टप्पे के बाद Deepak sharma द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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टप्पे के बाद

 

                    स्टेशन पर बहन ने मुझे अकेले पाया तो एकाएक उस का चेहरा बदल- बदल गया। भेद- भरे स्वर में बोली, “तुम से एक ज़रूरी बात कहनी है…..”

                   “पहले स्टेशन की भीड़ से निपट लो,” जानबूझ कर मैं अपने स्वर में गहरी खीझ का पुट ले आया।

                   “अपने विवाह से मैं खुश नहीं हूं,” प्लेटफॉर्म पार कर जब हम बाहर पोर्टिको में आए तो बहन ने मुझे फिर घेर लेना चाहा, “उधर मदन अकेला नहीं है। मां हैं। तीन बहनें हैं। मां दिन भर आफ़त मचाए रहती हैं और बहनें ऊधम….”

                   चार महीने पहले बहन ने विजातीय अपने एक पुराने व जूनियर सहकर्मी, मदन, से प्रेम- विवाह किया था तथा अपनी बदली उस के शहर वाले सरकारी कालेज में करवा ली थी।

                  “मैं वहां लौट कर नहीं जाना चाहती,” जैसे ही अपने स्कूटर की पिछली सीट पर उसे बिठलाने के बाद मैं ने स्कूटर चलाना शुरू किया, बहन फिर चालू हो गई। 

                 “इधर वीणा बहुत बवाल करने लगी है। तुम्हारी मुश्किल की उसे भनक लग गई तो वह मेरे लिए नई आफ़त खड़ी कर देगी,” मैं जानता था मेरे मुंह से वीणा की बुराई सुन कर वह मेरे लिए अपनी जान पर भी खेल सकती थी, “उस मिसकैरिज के बाद…..”

                 वीणा बहन की छात्रा रह चुकी थी तथा वीणा से विवाह करने का मेरा निर्णय उसे तनिक न भाया था।

                “यदि ऐसा है तो अभी किसी से कुछ न कहूंगी। बाबूजी से भी नहीं। वह बेकार परेशान होंगे…..”

                 “थोड़ा धीरज रखो,” उखड़ आई मेरी सांस नियमित हो आई, “जल्दी ही मैं तुम्हारी बदली यहां वापस करवा दूंगा और तुम अपनी नौकरी के बहाने फिर हमेशा के लिए यहां चली आना…..”

 

                 अगले दिन मेरा एल.एल.बी.का तृतीय वर्ष का पहला पर्चा था।

                  एम.कौम. के बाद जिस डिग्री कालेज में मैं ने पढ़ाना शुरू किया था, वहां मेरे सभी सहकर्मी या तो एल.एल.बी.कर चुके थे या कर रहे थे। देखा- देखी मैं ने भी उसी वर्ष अविलंब एल.एल.बी. की पढ़ाई शुरू कर दी थी।

                  “मेरा नाश्ता मेरे कमरे में ले आओ, वीणा,” अपने इम्तिहान की अफ़रा- तफ़री में मैं बहन की उपस्थिति भूल गया और अपने कमरे से चिल्लाया। वरना सामान्यतः बहन के सामने मैं वीणा से बहुत धीमे स्वर में बात किया करता।

                  बहन को दखलंदाज़ी का पुराना मर्ज़ था।मेरा पूरा बचपन व कैशोर्य बहन के तुके- बेतुके सवालों का जवाब देते बीता था।बहन की श्रवण- सीमा के आवाह- क्षेत्र के भीतर कोई भी बात होती, बहन हर उस बात की तह तक जाना चाहती। हर छोटी- बड़ी घटना का एक-एक ब्योरा इकट्ठा करना उसे बहुत ज़रूरी लगता :

                  बाबूजी काम पर कब गए?घर पर कौन-कौन रहा? मधु स्कूल से कब लौटी?

गिरिजा कालेज के लिए कितने बजे घर से निकली? तुम कहां थे? क्या खाया? वीणा ने क्या पकाया?वीणा के भाई ने क्या कहा?इत्यादि,इत्यादि,इत्यादि…..

                 “मैं नहा रही हूं,” वीणा ने बाथरूम से कहा।

                 “बहुत गलत बात है,” पांच मिनट बाद जब मैं ने वीणा को दोबारा पुकारा तो बहन वीणा का दरवाज़ा पीटने लगी, “उधर अरुण को इम्तिहान के लिए देर हो रही है और इधर तुम्हें अपने नहाने की पड़ी है।क्या तुम दस मिनट बाद नहीं नहा सकती थी?”

                 “जीजी,” मजबूर हो कर मुझे अपने कमरे से बाहर आना पड़ा, “वीणा अब घर की एक महत्वपूर्ण सदस्या है। तुम्हारी पुरानी छात्रा नहीं।वह अपनी ज़िम्मेदारियां बखूबी समझती है। तुम अपने कमरे में जाओ और अपनी आदतें सुधारो।”

                 “तुम मेरा अपमान कर रहे हो,” बहन अपनी आंखों में आंसू ले आई।

                 “यह क्या हो रहा है?” बाबूजी अपने कमरे से बाहर चले आए। 

                 “आप जीजी को समझाइए, बाबूजी,” मैं ने कहा, “जीजी को अब अपनी पुरानी आदतें बदल लेनी चाहिए। आजकल लोग एक दखलंदाज़ को किसी हमलावर से कम नहीं मानते…..”

                   “मुझे अपना पाठ न पढ़ाओ,” बाबूजी का स्वर कठोर हो आया, “उषा तुम्हारी बड़ी बहन है। तुम्हारी शुभचिंतक है। तुम्हें उसे पूरा सम्मान देना चाहिए। यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि उस ने हमारी खातिर अपने जीवन के सर्वोत्तम वर्ष हमारी सेवा में बिताए हैं…..”

                   “आप की सेवा में बिताए होंगे,” मैं ताव खा गया, “हमारे लिए उन्हों ने कुछ नहीं किया। इधर वीणा अस्वस्थ थी, फिर भी उन्हों ने अपनी शादी नहीं रोकी। अपनी ढल रही उम्र का भी कोई लिहाज़ नहीं रखा। जिसे सामने पाया, आंखें मूंद कर उसी के साथ अपने चक्रदोले पर सवार हो लीं…..”

                   “वीणा की बोली बोल रहे हो?” बहन मुकाबले पर उतर आई। वह ज़रूर जानती थी, ‘चक्रदोला’ शब्द मेरा नहीं, वीणा का शब्द रहा था।

                   “तुम्हें शर्म आनी चाहिए,” बाबूजी मुझ पर बरस लिए, “बेचारी पंद्रह साल की थी, जब तुम्हारी मां चल बसी थीं। मां बन कर उस ने तुम तीन भाई- बहनों के लिए अपनी नींद, अपना आराम,अपनी भूख…..”

                  “मां को मैं ने नहीं मारा था,” मैं आग हो लिया, “फिर क्यों मुझी को सारी कहानी बार- बार सुनाई जाती है? मधु और गिरिजा तो शादी करवा कर आप लोगों से छूट लीं, मगर लड़का होने की वजह से मैं तो पिस रहा हूं ना!”

                 “छोड़िए बाबूजी,” बहन अपने कमरे की दिशा की ओर सरक ली, “अरुण का आज इम्तिहान है।”

                  “जीजी में यही सब से बड़ी खराबी है,” मैं फिर चिल्लाया, “हेरा- फेरी भी करती हैं और संत भी बनती हैं। पहले आग लगाती हैं, फिर उसे बुझाने का नाटक करती हैं…..”

                  “जाओ, जा कर अपना इम्तिहान दो,” बाबूजी बहन के कमरे की ओर बढ़ लिए। 

                  दूसरे दिन बहन ने अपनी ससुराल के लिए गाड़ी पकड़ी तो स्टेशन पर उन्हें विदा करने बाबूजी ही गए, मैं नहीं।

 

                  उस दिन मेरी नींद ज़रूर बहुत सवेरे एक भयानक सपने के साथ टूटी थी– बाहर हमारे घर के बरामदे में एक निर्जीव देह पड़ी थी : कभी उस देह पर अठारह वर्ष पहले गुज़र चुकी मां का चेहरा होता तो कभी बहन का…..

                   उस दुःस्वप्न की दहल इतनी जघन्य रही थी कि जब वीणा ने मेरे मोबाइल पर आया वह संदेश खोल कर मुझे दिखाया तो मैं तय न कर पाया कि वह संदेश मेरे दुराशी संदेहार्थ का वितान था अथवा मेरा दुःस्वप्न भयावह किसी त्रासदी का पूर्वाभास था।

                   संदेश मदन की ओर से था:  “उषा जी को उच्च रक्तचाप के कारण अस्पताल ले आए हैं । संभव हो तो आप लोग यहां आ जाएं।”

                   बहन ने पिछले अढ़ाई महीने कैसे काटे थे,मैं ने स्वंंय कोई खबर न ली थी। हां,उस के और बाबूजी के बीच जिन संदेशों का आदान- प्रदान रहा था, बाबूजी ज़रूर मुझे उन से अवगत करवाते रहे थे।

                   “क्या है?” बरामदे में अखबार पढ़ रहे बाबूजी मुझे अपने समीप पाकर चौंक गए। 

                   “मैं न कहता था,” भावावेग में मेरा क्रोध मेरे शोक पर हावी हो गया, “मदन ठीक नहीं। पर नहीं,अपने चक्रदोले पर सवार जीजी ने आप से पूछा, क्या मदन अच्छा नहीं? आप ने फ़ौरन कहा, हां, बहुत अच्छा है। जीजी ने पूछा, क्या शादी के लिए ठीक नहीं? और उसी पल आप ने अपना जवाब हाज़िर कर दिया, हां,हां।बिल्कुल ठीक है……”

                  “क्यों कहा मैं ने ऐसा? क्योंकि पहली बार उस ने अपनी मनमर्ज़ी जताई थी और उस से मुझे ‘न’ कहते नहीं बना था…..”

                  “और यह देखिए अब, मदन ने जीजी को अस्पताल जा पहुंचाया है। उसे  रक्तचाप देते हुए…..”

                  मेरे मोबाइल का संदेश पढ़ते ही बाबूजी बोले, “घनश्याम भैया की वैन और ड्राइवर लेते हैं और उषा को यहीं लिवा लाते हैं…..”

                  घनश्याम ताऊजी बाबूजी के सगे भाई हैं और अपनी डाक्टरी के चल निकलने की वजह से उन्हों ने वाहन- स्वरूप अपने घर के बाहर  तीन मोटरें खड़ी कर रखी हैं। 

 

                   हमारे कस्बापुर से मदन का शहर तीन सौ किलोमीटर दूर था। अभी हम आधे रास्ते ही में थे कि मदन का दूसरा संदेश आया, ‘उषा जी को घर ले आए हैं। वहीं आइए।’

                   बहन की ससुराल मैं दूसरी बार जा रहा था और उस गली को ठीक पहचानता न था जहां मदन अपने परिवार के साथ रहता था। मगर बाबूजी न केवल बहन वाली गली ही ठीक पहचाने, बल्कि ड्राइवर को उस के घर के दरवाज़े तक बेझिझक ले गए। 

                  “रास्ते में कोई तकलीफ़ तो नहीं हुई?” हमारे आने की सूचना मिलते ही मदन हमारी ओर लपका।

                  “उषा कहां है?” बाबूजी एक के बाद एक, कितने ही प्रश्न एक सांस में पूछ लिए, “अस्पताल जाना क्यों पड़ा?उस का रक्तचाप अब कितना है? कल कैसे बढ़ गया? कितना बढ़ गया?”

                 “अभी कमरे में आराम कर रहीं हैं। अस्पताल हमें जाना ज़रूरी हुआ जब कल रात उन का रक्तचाप 212/ 110 पहुंच गया। निरंतर दवा दिला कर डाक्टर जब उसे 130/ 80 तक ले आया तो फिर डाक्टर ही ने सलाह दी, उषा जी को घर पर ज़्यादा आराम मिलेगा…..”

                 “आप पहले कुछ चाय- नाश्ता  लीजिए न! उषा ठीक है अब,” मदन की मां भी हमारे स्वागत में आगे बढ़ आंईं।

                  “नहीं। पहले उसे देखेंगे,” बाबूजी का स्वर भर आया, “अस्पताल ले जाने की नौबत आनी ठीक नहीं…..”

                   मदन का कमरा छोटा था। जिस का अधिकांश भाग एक डबल बेड ने घेर रखा था। बहन की आधी खुली आंखें पूरे खुले दरवाज़े पर टिकी थीं।और उस के सिरहाने के पास एक मेज़ थी। रक्तचाप मापने का उपकरण व कुछ दवाइयां लिए।

                   बहन की आंखें गहरे काले घेरे लिए थीं,और उस का चेहरा बहुत दुबला गया था।

                    बाबूजी बहन के सिरहाने जा खड़े हुए ।

                   “इधर दो- एक महीने से इन का रक्तचाप काफ़ी बढ़ता- घटता रहा है,” मदन ने कहा, “हम अस्पताल में इन्हें बराबर दिखाते भी रहे हैं। दवा घटाने- बढ़ाने के लिए…..”

                  “अजीब गहरी लड़की है,” मदन की मां ने उलाहना दिया, “ सुबह कालेज नहीं गई थी। बोली थी, हम आज काली गाजर की कांजी बनाएंगी। तीन बार लड़कियों के हाथ उसे चाय भिजवाई मगर उस ने मुंह जूठा नहीं किया। वैसे भी हम सभी उस पर ज़ोर डालने से डरते ही हैं…..”

                 “हां,” मदन ने कहा, “हमें तो मालूम भी न था उषा जी कांजी बना लेती हैं। परसों अपने आप से बोलीं। मुझे दो किलो काली गाजर ला दीजिए। कांजी के लिए …..”

                 गाजर की कांजी मुझे बहुत पसंद है और उस सर्दी में मैं पहली बार कांजी से वंचित रहा था। घर में गाजर की कांजी बहन नियमपूर्वक प्रत्येक सर्दी के मौसम में बनाती रही थी।

                 “जीजी, हम आए हैं,” सहसा मुझे लगा बहन के बारे में वीणा की राय न्यायसंगत नहीं रही थी और द्रवित हो कर मैं ने बहन को पुकारा।

                  “बाबूजी…..” बहन ने अपनी आंखें खोल लीं।

                  “जीजी, हम वैन से आए हैं,” बहन के बिस्तर पर मैं उस की बगल में जा बैठा, “आप को कस्बापुर लिवाने…..”

                  “वीणा?” बहन अप्रतिभ हो आई। 

                  “आप को हमारे साथ आना ही होगा, जीजी…..”

                   “आप क्या कह रहे हैं?” मदन ने मेरी ओर आश्चर्य से देखा।

                   “अरुण सही कह रहा है,” बाबूजी ने मदन से कहा, “उषा के बढ़ते-उतरते रक्तचाप को हम हल्के से नहीं ले सकते। हमारे कस्बापुर में हमारी जान- पहचान के अच्छे समझदार डाक्टर हैं। उन्हें दिखाएंगे…..”

                    “मगर अभी आप आइए,” मदन ने बाबूजी से विनती की, “उधर बैठक में बैठते हैं। आप को चाय- नाश्ता कराते हैं। उषा जी के बारे में बाद में बात करेंगे…..”

                  “मैं चाय बना रही हूं,” मदन की मां कमरे से बाहर हो लीं।

                  “मैं बाबूजी और अरुण की बात मानूंगी,” बहन ने अपने बिस्तर से उठने का उपक्रम किया।

                  “आइए, जीजी,” बहन की बगल से उठ कर मैं ने उस के कंधों की ओर अपने हाथ बढ़ाए। 

                 “अस्पताल के कागज़ भी लेती चलूंगी….” बहन ने मदन की ओर देखा।

                 “आप ऐसे कैसे जा सकती हैं ?” मदन ने जीजी के हाथ जा थामे।

                 “मुझे जाना ही है,” बहन ने उस के हाथ लौटा दिए और अपने स्वर में वही सत्ता व स्वधर्मिता ले आई जो अपनी बात मनवाने के लिए वह हम छोटे भाई- बहनों के लिए प्रयोग में लाया करती रही थी।