असुरविद्या - 5 OLD KING द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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असुरविद्या - 5

शाही दावत


मुंबई की दोपहर की चिलचिलाती धूप अब विहान के शरीर को जला नहीं रही थी, बल्कि उसे अपनी नई शक्ति का एहसास करा रही थी. भिंडी बाजार की उन तंग और बदबूदार गलियों से बाहर निकलते समय उसके बैग का भार बढ चुका था. रुपये सत्रह लाख चालीस हजार—एक ऐसी रकम, जिसके बारे में विहान ने अपने पूरे जीवन में केवल सपनों में सोचा था. लेकिन आज वह कागज के उन टुकडों का मालिक था.
उसने एक ऊँची इमारत के नीचे स्थित' ग्लोबल मोबाइल वर्ल्ड' में कदम रखा. अंदर की एअर- कंडीशनर हवा ने उसके ओवरकोट के भीतर छिपे पसीने को सुखा दिया. विहान ने बिना काउंटर की ओर देखे सीधे प्रीमियम सेक्शन की ओर इशारा किया.
एक सबसे महंगे स्मार्टफोन, लेटेस्ट मॉडल. और एक स्मार्टवॉच, विहान की आवाज में वह अधिकार था जो केवल भारी जेब वाले व्यक्ति के पास होता है.
दुकानदार ने उसे शक की नजर से देखा—एक धूल भरा ओवरकोट पहने युवक दो लाख का सामान मांग रहा था. विहान ने बिना एक शब्द कहे बैग से नोटों की दो गड्डियां निकालीं और कांच के काउंटर पर रख दीं. नोटों की गूँज ने दुकानदार के शक को सम्मान में बदल दिया. विहान ने नकद भुगतान किया, एक नया सिम कार्ड लिया जो एक फर्जी पते पर पंजीकृत था.
उसे पता था कि आधुनिक युग में किसी को मिटाना है, तो उसकी डिजिटल परछाई को मिटाना सबसे जरूरी है.
क्यों कि वो बहुत जल्द कुछ ऐसा करने वाला था जो कानून के नजरों में गलत था उसने सोच लिया था कि वो अब इतना सोना बनाए गा की जिसे वो एक पूरा महल बना सके.
दुकान से निकल कर विहान ने अपना पुराना फोन निकाला. उसकी स्क्रीन चटक चुकी थी, ठीक वैसी ही जैसे उसकी पुरानी जिंदगी. उसने सोशल मीडिया पर अपनी प्रोफाइल देखी—न कोई फोटो, न कोई स्टेटस. विहान खन्ना हमेशा से एक' साया' था, जिसे किसी ने कभी नोटिस नहीं किया.
उसने एक- एक करके अपने सारे अकाउंट डिलीट कर दिए. ईमेल, क्लाउड स्टोरेज, मैसेज—सब कुछ साफ कर दिया. अंत में, उसने फोन का सिम कार्ड निकाला और उसे अपने दाँतों से चबाकर तोड दिया. फोन को उसने फैक्ट्री रीसेट किया और फिर उसे एक भारी पत्थर से कुचलकर डस्टबिन में डाल दिया.
अब विहान खन्ना डिजिटल दुनिया के लिए मर चुका है, उसने बुदबुदाया. अब उसका कोई' लोकेशन डेटा' नहीं था, कोई' सर्च हिस्ट्री' नहीं थी. वह अब एक ऐसा भूत था जिसके पास केवल भौतिक अस्तित्व था.
विहान ने नए फोन में नया सिम डाला और घर का नंबर मिलाया. वह जानता था कि उत्तर प्रदेश के राजीपुर' गाँव में इस वक्त शाम के खाने की तैयारी हो रही होगी.
फोन उसकी माँ ने उठाया. हैलो? कौन?
माँ, मैं विहान, विहान ने गहरी साँस लेकर कहा.
अरे लल्ला! तूने कल ही तो बात की थी, आज फिर? सब खैरियत तो है ना? तूने फोन क्यों बदल लिया? माँ की आवाज में ममता और घबराहट दोनों थी.
अरे माँ, वो पुराना फोन चोरी हो गया. सुनो, मैंने पीहू के अकाउंट में तीन लाख रुपये भेज दिए हैं. पहुँच गए होंगे।
जैसे ही' तीन लाख' का नाम आया, फोन के दूसरी तरफ से एक जोरदार चीख सुनाई दी. यह विहान की दादी थी. दादी दिन भर टीवी पर' सास- बहू' वाले सीरियल देखती थीं और उनकी बातें अब बिल्कुल नाटकों जैसी हो गई थीं.
हे नारायण! अनर्थ हो गया! दादी ने फोन छीनते हुए चिल्ला कर कहा. विहान. ओ रे कुलदीपक! इतने पैसे कहाँ से आए? कहीं तूने किसी स्मगलर की बेटी से गंधर्व विवाह तो नहीं कर लिया? या तूने अपनी किडनी बेच दी? सीरियल' खून भरी माँग' में भी ऐसा ही हुआ था!
विहान की आँखों में आँसू थे, पर दादी की बात सुनकर उसकी हंसी छूट गई. नहीं दादी! कोई किडनी नहीं बेची और न ही कोई शादी की है. शांति रखिए।
तभी बाबूजी ने फोन लिया. उनकी आवाज गंभीर थी. विहान, सच बता बेटा. तू अभी college का छात्र है, पार्ट- टाइम काम करके तीन लाख कैसे कमा लिए?
विहान ने अपना वही झूठ दोहराया, बाबूजी, मैंने बताया था ना, कंपनी का project सफल हुआ है. मेरा काम थोडा मुश्किल है, कोडिंग और डेटा का चक्कर है, आप नहीं समझेंगे. पर पैसा बहुत अच्छा है. बस आप लोग वो साहूकार का एक लाख का कर्जा चुका दीजिए. मुझे पता है आपने मेरे लिए वो कर्जा लिया था।
बाबूजी सन्न रह गए. तुझे. तुझे कैसे पता चला?
पता चल जाता है बाबूजी. अब आप उस दुकान पर नहीं बैठेंगे. पीहू से कहिए कि सबको अच्छा खाना खिलाए. और माँ. विहान रुक गया, कॉलेज की चिंता मत करना. ये जो भी आज मेरे पास है, सब मेरी उन' किताबों' की बदौलत ही है।
उसने मन ही मन कडवा सच सोचा—' अगर मैंने अपनी आत्मा और अपनी किताबें न बेची होतीं, तो आज भी मैं फुटपाथ पर सो रहा होता।
दादी ने फिर फोन झपट लिया. सुन लल्ला! अगर तू दीवाली पर नहीं आया, तो मैं अन्न- जल त्याग दूँगी! जैसे वो सीरियल में कोकिला बेन ने किया था! और हाँ. मेरे लिए एक बनारसी साडी लाना, वैसी ही जैसी वो वैम्प पहनती है!
विहान मुस्कुराया. लाऊँगा दादी, पक्का लाऊँगा. सबको मेरा प्रणाम कहना और सब लोग बैंक अकाउंट खुलवा लो।
फोन काटते ही विहान के चेहरे से मुस्कान गायब हो गई. वह अपनी पुरानी खोली (कमरे) के लिए टैक्सी रुकवाई पैसे अधिक लगेंगे चलेगा लेकिन रिश्क नहीं लेंगे सोच कर टैक्सी ने बैठ गया.
समय: दोपहर के तीन: बीस बजे वो अपने चॉल पहुंच गया था.
विहान मुंबई के' कुर्ला' जैसी घनी आबादी वाली चॉल की तीसरी मंजिल पर एक छोटी सी' खोली' (दसxदस का कमरा) में रहता है.
विहान ने जब अपनी चॉल की सीढियों पर कदम रखा, तो उसके शरीर में एक अजीब सी ऊर्जा दौड रही थी. रुपये बारह लाख तीस हजार की नकदी उसके पुराने बैग में किसी सोए हुए ज्वालामुखी की तरह थी. वह सीधा अपनी खोली में घुसा और सबसे पहले अंदर से मजबूत कुंडी चढाई.
विहान ने सबसे पहले अपना नया स्मार्टफोन निकाला. उसकी स्क्रीन की चमक उस अंधेरे कमरे में किसी उम्मीद की तरह थी. सुबह से पेट में एक दाना भी नहीं गया था, उसने एक नामी रेस्तरां से शाही पनीर, कश्मीरी पुलाव और मलाई कोफ्ता ऑर्डर किया. रुपये तीन हजार का बिल चुकाते समय उसे जरा भी मलाल नहीं हुआ; उसे पता था कि उसका शरीर अब साधारण पोषण से नहीं चलने वाला.
खाना आने से पहले उसने अपना' ऑपरेशन तिजोरी' शुरू किया.
उसने मेज पर नोटों की गड्डियाँ फैला दीं. रुपये तीस हजार उसने अपनी जेब में' रोजाना खर्च' के लिए रखे. बाकी के रुपये बारह लाख को उसने चॉल के उस जर्जर कमरे के कोने- कोने में दफन कर दिया:
तकिये के अंदर: रुपये दो लाख (रुई के बीच दबाकर)।
छत की दरार: रुपये पाँच लाख (प्लास्टर के पीछे, फेविकोल के डिब्बे के आड में)।
पुरानी लकड़ी के बक्से: बाकी के रुपये पाँच लाख अपन कपडो के बीच, छुपा दिए.
उसने वह भारी सोने का ताला चाबी और कडा निकाला. ताले को उसने एक रद्दी न्यूजपेपर में लपेटा और कूडे के ढेर के पास पडे पुराने जूतों के डिब्बे में डाल दिया. कडे को एक फटे हुए मोजे में डालकर अलमारी के सबसे पीछे वाले छेद में ठूँस दिया. अब बाहर से देखने पर वह कमरा पहले जैसा ही' कंगाल' दिख रहा था.
विहान अपनी खोली के अंदर' शहंशाह' बना बैठा था. मेज पर रुपये तीन हजार का शाही पनीर और कश्मीरी पुलाव सजा था. वह अभी एक बडा सा रसगुल्ला मुँह में दबाने ही वाला था कि दरवाजे पर हल्की सी दस्तक हुई.
कुंडी नहीं खटखटाई गई थी, बल्कि किसी ने अपने नाखूनों से दरवाजे को सहलाया था.
विहान ने दरवाजा खोला तो सामने माया खडी थी. वह विहान के मकान मालिक की बेटी थी और उसी के college में एक साल जूनियर थी. माया ने एक साधारण कुर्ता और जीन्स पहनी थी, बाल गीले थे और चेहरे पर एक मासूम सी मुस्कान.
विहान के मन में माया के लिए गहरी इज्जत थी. जब वह मुंबई नया आया था और तंगी के कारण चार महीने का किराया नहीं दे पाया था, तब माया ने ही अपने पिता को संभालकर विहान को कमरे से बाहर निकलने से बचाया था. विहान अक्सर उसकी पढाई और असाइनमेंट्स में मदद कर देता था, और यही उनका एक अदृश्य रिश्ता था.
अरे विहान. बडी खुशबू आ रही है आज? शाही दावत चल रही है क्या? माया ने दरवाजे के फ्रेम पर हाथ रखकर अंदर झांकते हुए कहा. उसकी नजरों ने तुरंत मेज पर रखे' होटल ग्रैंड' के महंगे डिब्बे और बिस्तर पर पडे नए स्मार्टफोन के पैकेट्स को भांप लिया.
हाँ माया, बस थोडा काम मिल गया था तो सोचा आज खुद को पार्टी दे दूँ, विहान ने मुस्कुराते हुए कहा.
पार्टी तो ठीक है, पर पापा पूछ रहे थे कि तुम्हारा कोई अता- पता नहीं है, माया अंदर कदम रखते हुए बोली. उसने एक छोटी प्लेट विहान की ओर बढाई जिसमें गर्मागर्म रोटियां और भुजिया थी. ये लो, मम्मी ने तुम्हारे लिए बनाया है. तुम बीमार थे ना, तो सोचा बाहर का खाना तुम्हें नुकसान करेगा।
विहान ने प्लेट थाम ली. हाँ, अब तो मैं बिल्कुल ठीक हूँ।
फिर से' हाँ- हाँ' शुरू कर दिया? कितनी बार बोला है मुझे' सिर्फ माया' बुलाया करो या कम से कम उस तरह बात करो जैसे हम Collage में करते हैं, उसने बनावटी गुस्से में अपनी तिरछी नजरें उस पर डालीं.
ठीक है माया, ध्यान रखूँगा, विहान थोडा झेंप गया.
अच्छा सुनो, पापा को किराया दे देना वरना वो फिर से चिल्लाएंगे. मैं चलती हूँ, तुम खाना खाओ और हाँ. दरवाजा ठीक से बंद कर लेना, आजकल लोग बहुत सवाल पूछते हैं, उसने एक गहरी नजर विहान की आँखों में डाली और बाहर निकल गई.
विहान मेज के पास बैठा. उसने माया की दी हुई रोटियां और भुजिया देखी. यद्यपि उसके पास रुपये तीन हजार का शाही पनीर और पुलाव मौजूद था, लेकिन उसने पहले उन रोटियों को बडे सम्मान से खाया. वह जानता था कि जब उसकी जेब खाली थी, तब इसी परिवार ने उसे सहारा दिया था. उसके बाद उसने उस शाही पनीर और मलाई कोफ्ते पर हाथ साफ किया. पनीर का हर निवाला उसके शरीर में एक नई जान फूँक रहा था. खाना इतना लजीज था कि विहान को लगा जैसे महीनों बाद उसने सच में कुछ खाया है.
पेट भर जाने के बाद विहान ने एक लंबी डकार ली और मेज को पूरी तरह साफ किया. अब समय था उस रहस्यमयी किताब का, जिसने उसकी पूरी दुनिया उलट- पुलट कर दी थी.
विहान ने बिस्तर पर बैठकर' असुरविद्या' को अपनी गोद में रखा. वह यक्षिणी को नहीं बुलाना चाहता था, क्योंकि उसे डर था कि यक्षिणी के प्रकट होने का मतलब है कोई नया खतरा या बलिदान. वह खुद इस शक्ति को समझना चाहता था.
उसने बडी सावधानी से किताब का पहला पन्ना पलटा. पन्ने की लिखावट किसी पुरानी लिपि में थी, लेकिन जैसे ही विहान ने उन पर उंगली रखी, शब्द उसके दिमाग में अपने आप अनुवादित होने लगे.
एक. असुर- युद्ध तकनीक (Asura Combat Techniques)
किताब के एक पन्ने पर कुछ अजीबोगरीब मुद्राएँ (Poses) बनी थीं. वहाँ लिखा था—" वज्र- काया तकनीक"
असुरों के पास लडने की ऐसी तकनीकें थीं जहाँ वे अपनी हड्डियों को लोहे से भी सख्त और अपनी मांसपेशियों को बिजली से भी तेज बना सकते थे.
मर्म- भेदी' प्रहार: वह तकनीक जिससे दुश्मन के शरीर के किसी खास हिस्से को छुए बिना ही उसकी नसों को सुखाया जा सकता है.
छाया- गति' अंधेरे का उपयोग करके अपनी गति को इतना तेज कर लेना कि दुश्मन को केवल एक साया दिखे और वह वार खाने से पहले कुछ समझ न पाए.
दो. आंतरिक ऊर्जा का विस्तार (Internal Energy Flow)
विहान ने पढा कि असुर खुद को शक्तिशाली बनाने के लिए केवल बाहर के भोजन पर निर्भर नहीं रहते थे. वे' प्राण- शोषण' की कला जानते थे. वे अपने आसपास की नकारात्मक ऊर्जा, यहाँ तक कि धातु (जैसे सोना और लोहा) से भी शक्ति खींचकर अपनी उम्र और ताकत बढा सकते थे.
किताब में एक मंत्र और सांस लेने की विधि (Breathing Technique) दी गई थी, जिसे करने से शरीर की कोशिकाएँ खुद को दोबारा जीवित (Regenerate) कर सकती थीं.
विहान यह सब पढते- पढते पूरी तरह से मंत्रमुग्ध हो गया. उसके दिमाग में युद्ध की कलाओं और ऊर्जा के चक्रों का एक तूफान चल रहा था. उसे अहसास हुआ कि अगर वह इस किताब को पूरी तरह समझ ले, तो उसे किसी से भीे डरने की जरूरत नहीं होगी. वह खुद अपनी नियति लिख पाएगा.
लेकिन शरीर की अपनी सीमाएँ होती हैं. दोपहर की वह भारी शाही दावत और किताब से निकलता वह भारी ज्ञान. विहान का दिमाग थक गया. उसने किताब को बंद किया, उसे अपनी तकिये के नीचे दबाया ताकि सोते समय भी उसका स्पर्श बना रहे, और वह गहरी नींद की आगोश में चला गया.
रात के दो: पंद्रह बजे थे
तभी, गलियारे के अंधेरे से दो साये उभरे. समीरा—वही शोरूम वाली लडकी, जिसने आज जींस और हुडी पहन रखी थी, और उसके साथ उसका Boyfriend रॉकी. रॉकी के हाथ में एक छोटा कटर और कमर में खुसी हुई एक देसी कट्टा (पिस्तौल) थी.
रॉकी ने बहुत ही सफाई से कुंडी के पास की लकडी काटी और तार डालकर कुंडी गिरा दी. ठक. एक बहुत हल्की सी आवाज हुई.
दोनों दबे पाँव अंदर दाखिल हुए. कमरे की जर्जर हालत देखकर रॉकी ठिठका. समीरा, तू पक्का है ना कि इसी भिखारी के पास माल है? यहाँ तो दरिद्रता नाच रही है।