महाभारत की कहानी - भाग 218 Ashoke Ghosh द्वारा आध्यात्मिक कथा में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

महाभारत की कहानी - भाग 218

महाभारत की कहानी - भाग-२२२

भीष्म द्वारा वर्णित तीन प्रकार के प्रमाण, भीष्म के उपदेश की समाप्ति और स्वर्गारोहण

 

प्रस्तावना

कृष्णद्वैपायन वेदव्यास ने महाकाव्य महाभारत रचना किया। इस पुस्तक में उन्होंने कुरु वंश के प्रसार, गांधारी की धर्मपरायणता, विदुर की बुद्धि, कुंती के धैर्य, वासुदेव की महानता, पांडवों की सच्चाई और धृतराष्ट्र के पुत्रों की दुष्टता का वर्णन किया है। विभिन्न कथाओं से युक्त इस महाभारत में कुल साठ लाख श्लोक हैं। कृष्णद्वैपायन वेदव्यास ने इस ग्रंथ को सबसे पहले अपने पुत्र शुकदेव को पढ़ाया और फिर अन्य शिष्यों को पढ़ाया। उन्होंने साठ लाख श्लोकों की एक और महाभारत संहिता की रचना की, जिनमें से तीस लाख श्लोक देवलोक में, पंद्रह लाख श्लोक पितृलोक में, चौदह लाख श्लोक ग़न्धर्बलोक में और एक लाख श्लोक मनुष्यलोक में विद्यमान हैं। कृष्णद्वैपायन वेदव्यास के शिष्य वैशम्पायन ने उस एक लाख श्लोकों का पाठ किया। अर्जुन के प्रपौत्र राजा जनमेजय और ब्राह्मणों के कई अनुरोधों के बाद, कृष्णद्वैपायन वेदव्यास ने अपने शिष्य वैशम्पायन को महाभारत सुनाने का अनुमति दिया था।

संपूर्ण महाभारत पढ़ने वाले लोगों की संख्या बहुत कम है। अधिकांश लोगों ने महाभारत की कुछ कहानी पढ़ी, सुनी या देखी है या दूरदर्शन पर विस्तारित प्रसारण देखा है, जो महाभारत का केवल एक टुकड़ा है और मुख्य रूप से कौरवों और पांडवों और भगवान कृष्ण की भूमिका पर केंद्रित है।

महाकाव्य महाभारत कई कहानियों का संग्रह है, जिनमें से अधिकांश विशेष रूप से कौरवों और पांडवों की कहानी से संबंधित हैं।

मुझे आशा है कि उनमें से कुछ कहानियों को सरल भाषा में दयालु पाठकों के सामने प्रस्तुत करने का यह छोटा सा प्रयास आपको पसंद आएगा।

अशोक घोष

 

भीष्म द्वारा वर्णित तीन प्रकार के प्रमाण, भीष्म के उपदेश की समाप्ति और स्वर्गारोहण

युधिष्ठिर ने कहा, पितामह, प्रत्यक्ष और आगम या श्रुति इन दो प्रमाणों में से कौन श्रेष्ठ है? भीष्म ने कहा, पांडित्य के अभिमानी हेतुवादी प्रत्यक्ष के अतिरिक्त अन्य प्रमाण नहीं मानते, उनका यह सिद्धांत भ्रांत है। आगम ही मुख्य प्रमाण है, किंतु अनलस और अभिनिविष्ट नहिं हो तो उसे स्थिर करना दुर्लभ है। जो शिष्टाचारहीन, वेद और धर्म के द्वेषी हैं, उनके कथन विश्वासयोग्य नहीं। जिन साधुओं के बुद्धि शास्त्रचर्चा से विशुद्ध हो गई है, उनके पास ही संशय दूर करने के लिए जाना उचित है। वेद, प्रत्यक्ष और शिष्टाचार — ये तीन ही प्रमाण हैं। युधिष्ठिर ने कहा, तब क्या धर्म भी तीन प्रकार का है? भीष्म ने कहा, धर्म एक ही है, उसके प्रमाण तीन प्रकार के हो सकते हैं। तर्क द्वारा धर्म जानने का प्रयास न करो, प्रमाण की जो निश्चित पद्धति है उसके द्वारा ही अपने संशय को दूर कर सकोगे। अहिंसा, सत्य, अक्रोध और दान — ये चार सनातन धर्म हैं, तुम इस धर्म का अनुष्ठान करोगे। पितृ-पितामह का अनुसरण करके ब्राह्मणों की सेवा करो, वही तुम्हें धर्म का उपदेश देंगे।

भीष्म ने इस प्रकार युधिष्ठिर को नाना विषय में उपदेश देकर मौन हो गए। जो क्षत्रवीर उनके निकट एकत्रित थे, वे क्षणकाल निश्चल होकर रहे। उसके बाद महर्षि वेदव्यास शरशय्या में शायीत भीष्म से बोले, गंगानंदन, कुरुराज युधिष्ठिर अब प्रकृतिस्थ हो गए हैं, तुम अनुमति दो, वे अपने भाइयों, कृष्ण और उपस्थित राजाओं के साथ हस्तिनापुर लौट जाएं। भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा, तुम अब अमात्यों के साथ नगर लौट जाओ, तुम्हारा मानसिक ताप दूर हो। तुम श्रद्धासहित ययाति के समान अनेक यज्ञ करके प्रचुर दक्षिणा दो, देवगण और पितृगण को तृप्त करो, प्रजागण का मनोरंजन और शुभचिंतकों का सम्मान करो। पक्षी जैसे फलवान वृक्ष का आश्रय करते हैं, वैसे ही तुम्हारे शुभचिंतकों ने तुम्हें आश्रय करें। सूर्य के उत्तरायण आरंभ होने पर मेरा मृत्युकाल उपस्थित होगा, तब तुम फिर आओ। युधिष्ठिर सहमत हुए और भीष्म को अभिवादन करके धृतराष्ट्र और गांधारी को आगे रखकर सबके साथ हस्तिनापुर की ओर यात्रा किए।

युधिष्ठिर हस्तिनापुर आकर पुरवासियों और जनपदवासियों को यथोचित सम्मान देकर घर लौटने की अनुमति दी और पतिपुत्रहीन नारियों को प्रचुर धन देकर सांत्वना दी। पचास दिन बाद उन्होंने स्मरण किया कि भीष्म के पास जाने का समय उपस्थित हो गया है। तब उन्होंने अंत्येष्टि क्रियाओं के लिए घी, फूलों की माला, क्षौमवस्त्र, चंदन, अगुरु आदि भेजे और धृतराष्ट्र, गांधारी, कुंती और भाइयों को साथ लेकर याजकों के साथ यात्रा किया। कृष्ण, विदुर, युयुत्सु और सात्यकि उनके अनुसरण करने लगे। वे कुरुक्षेत्र में भीष्म के निकट पहुंचकर देखा कि वेदव्यास, नारद और असितदेवल उनके पास बैठे हैं और नाना देशों से आए राजा और रक्षिगण उन्हें रक्षा कर रहे हैं।

सबको अभिवादन करके युधिष्ठिर ने भीष्म से कहा, पितामह, मैं युधिष्ठिर हूं, आपको प्रणाम कर रहा हूं। महाबाहु, क्या आप सुन रहे हैं? बताइए अब मैं आपके लिए क्या करूं। मैं अग्नि लेकर यथासमय उपस्थित हो गया हूं। आचार्य, ऋत्विक और ब्राह्मणगण, मेरे भाई, आपका पुत्र धृतराष्ट्र, और अमात्योंसहित कृष्ण आ गए हैं। कुरुश्रेष्ठ, आप सबको देखें। आपके अंत्येष्टि के लिए जो आवश्यक है सब कुछ मैंने आयोजित किया है।

भीष्म ने सबकी ओर देखा, फिर युधिष्ठिर का हाथ पकड़कर गंभीर स्वर में कहा, तुम उपयुक्त काल में आ गए हो। मैं अट्ठावन दिन इस तीक्ष्ण शरशय्या पर लेटा हूं, ऐसा लगता है की सौ वर्ष बीत गए। अब चांद्र माघ माहिना के तीन भाग शेष हैं, शुक्लपक्ष चल रहा है। उसके बाद भीष्म ने धृतराष्ट्र से कहा, तुम धर्मज्ञ हो, शास्त्रवेत्ता, अनेक ब्राह्मणों की सेवा की है, वेद और धर्म के सूक्ष्म तत्त्व तुम जानते हो, तुम्हें शोक करना उचित नहीं, जो भवितव्य था वही हुआ। पांडुपुत्र धर्मतः तुम्हारे पुत्रतुल्य हैं, तुम धर्मानुसार उनका पालन करो। धर्मराज युधिष्ठिर गुरुभक्त और अहिंसक हैं, ये तुम्हारे निर्देश का पालन करेंगे। तुम्हारे पुत्र दुरात्मा, क्रोधी, मूढ़, ईर्षान्वित और दुराचारी थे, उनके लिए शोक न करो। फिर भीष्म ने कृष्ण से कहा, हे देवेश सुरासुर वंदित शंखचक्रगदाधर त्रिविक्रम भगवान, तुम्हें नमस्कार। तुम सनातन परमात्मा हो, मैं तुम्हारा एकांत भक्त हूं। पुरुषोत्तम, तुम मुझे त्राण करो, तुम्हारे अनुगत पांडवों की रक्षा करो। मैंने दुर्योधन से कहा था - जिस पक्ष में कृष्ण है उसी में धर्म है, जहां धर्म है वहां जय है। मैंने बार-बार उसे संधि करने को कहा था, किंतु वह मूर्ख मेरी बात न माना, पृथ्वी के समस्त राजाओं को नष्ट करके स्वयं नष्ट हो गया। कृष्ण, अब मैं शरीर त्यागूंगा, तुम आश्वासन दो कि मैं परमगति प्राप्त करूं।

कृष्ण ने कहा, भीष्म, मैं अनुमति देता हूं, तुम वसुओं के लोक जाओ। राजर्षि, आप निष्पाप हो, पितृभक्त हो, दूसरे मार्कंडेय समान हो। मृत्यु तुम्हारी भृत्य के समान वशवर्ती है। उसके बाद भीष्म ने सबको संभाषण और आलिंगन करके युधिष्ठिर से कहा, महाराज, ब्राह्मणगण, विशेषतः आचार्य और ऋत्विकगण, तुम्हारे पूजनीय हैं।

शांतनुपुत्र भीष्म ने उपस्थित कुरुगण को इस प्रकार कहकर मौन हो गए, फिर यथाक्रम मूलाधारादि में अपना चित्त निबेश किया। उनका प्राणवायु निरुद्ध होकर ऊर्ध्वगामी होने लगा, उसी के साथ उनका शरीर क्रमशः बाणमुक्त और निदर्द हो गया। फिर उनका प्राण ब्रह्मरंध्र भेद करके महा उल्का के समान आकाश में उठकर अंतर्हित हो गया। पुष्पवृष्टि और देवदुंदुभि की ध्वनि होने लगी, सिद्ध और महर्षिगण साधु-साधु कहने लगे। भीष्म ने इस प्रकार स्वर्गारोहण किया तो पांडवगण, विदुर, युयुत्सु ने उनके निष्प्राण शरीर पर छत्र धारण किया, चामर से वीजन करने लगे, नकुल और सहदेव ने उष्णीष पहनाया, धृतराष्ट्र और युधिष्ठिर उनके पाददेश पर रहे। कौरव नारियां भीष्म के आपादमस्तक तालपत्रों से हवा करने लगीं। होम और सामगान के बाद धृतराष्ट्र आदि ने भीष्म के देह को चंदनकाष्ठ, अगुरु आदि से ढककर अग्निदान किया। अंत्येष्टि क्रिया समाप्त होने पर सब भगीरथी तट जाकर यथाविधि तर्पण किया।

उसी समय देवी गंगा जल से उठीं और शोकाकुल होकर कहा, कौरवगण, मेरा पुत्र राजोचित गुण संपन्न, प्रज्ञावान और महाकुलजात था। परशुराम के निकट जिन्होंने पराजय नहीं पाई, वे शिखंडी के दिव्य अस्त्र से नष्ट हुए हैं। मेरा हृदय लौहमय है, इसलिए प्रिय पुत्र के मरण में विदीर्ण नहीं हुआ। गंगा के विलाप को सुनकर कृष्ण ने कहा, देवी, शोक त्याग करो, तुम्हारा पुत्र परमलोक गया है। शिखंडी ने उसे वध नहीं किया, वे क्षत्रधर्म अनुसार युद्ध करके अर्जुन के द्वारा नष्ट होकर वसुलोक गए हैं।

______________

(धीरे-धीरे)