वन के घने अंधकार में, जहां सूरज की किरणें भी मुश्किल से छनकर आती थीं, पांडवों का वनवास अपने चरम पर पहुंच चुका था। बारह वर्ष की कठिन यात्रा के बाद, वे अब अज्ञातवास की तैयारी में थे। युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव—ये पांच भाई अपनी पत्नी द्रौपदी के साथ जंगल की गहराइयों में भटक रहे थे। प्यास से व्याकुल, वे एक सरोवर की तलाश में थे। अचानक, नकुल की नजर एक चमकते हुए जलाशय पर पड़ी। "भैया, देखो! वहां पानी है!" नकुल उत्साहित होकर बोला और दौड़कर सरोवर की ओर गया।
लेकिन जैसे ही नकुल ने पानी पीने के लिए झुका, आकाश से एक रहस्यमयी आवाज गूंजी। "रुक जाओ, हे मनुष्य! यह सरोवर मेरा है। पहले मेरे प्रश्नों का उत्तर दो, तब पानी पीना।" नकुल ने आवाज की परवाह न की। वह इतना प्यासा था कि उसने पानी पी लिया। तुरंत ही वह मूर्छित होकर गिर पड़ा। सहदेव, जो पीछे से आ रहा था, ने भाई को गिरा देखा और वह भी पानी पीने लगा, बिना आवाज पर ध्यान दिए। वह भी बेहोश हो गया।
अर्जुन और भीम को चिंता हुई। वे सरोवर पहुंचे और अपने भाइयों को मृतप्राय देखकर स्तब्ध रह गए। आवाज फिर गूंजी, "मेरे प्रश्नों का उत्तर दो, तब पानी पीना।" लेकिन क्रोधित भीम ने आवाज को चुनौती दी और पानी पी लिया। वह भी गिर पड़ा। अर्जुन ने अपना गांडीव उठाया, लेकिन पानी पीने से पहले ही मूर्छित हो गया। अब केवल युधिष्ठिर बचे थे। वे धीरे-धीरे सरोवर की ओर बढ़े। अपने चारों भाइयों को निर्जीव देखकर उनका हृदय द्रवित हो गया, लेकिन वे शांत रहे।
आवाज फिर गूंजी, "हे राजकुमार! यदि तुम पानी पीना चाहते हो, तो मेरे प्रश्नों का उत्तर दो। मैं यक्ष हूं, इस सरोवर का स्वामी।" युधिष्ठिर ने हाथ जोड़कर कहा, "हे यक्ष! मैं आपके प्रश्नों का उत्तर देने को तैयार हूं। कृपया पूछिए।" यक्ष प्रसन्न हुआ। उसने कहा, "तुम बुद्धिमान हो। सुनो, मेरे प्रश्न।"
यक्ष का पहला प्रश्न था, "कौन सा व्यक्ति सबसे भारी है?" युधिष्ठिर ने सोचा और उत्तर दिया, "माता सबसे भारी है, क्योंकि पृथ्वी भी उसके बोझ को सहन करती है।" यक्ष ने हंसकर कहा, "सही उत्तर। अगला प्रश्न: कौन सा व्यक्ति सबसे ऊंचा है?" युधिष्ठिर बोले, "पिता सबसे ऊंचा है, क्योंकि आकाश भी उसके सिर को छूता है।"
यक्ष ने जारी रखा, "कौन सी चीज सबसे तेज चलती है?" युधिष्ठिर ने कहा, "मन सबसे तेज चलता है, क्योंकि वह पलक झपकते ही दूर-दूर पहुंच जाता है।" यक्ष प्रभावित हुआ। "कौन सा जीव सबसे अधिक संख्या में है?" युधिष्ठिर का उत्तर था, "कीड़े-मकोड़े और छोटे जीव सबसे अधिक हैं।"
संवाद जारी रहा। यक्ष ने पूछा, "सूर्य से अधिक चमकदार क्या है?" युधिष्ठिर ने कहा, "ज्ञान सूर्य से अधिक चमकदार है।" "पृथ्वी से अधिक धैर्यवान कौन?" "माता पृथ्वी से अधिक धैर्यवान है।" "आकाश से अधिक विस्तृत क्या?" "मन आकाश से अधिक विस्तृत है।" "हवा से तेज क्या?" "चिंता हवा से तेज है।"
यक्ष के प्रश्न गहन होते जा रहे थे। "मृत व्यक्ति कौन सा कार्य करता है?" युधिष्ठिर ने कहा, "जो व्यक्ति दान नहीं करता, वह मृत के समान है।" "जीवित रहते हुए भी मृत कौन?" "जो गरीब है और मदद नहीं मांगता, वह जीवित रहते हुए मृत है।" "सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है?" युधिष्ठिर का प्रसिद्ध उत्तर था, "प्रतिदिन लोग मरते हैं, फिर भी जीवित लोग अमर होने का भ्रम पाले रहते हैं। यही सबसे बड़ा आश्चर्य है।"
यक्ष ने कई और प्रश्न पूछे। "धर्म क्या है?" "अहिंसा परमो धर्मः।" "सबसे बड़ा शत्रु कौन?" "क्रोध सबसे बड़ा शत्रु है।" "सबसे बड़ा मित्र कौन?" "ज्ञान सबसे बड़ा मित्र है।" "सुख क्या है?" "संतोष सुख है।" "दुख क्या है?" "लोभ दुख है।"
युधिष्ठिर के प्रत्येक उत्तर से यक्ष अधिकाधिक प्रसन्न होता गया। अंत में यक्ष ने कहा, "हे युधिष्ठिर! तुमने मेरे सभी प्रश्नों का सही उत्तर दिया। अब मांगो, क्या वरदान चाहिए?" युधिष्ठिर ने विनम्रता से कहा, "हे यक्ष! मेरे भाइयों को जीवनदान दीजिए।" यक्ष ने हंसकर कहा, "तुम्हें केवल एक भाई को जीवित करने का अधिकार है। चुनो, किसे जीवित करूं?"
युधिष्ठिर ने सोचा। वे जानते थे कि अर्जुन और भीम युद्ध में महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उन्होंने कहा, "नकुल को जीवित कीजिए।" यक्ष आश्चर्यचकित हुआ। "क्यों नकुल? वह तो सबसे छोटा है।" युधिष्ठिर बोले, "मेरी माता कुंती के तीन पुत्र हैं—मैं, भीम और अर्जुन। लेकिन माध्री के दो—नकुल और सहदेव। यदि नकुल जीवित रहा, तो दोनों माताओं के एक-एक पुत्र रहेंगे। न्याय यही है।"
यक्ष इतना प्रभावित हुआ कि उसने अपना असली रूप प्रकट किया। वह कोई और नहीं, स्वयं धर्मराज यम थे, युधिष्ठिर के पिता। "हे पुत्र! मैं तुम्हारी परीक्षा ले रहा था। तुम धर्म के सच्चे अनुयायी हो। मैं सभी भाइयों को जीवित करता हूं।" और तुरंत ही नकुल, सहदेव, अर्जुन और भीम उठ बैठे।
पांडवों ने यम को प्रणाम किया। यम ने उन्हें आशीर्वाद दिया और कहा, "तुम्हारा वनवास सफल होगा। धर्म की रक्षा करो।" फिर वे अंतर्धान हो गए।
यह घटना पांडवों के जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ थी। युधिष्ठिर की बुद्धिमत्ता और धर्मनिष्ठा ने न केवल उनके भाइयों को बचाया, बल्कि उन्हें जीवन के गहन सत्यों से परिचित कराया। जंगल की उस सरोवर के किनारे हुआ यह संवाद आज भी लोगों को प्रेरित करता है। यह बताता है कि ज्ञान, धैर्य और न्याय कितने महत्वपूर्ण हैं।
कहानी आगे बढ़ती है। इस घटना के बाद पांडवों ने अपना अज्ञातवास राजा विराट के दरबार में बिताया। युधिष्ठिर कंक नाम से ब्राह्मण बने, भीम बल्लभ नाम से रसोइया, अर्जुन बृहन्नला नाम से नृत्य शिक्षक, नकुल ग्रंथिक नाम से अश्वपालक और सहदेव तंतिपाल नाम से गौपालक। द्रौपदी सैरंध्री बनीं।
अज्ञातवास के दौरान कई चुनौतियां आईं। कीचक ने द्रौपदी पर बुरी नजर डाली, लेकिन भीम ने उसे मार डाला। फिर कौरवों ने विराट की गायें चुरा लीं। अर्जुन ने उत्तरा के सारथी बनकर उन्हें हराया। इस प्रकार अज्ञातवास सफल हुआ।
लेकिन यक्ष-युधिष्ठिर संवाद की स्मृति हमेशा उनके साथ रही। युधिष्ठिर अक्सर सोचते कि जीवन का सबसे बड़ा आश्चर्य मृत्यु का भ्रम है। युद्ध के मैदान में, जब कुरुक्षेत्र की लड़ाई हुई, युधिष्ठिर ने इसी ज्ञान से प्रेरणा ली। उन्होंने अधर्म का साथ नहीं दिया, भले ही वह उनके गुरु द्रोण या भाई कर्ण हों।
महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ। पांडव विजयी हुए, लेकिन विजय की कीमत भारी थी। युधिष्ठिर राजा बने, लेकिन हृदय में शोक था। वे यक्ष के प्रश्नों को याद करते और सोचते कि सच्चा सुख संतोष में है।
आज भी, जब कोई व्यक्ति जीवन की उलझनों में फंसता है, तो इस संवाद को याद करता है। यह कहानी नहीं, बल्कि एक दर्शन है—धर्म, ज्ञान और न्याय का दर्शन। युधिष्ठिर की तरह, हमें भी प्रश्नों का सामना करना चाहिए, उत्तर खोजना चाहिए। क्योंकि जीवन एक सरोवर है, जहां पानी पीने से पहले सत्य जानना जरूरी है।
(शब्द संख्या: लगभग 1050)