वापसी: एक डरावनी कहानी Yakub Ansari द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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वापसी: एक डरावनी कहानी

आर्यन ने जब अपने मोबाइल स्क्रीन पर “दादा नहीं रहे” ये तीन शब्द देखे, तो उसे जैसे किसी ने जड़ से काट दिया हो। पंद्रह साल पहले जब वो जखमपुर गाँव से अपने माँ-बाप के साथ शहर गया था, तब से उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा था। उस गाँव की धुंधली सी यादें कभी-कभी सपनों में आकर उसे डरा देती थीं, लेकिन वो उन्हें हमेशा ‘बचपन का वहम’ कहकर टाल देता था।

अब जब उसके दादा की मृत्यु हो गई थी, उसे लौटना पड़ा। ट्रेन से तीन घंटे, फिर एक जीप, और फिर पैदल चलकर वो वापस उसी जगह पहुंचा जहाँ उसकी नज़रें कभी जमीन तो कभी आसमान ताक रही थीं। जखमपुर।

गाँव में घुसते ही हवा कुछ अजीब सी लगी। जैसे कोई साँस ले रहा हो — धीमी, भारी, और ठंडी। चारों ओर सन्नाटा था। गाँव के लोग जो कभी गर्मजोशी से स्वागत करते थे, अब दरवाज़ों की ओट से उसे देख रहे थे। कुछ निगाहें डर से भरी थीं, कुछ अफसोस से। लेकिन ज़्यादातर में एक बात समान थी — खामोशी।

दादा का घर वैसा ही था, जैसा आर्यन ने यादों में संजो रखा था। बड़ा, लकड़ी का बना हुआ, ऊपर लाल टिन की छत और पीछे की ओर एक पुराना कुआँ। बाहर सिर्फ रज्जो दादी बैठी थीं — वही झुकी हुई पीठ, वही काँपते होंठ, बस आँखों में एक नयी चमक थी। जैसे उन्हें आर्यन की वापसी का इंतज़ार था।

“तू... आ गया?” उन्होंने काँपती आवाज़ में कहा।

आर्यन बस सिर हिलाकर घर के अंदर चला गया। घर की दीवारों पर पुराने समय की तस्वीरें थीं — एक में दादा मुस्कुरा रहे थे, एक में माँ, और एक में आर्यन खुद, शायद चार साल का होगा।

रात को सबकुछ अजीब था। हवा में कुछ भारीपन था। दूर से किसी जानवर के रोने की आवाज़ आती थी, लेकिन ये रोना कुछ ज़्यादा लंबा था, जैसे कोई इनसान कराह रहा हो।

आर्यन ने दादा का कमरा खोला। धूल से भरा हुआ, लेकिन सबकुछ अपनी जगह था। एक अलमारी में एक पुरानी डायरी मिली — उस पर नाम लिखा था: “वापसी”।

उसने पहला पन्ना खोला।

“हर 15 साल में, एक ‘वो’ लौटता है। लेकिन जो लौटता है, वह वही नहीं होता।”

आर्यन की रूह काँप उठी। ये क्या लिखा था? कौन ‘वो’? और 15 साल? क्या ये उसके आने की बात थी?

अगले दिन, आर्यन गाँव में घूमने निकला। पुराने खेत, कुआँ, और स्कूल के पास जाकर उसे कुछ यादें लौटने लगीं। धुँधली सी तस्वीरें — माँ की चीखें, एक लाल सा पर्दा, और एक दरवाज़ा जो हमेशा बंद रहता था।

तभी उसे कोई दिखाई दिया — एक लड़की। सफेद कपड़ों में, लंबे बाल, नंगे पाँव। वह कुएँ की ओर जा रही थी।

“नीलम?” आर्यन के मुँह से खुद-ब-खुद निकल गया।

वह पलटी। मुस्कराई। और बिना कुछ कहे जंगल की तरफ बढ़ गई।

आर्यन उसे पीछे-पीछे देखता रहा, फिर उसके पीछे चल पड़ा। लेकिन जैसे ही वह झाड़ियों तक पहुँचा, वहाँ कोई नहीं था।

गाँव लौटकर उसने धीरज मास्टर से पूछा, “नीलम कहाँ है आजकल?”

मास्टर का चेहरा पीला पड़ गया। “बेटा… वो तो मर गई थी। पंद्रह साल पहले। तुम्हें याद नहीं?”

आर्यन का सिर घूम गया।