कलाकृति
लेखक राज फुलवरे
(द फाइल नंबर 22)
PART 1 : फाइलों की दुनिया
वैशाली नगर पुलिस स्टेशन मुंबई की उन इमारतों में से एक था, जहाँ बाहर से देखने पर कुछ खास नहीं लगता, लेकिन अंदर कदम रखते ही एहसास हो जाता था कि यहाँ सिर्फ अपराध नहीं, ज़िंदगियाँ दर्ज होती हैं।
हर दीवार पर टंगी घड़ियाँ जैसे समय नहीं, बल्कि इंतज़ार गिन रही थीं।
सुष्मिता स्टेशन के अंदर दाखिल हुई।
उसके हाथ में कैमरा बैग था, लेकिन दिल में सवालों का बोझ।
सुष्मिता (मन ही मन):
“सच को दिखाने के लिए हिम्मत चाहिए… और झूठ को छुपाने के लिए ताकत।”
डेस्क पर बैठे कांस्टेबल ने उसे देखा।
कांस्टेबल:
“मैडम, किससे मिलना है?”
सुष्मिता:
“किसी से नहीं… बस कुछ पुरानी फाइलों से।”
कांस्टेबल ने उसकी आईडी देखी।
कांस्टेबल (संशय से):
“पुरानी फाइलें मतलब… बहुत पुराना दर्द।”
सुष्मिता (शांत स्वर में):
“दर्द दिखेगा नहीं, तो ठीक कैसे होगा?”
कांस्टेबल उसे रिकॉर्ड रूम तक ले गया।
लोहे का भारी दरवाज़ा खुला।
धूल, अंधेरा और सन्नाटा।
वहाँ एक फाइल अलग ही चमक रही थी—
THE FILE – NO. 22
सुष्मिता ने उसे उठाया…
और कहानी ने साँस लेना शुरू किया।
अध्याय 2 : प्रताप मनचंदा – नाम, पहचान, विरासत
प्रताप मनचंदा का घर मुंबई के उन गिने-चुने घरों में से था जहाँ सादगी और रुतबा एक साथ रहते थे।
उनकी आवाज़ में न गुस्सा था, न घमंड—बस अनुभव।
ड्रॉइंग रूम में उनकी दोनों बेटियाँ बैठी थीं।
बड़ी बेटी — कला मनचंदा
तेज़ निगाहें, आत्मविश्वास से भरा चेहरा।
छोटी बेटी — कृति मनचंदा
संयमित, शांत, लेकिन गहरी समझ वाली।
प्रताप:
“मैं चाहता हूँ कि मेरे जाने के बाद भी मेरा नाम किसी गलत काम से न जुड़ें।”
कला (थोड़ा अधीर होकर):
“पापा, ज़माना बदल गया है… आज पैसा ही ताकत है।”
प्रताप ने उसे देखा।
प्रताप:
“पैसा ताकत नहीं, परीक्षा है कला।”
कृति चुप थी।
प्रताप (कृति से):
“तुम कुछ कहोगी नहीं?”
कृति:
“कहने से ज़्यादा निभाने में यकीन रखती हूँ, पापा।”
प्रताप मुस्कुराए।
अध्याय 3 : बँटवारा
वकील ने काग़ज़ आगे बढ़ाए।
वकील:
“सर, अंतिम निर्णय लिख दिया जाए?”
प्रताप:
“हाँ।”
उन्होंने गहरी साँस ली।
प्रताप:
“कला को सेबों के पूरे बाग…
और कृति को चाय पत्ती की खेती।”
कला की आँखों में चमक आ गई।
कला (मन में):
“सेब… इंटरनेशनल मार्केट… पैसा ही पैसा।”
कृति ने सिर झुका लिया।
कृति:
“जैसा आप चाहें।”
प्रताप ने दोनों के सिर पर हाथ रखा।
प्रताप:
“याद रखना… विरासत संभालना आसान नहीं होता।”
अध्याय 4 : पिता का जाना
कुछ महीनों बाद—
घर में सन्नाटा था।
फोटो पर माला।
प्रताप मनचंदा अब सिर्फ याद थे।
कला शीशे के सामने खड़ी थी।
कला (खुद से):
“अब कोई रोकने वाला नहीं है।”
कृति आँगन में बैठी थी।
कृति (आँखें बंद करके):
“पापा… मैं आपकी सीख नहीं भूलूँगी।”
अध्याय 5 : दो बहनें, दो दुनिया
कला मुंबई लौट आई।
कृति गाँव में रुक गई।
कला (फोन पर):
“कृति, ज़िंदगी मौके देती है… डरने वालों को नहीं।”
कृति:
“और ज़िंदगी सबक भी देती है… समझदारों को।”
फोन कट गया।
रिश्तों में पहली दरार पड़ चुकी थी।
अध्याय 6 : रघुवीर सिंह
रघुवीर सिंह का नाम मुंबई की अंडरवर्ल्ड गलियों में खामोशी से लिया जाता था।
एक हाई-प्रोफाइल पार्टी।
रघुवीर:
“तुम्हारे चेहरे पर भूख है… और मुझे भूखे लोग पसंद हैं।”
कला:
“मुझे भूख नहीं… आज़ादी चाहिए।”
रघुवीर (हँसकर):
“तो फिर मेरे साथ चलो… आज़ादी की कीमत चुकानी पड़ती है।”
कला ने हाथ बढ़ाया।
यहीं से पतन शुरू हुआ।
अध्याय 7 : सेबों में छुपा ज़हर
सेबों के ट्रक अब ड्रग्स ढो रहे थे।
कला:
“किसी को शक भी नहीं होगा।”
रघुवीर:
“क्योंकि लोग सिर्फ छिलका देखते हैं… सड़ांध नहीं।”
शादी हुई।
काला कारोबार फैला।
अध्याय 8 : कृति की बेचैनी
कृति को अकाउंट्स में गड़बड़ दिखी।
कृति (खुद से):
“ये सिर्फ व्यापार नहीं… अपराध है।”
उसने सच ढूँढना शुरू किया।
अध्याय 9 : आमना-सामना
कृति:
“कला, ये सब गलत है।”
कला (गुस्से में):
“तू मुझे मत सिखा!”
कृति:
“पापा होते तो—”
कला (चिल्लाकर):
“पापा मर चुके हैं!”
खामोशी।
अध्याय 10 : द फाइल बंद नहीं हुई
सुष्मिता फाइल बंद करती है।
सुष्मिता:
“ये कहानी यहीं खत्म नहीं होती…”
PART 2
अध्याय 11 : रघुवीर सिंह का असली चेहरा
रघुवीर सिंह सिर्फ एक नाम नहीं था, वह एक सोच था—
ऐसी सोच जो कानून को कमजोरी समझती थी और डर को हथियार।
मुंबई के एक आलीशान बंगले में रघुवीर अपने आदमियों के साथ बैठा था।
कमरे में सिगार का धुआँ, शराब की गंध और डर का सन्नाटा था।
रघुवीर (धीमी लेकिन भारी आवाज़ में):
“इस शहर में या तो लोग मेरा नाम लेते हैं…
या मेरी इजाज़त।”
एक आदमी बोला—
आदमी:
“माल पूरी तरह से निकल गया है सर… सेब के ट्रक बिल्कुल साफ़।”
रघुवीर मुस्कुराया।
रघुवीर:
“देखा… सबसे सुरक्षित वही होता है जो सबसे मासूम दिखे।”
उसी समय कला अंदर आई।
कला:
“हर चीज़ पैसे के लिए क्यों होनी चाहिए, रघुवीर?”
रघुवीर ने उसे घूरा।
रघुवीर:
“क्योंकि बिना पैसे के इंसान सिर्फ बोझ होता है…
और मुझे बोझ पसंद नहीं।”
कला पहली बार डर गई।
अध्याय 12 : कृति की जाँच
कृति अब सिर्फ बहन नहीं थी—
वह एक खोजी बन चुकी थी।
उसने अकाउंट बुक्स, ट्रांसपोर्ट रसीदें, ड्राइवरों के बयान—सब इकट्ठा किए।
कृति (खुद से):
“अगर मैं चुप रही, तो मैं भी अपराधी हूँ।”
उसने एक पुराने ड्राइवर से बात की।
ड्राइवर (डरते हुए):
“मैडम… ट्रक में सेब कम होते हैं, वजन ज़्यादा।”
कृति:
“सच बोलो… तुम्हें डर किसका है?”
ड्राइवर:
“रघुवीर सिंह का नाम मौत जैसा है, मैडम।”
कृति की आँखों में आँसू आ गए।
अध्याय 13 : बहनों का टकराव
कृति सीधे कला के सामने पहुँची।
कृति:
“अब झूठ मत बोलना… मुझे सब पता है।”
कला (चिढ़कर):
“तुझे क्या लगता है? तू मुझे बचाने आई है?”
कृति:
“नहीं… मैं तुम्हें खोने से बचाने आई हूँ।”
कला (गुस्से में):
“मैंने जो चुना है, वही मेरी ज़िंदगी है!”
कृति (आँखों में दर्द):
“नहीं दीदी… ये तुम्हारी मौत है।”
कला पहली बार चुप हो गई।
अध्याय 14 : रघुवीर और कृति
कृति ने रघुवीर से सीधा सामना किया।
कृति:
“आपने मेरी बहन की कमजोरी का फायदा उठाया।”
रघुवीर (हँसते हुए):
“कमज़ोर लोग फायदा उठाने के लिए ही होते हैं।”
कृति:
“आपको कानून नहीं छोड़ेगा।”
रघुवीर (ठंडी हँसी):
“कानून मेरे दरवाज़े पर जूते उतार कर आता है।”
कृति समझ गई—
यह आदमी सुधरने वाला नहीं।
अध्याय 15 : फैसला
उस रात कृति सो नहीं पाई।
पिता की आवाज़ कानों में गूँज रही थी—
प्रताप (यादों में):
“सही और गलत के बीच खड़े होने की हिम्मत रखना।”
सुबह कृति पुलिस स्टेशन पहुँची।
कृति:
“मैं गवाह बनना चाहती हूँ।”
अधिकारी चौंक गया।
पुलिस अधिकारी:
“तुम जानती हो इसका मतलब क्या है?”
कृति:
“हाँ…
अपनी बहन को खोने का डर…
लेकिन खुद को खोने का नहीं।”
अध्याय 16 : गिरफ्तारी
पुलिस ने जाल बिछाया।
सेबों का अगला ट्रक—
लेकिन इस बार रास्ते में सायरन।
रघुवीर भागने की कोशिश करता है।
रघुवीर (चिल्लाकर):
“कोई मुझे रोक नहीं सकता!”
हथकड़ी लगती है।
पुलिस अधिकारी:
“कानून से बड़ा कोई नहीं, रघुवीर सिंह।”
अध्याय 17 : अदालत
कोर्ट में सन्नाटा था।
कला की आँखें नीचे झुकी थीं।
जज ने पूछा—
जज:
“क्या आप गवाही देंगी?”
कृति खड़ी हुई।
कृति:
“हाँ…
क्योंकि चुप्पी भी एक अपराध है।”
उसने सब बताया—
सेब, ड्रग्स, रघुवीर।
रघुवीर का चेहरा पीला पड़ गया।
अध्याय 18 : कला का टूटना
कोर्ट के बाहर—
कला (रोते हुए):
“मैं अंधी थी, कृति…”
कृति:
“नहीं दीदी…
आप बस अकेली थीं।”
कला:
“क्या पापा मुझे माफ़ कर देंगे?”
कृति:
“अगर आप खुद को माफ़ कर लें… तो हाँ।”
दोनों बहनें गले लगीं।
अध्याय 19 : द फाइल का अंत
फाइल के आखिरी पन्ने पर लिखा गया—
“द फाइल नंबर 22 – क्लोज़्ड”
सुष्मिता ने फाइल बंद की।
उसकी आँखें नम थीं।
सुष्मिता:
“ये सिर्फ एक केस नहीं…
ये आईना है।”
अध्याय 20 : दस्तावेज़ी सच
कैमरा ऑन हुआ।
सुष्मिता (कैमरे की ओर):
“कलाकृति सिर्फ दो बहनों की कहानी नहीं…
ये उस कीमत की कहानी है
जो गलत रास्ते पर चलने से चुकानी पड़ती है।”
समापन
कुछ फाइलें बंद हो जाती हैं…
लेकिन उनसे निकली सीख
कभी बंद नहीं होती।