उस शाम की चाय InkImagination द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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उस शाम की चाय

उस शाम की चाय ☕
(जो मैं खुद से कह नहीं पाई)

वाराणसी की शामें कभी पूरी तरह शाम नहीं होतीं।
सूरज ढलते ही गंगा पर एक सुनहरा-सा पर्दा पड़ जाता है, लेकिन दिल की थकान उससे पहले ही शुरू हो जाती है।
मैं उस दिन घाट से थोड़ी दूर, एक पुरानी चाय की दुकान पर बैठी थी।
दुकान छोटी-सी थी – लकड़ी की टूटी-फूटी टेबल, चार-पांच कुल्हड़ रखने वाली ट्रे, और पीछे एक बूढ़ा चाय वाला जो बिना मुस्कुराए चाय बनाता था।
आसपास लोग थे – कोई जोड़े में हाथ पकड़े घूम रहा था, कोई बच्चे कंधे पर उठाए हंस रहे थे, कोई अकेला साधु गंगा की तरफ देखकर कुछ बुदबुदा रहा था।
और मैं?
बस बैठी थी।
फोन साइलेंट, बैग पैरों के पास, और आंखें गंगा पर।
चाय आई।
अदरक वाली, भाप से कुल्हड़ गर्म।
मिठास कम थी, कड़वाहट ज्यादा – ठीक वैसी जैसी मैं उस वक्त फील कर रही थी।
मैंने कुल्हड़ हाथ में लिया।
गर्माहट उंगलियों तक पहुंची, लेकिन दिल तक नहीं।
मैंने सोचा – आज फिर वही दिन है।
सुबह उठी, कॉलेज गई, दोस्तों से मिली, हंसी-मजाक किया, लेकिन अंदर से कुछ टूट रहा था।
जिसे मैं सबसे ज्यादा सोचती हूं, वो मैसेज का जवाब नहीं दे रहा।
"हाय" भेजा था दो दिन पहले।
देखा, लेकिन रिप्लाई नहीं।
फिर स्टोरी लगाई उसने – नए दोस्तों के साथ हंसते हुए।
मैंने देखा, लाइक किया, और फिर फोन बंद कर दिया।
क्योंकि लाइक करने से दिल हल्का नहीं होता।
चाय का पहला घूंट लिया।
गंगा की लहरें आगे बह रही थीं।
एक लड़की और लड़का पास की बेंच पर बैठे थे। वो लड़की ने लड़के के कंधे पर सिर टिका दिया।
लड़का उसके बालों में उंगलियां फिरा रहा था।
मैंने नजरें फेर लीं।
क्योंकि वो सीन देखकर याद आया – कभी मैं भी किसी के लिए इतनी खास थी ना?
शायद थी।
पर अब?
अब लगता है जैसे मैं किसी की लाइफ का बैकग्राउंड म्यूजिक हूं – सुनाई देता है, लेकिन जरूरी नहीं।
मैंने खुद से पूछा – क्या सच में कोई इतना बिजी हो सकता है?
कि "ठीक हो?" लिखने का भी वक्त न हो?
या फिर... मैं ही उसके लिए उतनी important नहीं हूं जितनी वो मेरे लिए है?
ये सवाल रोज आता है, लेकिन आज चाय के साथ ज्यादा तेज आया।
क्योंकि वाराणसी में सवालों को जवाब नहीं मिलते।
यहां सिर्फ सुनने की जगह है।
गंगा सुनती है।
घाट की सीढ़ियां सुनती हैं।
और वो चाय वाला भी शायद सुनता है, लेकिन बोलता नहीं।
मैंने दूसरा घूंट लिया।
पास में एक बच्चा दौड़ता हुआ आया, उसके हाथ में गुब्बारा।
वो हंस रहा था, मां उसके पीछे दौड़ रही थी।
"रुक जा बेटा!"
बच्चा रुका नहीं।
गुब्बारा हवा में उड़ गया।
बच्चा रोने लगा।
मां ने उसे गोद में उठाया, चुप कराया।
मैंने देखा – कितना आसान था।
एक गले लगाने से रोना थम गया।
फिर सोचा – मेरे लिए कौन उठाएगा?
कौन कहेगा – "बस, सब ठीक हो जाएगा"?
चाय खत्म होने लगी।
कुल्हड़ में सिर्फ थोड़ी-सी तली बची थी।
मैंने उसे घुमाया।
फिर आखिरी घूंट।
और अचानक आंखें भर आईं।
नहीं रोई।
बस भर आईं।
क्योंकि रोना तो तब आता है जब कोई देख रहा हो।
अकेले में तो बस आंसू आते हैं, गिरते नहीं।
उठने से पहले मैंने एक बार गंगा की तरफ देखा।
लहरें जैसे कह रही थीं – "हर चीज बह जाती है। दर्द भी। इंसान भी।"
मैं मुस्कुराई – हल्के से।
फिर कुल्हड़ उठाकर चाय वाले को दिया।
"बाबा, और एक चाय।"
वो बोला, "बेटी, अब काफी हो गई।"
मैंने कहा, "नहीं, आज थोड़ी ज्यादा चाहिए।"
दूसरी चाय आई।
इस बार थोड़ी ज्यादा मिठास।
मैंने पी।
और सोचा – शायद कल कुछ बदल जाए।
शायद वो मैसेज कर दे।
या शायद नहीं।
लेकिन मैं तो हूं ना।
अपने लिए।
उठी।
घाट की सीढ़ियां उतरते हुए लगा –
कभी-कभी चाय सिर्फ चाय नहीं होती।
वो एक दोस्त होती है, जो बिना जजमेंट के सुनती है।
एक आईना होती है, जो तुम्हें तुम्हारा सच दिखाती है।
और एक उम्मीद होती है – कि अगली चाय के साथ शायद दिल थोड़ा और हल्का हो।

अब तुम बताओ।
तुम्हारे लिए चाय क्या है?
सुकून?
सवाल?

या वो पल जब तुम खुद से मिलते हो?
अगर ये पढ़ते हुए तुमने भी कभी ऐसा फील किया हो –
कि तुम्हारा होना किसी के लिए फर्क नहीं पड़ता...
तो कमेंट में एक कुल्हड़ वाली चाय का इमोजी ☕ जरूर डालना।
शायद हम सब मिलकर ये अकेलापन थोड़ा कम कर लें।

वाराणसी की शामें आज भी वही हैं।
और मैं आज भी उस चाय की दुकान पर जाती हूं।
कभी-कभी अकेले।
कभी-कभी खुद से बातें करने।
और हर बार वो चाय मुझे याद दिलाती है –
तुम्हारा दर्द भी बह जाएगा।
बस थोड़ा वक्त दो।
और हां... अगली चाय मेरे साथ।
☕♡