: : प्रकरण - 56 : :
सुंदर ने भी खुद अपनी जिंदगी बर्बाद की थी. अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी थी.
उस ने पिछ्ली उम्र में शेयर बाजार में पदार्पण किया था.
कुछ भी हो उस का दिमाग़ तभी तेज था. वह पूरा दिन शेयर बाजार में डूबा रहता था.
सुबह 6-30 बजे वह टी वी खोलकर बैठ जाता था. हर एक शेयर के भाव देखता था. एक्सपर्टस की राय सुनता था.
मैं उसे मोबाइल में देखकर भाव की जानकारी देता था. वह जरूर कुछ कमाया था. उस से वह गुमानी हो गया था. उस की अककड़ भी बढ़ गई थी. वह मेरे साथ एक नौकर जैसा व्यवहार करता था.
हर पल वह सभी शेयर्स का अप डेट रखता था. उस की यही आदत बड़ी तकलीफ देती थी.
सुबह बाजार शुरू होने के पहले मैं उसे सारे भाव बताता था. बाद में आधा घंटे में बाजार खुलने पर सभी शेयर्स का भाव पूछता था. थोड़े थोड़े अंतराल पर दिन में दस बार भाव के पीछे लगा रहता था.
ब्रोकर को भी वह घड़ी घड़ी फोन करता था. फिर भी उसे संतोष नहीं होता था. वह स्नेहा को भी बिना वजह इन्वॉल्व करता था, उस का समय बर्बाद करता था. फिर हर चीज में विलम्ब होने का स्नेहा को ताना मारता था.
रात को टी वी धारावाहिक देखते समय भी हर ब्रेक में शेयर बाजार की चैनल पर शिफ्ट हो जाता था.
वह समय का बड़ा पाबन्दी था.
रोज उस के मुंह से एक हीं संवाद बाहर निकलता था.
" कितनी देर कर दी..?! "
रसोई को लेकर भी वह बहुत बड़ा चंचूपात करता था. उस को बनाई गई रसोई में कुछ न कुछ चूक निकालने की बूरी आदत लग गई थी.
खाने से पहले दाल, शाक या अन्य चीजों में नमक, मसाला और मिर्ची बराबर डाला हैं के नहीं वह चेक करता था. बिना चखे वह किसी चीज को खाता नहीं था.
उसे औरों को क्या पसंद था ? क्या अच्छा लगता था? यह जानने की फ़िक्र,चिंता नहीं थी.
खाने के मुआमले में भी वह बहुत चंचूपात करता था.
फिर भी स्नेहा उस को संभाल लेती थी. सुंदर को मौका नहीं देती थी. लेकिन वह विचित्रता की मुरत था. कुछ न कुछ गलती निकाले बिना उसे खाना हजम नहीं होता था.
मुझे तो कुछ बोलने का अधिकार नहीं रहा था.
मेरी हालत पर स्नेहा को तरस आता था. लेकिन वह सुंदर को कुछ कह नहीं पाती थी.,खामोशी उस का विकल्प था.
वह सब कुछ बर्दास्त नहीं कर पाती थी.
मुझे भी इस बात से उस की शादी करवाने के लिये अफ़सोस हो रहा था.
लंबी आयु तक वह शारीरिक सुख से वंचित रह गया था. शायद इस वजह से उस में विकृति आ गई थी.
शादी हो जाने पर उस में क़ोई बदलाव आयेगा. मुझे उम्मीद थी. लेकिन सुंदर अब भी नकारात्मक सोच के दायरे से बाहर नहीं निकल पाया था., वह शादी करने को तैयार नहीं था.
मैंने स्नेहा के पति को वादा किया था.
मैं उसे अपनी बेटी की तरह रखूंगा.
आरती उसे घर में रखेगी या नहीं? इस बात से मैं असमंजस में था. वह स्नेहा को साथ रखने को तैयार हुई थी, लेकिन उस का क़ोई भरोसा नहीं था. उस को घर में लाने के बाद उस ने क़ोई नाटक किया तो? वह बेचारी कहाँ जायेगी?
लेकिन वह उसी दौरान चल बसी थी. और मैंने ईश्वर का शुक्रिया अदा किया था. कम से कम उस की परेशानी का अंत आ गया था.
लेकिन सुंदर का व्यवहार हर चीज में मेरी आड़े आ जाता था.
शेर बाजार में शुरू में नुकसान हुआ था.. यह मेरे लिये बड़ा झटका था, जिसे मैंने सह लिया था.. इस स्थिति में भी वह शेयर बाजार छोडने को तैयार नहीं था. मैं उसे पैसे देता था. फिर भी वह सोचता था. यह पैसे उस के थे.
उस की यह सोच पर मुझे बड़ा गुस्सा आता था.
मैंने घर बेचकर उस पैसे की एफ डी करवाई थी. उस पैसे पर उस ने अपना हक जमाना शुरू कर दिया था.
उस के नसीब का घोड़ा सही दिशा में दौड़ रहा था. इस लिये उस ने बाजार में कुछ कमाई की थी. म्यूच्यूअल फंड्स में भी उसे कुछ फायदा हुआ था.
एक पल मुझे अपने लिये छोटा सा घर खरीदने का मन हुआ था. लेकिन भाव बढ़ते जा रहे थे. इस स्थिति में मैं उस के बारे में कुछ नहीं कर पाया था.
सुंदर की वजह से स्नेहा का जीना हराम हो गया था.. नीला आश्रम में अकेली थी. उस का स्नेहा और सुंदर के साथ अच्छा रिश्ता बन गया था.
उस स्थिति में मैं नीला को घर ले आया था. अकस्मात में उस की आँखों की रौशनी चली गई थी.. जो गरिमा और गौरव की मदद से वापस मिल गई थी.
और उस को नई जिंदगी मिली थी.
सुंदर देख नहीं पाता था. इस बात से नीला को बहुत दुख होता था.
उस की मौजूदगी में सुंदर में कुछ बदलाव आया था.
फिर भी उस ने हथियार फेंक दिये थे. उस वजह से उस ने घर से बाहर नहीं निकलने का बंद कर दिया था . इसी बजह से सब को बड़ी तकलीफो का सामना कर पड़ रहा था.
वह तो शादी के लिये भी अपने आप को काबिल नहीं समझ रहा था.
शारीरिक सुख की कमी ने उस कोई काफ़ी परास्त कर दिया था.
अपनी कमजोरी को उस ने नीला के साथ शेयर की थी. उस ने सुंदर को हकारात्मक सोच के कुछ डोज पिलाये थे.
और उस की स्नेहा के साथ शादी हो गई थी.
लेकिन वह वैवाहिक सुख देने में असमर्थ पुरवार हुआ था.
स्नेहा को भी इस बात का बहुत अफ़सोस होता था.
भगवान ने उसे बीवी का प्यार दिया था, लेकिन संतान सुख से अलिप्त रखा था. इन दोनों बाते भी उसे नकारात्मक माहौल से बाहर निकलने में कुछ मदद नहीं कर पाया था.
स्नेहा जानती थी. सुंदर को कहानिया और लेख लिखने की आदत थी. वह अपने पति के लिये गणेश जी की तरह लहिये का काम करने को उत्सुक थी.
लेकिन पैसे मिलते नहीं थे. इस हालत में सुंदर ने लिखने छोड़ दिया था.
उस वक़्त स्नेहा ने उस को नैतिक सहयोग देते हुए हिदायत दी थी.
" आप फ़िल्म एवं टी वी धारावाहिक के लिये कहानी- संवाद लेखन कीजिए. उस में अच्छे पैसे मिलते हैं. "
मैंने और स्नेहा ने उस के लिये सुंदर को मोटिवेट किया था.
लेकिन यहाँ सिनेमा - क्रिकेट मैच की टिकिट से ज्यादा लंबी कतार लगी थी. इस हालत में उसे नाकामी के सिवा कुछ हाथ नहीं लगा था. 00000000000000 ( क्रमशः)