मेन काम्फ ABHAY SINGH द्वारा पुस्तक समीक्षाएं में हिंदी पीडीएफ

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मेन काम्फ

किताबे, कालजयी हो सकती हैं..
और टाइम कैप्सूल भी।

हर किताब लेखक की सोच, और उसके दौर का प्रतिनिधित्व भी करती है। हिटलर की मेन काम्फ 1924-25 में लिखी गई।
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1921 में मिलान से लॉन्ग मार्च करते हुए , लाखों लोगों के साथ मुसोलिनी रोम में घुसा। डरकर वहां के राजा ने सरकार हटाकर, मुसोलिनी को प्रीमियर बना दिया।

इसी मॉडल पर जर्मनी में हिटलर ने कोशिश की। एक बीयर हॉल में भीड़ इकट्ठा की, और गर्वमेंट ऑफिसेज की तरफ मार्च किया।

गोलियां चली, तो सब भाग गए। हिटलर भी, अपने छुपने के स्थान से दो दिन बाद पकड़ लिया गया।

जेल हुई। इसी जेल में अपनी सोच का दस्तावेज लिखा- मेन काम्फ
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आज फासिज्म बड़ा बुरा शब्द है, गाली है, तब नहीं था। फासिज्म तब, शासन की एक वैकल्पिक विधा थी।

और बड़ी चमकदार, सफल विधा थी। दरअसल मुसोलिनी, हिटलर, फ्रेंको, तोजो जब सत्ता में आये, उनके देश मजबूत होते गए, ताकतवर और खुशहाल होते गए।

या एटलीस्ट, दुनिया के सामने प्रोपगंडा तो यही था।
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फासिस्ट लीडर बिजली की गति से रोड बनवाता, इंडस्ट्री लगवाता, मकान बनाकर देता, रोजगार दिलाता, गरीबो का ख्याल रखता, अमीरों को और कमवाता।

खूब टैंक तोप युद्धक विमान खरीदता। खुद सेना की वर्दी पहनता, सबको सैनिक अनुशासन में रखता। जो अनुशासनहीनता करे, उसपर बुलडोजर चला देता।

पूरा देश एक सैनिक टुकड़ी।
पार्टी उसकी कोर कमांड, नेता इसका स्वंयम्भू कमांडर। ऐसा युद्धक किस्म का समाज रातोरात मजबूत, ताकतवर हो जाता।
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और कौन सा देश, कौन सा समाज ताकतवर नही होना चाहता।

मुसोलिनी के मॉडल पर तोजो चले, हिटलर चला। फ्रेंको, च्यांग काई शेक यही नीति अपनाने लगे। ब्राजील, हंगरी, क्रोशिया, ग्रीस, नॉर्वे, पुर्तगाल, स्पेन सहित कई देशों में फासिस्ट लीडर उभरे।

सबने इसे अपने अपने तरीके से थोड़ा बदलकर अपनाया। कोई सोशलिष्ट फासिस्ट था, कोई कम्युनिस्ट फासिस्ट था, कोई नेशलिस्ट फासिस्ट था, कोई लोकतांत्रिक फासिस्ट था...

कई नेता सत्ता तक आये, कई सत्ता की राह पर फटाफट बढ़ रहे रहे थे। लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध ने सब बदल दिया।
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1945 में फासिज्म का भांडा फूटा। स्ट्रिक्टली कंट्रोल्ड मीडिया में जो खबरे कभी आती नही थी, रेजीम हटते ही सारी सड़ांध बम की तरह फूटी।

जो चमक दमक थी, विकास था..

वह स्लेव लेबर की वजह से था। शोषण, क्रोनी कैप्टिलिज्म था। ऊपर फेक डेटा, झूठा प्रोपगंडा था। नीचे लेबर कैम्प थे, कन्सन्ट्रेशन कैम्प थे। नफरत और डर के बूते एकताबद्ध समाज था।

अनगिनत लाशें, राख, हड्डियां थी,
ऊपर विकास का सुनहरा मुलम्मा था।
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मोरल यह, कि 1921 से 45 के बीच फासिज्म सुनहरी चीज थी।

दुनिया के नेता इसका अध्ययन कर रहे थे।
भारत मे भी..
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न, न। आरएसएस की बात बाद में।

पहले सुभाष। जो 1930-45 में चार साल छोड़, ज्यादातर यूरोप में रहे। आसपास फासिस्ट सरकारों को अचंभे और एडमैरेशन से देखते रहे। "इंडियन स्ट्रगल" 1934 में लिखी।

कम से कम 3 बार वे मुसोलिनी से मिले। अपनी किताब भी भेंट की। कभी पढिये, और देखिए कि वह सोच गांधी के ज्यादा करीब है, या मुसोलिनी के।

वैसे क्या आप जानते है कि हिंदी में नेताजी का जो मतलब है, वही जर्मन में फ्यूहरर और इटालियन में डुचे का होता है।
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पर सुभाष वाहिद आदमी थे। प्रेरित होते, पर अपना दिमाग ताक पर नही रखते।

मोटे तौर पर वे अपने देश मे अनुशासित सिपाही वाला समाज बनाना तो चाहते थे, पर उनके आईडियल्स वामपन्थ की तरफ थे।

फिर भारतीय पैदाइश और गांधी के साथ ने उन्हें कभी रेसिस्ट न होने दिया था।

सबमे इतनी बुद्धि नही होती।
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संघ के मुंजे भी मुसोलिनी से मिलने गए। लौटे, डिट्टो कॉपी पेस्ट मार दिया।

वही काली टोपी, वही हाफ पैंट,

माफ करें, डिट्टो नही। ब्राउन शर्ट की जगह सफेद शर्ट थी। पैंट काली की जगह खाकी, क्योकि वह पुलिस की वर्दी से मैच करती थी।
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और लिखी गई संघी आइडियोलॉजी किताबें।

सावरकर की हिन्दुत्वा से गोलवरकर की वी एंड अवर नेशनहुड डिफाइंड तक, मोस्टली ऐसा साहित्य तब लिखा गया जब फासिज्म उरूज पर था।

यह विचारधारा, धर्म को आधार बनाती है। वहां के बहुसंख्यक समाज की जगह यहां का बहुसंख्यक समाज है।

वहां के अल्पसंख्यक की जगह, यहां के अल्पसंख्यक हैं। रोमन गर्व की जगह, हिंदू इतिहास का गर्व है।

बाकी डिट्टो..
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किताब लिखी, छाप दी, वर्कर्स को रटा दिया।
कि उधर फासिज्म मर गया। बुरी चीज हो गयी।
पता चला कि सारी चमक दमक तो प्रोपगंडा की उपज थी।

तो विचारधारा नही सुधारी।
प्रोपगंडा ही अपना लिया।

वह किताबे, अब भी इनकी गीता हैं, कुरान है, अवेस्ता हैं। हां, नए वर्जन्स में कुछ आपत्तिजनक हिस्से हटाकर रीप्रिंट कर देते हैं।

ये किताबे, कालजयी बताई जाती हैं
पर हैं टाइम कैप्सूल।
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जहरीली सोच का कैप्सूल