: : प्रकरण 55 : :
कहते हैं हर किसी क़े दिमाग़ में कुछ ना कुछ चहल पहल होती रहती हैं. दिमाग़ बिना सोचे एक पल भी रह नहीं सकता.
मेरा भी कुछ ऐसा हाल था.
मैं हर पल कुछ ना कुछ सोचता रहता था.
मेरी जिंदगी में कई लोग आये थे, जिस की याद मुझे समय समय पर आती रहती थी. मेरी याद दास्त भी बड़ी तेज थी. कुछ भी चीज मानो फेविकोल की तरह मेरे दिमाग़ में घुसकर पूरी तरह चिपक जाती थी, जिसे मैं चाहकर भी मैं मिटा नहीं सकता था. बार बार मुझे याद आता रहता था.
बचपन में हम लोगो को टांगे में बैठने से जो अनुभव हुआ था. उस का रिकैप ना जाने मैंने कितनी बार देखा था.
उन्ही दिनों मैंने सुना था. एक छोटा लड़का हादसे की वजह से मर गया था. उस वक़्त तो मुझे मौत किस बला का नाम हैं? वह भी पता नहीं था.
नानी मा ने मुझे जानकारी दी थी.
" वह भगवान क़े पास चला गया हैं. वह कभी वापस नहीं आयेगा. उस को जला दिया जायेगा . "
उस वक़्त मैंने उन्हें सवाल किया था.
" नानी मा उस वक़्त बच्चा रोयेगा नहीं? "
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हमारे पड़ोस में एक शख्स रहते थे उन की पान, तम्बाकू और सिगरेट की दुकान थी. उस की बीवी का देहांत हो गया था.. उस की एक लड़की थी. जिस को मेरी नानी मा ने पाल पोषकर बड़ा किया था.. वह यह अहसान कभी भूला नहीं पाई थी. उस ने मेरे साथ भाई बहन का रिश्ता क़ायम किया था. उस का नाम ममता था. जो नाम क़े अनुरूप सचमुच ममता की मुरत थी.
लेकिन उस का बड़ा भाई उस से बिल्कुल विपरित था. और उस की बीवी का तो क्या कहना? उस को अड़ोस पड़ोस में, गांव में किसी से नहीं बनती थी. वह हर किसी से लड़ती झगड़ती रहती थी. क़ोई उसे बुलाता नहीं था. उस का लड़का बराबर अपनी मा पर गया था. वह हर घड़ी मुझ से लडता झगड़ता रहता था.
उस को पढ़ाई लिखाई में क़ोई दिलचस्पी नहीं थी.
मैं उस से दूर रहना ही पसंद करता था. उस की मा भी अपने बेटे को सब कुछ गलत सिखा रही थी.
हमारी पड़ोस में दूसरी एक बुजुर्ग महिला रहती थी. जो विधवा थी. उस का खुद का बंगले टाइप घर था. जिस में उस ने मंदिर बनाया था.
उस क़े अलावा उस क़े पास गाय भेंसे थी. जिस क़े दूध से वह पैसे कमाती थी.
बाहर मंदिर में एक तबैला था. जहाँ गाय भेंसे को रखा जाता था. शाम को वह बाई दूध दोहने मंदिर आती थी. दोहने की प्रतिक्रिया हमें पसंद थी. हम दोनों शाम को उसे देखने मंदिर पहुंच जाते थे.
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मा की मौत को काफ़ी समय बीत गया था.
फिर भी एक बात मेरे जहम में घर कर गई थी.
नानी मा क़े निर्दय मार से मेरे बडे भाई सुखेश की मौत हो गई थी.
मैं कुछ भी नहीं भूला पाता था.
मेरी मा का क़ोई बीमारी की वजह से शादी क़े बाद चार साल में देहांत हुआ था जो कुदरती नहीं था.. मुझे उस क़े बारे में कुछ मालूम नहीं था. खुद नानी मा ने मुझे बताया था.
" तुम्हारी मा को किसी ने कुछ जहरीली चीज खिला दी थी, जिस की वजह से उन की मौत हो गई थी. "
मुझे तो अपनी मा का चेहरा भी ठीक से याद नहीं था.
उस को लेकर मुझे एक गीत याद आता था:
राम तेरे घर कौन कमी थी छिन ली तूने हंसी क्यों किसी की सुना जियरा मा मा कहे मा ना मरे बचपन में किसी की (2)
हर बार यह गीत मेरी आँखों में आंसू की लड़ी बहाती थी.
ज़ब भी क़ोई फ़िल्म देखता था और उस में मा क़े मौत की बात आती थी तो मैं अपने आंसू नहीं रोक सकता था.
मरने क़े बाद हर क़ोई खुदा क़े घर चला जाता हैं.
लेकिन वह कहाँ हैं? किसी को उस की जानकारी नहीं थी.
कुछ साल पहले ' जमीन क़े तारे ' नाम से एक फ़िल्म बनी थी. जिस में दो छोटे बच्चों की मा भगवान क़े पास चली जाती हैं. ऐसा दिखाया था..
और भगवान का घर कहाँ था?
बच्चों को उस क़े बारे में कुछ पता नहीं था. वह ढूंढ़ने को निकल पड़ते हैं.
उन्हें एक ट्रक ड्राइवर मिल जाता हैं. जो बच्चों को सवाल करता हैं.
" बच्चों कहाँ जाना हैं? "
वह लोग सरलता से निर्दोष अंदाज में जवाब देते हैं.
" हमें हमारी मा क़े पास जाना हैं. "
" कहाँ हैं तुम्हारी मा?
" भगवान क़े पास!! "
सुनकर ट्रक वाले की आँखों भर आती है.
और वह उन्हें जूठी तसल्ली देता हैं.!!
" ओ मेरे प्यारो जमीन के तारों मैं ले जाऊंगा तुम को वहाँ! "
गीत के जरिये वह बच्चों को जूठा आश्वासन देता हैं..
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मेरे भीतर एक लेखक छिपा था. मुझे उस बात का एहसास हो गया था. मेरे भीतर हरदम कुछ ना कुछ लिखने के विचार उठते थे.
उस वक़्त तो मैं कुछ लिख नहीं पाया था.
लिखने क़े बारे में मैंने दो अहम बातें सुनी थी.
जिस की बीवी अच्छी ना हो वही सफल लेखक बन सकता हैं!!
और दूसरा..
मुझे एक वाक्या याद आया था. किसी ने इच्छुक लेखक को सवाल किया था.
" तुम लेखक बनना चाहते हो? कहाँ हैं तुम्हारे जख्म? जितने बडे जख्म उतने ही बडे लेखक बन सकते हो. "
आरती तो उस समय उस बिरादरी में नहीं थी. तो 50 प्रतिशत लेखक बनने की संभावना मिट गई थी. लेकिन जख्मो की बात की जाये तो भगवान मेरे पर मेहरबान था. उस ने मुझे कदम कदम पर जख्मो की लहानी देने में क़ोई कसर नहीं छोड़ी थी.
स्कुल क़े दिनों में मैंने एक दूसरे कवि से प्रभावित होकर दो लाइने लिखी थी::
' जिगर में दर्द लेकर जा रहा हूं, कहना मत अकेला जा रहा हूं.
कहां जाता हैं क़ोई भी अपने साथ कुछ नहीं ले जाता.
शायद इसी बात ने मुझे ऐसा लिखने क़े लिये प्रेरित किया था.
अनन्या क़े मुआमले में मैंने पहली बार चोट खाने का एहसास किया था.
जिस ने मुझे ऐसा लिखने पर विवश किया था.
आंसू रो रो पीता हूं, मुस्कुरा कर जीता हूं दोस्त नहीं यार कोई जख़्मी दिल को सिता हूं
उस वक़्त मेरे स्कूली यार ने मेरी इस टेलन्ट की सराहना की थी.
मैंने उसे आगे बढ़ाया था.
जब मैं चला पाने मंज़िल मिली मुझे तबाही, मिलते ही मंज़िल खुद हम सफर ने ली बिदाई मैंने तो इश्क की आग मैं अरमानो की होली जलाई क़ोई फिर भी नहीं पूछता मैं कहाँ कैसे जीता हूं.
गरिमा ना मिलने पर मैंने अपना विषाद इस तरह व्यक्त किया था.
000000000 ( क्रमशः)