सिक्किम यात्रा - 1 महेश रौतेला द्वारा यात्रा विशेष में हिंदी पीडीएफ

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सिक्किम यात्रा - 1

सिक्किम यात्रा:
हवाई जहाज में बैठने पर राइट बंधुओं की याद आती है। आधुनिक जीवन का आश्चर्य है ये। जेट इंजन वाले जहाज आज भी चार ही देश बना पाते हैं। ब्रिटेन, संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस और फ्रांस। सिक्किम जाने के लिए बागडोगरा तक हवाई जहाज से और गंगटोक तक कार से जाते हैं। गंगटोक सिक्किम की राजधानी है। तिस्ता नदी का उद्गम सिक्किम में पौहुनरी ग्लेशियर से होता है जो लगभग २३ हजार फीट की ऊँचाई पर है। एक ट्रक के पीछे लिखा था," मैं उस देश का वासी हूँ जहाँ तिस्ता बहती है।" गंगा जैसा स्नेह झलकता है, इस वाक्य में। तिस्ता की बाढ़ के अवशेष दिख रहे हैं,सड़क से। चार अक्टूबर २०२३ को उग्र रूप में लोगों ने देखा था उसे। बहुत अधिक नुकसान हुआ था। बाढ़ में बहुत से स्थानों पर सड़क तक आ जाती है और घरों को अपना क्षेत्र बना लेती है।
"यह हिमालय क्यों उग्र हो रहा
देखो मानव क्यों सो रहा है!"
गंगटोक में ठहरने के अच्छे-अच्छे होटल हैं। खाना अच्छा है। आलू का स्वाद बिल्कुल नैनीताल के आलू सा है। बेहद स्वादिष्ट। सिक्किम २०१६ में भारत का सौ प्रतिशत जैविक राज्य बन गया था। प्राकृतिक दृश्य मनमोहक है। स्वच्छता उल्लेखनीय है। धुंध होने के कारण हिमालय के दर्शन नहीं हुये।
पहाड़ी शहर में उतार-चढ़ाव दिखना स्वाभाविक हैं। ताशी व्यु पाइंट से कंचनजंगा साफ मौसम में दर्शनीय लगता है। बौद्ध विहार शान्ति के प्रतीक यहाँ देखे जा सकते हैं। गणेश जी के मन्दिर में जा आशीष लिये जा सकते हैं। छोटे-छोटे झरनों का अपना आकर्षण है। वहाँ की पारंपरिक वेशभूषा में फोटो खिंचाने का स्थान-स्थान पर व्यवस्था है। इसमें रोजगार भी है। एक ड्रेस के सौ रुपये हैं।
चाँगु झील तक बीआरओ ने सड़क बनायी है। रास्ते में झरने मिलते हैं। ड्राइवर से पूछा डैनी सिक्किम का ही है क्या? उसने कहा हाँ," डैनी डेजोंगप्पा"। कल आप जहाँ जा रहे हैं वहीं का। मैंने कहा मुझे उसकी धुँध फिल्म याद है। उसमें नवीन निश्चल और जीनत अमान भी थे। झील तक जाने के लिए परमिट व्वस्था है। आक्सीजन भी उपलब्ध कराने की व्यवस्था भी है, कार ड्राइवर ने बताया। सड़क बहुत अच्छी है। रास्ते में नाश्ते- चाय- भोजन की दुकानें हैं और गरम कपड़े खरीदे जा सकते हैं या किराये पर ले सकते हैं। झील १२४०० फीट की ऊँचाई पर है। यहाँ रज्जु मार्ग(रोप वे) है जो भारत में सबसे ऊँचे स्थान पर बना रज्जु मार्ग है। झील का रंग बदलता रहता है। धुंध से अभी सब ढका है। लगभग पच्चीस याक वहाँ पर हैं।पर्यटक इनमें बैठकर फोटो खिचवाते हैं या सवारी भी करते हैं। कुछ बगल में खड़े होकर फोटो खींचा कर संतुष्ट हो जाते हैं। याक में बैठ कर फोटो खींचाने के लिए सौ रुपये देने होते हैं। मैंने बैठ कर फोटो खींचाई और फिर बगल में खड़े होकर सबने। मैंने याक के मालिक को पचास रुपये और देने चाहे तो उसने नहीं लिये। कहा," बगल में खड़े होकर खींचाने का कुछ नहीं लेते हैं।" झील के किनारे कुछ दूर तक हम गये। पहाड़ों में पहाड़ याद आते हैं।
"धुँध में दबी है झील
कोहरा दौड़ रहा है
किनारे ओझल,
भारत का सबसे ऊँचाई पर
टिका रज्जुमार्ग
पहाड़ों से बातें कर रहा है,
प्यार लिख जाता हूँ
लौटकर,ध्यानमग्न
झील सा रंग,झरनों सा बहाव
अपने में पाता हूँ।---- क्रमशः

** महेश रौतेला