जीवन की पहचान : रीमा Shivani Jatinkumar Pandya द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

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जीवन की पहचान : रीमा

रीमारीमा… फैशन की दुनिया में यह नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं था। अंतरराष्ट्रीय फैशन शो, नामी ब्रांड्स, विदेशी मैगज़ीनों के कवर—सब जगह उसकी डिज़ाइनों की चर्चा थी। लोग कहते थे, “रीमा के हाथों में जादू है।” पर इस चमकदार दुनिया के पीछे एक ऐसी सच्चाई छुपी थी, जिसे रीमा ने खुद भी कभी गंभीरता से नहीं देखा था।रीमा की ज़िंदगी हमेशा तेज़ रफ्तार में चलती रही। मीटिंग्स, डिज़ाइन, ट्रैवल, इंटरव्यू—उसके पास रुकने का समय ही नहीं था। उसने सफलता को ही जीवन का लक्ष्य मान लिया था। परिवार, रिश्ते, सेहत—सब कुछ पीछे छूटता चला गया।लेकिन ज़िंदगी जब सिखाती है, तो अचानक और गहराई से सिखाती है।एक दिन अचानक रीमा की तबीयत बिगड़ गई। तेज़ बुखार, कमजोरी और सांस लेने में तकलीफ। जांच के बाद डॉक्टरों ने बताया कि उसे गंभीर बीमारी है और लंबे इलाज की ज़रूरत पड़ेगी। रीमा को शहर के एक सामान्य अस्पताल में भर्ती किया गया। एक छोटा सा कमरा, सफेद दीवारें और एक साधारण सा बिस्तर—यही अब उसकी दुनिया थी।रीमा, जिसने कभी पांच सितारा होटलों से नीचे रुकना स्वीकार नहीं किया था, आज एक अस्पताल के बेड पर लेटी थी। पहली बार उसे अपनी सांसों की आवाज़ सुनाई दे रही थी। पहली बार उसे अपने शरीर की नाज़ुकता का एहसास हुआ।उसके महंगे कपड़े, कीमती गहने, नाम और शोहरत—सब कुछ अस्पताल के दरवाज़े के बाहर ही रह गया था। यहां न कोई रीमा को पहचानता था, न उसकी सफलता की परवाह करता था। यहां सभी मरीज़ एक जैसे थे—कमज़ोर, असहाय और उम्मीद के सहारे जीते हुए।इलाज के दौरान रीमा ने कई लोगों को देखा। किसी के पास पैसे नहीं थे, फिर भी चेहरे पर सुकून था। किसी के पास परिवार का सहारा था, तो किसी के पास सिर्फ़ हिम्मत। बगल के बेड पर एक बुज़ुर्ग महिला थी, जो हर दिन मुस्कुराकर भगवान का शुक्रिया अदा करती थी।एक दिन रीमा ने उससे पूछा,“आप इतनी शांति से कैसे रह पाती हैं?”महिला मुस्कुराई और बोली,“बेटी, जो है उसी में संतोष कर लिया है। बाकी सब तो छूट ही जाना है।”यह वाक्य रीमा के दिल में उतर गया।उसे एहसास हुआ कि उसने पूरी ज़िंदगी ‘और ज़्यादा’ पाने में गुज़ार दी, लेकिन ‘काफी’ क्या होता है, यह कभी नहीं समझा। उसने शरीर को एक मशीन की तरह इस्तेमाल किया, आत्मा की आवाज़ कभी नहीं सुनी।इलाज के दिनों में परिवार रोज़ मिलने आता। मां की आंखों में डर, पिता की खामोशी और भाई की बेचैनी—इन सबने रीमा को अंदर से हिला दिया। उसे लगा, उसने जिन्हें सबसे ज़्यादा नजरअंदाज़ किया, वही आज सबसे ज़्यादा उसके साथ खड़े हैं।कई हफ्तों बाद जब रीमा की हालत सुधरी, तो वह पहले जैसी नहीं रही। अस्पताल ने उसे सिर्फ़ इलाज नहीं दिया था, बल्कि जीवन को नए नज़रिए से देखने की दृष्टि दी थी।घर लौटने के बाद रीमा ने अपने काम का तरीका बदला। अब डिज़ाइन उसके लिए सिर्फ़ फैशन नहीं था, बल्कि भावनाओं की अभिव्यक्ति था। उसने छोटे कारीगरों और गरीब लड़कियों को प्रशिक्षण देना शुरू किया। उसने समझ लिया था कि सफलता तभी सार्थक है, जब वह दूसरों की ज़िंदगी में रोशनी लाए।आज भी रीमा एक मशहूर डिज़ाइनर है, लेकिन अब उसकी पहचान सिर्फ़ उसके नाम से नहीं, उसके काम और संवेदनशीलता से होती है।वह कहती है—“मैंने दुनिया के लिए कपड़े डिज़ाइन किए,पर अस्पताल ने मुझे ज़िंदगी डिज़ाइन करना सिखाया।”रीमा जान चुकी थी—पैसा बहुत कुछ खरीद सकता है,लेकिन सुकून, समय और जीवन नहीं।और यही समझ उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि बन गई।