”

चारों में से एक लड़का, जिसकी शर्ट के सारे बटन खुले हुए थे, गले में रुमाल डाले हुए और कान में चेन जैसी बाली पहने हुए था, हद ही पार कर गया। उसने माया को खींचकर गाड़ी की तरफ ले जाना शुरू कर दिया। बाकी लड़के ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे।

माया की चीख निकल गई।
“प्लीज़… मुझे छोड़ दो!”

उसने पूरी ताकत से झटका देकर अपना हाथ छुड़ाया और पूरी रफ्तार से कैब की तरफ भागी। इस वक्त वह बुरी तरह काँप रही थी। मधव काका न जाने कहाँ चले गए थे। घबराहट में उसका फोन भी हाथ से छूटकर कहीं गिर गया था।

उसने जैसे ही कैब का दरवाज़ा दोबारा खोलना चाहा, वे चारों शैतान फिर से उसके सिर पर आ खड़े हुए।

“अरे यार, ये ऐसे काबू में नहीं आएगी…”

चारों में से एक ने हाथ बढ़ाकर उसके गले से दुपट्टा खींच लिया और पीछे फेंक दिया।
“देख, चुपचाप हमारी बात मान और हमारे साथ चल। वरना ये जगह भी हमारे लिए बुरी नहीं है…”

गंदी नज़रों और बेहूदा लहजे में बोलते हुए उसने आँख मारी और अपने दोस्तों की तरफ देखकर हँस पड़ा। उनके चेहरों से गंदगी टपक रही थी।

माया किसी तरह बचते हुए कैब के पीछे की तरफ जाकर छिपने की कोशिश करने लगी, लेकिन सब बेकार था। वह पसीने से भीगी हुई, खुद को बचाने की नाकाम कोशिश कर रही थी। चारों उसके सिर पर सवार थे।

“अरे यार, ये प्यार से नहीं मानेगी…”
“चल रॉकी, इसके हाथ पकड़…”
“और तू… अमित, इसके पैर पकड़। उठाओ इसको…”
“गाड़ी में डालो इसे!”

और इतना कहते ही उसके दोनों दोस्त, अमित और विक्की, माया के हाथ पकड़कर उसे उठाने लगे और गाड़ी की तरफ घसीटने लगे। माया को अपनी ज़िंदगी तबाही की ओर जाती हुई साफ़ दिखाई दे रही थी। उसके शरीर में खुद को बचाने की ताक़त जैसे खत्म होती जा रही थी। ऐसा लग रहा था मानो अब उसके शरीर में जान ही नहीं बची हो।

चारों ने उसे किसी जानवर की तरह हाथ‑पैर से उठाया हुआ था। एक लड़का गाड़ी में बैठकर उसे स्टार्ट कर चुका था, दूसरे ने पीछे का दरवाज़ा खोल दिया था, और वे दोनों माया को गाड़ी में डालने ही वाले थे कि तभी एक सफ़ेद कार बहुत तेज़ी से आकर वहाँ रुकी।

दोनों लड़के घबरा गए और माया को छोड़ दिया। सफ़ेद कार से उतरता हुआ शख़्स तेज़ी से उनके सामने आकर खड़ा हो गया।

“यहाँ क्या हो रहा है? तुम लोग कौन हो?”

उसकी रौबदार आवाज़ और सख़्त शख़्सियत देखकर दोनों लड़के पीछे हट गए। माया ने उस आने वाले को देखा—एक लंबा‑चौड़ा आदमी उसके सामने खड़ा था।

“माया मैम, आप इधर आ जाइए,”
उसने अचानक माया को नाम लेकर पुकारा और अपने पीछे आने का इशारा किया।

माया चौंकते हुए उसकी तरफ़ देखती हुई पीछे हट गई। वह आदमी फिर उन चारों के पास पहुँचा।
“शर्म नहीं आती? शराब पीकर मासूम लड़कियों को परेशान करते हो? यही सिखाया है तुम्हारे माँ‑बाप ने?”

“ओए, तू है कौन? चल, लड़की को छोड़ और यहाँ से निकल,”
ड्राइविंग सीट पर बैठा अमित उसके रौब से ज़रा भी न डरते हुए बोला।

“मैं बताता हूँ तुझे कि मैं कौन हूँ,”
यह कहते हुए उसने ज़ोरदार थप्पड़ अमित के गाल पर जड़ दिया। बाकी तीनों डर के मारे पीछे की सीट पर जा बैठे।

अमित गाल सहलाता हुआ ड्राइविंग सीट पर लौट आया।
“देख लूँगा तुझे… बहुत गर्मी है ना?”

“चुपचाप अपने इन लफंगे दोस्तों के साथ यहाँ से निकल जा, वरना ज़िंदगी भर जेल में सड़ेगा,”
उसने कड़क आवाज़ में फटकारा।

थार आगे बढ़ गई और कुछ ही पलों में वहाँ से दूर हो गई।

उनके जाने के बाद वह आदमी माया की तरफ़ आया। सड़क पर पड़ा माया का मोबाइल और दुपट्टा उठाकर उसकी तरफ़ बढ़ाते हुए बोला,
“आप गाड़ी में बैठिए, मैम। मैं कंपनी की तरफ़ से आया हूँ। मधव काका ने कैब खराब होने की शिकायत की थी।”

माया हैरानी से सब देख रही थी। उसकी बात सुनकर उसने राहत की साँस ली।
“मधव काका अभी तक नहीं आए…”

“वो कैब लेकर आ जाएँगे। आप मेरे साथ चलिए, अपना सामान ले लीजिए। मैं आपको घर ड्रॉप कर देता हूँ। रात बहुत हो गई है।”

वह ड्राइविंग सीट पर बैठ गया और माया ने अपना सामान उठाया। पीछे की सीट पर बैठते ही उसने सिर सीट से टिका दिया। उसकी आँखों से आँसू अपने‑आप बहने लगे। आज क्या से क्या हो जाता…
पापा‑मम्मी को वह कुछ नहीं बताएगी। बस यही कहेगी कि आज देर से निकली थी, इसलिए देर हो गई।

न जाने कितनी ही सोच और फिक्र उसे घेरे हुए थीं कि कब कैब अपनी मंज़िल पर आकर रुकी, उसे पता ही नहीं चला। जैसे ही गाड़ी रुकी, माया की माँ दरवाज़े पर ही मिल गईं—परेशान चेहरे के साथ।

“बेटा, इतनी देर कैसे हो गई?”

माया गाड़ी से उतरकर अपना सामान लेने लगी। अब वह काफी हद तक खुद को संभाल चुकी थी।
“अरे माँ, आप यहाँ क्यों इंतज़ार कर रही हैं? कितनी बार कहा है, परेशान मत हुआ करें। आज बस निकलने में थोड़ा ज़्यादा टाइम लग गया, इसलिए देर हो गई। अब आ गई हूँ ना।”

“और तेरा फ़ोन भी नहीं लग रहा था,” माँ बोलीं।
“अरे हाँ माँ, फ़ोन की बैटरी खत्म हो गई थी, इसलिए…”
“चलो, अब अंदर चलें।”

माँ के पीछे‑पीछे अंदर जाते हुए माया ने मुड़कर कैब की ड्राइविंग सीट पर बैठे उस शख़्स को देखा।
एक लड़की अपने साथ हुए हादसे को कितनी सफ़ाई से छुपा गई थी—सिर्फ़ इस ख़याल से कि अगर उसके माता‑पिता को पता चलता, तो वे कितने परेशान हो जाते।

माया को देखते हुए वह हल्के से मुस्कुरा दिया—ऐसी मुस्कान, जैसे उसे तसल्ली दे रहा हो, जैसे कह रहा हो कि हिम्मत रखो, सब ठीक है।

माया अंदर चली गई…
और कैब आगे बढ़ गई।

अगले दो दिन माया की छुट्टी थी, वो अपनी पढ़ाई में बिज़ी रही। तीसरे दिन वो कॉल सेंटर पहुँचि तो मैनेजमेंट ऑफिस जाकर उसने अपनी शिफ्ट चेंज करने की अर्जी दे दी।

वहाँ से बाहर निकलते हुए उसे मधव काका मिल गए।
“अरे काका, आप ठीक हैं ना? उस दिन कब घर पहुँचे थे? आप बहुत परेशान हुई होंगे ना?” उसने मधव काका को देखकर जल्दी से पूछा।

मधव काका बोले,
“अरे मैडम, बस बहुत मुश्किल से ढूँढकर पानी लाया था। वहाँ पहुँच तो आप नहीं थी और फोन भी लग रहा था आपका। मैंने ऑफिस भी कॉल लगाने की कोशिश की थी, वहाँ भी बात नहीं हो पाई। आप उस दिन कैसे घर पहुँची?”

मधव काका की बात सुनकर वो बहुत हैरानी से उनको देख रही थी। समझ नहीं आया क्या बोले।

तभी किसी को मधव काका ने आवाज़ दी तो वो उसे हैरान सा छोड़कर चले गए।

माया दौड़कर कैब रॉस्टर मैनेजर के पास पहुँचि।
“क्या आप मुझे बता सकती हैं कि शनिवार रात मधव काका की कैब रिप्लेसमेंट लेकर कौन आया था?”

राजन नाम के लड़के ने कंप्यूटर में चेक करके सिर हिला दी।
“इस शनिवार तो कोई रिप्लेसमेंट की रिपोर्ट मेरे पास नहीं आई है और पिछले शनिवार तो सभी ड्राइवर डे शिफ्ट में ही थे। सिर्फ मधव काका ही एक रूट की नाइट शिफ्ट पर थे। उस दिन अगर वो रिप्लेसमेंट मांगते तो कोई उपलब्ध भी नहीं था।”

“बात क्या है? आप कुछ बताएंगी?”
राजन के मुँह से निकलते शब्द माया के पैरों से जान निकाल गई। वो उसकी बात का जवाब दिए बिना ही ऑफिस से बाहर निकल आई।

“शायद कोई रास्ते का इंसान था, मुझे परेशान देखकर मदद के लिए आया था… पर नहीं, उसने खुद कहा था कि उसे ऑफिस से भेजा गया है। और उसने साफ़-साफ़ माया का नाम लिया और उसे बताया था… कौन था वो…”

माया कैन्टीन में बैठी जितना सोच रही थी उतना ही उलझ रही थी और दिमाग था कि शोर कर रहा था। हैरानी के समंदर में वो डूबी सोच रही थी।

तभी टेबल पर रखा उसका मोबाइल बीप हुआ। शायद कोई मैसेज था। माया ने यूँ ही मैसेज बॉक्स खोला। एक मैसेज देखकर उसकी आँखों की हैरानी बढ़ गई।

“माया, जरूरी नहीं कि हर सवाल का जवाब ढूँढा जाए। कुछ राज़ अनसुलझे रहना चाहिए।”