Last Flight : रसोई की चारदीवारी और खामोश चीखें! Akshay Sharma द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

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Last Flight : रसोई की चारदीवारी और खामोश चीखें!

क्या आपने कभी उस खामोशी को सुना है जो एक जलती हुई रोटी और खौलती हुई दाल के बीच दम तोड़ देती है? 'Last Flight' उन करोड़ों भारतीय स्त्रियों की कहानी है जिन्होंने अपनी उम्र रसोई के डिब्बों को गिनते हुए गुजार दी। यह कहानी है 'मीरा' की, जिसके सपनों की अर्थी उसी दिन उठ गई थी जिस दिन उसकी डोली उठी थी। यह किताब सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि उन आंसुओं का सैलाब है जो समाज के डर से कभी पलकों से बाहर नहीं आए। अगर आपकी रूह को झकझोरने और आपकी आँखों को भिगोने का साहस मुझमें है, तो ही इस किताब के अगले पन्ने को पलटियेगा।

मीरा के दिन की शुरुआत सूरज उगने से पहले होती और अंत बर्तन मांजने की आवाज़ के साथ। उसके लिए दुनिया का मतलब था—मसालेदानी के सात खांचे। समाज के ताने उसके कानों में पिघले हुए शीशे की तरह उतरते थे, "पढ़ी-लिखी होकर भी क्या किया? अंत में तो चौका-बर्तन ही नसीब हुआ।"
वह रोती, पर उसके आंसुओं को पोंछने वाला कोई नहीं था। उसके बच्चे ही उसकी दुनिया थे, पर वह अंदर ही अंदर मर रही थी।
"जिस घर की दीवारों को उसने अपने खून से सींचा,
उसी घर की चौखट उसके लिए बेड़ियाँ बन गईं।"
एक रात, जब सब सो रहे थे, उसने खिड़की से बाहर देखा। चांद भी उसे कैद लगा। उस दिन उसने तय किया कि वह अब सिर्फ 'जीएगी' नहीं, बल्कि 'उड़ेगी'।

मीरा ने पुरानी अलमारी से अपनी किताबें निकालीं। ससुर की डांट और पति की बेरुखी के बीच उसने रातों को जागकर पढ़ना शुरू किया। जब वह पढ़ती, तो उसे भूख नहीं लगती थी। उसने सीखा कि आत्म-सम्मान क्या होता है।
एक सुबह, उसने अपनी साड़ी का पल्लू कमर में बांधा और घर से बाहर कदम रखा। पड़ोसियों की नजरें उसके चरित्र पर सवाल उठा रही थीं, लेकिन मीरा की नजरें सामने के उस जंगल पर थीं जिसे उसने बरसों से सिर्फ खिड़की से देखा था।
पहली बार उसने बहती नदी के संगीत को सुना। उसने देखा कि कैसे एक तितली बिना किसी से पूछे फूलों का रस पी रही थी। उसने सोचा, "अगर कुदरत आज़ाद है, तो मैं क्यों नहीं?"
"मर्यादा की चादर ओढ़कर जो बाहर निकली है,
समझो वो नारी अब अंगारों पर चलने को निकली है।"

मीरा ने अपना हुनर पहचाना—वह सिलाई और शिक्षा में माहिर थी। उसने अपनी छोटी सी दुनिया बनाई। उसने समाज को नहीं बदला, बल्कि समाज की परवाह करना छोड़ दिया। अब वह कमाने लगी थी। उसके बच्चों के पास अब बेहतर किताबें और बेहतर संस्कार थे।
दुख इस बात का था कि जिस समाज ने उसे 'मर्यादा' सिखाई, उसी ने उसे कभी 'इंसान' नहीं समझा। उसकी आँखों में अब भी आंसू थे, पर वे बेबसी के नहीं, बल्कि उस संघर्ष के थे जिसने उसे पत्थर से हीरा बना दिया था।

आज मीरा उस ऊंचाई पर है जहाँ से नीचे देखने पर समाज के ताने बौने नजर आते हैं। वह आज़ाद है। उसने अपनी 'Last Flight' (आखिरी उड़ान) भर ली है—उन बंधनों से दूर जो उसे जकड़े हुए थे।

संदेश:
इंसान के पंख मांस-हड्डियों के नहीं, बल्कि उसके विचारों के होते हैं। यदि आपके पास हुनर और मर्यादा है, तो पूरा आसमान आपका है।