उज्जैन एक्सप्रेस - 5 Lakhan Nagar द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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उज्जैन एक्सप्रेस - 5

"कुछ बोझ कंधों पर नहीं, आत्मा पर होते हैं। और वो बोझ तब तक हल्के नहीं होते जब तक इंसान खुद को खो न दे।"

 

रात 11:49  — उज्जैन जंक्शन।

 

प्लेटफॉर्म की सबसे अंतिम बेंच पर एक लड़का बैठा था। उसके चेहरे पर गहराई थी — जैसे किसी ने वर्षों से मुस्कुराना छोड़ दिया हो। उसके पास न कोई सूटकेस था, न कोई टिकट, सिर्फ एक पुराना बैग, कुछ नोट्स, और एक अधूरी डायरी।

 

 

सुनील के लिए UPSC सिर्फ एक परीक्षा नहीं थी, वो एक वादा था — खुद से, अपने परिवार से, और उस समाज से जो हमेशा कहता रहा — “गरीबों के बच्चे कुछ नहीं कर सकते। जब एक मध्यमवर्गीय बच्चा एक बड़े सपने तो चुनता हैं तो वो सिर्फ अपने लिए ऐसा नही करता बल्कि वह हर उस बच्चे में खुद को देखता हैं जिस परिस्थिति से वो आया हैं , वह हर उस उम्रदराज व्यक्ति में अपने पिता को देखता हैं जो कर्ज और आशाओं के बोझ के नीचे दबे हुए हैं , हर उस महिला में अपनी माँ को देखता हैं जो जैसे-तैसे मजदूरी करके अपने बच्चों को पढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ती ,,वो देखता हैं हर उस युवा में अपने बड़े भाई को जो इस उम्मीद में होता हैं कि एक दिन मेरा भाई सब ठीक कर देगा ,,,,साथ ही साथ उन लडकियों में अपनी बहिनों को जिन्हें उस दिन का इंतज़ार हैं जब वो अपने भाई पर गर्व कर सकें।”

 

वो एक छोटे से गाँव से आया था, जहाँ बारिश अगर वक्त पर ना हो, तो भूख खुद दरवाज़ा खटखटाती है। उसका बचपन बैलों की जूतियों, टूटी स्लेटों और रात में लालटेन की रौशनी में बीता। लेकिन किताबों से उसे इश्क़ हो गया था। वो स्कूल का टॉपर था — पर उस गाँव में टॉप करने पर कोई ताली नहीं बजाता, बस एक उम्मीद और जुड़ जाती है तुम्हारे साथ ,तुम्हारे परिवार की , तुम्हारे गाँव की ,। छोटे गाँवों में बड़े सपने दुर्लभ ज़रूर होते हैं पर सामूहिक होते हैं , तुम्हारे अकेले के नहीं, पूरे गाँव के  ।

 

“मेरा बेटा कलेक्टर बनेगा...” पिता की यह बात उसके कानों में अक्सर गूंजती थी। 

उसके पिता एक किसान थे, वो भी ऐसे जिनकी फसलें हर साल सरकारी योजना की आस में बर्बाद हो जाती थीं। माँ दिन-रात खेत और घर दोनों संभालती थीं। और दो बड़ी बहनें थीं — जिन्हें अब भी पिता अपनी इज़्ज़त मानते थे, और समाज उन्हें 'बोझ' कहता था। खैर अपना समाज हैं ही ऐसा अक्सर कुछ न कुछ कहता रहता हैं , शायद कायदे की  बात कहने जैसा कुछ नहीं बचा हैं इसके पास ।

 

सुनील का गाँव दिल्ली से बहुत दूर था, लेकिन कोचिंग सेंटर्स के होर्डिंग्स, टॉपर्स की कहानियाँ, और IAS बनने का ख्वाब उसके दिल के बहुत करीब आ चुके थे। UPSC अब एक सपना नहीं, धर्म बन गया था।

 

जब उसने दिल्ली के लिए रवाना होते समय माँ की आँखों में आंसू देखे थे, और पिता के कांपते हाथों में टिफिन, तब उसे लगा था — “अब हार का कोई विकल्प नहीं है।”

मुखर्जी नगर की गलियों में, उस भीड़ में जहाँ हर तीसरा लड़का ‘UPSC ASPIRANT’ था, सुनील ने अपने जीवन के पाँच साल झोंक दिए।

रात को उठकर 'लक्ष्मीकांत' पढ़ना, सुबह चार बजे उठकर 'द हिन्दू' पढ़ना, मॉक टेस्ट, एथिक्स के केस स्टडीज़, एसे की प्लानिंग — ये सब उसकी दुनिया बन गए थे।

 

लेकिन दुनिया वैसी नहीं होती जैसी किताबें सिखाती हैं। चार बार असफलता ने उसे भीतर से तोड़ दिया। हर बार वह खुद से कहता, “इस बार नहीं तो अगली बार।” पर हर अगली बार एक नई चोट बन जाती थी। और पाँचवीं बार — वह चोट गहराई में जाकर स्थायी हो गई। 

 

उसका परिणाम आने से पहले ही उसे आभास हो चुका था। जिस दिन रिज़ल्ट आया, उसने मोबाइल तक नहीं उठाया। उसने किसी से बात नहीं की, कमरे की खिड़की भी नहीं खोली। और उस रात — उसने अपने नोट्स जलाए नहीं, बस समेटकर बैग में रख लिए और ट्रेन पकड़ी — बिना टिकट।

अब वो उज्जैन के प्लेटफॉर्म पर था — चुप, स्थिर, और भीतर से टूट चुका।

लेकिन उस रात नियति ने उसे अकेला नहीं छोड़ा।

 

“इतनी ठंडी रात में यूँ अकेले? कोई इंतज़ार कर रहा है या सब छोड़ दिया?”

 

उसने देखा — एक लड़की खड़ी थी। सलवार-कुर्ते में, कंधे पर किताबों से भरा झोला, चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान और आँखों में शांति।

“तुम?”

“श्रुति ” उसने सहजता से कहा।

“मुझे अकेला छोड़ दो,” सुनील बोला।

“मैं यहाँ तुम्हें समझाने नहीं आई। बस कुछ बातें करने का मन हुआ — किसी ऐसे से, जिसने खुद से लड़ाई लड़ी हो।”

वे दोनों चुप बैठे रहे कुछ देर। फिर श्रुति  ने कहा:

“जानते हो, UPSC सिर्फ एक रास्ता है। मंज़िल नहीं । ये व्यवस्था हमसे बहुत कुछ लेती है — समय, ऊर्जा, नींद, रिश्ते — पर ये कभी ये नहीं बताती कि अगर हम असफल हुए, तो क्या करें?”

सुनील की आँखें भर आईं। उसने धीरे से कहा:

“मैंने तो बस अपने परिवार के लिए कुछ सोचा था। मेरे पिता का कर्ज़, माँ का भरोसा, बहनों का भविष्य — सब मेरी सफलता पर टिका था।”

“तुम्हारी सोच गलत नहीं थी,” श्रुति   बोली, “लेकिन ये समाज सिर्फ सफल लोगों की कहानियाँ बताता है। वो लाखों कहानियाँ, जो असफल होकर फिर भी ज़िंदा रहती हैं, उन्हें कोई नहीं पूछता। पर असल संघर्ष तो वही है — ज़िंदा रहना, हर हार के बाद फिर खड़ा होना।”

“मैं अब थक गया हूँ,” सुनील बोला। “ये लड़ाई अब मुझसे नहीं लड़ी जाती।”

“थकना गलत नहीं है,” श्रुति  ने कहा। “पर रुकना गलत हैं ,  वो भी तब, जब तुम्हारा वजूद कई और लोगों की उम्मीद है?”

श्रुति  ने फिर कहा:

 

UPSC नहीं निकला? तो क्या हुआ?

UPSC ने तुम्हे नहीं तुमने UPSC को चुना हैं , जो आज सफल हुए हैं वो भी कल हारे थे , जो आज हारे हैं वो कल के टॉपर हो सकते हैं ; तुम शिक्षक बन सकते हो, लेखक बन सकते हो, उद्यमी बन सकते हो, कोई ऐसा काम कर सकते हो जो तुम्हें संतोष दे। UPSC एक परीक्षा है, ज़िंदगी नहीं।”
ट्रेन की सीटी बजी। सुनील ने देखा — अँधेरा अब भी था, लेकिन उस अंधेरे में एक नई रौशनी की झलक थी।

श्रुति  ने कहा — “चलो, वापस चलते हैं। एक नई शुरुआत करें। इस बार खुद के लिए।”

सुनील की आँखों से आँसू बह निकले, लेकिन ये आँसू हार के नहीं थे। ये एक नर्म राहत थे — जैसे किसी ने उसे फिर से जीने का कारण दे दिया हो।

वो उठा। ट्रेन चली गई। श्रुति  कहीं नज़र नहीं आई। लेकिन उसके शब्द... अब सुनील की आत्मा में बस चुके थे।