आँगन में हल्की धूप बिखरी हुई थी।
घर की औरतें रसोई में व्यस्त थीं, बच्चे आँगन में खेलकूद में मग्न।
अचानक दरवाज़े से राजा भीतर घुसा—उसके हाथ में एक काग़ज़ का कवर था।
उसकी आँखों में शरारत और चेहरे पर एक छुपा हुआ राज़ झलक रहा था।
वो हँसते हुए, लगभग दौड़ता हुआ घर में दाख़िल हुआ।
चाची (हँसकर):
"अरे राजा, क्या लाया है? हमें भी दिखा तो!"
भाभी (रास्ता रोकते हुए):
"रुक-रुक! पहले हमें दिखाना पड़ेगा, तभी आगे जा सकेगा।"
राजा ने दोनों को हल्के-से धक्का दिया, शरारती मुस्कान के साथ।
राजा (हँसते हुए):
"नहीं-नहीं! ये किसी और के लिए है। सिर्फ़ उसी को दिखाऊँगा।"
सबके चेहरे पर हैरानी थी—आख़िर ऐसा क्या है इस कवर में?
लेकिन राजा बिना किसी की परवाह किए सीधा उस कमरे की ओर भागा,
जहाँ फ़ूल चुपचाप बैठी थी।
फ़ूल—जो बोल नहीं सकती थी—अपने काम में मग्न थी।
राजा की आहट सुनते ही उसने सिर उठाया।
उसकी बड़ी-बड़ी आँखों में सवाल थे।
चेहरे पर हल्की मुस्कान तैर गई।
उसने अपनी उँगलियों से इशारा किया—
"क्या हुआ? आज इतने खुश क्यों हो?"
राजा हाँफता हुआ उसके सामने आकर खड़ा हो गया।
उसने तुरंत वो काग़ज़ का कवर आगे बढ़ाया।
राजा (उत्साहित होकर):
"लो दीदी… ये तुम्हारे लिए है!"
फ़ूल ने हैरानी से कवर खोला।
अंदर से एक छोटा-सा चमचमाता हुआ आईना निकला।
आईने की रोशनी उसकी आँखों में उतर आई।
उसकी उँगलियाँ काँप गईं।
उसने दोनों हाथों से आईने को पकड़कर धीरे-धीरे अपनी तरफ़ किया।
उसकी साँसें रुक-सी गईं।
आँखों से चमकते आँसू निकल पड़े।
फ़ूल ने काँपते हाथों से इशारा किया—
"आईना…? ये कहाँ से…?"
राजा के चेहरे पर मासूम गर्व था।
राजा (मुस्कुराकर):
"आज तुम्हारा जन्मदिन है, दीदी!
पापा और मैं शहर से ये लाए हैं।
पापा ने कहा था—फ़ूल के लिए कुछ ख़ास होना चाहिए।
तो ये देखो… अब तुम भी सबकी तरह खुद को देख पाओगी।"
फ़ूल की आँखों से आँसुओं की धार बह चली।
वो बोल नहीं सकी, पर उसके चेहरे पर जो चमक थी—
वो
शब्दों से कहीं गहरी थी।
उसने राजा को कसकर गले से लगा लिया।
फ़ूल बचपन से ही खामोश थी। बोल नहीं पाती थी, पर उसकी आँखों में जो गहराई थी, उसमें शब्दों से कहीं ज़्यादा बातें छुपी रहती थीं। डॉक्टर ने एक बार कहा भी था कि एक छोटा-सा ऑपरेशन करके उसका गला ठीक किया जा सकता है, लेकिन उसके घरवालों ने पैसे बचाने के लिए यह कहकर मना कर दिया—
"लड़की तो चुप ही रहे तो अच्छी लगती है।"
गाँव बहुत छोटा था। इतना छोटा कि वहाँ ज़िंदगी मानो समय से पीछे अटकी हुई हो। मिट्टी की झोपड़ियाँ, बैलों की गाड़ी, चूल्हे का धुआँ और लोगों का सीधा-सादा मन। बाहर की दुनिया यहाँ तक कभी आई ही नहीं थी।
इसी गाँव में एक दिन फ़ूल के पिता शहर से लौटे। उनके हाथ में एक बड़ा-सा सामान लिपटा हुआ था। घर में सबने कौतूहल से देखा। जब कपड़ा हटाया गया तो चमकदार शीशा निकला—आईना।
आईना!
गाँव में यह कोई साधारण चीज़ नहीं थी। पूरे गाँव में बस गिनती के ही घरों में आईना था। यह उनके लिए वैसा ही था जैसे किसी और जगह सोने-चाँदी का गहना।
सबसे पहले फ़ूल के नर्म हाथों ने उसे छुआ। उसने हिचकते हुए आईने को उठाया और उसमें झाँका। अचानक उसे लगा जैसे पहली बार उसने खुद को देखा है। वो स्थिर खड़ी रही। मानो आईना उसके सामने नहीं, उसकी आत्मा उसके सामने खड़ी हो।
बाकी घरवाले भी बेचैन हो उठे। किसी ने हँसते हुए कहा—
"अरे ज़रा हमें भी तो देखने दे!"
घर में आईने का आना किसी त्यौहार से कम नहीं था। मिट्टी की दीवारों और पुरानी लकड़ी के खिड़कियों वाले उस छोटे-से घर में जैसे अचानक रोशनी भर गई हो। सबके चेहरे पर जिज्ञासा थी, मानो कोई ख़ज़ाना मिल गया हो।
फ़ूल खामोश खड़ी थी। पहली बार उसने खुद को आईने में देखा।
उसकी आँखों में हैरत तैर गई — मानो आईना उससे पूछ रहा हो, “ये तुम हो?”
पीछे से दादी की भारी-सी हँसी गूँजी।
“अरे! ज़रा हमें भी तो देखने दे। उम्र बीत गई, पर आज तक अपनी शक्ल साफ़-साफ़ नहीं देखी।”
उनके झुर्रियों वाले चेहरे पर चमक आ गई, जैसे अचानक जवानी लौट आई हो।
माँ थकी हुई-सी आगे बढ़ीं। आँखों के नीचे हल्के काले घेरे और माथे पर पसीने की चमक, लेकिन जैसे ही आईने में खुद को देखा, होंठों पर धीमी मुस्कान तैर गई।
“अरे वाह… ऐसे तो लगता है जैसे कोई और औरत मेरे सामने खड़ी है। सच में जादू है।”
फिर चाचा आए, मूँछों को ताव देते हुए बोले —
“देखो-देखो! मर्दों की असली शान यही है। मेरी मूँछ सबसे बढ़िया दिख रही है।”
चाची ने तुरंत टोक दिया, “अजी छोड़िए भी! ये आईना आपके लिए नहीं, हमारे लिए आया है। ज़रा मुझे देखने दीजिए।”
बड़ा भाई शरारत से कंघी उठाकर बाल सँवारने लगा —
“अब तो मैं पूरे गाँव में सबसे हैंडसम लगूँगा।”
छोटी बहन खिलखिला उठी —
“वाह! मेरी चोटी कितनी लंबी लग रही है इसमें।”
दो छोटे बच्चे उछलते-कूदते आईने के सामने पहुँचे।
“अरे! ये तो मैं हूँ! पर दीवार के अंदर कैसे आ गया?” पहला बच्चा हैरानी से बोला।
“नहीं-नहीं, ये तुम नहीं… ये तो भूत है!” दूसरे ने मुँह बनाते हुए कहा।
पूरा कमरा ठहाकों से गूँज उठा।
आख़िरकार पिता ने सबको सँभालते हुए आईना दीवार पर टाँग दिया।
गंभीर लेकिन मुस्कुराते हुए बोले —
“लो, अब सब बारी-बारी से देखो। किसी को छीनने की ज़रूरत नहीं। ये आईना पूरे घर का है।”
उस दिन घर हँसी-खुशी से भर गया।
पर रात होते-होते वही बड़ा परिवार, वही सब चेहरे — अब बार-बार एक ही नाम पुकारने लगे।
“फ़ूल, ज़रा रोटियाँ बना ले।”
“फ़ूल, ये कपड़े धो दे।”
“फ़ूल, पानी भर ला।”
हर ओर से आवाज़ें।
फ़ूल चुपचाप सबकी सुनती रही। बोल तो वो सकती ही नहीं थी, बस काम में लग जाती।
पर उसके चेहरे की थकान साफ़ झलकने लगी।
पिता ने एक पल रुककर सबको देखा।
उनकी आँखों में खामोश दर्द था।
“क्या कर रहे हो तुम लोग?” उन्होंने गंभीर स्वर में कहा।
“एक-एक करके कहो। वो सबका काम कैसे करेगी? वो भी इंसान है, पत्थर नहीं।”
फ़ूल फिर भी चुप रही।
उसके मन की सारी बातें बस उसकी आँखों में ही पढ़ी जा सकती थीं।
और घरवाले… शायद चाहकर भी उस थकान से मुँह नहीं मोड़ पाए।
आज फ़ूल कुछ अलग ही लग रही थी।
उसके चेहरे पर एक अजीब-सी चमक थी—साँवले रंग पर सूरज की हल्की किरणें जैसे खिल उठी हों। घरवाले जानते थे कि आज लड़के वाले देखने आने वाले हैं, इसलिए सब उसे कह रहे थे—
माँ (प्यार से डाँटते हुए):
"फ़ूल, आज के दिन तो कम से कम काम मत कर। ज़रा आराम से बैठ जा।"
चाची (हँसते हुए):
"सही कह रही हैं बहन, वरना फिर कहेंगे लड़की तो काम से ही थक गई लगती है।"
पर फ़ूल उनकी बातों को कभी गंभीरता से लेती ही नहीं थी। उसके लिए घर के काम ही उसका हिस्सा थे, उसका परिचय। उसने सबकी अनसुनी की और पानी भरने के लिए घड़ा उठाकर बाहर चली गई।
घर के अंदर लड़के वाले आ चुके थे।
आँगन में चारपाइयों और बिछी चटाइयों पर सब बैठे थे—लड़के के पिता, माँ और दो-तीन रिश्तेदार। औरतें फुसफुसाकर बातें कर रही थीं, मर्द धीरे-धीरे हँस रहे थे। सबकी नज़र बार-बार दरवाज़े की ओर उठ रही थी।
इसी बीच दरवाज़े से धीमी-सी आहट आई।
फ़ूल लौटी थी। दोनों हाथों में भारी-भारी पानी की बाल्टियाँ लिए, माथे पर पसीना और कपड़े किनारों से भीगे हुए। धूप की हल्की रोशनी में उसके चेहरे पर एक मासूम सी चमक थी।
उसकी झुकी पलकों और थकी साँसों के बीच, जब लड़के वालों की नज़र उस पर पड़ी, तो सब कुछ कुछ क्षण के लिए थम-सा गया।
दादी (गर्व से):
"देखा आप लोगों ने... हमने आज इसे लाख मना किया, पर मानती ही नहीं। काम की ऐसी अभ्यस्त है कि घर के लिए खुद को थका भी दे तो परवाह नहीं करती।"
पिता (गंभीर स्वर में):
"लड़की चाहे कितनी भी सुंदर क्यों न हो, असली सुन्दरता उसके काम और संस्कारों में होती है। और फ़ूल में दोनों हैं।"
फ़ूल शरमा कर चुपचाप पानी की बाल्टियाँ कोने में रख आई।
उसने किसी की तरफ सीधे न देखा, बस पल्लू से चेहरा पोंछते हुए आँगन में आकर चुपचाप खड़ी हो गई—
जैसे वही उसकी पहचान हो: ख़ामोश, मेहनती, और अपनी सादगी में सुंदर।
उपन्यास संस्करण – “फ़ूल की शादी”
आज का दिन फ़ूल के जीवन का सबसे बड़ा दिन था।
लाल साड़ी में सजी, सोने के गहनों और बालों में गुँथे ताज़े फूलों के साथ वह ऐसी लग रही थी जैसे कोई पुरानी चित्रकला आईने से निकलकर साँस लेने लगी हो।
आईने के सामने बैठी वह अपने आप को देख रही थी।
आईना उसकी आँखों में झांक रहा था—
आँखें जिनमें डर और ख़ुशी का अजीब-सा मेल था।
मानो आईना धीरे से पूछ रहा हो—
"क्या सचमुच यह सब तुम्हारे लिए है, फ़ूल?"
बाहर उत्सव का शोर था।
चूल्हे पर पकवानों की ख़ुशबू, बच्चों की किलकारियाँ, और औरतों के गीतों ने आँगन को जैसे किसी मेले में बदल दिया था।
चाची ताली बजाकर बोलीं—
"देखो-देखो, हमारी फ़ूल तो आज रानी लग रही है।"
लेकिन उस ख़ुशी के परदे के पीछे एक सच छिपा था—
लड़के वालों की शर्त।
“पाँच हज़ार नगद और एक मोटरसाइकिल।”
गाँव भर में ये बात आग की तरह फैल गई थी।
फ़ूल के चाचा ग़ुस्से से बोले—
"इतना पैसा क्यों दें? हमारी लड़की कोई बिकाऊ सामान नहीं है!"
दादी ने हाथ जोड़ते हुए सिर हिलाया—
"कहाँ से लाएँगे इतना खर्चा? हमें कहाँ इतना सहारा है?"
पर पिता चुप बैठे रहे।
उनकी आँखों में कोई तर्क नहीं था, बस एक ही सपना—
"मेरी बेटी खुश रहेगी।"
धीरे, मगर दृढ़ स्वर में उन्होंने कहा—
"ये रिश्ता अच्छा है। चाहे कर्ज़ लेना पड़े, पर मैं ये शर्त मानता हूँ।"
सुबह-सुबह ही वे शहर चले गए थे। बाइक ख़रीदने।
फ़ूल को मालूम था—
उसके पिता उसके लिए हर दीवार से टकरा सकते हैं।
पर आज जाने-अनजाने वे मौत से टकराने जा रहे थे।
---
आँगन में मंडप सज चुका था।
पंडित मंत्र पढ़ रहा था।
लड़का और उसका परिवार आ चुका था।
महौल में शगुन और उम्मीद की खुशबू तैर रही थी।
लड़के की माँ ने पूछा—
थोड़ी बेचैनी से—
"दूल्हन के पिताजी अभी तक आए क्यों नहीं?"
एक बुज़ुर्ग ने सहजता से कहा—
"शहर दूर है। बस थोड़ी ही देर की बात है।"
पर फ़ूल का चेहरा एक पल को फीका पड़ गया।
उसके होंठ काँप उठे।
वह जानती थी—
पिता की उपस्थिति के बिना उसका मन कभी पूरा नहीं होगा।
पंडित ने आवाज़ दी—
"समय हो गया है। दूल्हा दुल्हन की माँग में सिंदूर डाले।"
लड़के का हाथ थाली की ओर बढ़ा ही था कि अचानक—
बाहर से शोरगुल उठा।
किसी के रोने की आवाज़।
फिर चीखें।
पूरा मंडप स्तब्ध हो गया।
एक पल के लिए समय ठहर गया।
फ़ूल के चाचा भागते हुए अंदर आए।
उनकी आँखें लाल थीं, गला फटा हुआ।
उनकी चीख ने मंडप का हर दीपक बुझा दिया—
"फ़ूल... तेरे पिताजी अब नहीं रहे!
शहर ने उन्हें खा लिया... सड़क पर कार के नीचे आ गए!"
हवा में जैसे कोई ज़हरीला धुआँ घुल गया।
माँ ज़मीन पर गिर पड़ीं।
दादी ने अपना सिर पीट लिया।
और फ़ूल...
वह पत्थर बन गई।
उसकी आँखों में आँसू तक नहीं आए।
सिर्फ़ एक सन्नाटा था—
जो उसके दिल की हर धड़कन को चीर रहा था।
लड़के वाले उठ खड़े हुए।
उनके चेहरे पर अफ़सोस नहीं, बल्कि हिसाब-किताब था।
लड़के के पिता कठोर स्वर में बोले—
"अब ये रिश्ता नहीं हो सकता। ये तो अपशकुन है।
और फिर... देने वाला भी चला गया। दहेज कहाँ से आएगा?"
ये शब्द फ़ूल के सीने में किसी खंजर की तरह धँस गए।
उसने नज़र उठाकर देखा—
दीवार पर वही आईना टँगा था।
वही आईना, जिसमें कुछ देर पहले उसने खुद को दुल्हन के रूप में देखा था।
अब उस आईने में वही अकेलापन झलक रहा था—
ठीक वैसा ही अकेलापन जैसा फ़ूल के भीतर था।
वह चुपचाप उठी।
उसके गहने, सजावट और सुर्ख साड़ी सब भारी पड़ गए थे।
जैसे वो भार नहीं, बेड़ियाँ हों।
आज उसकी आवाज़ नहीं थी—
लेकिन उसका मौन चीख रहा था—
"पापा... आपने मेरे सुख के लिए सब किया।
पर आज मैं सुख से पहले ही विधवा हो गई।"
गाँववालों की फुसफुसाहट
मंडप में पड़ी चुप्पी धीरे-धीरे टूटी।
बाहर से आती रोने की आवाज़ें अब अंदर भी गूँज रही थीं।
पर बीच-बीच में लोगों की फुसफुसाहटें भी तीर की तरह चुभ रही थीं।
गाँव की एक औरत (धीमे स्वर में):
"अरे बाप रे... कैसा अपशकुन हो गया। दूल्हे के बाप ने ठीक ही कहा, ये तो पनौती है।"
दूसरी औरत:
"क्यों पनौती? बेचारी का क्या कसूर? उसके बाप ने ही तो इतना बड़ा बोझ उठा लिया... बाइक और नक़द! अब कर्ज़ कहाँ से उतरेगा?"
एक बूढ़ा आदमी:
"हूँह! यही तो झंझट है। दहेज की भूख कभी पूरी नहीं होती। बेचारे ने बेटी के लिए सब दाँव पर लगा दिया... और अब जान भी चली गई।"
किसी ने हँसी दबाकर कहा:
"लड़की की किस्मत ही फूटी है। बाप गया, रिश्ता टूटा... अब कौन करेगा इससे शादी?"
कुछ औरतें आँखें पोंछते हुए बोलीं—
"हाय रे फ़ूल... अभी तो दुल्हन बनी थी।"
और कुछ बस खामोश खड़ी रह गईं।
उनकी आँखों में तरस था, पर होंठ चुप थे—जैसे गाँव की औरतों को पता हो कि ये चुप्पी ही सबसे सच्ची बात है।
फ़ूल बीच में बैठी थी, लाल साड़ी में, सिर झुकाए।
आईने पर उसकी नज़र पड़ी—वही आईना जिसमें कुछ घंटे पहले उसने खुद को एक खुशहाल दुल्हन की तरह देखा था।
अब वही आईना उसके टूटे सपनों की गवाही दे रहा था।
उसका दिल चीखना चाहता था, पर उसके गले से आवाज़ नहीं निकलती थी।
बस उसकी आँखें बोल रही थीं—
"पापा, आपने मेरा सुख खरीदना चाहा... और मेरी ज़िंदगी बिक गई।"
---
पिता का शव
सड़क से आती हल्की-हल्की आवाज़ों ने पूरे गाँव को बेचैन कर दिया।
लोगों का हुजूम उस ओर बढ़ चला, जहाँ से कुछ आदमी बांस की खाट पर लिपटा हुआ शरीर लेकर आ रहे थे।
कफ़न के नीचे से दिखती पिता की पहचान हर किसी के दिल को चीर रही थी।
जैसे ही शव आँगन में पहुँचा, फ़ूल की माँ चीखते हुए आगे बढ़ीं।
माँ (धरती पर गिरते हुए):
"नहीं-नहीं... ये सच नहीं है... तुम मुझे छोड़कर नहीं जा सकते!"
फ़ूल की चाची रोते-रोते सिर पीटने लगीं।
चाची:
"हाय रे भैया... बिटिया के हाथ पीले करने निकले थे... और खुद को ही काल पी गया।"
फ़ूल के छोटे भाई बेतहाशा रो रहे थे।
भाई:
"बाबा! आँख खोलो... देखो, मैं हूँ... मैं हूँ बाबा!"
बड़े-बुज़ुर्ग पुरुषों ने आँसू रोकने की कोशिश की, लेकिन उनकी आँखें भी भीग गईं।
गाँव की औरतें दहाड़ें मार-मारकर विलाप कर रही थीं।
फ़ूल... लाल साड़ी और गहनों में सजी... अब भी दुल्हन ही थी, लेकिन उसके कदम भारी हो गए थे।
वह धीरे-धीरे शव की ओर बढ़ी।
उसके नंगे पाँव ज़मीन से घिसट रहे थे।
आगे जाकर उसने काँपते हाथों से पिता का चेहरा छुआ।
चेहरा ठंडा था, निश्चल, पर फ़ूल की आँखों में अभी भी उम्मीद की आखिरी चिंगारी थी।
उसने हल्के से होठ हिलाए—
जैसे कहना चाहती हो—
"पापा... उठ जाओ... देखो, मैं दुल्हन बनी हूँ।"
पर उसके गले से कोई आवाज़ नहीं निकली।
उसकी खामोशी अब चीख से भी भारी हो गई थी।
मंडप में रखा हवनकुंड बुझ चुका था।
पंडित ने मंत्रों की किताब बंद कर दी।
लड़के वाले चुपचाप, बिन कुछ कहे उठकर चले गए।
उनके पैरों की आहट से ज़्यादा शोर अब विलाप का था।
गाँववाले कह रहे थे—
एक बूढ़ी औरत:
"कैसा करम लेके आई है बेचारी फ़ूल... दुल्हन बनी और बाप का कंधा देख लिया।"
दूसरी औरत:
"बिटिया की किस्मत काली हो गई... अब कौन करेगा इससे ब्याह?"
एक आदमी (सिर हिलाकर):
"बेचारा बाप... बेटी की ख़ुशी के लिए सब दाँव पर लगाया, और अंत में जान भी चली गई।"
फ़ूल चुपचाप पिता के शव के पास बैठी थी।
उसकी आँखें आईने की तरफ उठीं, जहाँ वो कुछ देर पहले खुद को देख रही थी।
आईने में अब उसका चेहरा नहीं, सिर्फ़ आँसुओं और सन्नाटे की परछाई थी।
साल गुजर चुके थे।
अब फ़ूल के छोटे भाइयों की भी शादियाँ हो चुकी थीं।
घर बड़ा हो गया था, आँगन में बच्चों की किलकारियाँ गूँजती थीं, खेत और पशु भी बढ़ गए थे।
पर एक चीज़ वैसी ही थी—फ़ूल।
वह अब भी वही खामोश लड़की थी, जिसका जीवन घर के कामों और परिवार की सेवा में ही बँधा हुआ था।
सुबह-सुबह घर का नज़ारा किसी मेले जैसा होता।
किसी को खेत जाना होता, किसी को शहर की नौकरी पर, किसी को कॉलेज पहुँचना होता, और बच्चों को स्कूल।
और हर कोई जल्दी-जल्दी आईने के सामने खड़ा होना चाहता।
छोटी भाभी (झुँझलाकर):
"अरे, मुझे देर हो रही है, पहले मैं देखूँगी!"
बड़ा भाई (गुस्से से):
"नहीं, मैं पहले... मुझे कचहरी पहुँचना है!"
औरतें भी पीछे नहीं रहतीं।
एक चाची:
"पहले फ़ूल मेरा काम करेगी—बच्चों का टिफ़िन बाँधना है।"
दूसरी चाची:
"नहीं-नहीं, पहले बर्तन धुलवाऊँगी, फिर देखो जो चाहे कराना।"
हर कोई फ़ूल को अपनी ओर खींचता।
उसके हाथ पोंछने से पहले ही कोई उसे दूसरी तरफ़ घसीट लेता।
कभी चूल्हे की ओर, कभी बर्तनों की ओर, कभी बच्चों की कॉपियों के पास।
फ़ूल का शरीर दुखता, मन टूटता।
कभी-कभी उसकी आँखों में आँसू भर आते, और वह चीखना चाहती—
"मैं भी इंसान हूँ... मेरी भी एक ज़िंदगी है!"
पर उसकी आवाज़ गले से निकलती ही नहीं।
उस दिन सुबह हड़बड़ी और झगड़ों के बीच अचानक एक तेज़ आवाज़ गूँजी।
सबके कदम रुक गए।
सामने देखा तो आईना फर्श पर चकनाचूर पड़ा था।
घर भर में सन्नाटा छा गया।
बच्चे सिसक उठे।
छोटा भाई:
"अरे... ये क्या कर दिया! इतना महँगा आईना... अब कौन शहर जाएगा नया लाने?"
किसी ने याद दिलाया—
"उसे तो फ़ूल के पिता ही शहर से लाए थे..."
और एक पल को सबकी आँखें भर आईं।
तभी फ़ूल के चाचा आगे बढ़े।
उन्होंने झुककर आईने के टुकड़े उठाए, और एक-एक करके सबको थमा दिए।
चाचा (गंभीर स्वर में):
"लो, अब सबके पास आईना है। अब कोई झगड़ेगा नहीं। हर कोई अपनी शक्ल देख लेगा।"
घर के लोग चौंके, फिर मुस्कुरा उठे।
बच्चे खिलखिलाए, औरतें भी राहत महसूस करने लगीं।
पूरा परिवार अचानक हल्का और खुश हो गया—जैसे टूटा हुआ आईना ही उनकी लड़ाइयों का हल ले आया हो।
तभी फ़ूल की माँ ने गहरी साँस लेकर कहा—
"ठीक ही कह रहे हो भाईसाहब... इसी तरह फ़ूल को भी बाँट लो।
सुबह छोटी बहू के साथ काम करेगी, दोपहर में बड़ी बहू के साथ, और रात में सबसे बड़ी बहू की मदद करेगी।
अब कोई नहीं झगड़ेगा।"
सभी ने हामी भर दी।
सबने कहा—
"हाँ, सही है। अब सब बराबर रहेगा।"
फ़ूल सब सुन रही थी।
वह चुप रही।
उसके हाथ अब भी बर्तन धोने के पानी से भीगे थे।
आईने का कोई टुकड़ा उसके हिस्से में नहीं आया था—
क्योंकि वह खुद ही एक आईना बन चुकी थी, जिसमें सब अपनी-अपनी ज़रूरत देख रहे थे।
आँगन में हल्की धूप फैली हुई थी।
घर के कोने में टूटा हुआ आईना रखा था, जिसके टुकड़े सबने आपस में बाँट लिए थे। हर किसी के हाथ में उसका एक छोटा हिस्सा था—बस फ़ूल के पास कुछ नहीं था।
राजा की आँखों में गुस्सा भर आया। वह बीच आँगन में खड़ा हो गया, उसकी आवाज़ काँप रही थी—
राजा (चीखते हुए):
"ये… ये शीशा मेरी फ़ूल दीदी का था! बाबूजी शहर से सिर्फ़ उनके लिए लाए थे… और तुम सबने इसे टुकड़ों में बाँटकर अपने पास रख लिया। मेरी दीदी के हिस्से में कुछ भी नहीं दिया।"
उसके शब्दों में चोट और अपमान की आग थी।
पास खड़े चाचा ने तिरस्कार से मुस्कुराते हुए जवाब दिया—
चाचा (तीखे स्वर में):
"राजा! अपनी ज़ुबान संभाल। याद रख, ये सब घर हमारा है। और हम तो तुझे और तेरी बहन को खाना खिलाते हैं। तुम्हारी माँ भी सालों से हमारी खटिया पर पड़ी रहती है। ऐसे में तेरे ये तेवर हमें झेलने नहीं पड़ेंगे।"
राजा का चेहरा लाल हो गया। उसने मुट्ठियाँ कस लीं और चाचा की ओर बढ़ा।
राजा (ग़ुस्से से):
"नौकर समझते हो मेरी दीदी को? ये सब… ये घर, ये ज़मीन… सब बाबूजी का है। अगर वो जिंदा होते, तो तुम्हारी इतनी औक़ात भी नहीं थी कि एक गाय तक ख़रीद सको। आज तुम हमारे घर में बैठकर हमारा दिया खाते हो… और हमें एहसान जताते हो!"
फ़ूल अचानक बीच में आ गई। उसकी आँखें नम थीं। उसने काँपते हाथों से चाचा के पाँव पकड़कर इशारों में माफ़ी माँगी। फिर राजा का हाथ पकड़कर कमरे की ओर खींचना चाहा।
लेकिन राजा उसकी ओर देखता भी नहीं, और और भी ज़ोर से चीख पड़ा।
राजा (टूटती आवाज़ में):
"तुम सब… मेरी दीदी को एक नौकरानी समझते हो! जब कि वो इस घर की रानी है! उसकी चुप्पी का मतलब ये नहीं कि वो कुछ नहीं है!"
इतना सुनना था कि चाचा का धैर्य टूट गया। उन्होंने राजा के गाल पर ज़ोर से थप्पड़ जड़ दिया।
चाचा (ग़ुस्से में गरजते हुए):
"बहुत हो गया! निकल जा इस घर से। अगर इतना ही है तो हमारे दिए हुए टुकड़े मत खा। जा, खुद कमा… और कुछ बनकर दिखा!"
फ़ूल ने तुरंत चाचा को रोकने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने उसे ज़ोर से धक्का देकर दूर गिरा दिया।
राजा दौड़कर अपनी बहन को उठाता है। उसकी आँखें आँसुओं से भीग चुकी थीं, पर उसके होंठ अब भी बंद थे। वो कुछ कहना चाहती थी… लेकिन आवाज़ नहीं निकल पाई।
राजा ने उसके काँपते हाथों को कसकर थाम लिया।
राजा (धीरे, टूटी हुई आवाज़ में):
"दिदी… तुम चिंता मत करना। मैं… मैं बहुत जल्दी वापस आऊँगा। तुम्हें अपने साथ ले जाऊँगा। बस मेरा इंतज़ार करना।"
ये कहकर राजा घर से बाहर भाग गया।
फ़ूल आँगन में ही खड़ी रह गई—उसकी आँखों से आँसुओं की धार बह रही थी, पर उसकी ख़ामोशी… सबसे ऊँची चीख बनकर पूरे घर में गूँज रही थी
रात गहरी हो चुकी थी।
पूरा घर अपने-अपने हिस्से के आईनों में झाँककर चैन से सो चुका था।
कहीं बच्चे खर्राटे ले रहे थे, कहीं औरतें थकी हुई करवट बदल रही थीं, और पुरुष दिनभर की मेहनत के बाद नींद में डूब चुके थे।
लेकिन फ़ूल जाग रही थी।
आँगन के एक कोने में, बुझते हुए चूल्हे की राख को घूरती।
उसके हाथ अब भी साबुन की गंध लिए हुए थे, और पीठ में दर्द सुलग रहा था।
वह सोच रही थी—
“सुबह छोटी भाभी, दोपहर बड़ी भाभी, और रात को सबसे बड़ी भाभी...
तो मैं किसकी हूँ?
क्या मैं अपनी भी हूँ कभी?”
उसकी आँखें धीरे-धीरे उस जगह चली गईं जहाँ कभी आईना टँगा रहता था।
अब वहाँ सिर्फ़ दीवार थी।
उसके भीतर एक आवाज़ गूँजी—
"सबको आईने का टुकड़ा मिला... पर मुझे क्यों नहीं?
क्या इसलिए... क्योंकि मैं आईना खुद बन गई हूँ?
सब मुझमें अपनी परछाई देखते हैं... अपनी ज़रूरतें... लेकिन मुझे कौन देखता है?"
फ़ूल की साँस भारी हो गई।
गले से आवाज़ नहीं निकली, लेकिन उसकी खामोशी अब उतनी मासूम नहीं रही।
उस खामोशी में दर्द था, सवाल था... और एक अनदेखा विद्रोह।
उस रात उसने पहली बार खुद से पूछा—
"क्या सचमुच मेरी ज़िंदगी सिर्फ़ दूसरों के लिए है?
क्या मेरे लिए कभी कुछ होगा?"
बाहर चाँद चमक रहा था।
उसकी रोशनी टूटी हुई खिड़की से आकर फ़ूल के चेहरे पर पड़ रही थी।
वह जैसे कह रहा हो—
"हाँ फ़ूल... सवाल उठाना ही पहला कदम है।"
फ़ूल की आँखों से आँसू लुढ़क गए, लेकिन होंठों पर हल्की-सी मुस्कान भी आई।
शायद पहली बार उसने महसूस किया—
कि उसके भीतर भी ज़िंदगी की एक नयी शुरुआत छुपी है।
टूटा हुआ आईना – अगला अध्याय
सुबह की पहली रोशनी आँगन में उतर आई थी।
घर में हलचल मची हुई थी—बच्चों की किताबें सँभाली जा रही थीं, पुरुष खेत की ओर जाने को तैयार हो रहे थे, और औरतें रसोई में बर्तन खटकाने लगी थीं।
लेकिन उस दिन सबकी नज़रें बार-बार एक ही जगह टिक रही थीं—फ़ूल अब तक अपने बिस्तर पर लेटी हुई थी।
चाची (तेज़ आवाज़ में):
"अरी फ़ूल! उठ... सबके काम बाकी हैं, और तू ऐसे पड़ी है?"
फ़ूल ने करवट भी नहीं बदली।
उसकी आँखें छत पर अटक गई थीं।
उसने सिर्फ़ हाथ से इशारा किया—"मैं नहीं उठूँगी।"
चाची का चेहरा गुस्से से तमतमा उठा।
वह पास आई और एक ज़ोरदार थप्पड़ फ़ूल के गाल पर जड़ दिया।
"घर पर बोझ बनी बैठी है... ज़रा सा काम भी नहीं होता तुझसे!"
पर फ़ूल चुप रही।
उसके होंठ काँप रहे थे, पर आँखों में एक अजीब-सा सन्नाटा था।
चाची ने उसे हाथ पकड़कर बिस्तर से खींचा और ज़ोर से धक्का मारा।
"उठ जाएगी कि नहीं? किस बात की शह मिली है तुझे?"
फ़ूल ने काँपते हाथों से इशारा किया—
"मैं नहीं करूँगी... आज मैं कोई काम नहीं करूँगी।"
चाची हँसी, पर वह हँसी ज़हर से भरी थी।
"कैसे नहीं करेगी? तेरे बाप का करज़ा हमने चुकाया है!
तू हमारे घर खा-खा कर जी रही है, हम ही तुझे पाल रहे हैं।
तेरा बाप मर गया... और जानती है क्यों मरा?
तेरी काली किस्मत उसे खा गई!"
ये शब्द किसी चाकू से गहरे चुभे।
फ़ूल की साँसें भारी हो गईं।
उसकी आँखों में आँसू तैर उठे, और अचानक उसने चाची को पीछे धक्का दे दिया।
चाची लड़खड़ाकर दीवार से टकरा गई।
उसी पल आँगन में एक चीख गूँजी।
सबका ध्यान उधर गया—चाचा का हाथ लहूलुहान था।
आईने के टूटे हुए टुकड़ों में से एक उनकी उँगली में चुभ गया था।
सन्नाटा फैल गया।
तभी आँगन के कोने से धीमी, मगर गूँजती आवाज़ आई।
वह थीं दादी—सफ़ेद बालों वाली, काँपते हाथों से लकड़ी के सहारे बैठी हुई।
वह सबकुछ देख रही थीं।
दादी (धीरे-धीरे, मगर भारी स्वर में):
"टूटा हुआ हमेशा चुभता है...
चाहे वह आईना हो... या किसी का दिल।"
सब स्तब्ध रह गए।
दादी ने आगे कहा—
"तुम लोगों ने फ़ूल को घर की चीज़ समझ लिया है।
कभी बर्तन की तरह, कभी चूल्हे की तरह, कभी नोकरी के नौकर की तरह।
पर वो चीज़ नहीं है... इंसान है।
वो चुप है, इसलिए तुम सब उसे और दबाते हो।
पर उसके दिल में भी दर्द है... और वही दर्द अब चुभ रहा है।
फ़ूल हम सबसे ज़्यादा प्यार करती है।
हमारे लिए सब सहती है...
और हम? हमने उसे सिर्फ़ काम करने वाली समझा।"
दादी की आँखों से आँसू बह रहे थे।
पूरा घर चुप था।
फ़ूल आँगन के बीच खड़ी थी—उसकी साँस तेज़ थी, आँसू उसके गालों पर बह रहे थे।
लेकिन आज उसकी आँखों में डर नहीं था...
आज उनमें सवाल था... और जवाब माँगने की ताक़त।
टूटा आईना – दस साल बाद
गाँव की सुबह अब भी वही थी—मुर्गे की बाँग, कुएँ से खींचा जाता पानी, आँगन में बिखरे बर्तनों की खटपट।
पर समय ने सबको बदल दिया था।
घर पहले से बड़ा हो चुका था, परिवार में और लोग जुड़ गए थे—भाईयों की शादियाँ हो चुकी थीं, उनके बच्चे आँगन में खेलते थे।
पर फ़ूल की ज़िंदगी वैसी ही थी, जैसे कोई घड़ी रुकी रह जाए।
अब उसका चेहरा 35 का नहीं, 50 से ऊपर का लगता था।
चेहरे की चमक धूप और चूल्हे के धुएँ ने छीन ली थी।
हाथ-पाँव की नसें मोटी हो चुकी थीं, आँखों के नीचे काले घेरे गहराई दिखाते थे।
वह सुबह से रात तक काम करती, पर कोई उसके श्रम को काम नहीं मानता—सब उसे बोझ समझने लगे थे।
दादी अब इस दुनिया में नहीं थीं।
माँ लकवे से ग्रस्त बिस्तर पर पड़ी रहतीं, हिल तक नहीं सकतीं।
उनकी देखभाल का पूरा बोझ भी फ़ूल पर ही था।
आईना भी अब टूट कर इतने छोटे-छोटे टुकड़ों में बँट गया था कि उसमें कोई चेहरा पूरा नज़र नहीं आता।
कोई आँखें देखता, कोई सिर्फ़ होंठ...
हर टुकड़ा अधूरा था, जैसे इस घर का हर रिश्ता अधूरा रह गया हो।
आँगन में सुबह की वही भाग-दौड़ थी।
छोटी भाभी बच्चों का टिफ़िन लेकर चिल्लाई—
छोटी भाभी (तेज़ स्वर में):
"फ़ूल! पहले मेरा काम कर... बच्चोँ को स्कूल भेजना है।"
बड़ी भाभी पीछे से बोली—
"नहीं, पहले बर्तन धोएगी। कल के भी पड़े हैं।"
चाची ने तीखी हँसी हँसते हुए कहा—
"अरे गोगी को तो कुछ समझ में नहीं आता। इसे बोलो दिनभर घिस-घिस कर काम करती रहे... नहीं तो और खाएगी क्या? घर में बस यही बोझ है।"
“गोगी...”
यह नाम सुनकर फ़ूल के अंदर कहीं कुछ टूट जाता था।
वह चाहती थी कोई उसे उसके नाम से पुकारे,
पर अब घरवालों के लिए वह बस ‘गोगी’ रह गई थी—
जैसे कोई काम करने वाली नौकरानी, जिसका कोई अपना वजूद न हो।
फ़ूल चुप रही।
उसके होंठ थरथराए, लेकिन आवाज़ न निकली।
वह सिर झुकाकर एक-एक का काम करती रही।
चूल्हे में आग सुलगाई, माँ के लिए खिचड़ी बनाई, बच्चों के बस्ते बाँधे।
उसकी आँखें आईने के उस छोटे टुकड़े पर टिक गईं, जिसमें सिर्फ़ उसका एक कान और आधा गाल दिख रहा था।
वह सोच रही थी—
"क्या मैं कभी पूरी दिख पाऊँगी? या हमेशा ऐसे ही अधूरी रहूँगी...?"
घर के शोरगुल में उसकी साँसें दब जाती थीं।
पर उसकी आँखों में अब भी कहीं एक छोटी-सी लौ बची हुई थी—
जैसे टूटा हुआ आईना भी कभी-कभी रोशनी पकड़ लेता है।
जमी हुई रात
उस साल गाँव में ऐसी ठंड पड़ी थी कि बर्फ़-सी हवा हड्डियों तक उतर जाती थी।
हर घर में लोग मोटे-मोटे कम्बलों में लिपटकर, अंगीठियों के पास बैठे, रात काटते थे।
पर फ़ूल के हिस्से में सिर्फ़ रसोई का एक कोना था—जहाँ ज़मीन ठंडी पत्थर जैसी जम चुकी थी।
वह एक फटे से कम्बल में दुबकी पड़ी थी।
पूरी रात उसका शरीर काँपता रहा, जैसे हर साँस बर्फ़ में बदल रही हो।
सुबह, जब घर के लोग उठे तो एक अजीब बात हुई।
फ़ूल पहली बार सबसे बाद में उठी।
रसोई का दरवाज़ा चरमराया।
अंदर गई चाची ने देखा—फ़ूल अब तक लेटी हुई है।
चाची (चौंकते हुए, ठंडी हँसी के साथ):
"अरे ये क्या? आज तो ये गोगी अब तक सोई है! सब काम पड़ा है, और इसे नींद खुल ही नहीं रही।"
उन्होंने झकझोरकर उठाने की कोशिश की।
पर फ़ूल का बदन तो तप रही आग और काँपते बर्फ़ दोनों जैसा लग रहा था।
होंठ नीले पड़ गए थे, और दाँत अनियंत्रित बज रहे थे।
इतने में दरवाज़े पर खड़े चाचा ने देखा।
वे नहा-धोकर तैयार हुए थे और हाथ में आईने का छोटा-सा टुकड़ा उठाए अपना चेहरा देखना चाह रहे थे।
पर उस पर ओस की बूँदें जमकर धुंधला बना चुकी थीं।
उन्होंने दूसरा टुकड़ा उठाया—वो भी साफ़ कुछ नहीं दिखा।
चेहरे की जगह धुंध और दरारें ही झलक रही थीं।
चाचा (फ़ूल को देखते हुए):
"लगता है इसे बुख़ार हो गया है... ठंड लग गई है। इसे डॉक्टर के पास ले जाओ।"
चाची झल्लाकर बोलीं—
चाची (ताने के साथ):
"हाय राम! एक और झंझट। इतने काम पड़े हैं घर में... ऊपर से इसे भी मैं ही डॉक्टर के पास लेकर जाऊँ? ये खुद से कुछ कर भी तो नहीं सकती।"
चाचा (कड़े स्वर में):
"ये बीमार है... और तू जानती है, बोल भी नहीं सकती। शाम को ही सही, पर डॉक्टर के पास ले जाना पड़ेगा।"
चाची (सिर हिलाते हुए, बड़बड़ाकर):
"ठीक है, पर देख लेना... अब ये भी एक बोझ ही बन गई है। चलो, अभी इसे गरम कमरे में रख देते हैं। दवाइयाँ भी पड़ी हैं घर में, वही दे देते हैं। शायद ठीक हो जाए।"
शाम की थकान
दिन भर फ़ूल वैसे ही पड़ी रही।
घर का शोरगुल, बच्चों की चीखें, बर्तनों की खटर-पटर... सब कुछ वैसा ही चलता रहा,
पर किसी ने भी उसके बदन की सिहरन और आँखों की बेचैनी पर ध्यान न दिया।
शाम ढली।
आख़िरकार, चाची को न चाहते हुए भी उसे डॉक्टर के पास ले जाना पड़ा।
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गाँव का डॉक्टर
गाँव के डॉक्टर की छोटी-सी दुकान थी।
एक लकड़ी की मेज़, कुछ पुरानी दवाइयों की शीशियाँ, और दीवारों पर पड़ी धूल।
डॉक्टर ने फ़ूल का हाथ पकड़ा।
नब्ज़ को छुआ तो भौंहें सिकुड़ गईं।
डॉक्टर (गंभीर स्वर में):
"इसे ठंड बहुत लग गई है... फेफड़े तक जम रहे हैं। अभी तो बच गई है, पर इसका खयाल रखना होगा।
इसे ठंडी ज़मीन पर मत सुलाओ, गरम जगह रखो। दवाइयाँ लिख रहा हूँ, कल इसे फिर ले आना।"
चाची ने झट से कहा—
चाची (थके और झुंझलाए स्वर में):
"ठीक है डॉक्टर साहब... पर काम इतना है कि समझ नहीं आता पहले क्या करूँ, अब इसे भी रोज़ लाना पड़ेगा।"
फ़ूल ने उनकी तरफ़ देखा।
उसकी आँखें बोल रही थीं—“क्या मैं सच में सिर्फ़ काम हूँ? क्या मैं सिर्फ़ बोझ हूँ?”
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रात को जब सब सो गए, फ़ूल फिर उसी रसोई के कोने में दुबकी।
उसने आईने का वो धुँधला टुकड़ा उठाया, पर उसमें उसका चेहरा साफ़ नहीं दिखा।
बस धुंधली-सी आँखें और काँपते होंठ।
आईने की दरारों में उसने खुद से पूछा—
"क्या मेरा जीवन भी अब सिर्फ़ धुँधला और टूटा हुआ रह जाएगा?"
दूसरा दिन भी बीत गया था।
फ़ूल अब भी बीमार थी, लेकिन थोड़ी-थोड़ी चलने-फिरने लगी थी। कमरे के कोने में बैठी उसकी माँ ने उसे देखा, फिर धीमे स्वर में बोलीं—
Maa (धीरे से):
"लगता है, अब तू ठीक है बेटी… लेकिन आज हमें डॉक्टर के पास तो जाना ही होगा। तू ऐसा कर, घर के छोटे-मोटे काम निपटा ले। शाम को हम निकलेंगे।"
फ़ूल ने सिर हिला दिया।
वह बिना एक शब्द बोले घर के सारे काम करने लगी। बर्तन मांजे, झाड़ू लगाया, खाना बनाया। बीच-बीच में माँ को अपने हाथों से दाल-पानी पिलाती। माँ की आँखों से आँसू गिरते, लेकिन फ़ूल उन आँसुओं की आदत डाल चुकी थी। अब वह न आँसुओं को रोकने जाती थी, न ही ताने-डाँट को सुनकर सिहरती थी।
बस, चुपचाप हाथ बढ़ाकर माँ के गाल से आँसू पोंछ देती, फिर जैसे कुछ हुआ ही न हो — आगे काम में लग जाती।
रात होते-होते उसकी आंटी आ गईं। उन्होंने थका-हारा चेहरा फ़ूल की ओर देखा और बोलीं—
आंटी (कड़क आवाज़ में):
"फ़ूल, आज तू खुद ही डॉक्टर के पास चली जा। मुझे बहुत काम है।"
उन्होंने जेब से कुछ पैसे निकालकर फ़ूल की हथेली में रख दिए।
फ़ूल ने हल्का-सा सिर झुकाया और निकल पड़ी।
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डॉक्टर का क्लीनिक
छोटा-सा कमरा, एक पुरानी-सी मेज़ और लकड़ी की अलमारी में दवाइयों की शीशियाँ रखी थीं।
डॉक्टर ने स्टेथोस्कोप कान में लगाकर उसकी साँसें सुनीं, फिर कहा—
डॉक्टर (संजीदगी से):
"अब तुम ठीक हो, बस पानी में ज़्यादा हाथ मत लगाना… और ठंड से बचकर रहना। समझीं?"
फ़ूल ने इशारे से ‘हाँ’ कहा।
वह बाहर आई और घर की ओर चल दी।
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घर का सन्नाटा
फ़ूल डॉक्टर के पास गई हुई थी।
इसी बीच उसकी आंटी ने घर के एक कोने से पुराने शीशे के टूटे टुकड़े निकाले और थैले में भरकर बाहर फेंक दिए।
वो वही आईने के टुकड़े थे, जो अब धुँधले और बेकार हो गए थे।
आंटी (खीजते हुए):
"इनका अब कोई काम नहीं। बस बेवजह जगह घेरे बैठे थे।"
उन्होंने टुकड़े बाहर फेंक दिए।
रात गहराने लगी थी। करीब दस बज चुके थे।
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बंद दरवाज़ा
जब फ़ूल घर पहुँची, तो देखा— गेट बंद था।
उसने दरवाज़े पर दस्तक दी।
ठक… ठक… ठक…
लेकिन भीतर से कोई आवाज़ नहीं आई। शायद सब सो चुके थे।
उसने ज़ोर से बोलने की कोशिश की, लेकिन उसकी आवाज़ तो कभी थी ही नहीं।
गला हिला… मगर शब्द बाहर न निकले।
थकी हुई वह दरवाज़े के पास ही बैठ गई।
आधी रात को अचानक मूसलाधार बारिश शुरू हो गई।
तेज़ हवाएँ, बादलों की गड़गड़ाहट, और बरसते पानी की मार।
फ़ूल ने कई बार दरवाज़ा पीटा, लेकिन घर के भीतर सोए लोग नहीं जागे।
बारिश में भीगते हुए उसकी नज़र उन टूटे हुए आईनों पर पड़ी, जो उसके पापा शहर से लाए थे और सबसे पहले उसी के हाथों में रखकर मुस्कुराए थे—
"तू हमेशा हँसते रहना, क्योंकि तू हँसते हुए बहुत अच्छी लगती है। देख ले इस आईने में… यक़ीन न आए तो।"
फ़ूल ने भीगे हाथों से उन टुकड़ों को उठाया और खुद को देखने की कोशिश की।
लेकिन उसमें सिर्फ धुँधली-सी परछाई नज़र आई।
जैसे पूरा आईना ही नहीं, बल्कि उसकी ज़िंदगी भी अब धुँधली हो चली हो।
वह रात भर भीगती रही…
न किसी ने दरवाज़ा खोला, न ही उसकी ख़ामोश पुकार किसी ने सुनी।
अगली सुबह
सुबह होते ही आंटी रसोई में पहुँचीं।
उनकी आदत थी— हर सुबह फ़ूल को आवाज़ लगातीं।
आंटी (ज़ोर से):
"फ़ूल! कहाँ है तू?"
रसोई खाली थी।
उन्होंने कमरे-पर-घूमकर उसे ढूँढा, मगर कहीं नहीं मिली।
तभी दरवाज़े की ओर बढ़ीं और उसे खोला।
और फिर उनकी चीख़ निकली—
आंटी (हकबकाकर चिल्लाईं):
"फ़ूल!! ये क्या हुआ…!!"
सारे घरवाले दौड़े चले आए।
बरामदे के सामने, ज़मीन पर फ़ूल पड़ी थी।
भीगे कपड़े, ठंडी पड़ चुकी साँसें…
उसकी हथेलियाँ अब सर्द थीं।
अंकल ने उसके सीने पर हाथ रखकर साँसें टटोलीं।
उन्होंने आँखें झुका लीं—
अंकल (टूटी आवाज़ में):
"ये… ये अब नहीं रही…"
वातावरण में सन्नाटा फैल गया।
बारिश अभी भी रुक-रुककर हो रही थी, जैसे आसमान भी फ़ूल के लिए रो रहा हो।
अध्याय : आईने का सच
बारिश की हल्की-हल्की बूंदें छत से टपक रही थीं।
आँगन के बीचों-बीच फ़ूल की निर्जीव देह रखी थी।
सारा घर सन्नाटे में डूबा हुआ था—जैसे समय ही थम गया हो।
औरतें एक कोने में सिसक रही थीं, मर्द खामोश खड़े थे।
हर चेहरा अपने-अपने अपराध और डर से भरा हुआ।
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माँ की चीख
कमरे के भीतर, लकड़ी के बिस्तर पर बैठी माँ अचानक चीत्कार कर उठीं।
उनकी आँखें सूजी हुई थीं, होंठ काँप रहे थे, और स्वर टूट-टूट कर गूँज रहा था—
माँ (काँपती आवाज़ में):
“ये क्या कर दिया तुम सब ने मेरी बेटी के साथ…?
ज़िन्दगी भर उसे बोझ समझा…
हर पल उसकी ज़रूरतों को ठुकराया…
और अब उसे दरवाज़े के बाहर तड़पते हुए मर जाने दिया।
जिसने इस घर को जिया था,
मेरे दुख को अपने कंधों पर उठाया था,
मेरी साँसों तक को थामा था…
वो आज ठंडी ज़मीन पर दम तोड़ गई।”
उनके आँसू बिस्तर से फर्श तक लुढ़कते रहे।
लेकिन औरतों की ज़ुबान पर ताला था—
चेहरे पर पछतावा था, मगर किसी के पास शब्द नहीं थे।
---
चाची का अपराधबोध
दरवाज़े की चौखट पर खड़ी चाची काँप रही थीं।
उनके दिमाग़ में लगातार वही दृश्य घूम रहा था—
कल रात का पल, जब उन्होंने बेरुख़ी से कहा था:
“डॉक्टर के पास खुद चली जा… मुझे बहुत काम है।”
अब उनके भीतर ग्लानि का तूफ़ान था।
धीरे से उन्होंने फुसफुसाया—
चाची (टूटे स्वर में):
“काश… काश मैंने दरवाज़ा खोल दिया होता।
काश… मैंने एक बार उसे पुकार लिया होता।
मैंने तो सोचा था वो ज़िद कर रही है… काम से बचना चाहती है।
पर वो तो साँसों से ही हार गई।”
उनकी आँखें भीग चुकी थीं,
लेकिन अब पछतावे से अधिक कुछ उनके हाथ नहीं था।
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चाचा और आईना
आँगन के बीच, फ़र्श पर पड़े टूटे आईने के टुकड़े चमक रहे थे।
फ़ूल के हाथ से गिरा हुआ वो आईना अब खून और बारिश से धुंधला गया था।
चाचा ने झुककर उस टुकड़े को उठाया।
उन्होंने उसे हथेली पर रखा और लंबे समय तक फ़ूल के चेहरे को देखने की कोशिश करते रहे।
पर टुकड़े में अब कोई चेहरा साफ़ नज़र नहीं आ रहा था।
चाचा (भर्राए स्वर में):
“ये आईना… सालों से हमारे घर की लड़ाईयों का हिस्सा बना रहा।
हर कोई इसमें अपना चेहरा देखना चाहता था…
लेकिन किसी ने कभी फ़ूल का चेहरा इसमें नहीं देखा।
वो तो खुद आईना थी…
सबको उनकी सच्चाई दिखाती रही…
और धीरे-धीरे खुद धुंधली होती चली गई।
आज… ये आईना भी बेमोल हो गया,
और फ़ूल भी…”
उनके शब्द आँगन की खामोशी में डूब गए।
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परिवार का टूटना
घर के बाकी लोग—भाई, भाभियाँ, बच्चे—सब चुप थे।
किसी की नज़रें झुकी हुई थीं, किसी के होंठ काँप रहे थे।
सबको याद आ रहा था कि हर सुबह फ़ूल कैसे सबसे पहले उठती थी,
कैसे पूरे घर की ज़रूरतें अकेले पूरी करती थी,
कैसे वो सबकी परवाह करती थी, पर खुद को कभी नहीं।
अब… जब वो चली गई थी,
तो घर भरा होने के बावजूद खाली-खाली लग रहा था।
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दादी की कही हुई बात
तभी किसी को दादी की बरसों पुरानी बात याद आई।
वो अक्सर कहा करती थीं—
“टूटा हुआ हमेशा चुभता है… चाहे वो आईना हो या किसी का दिल।”
सभी की नज़रें ज़मीन पर बिखरे आईने के टुकड़ों पर टिक गईं।
हर टुकड़ा बस धुंधला-सा था।
उसमें किसी को अपना चेहरा साफ़ नज़र नहीं आ रहा था।
और फ़ूल की परछाई… कहीं भी नहीं थी।
राजा उस दिन शहर से लौट रहा था।
उसके हाथों में दो चीज़ें थीं—
एक बड़े काग़ज़ी कवर में लिपटा हुआ आईना (mirror) और दूसरे हाथ में नई-नई चुनी हुई कपड़े।
उसके चेहरे पर थकान थी, मगर आँखों में चमक।
वो मन ही मन सोच रहा था—
“आज फुलदीदी कितनी खुश हो जाएगी। ये आईना तो मैंने खुद चुना है… और ये कपड़े… बस, वही पहन ले तो पूरे गाँव में सबकी नज़रें उस पर टिक जाएँ।”
गाँव के मोड़ पर पहुँचते ही उसे हलचल सी लगी।
सड़क के किनारे, आँगन के आगे—
लोगों का झुंड खड़ा था।
औरतों की सिसकियाँ, बच्चों की रोने की आवाज़ें, और मर्दों की दबी-हुई फुसफुसाहटें हवा में तैर रही थीं।
राजा चौंका।
तेज़ी से भीड़ को चीरता हुआ आगे बढ़ा।
राजा (हड़बड़ाहट में, भीड़ से)
“क्या हुआ? कौन बीमार है? रास्ता दो…!”
भीड़ ने उसे जगह दी।
राजा जब घर की चौखट पर पहुँचा—
उसकी साँस थम गई।
वहाँ—
आईने के टूटे हुए काँच के टुकड़ों के बीच,
फूल पूरी तरह भीगी हुई,
निश्छल,
निर्जीव पड़ी थी।
उसके चेहरे पर अजीब-सी शांति थी,
लेकिन हाथ—बिलकुल सफ़ेद पड़ चुके थे।
उस पल सब कुछ रुक गया।
उसकी आँखें चौड़ी हो गईं।
राजा (कंपती आवाज़ में)
“दी… दीदी…!!”
भीतर से चाची की टूटी हुई चीख आई—
चाची (रोते हुए)
“राजा… अब तेरा आईना क्या करेगा…? अब तेरे कपड़े कौन पहनेगा…”
राजा के हाथ ढीले पड़ गए।
कपड़े और आईना दोनों उसके हाथ से फिसलकर ज़मीन पर गिर पड़े।
काँच की टंकार,
भीगे कपड़ों की छपाक,
और सन्नाटे में घुली हुई सिसकियाँ—
सब कुछ एक साथ टूटकर हवा में भर गया।
राजा वहीं चौखट पर गिर पड़ा,
उसके होंठ काँप रहे थे,
लेकिन आवाज़ गले में अटक चुकी थी।
उसकी आँखों से सिर्फ़ आँसू बह निकले।
अंतिम दृश्य
शाम ढल चुकी थी।
फ़ूल की चिता जब जलाई गई, तब बारिश भी थम गई थी।
पर उसके धुएँ ने पूरे घर को भर दिया था—
जैसे उसकी आख़िरी साँस हर कोने में फैल गई हो।
उस दिन सबको एहसास हुआ—
फ़ूल केवल एक “गोगी” नहीं थी,
वो इस घर की साँस लेने वाली धड़कन थी।
आईना अब हज़ार टुकड़ों में बिखर चुका था—
वैसे ही जैसे फ़ूल की यादें,
जिन्हें जोड़ पाना अब किसी के बस में नहीं था।
By POOJA KUMARI