मुन्शीराम बना श्रद्धानंद - भाग 2 Choudhary SAchin Rosha द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

मुन्शीराम बना श्रद्धानंद - भाग 2


हम भले ही रुक जाये परन्तु समय , समय तो अपनी निश्चित गति से विचरण कर रहा है बिना थके, बिना रुके।

। । पर्दा उठता है ।।

धीरे–धीरे मंच पर प्रकाश होता है। किशोर मुंशीराम और नानकचन्द जी बाईं ओर से प्रवेश करते हैं। दोनों ही घर में रखी वस्तुओं को कभी उधर रख रहे हैं, कभी इधर। नानकचंद जी एक कोने में चादर बिछाकर उस पर कुछ खाने–पीने की सामग्री लाकर रख देते हैं तथा फिर अन्य कार्यों में जुट जाते हैं।


वृद्ध संन्यासी/गुरुजी : (पर्दे के पीछे से) हम भले ही रुक जाए परंतु समय, समय तो अपनी निश्चित गति से विचरण कर रहा है। अब मुझे ही देख लो कैसे मैं बालक से किशोर अवस्था को प्राप्त हुआ मुझे पता ही नहीं चला। वैसे आप सोच रहे होंगे कि मैं और पिताजी किसके लिए इतनी तैयारियां कर रहे हैं। आज हमारे घर में विशेष पूजा है उसके लिए मेरे पिताजी ने चार चौबों को छटांक–छटांक भर भांग भेजकर निमंत्रण पर बुलाया है, उन्हीं के सत्कार के लिए हम तैयारियां कर रहे हैं। (बाहर से कुछ शब्द सुनाई देते हैं।) लो सम्भवतः चौबे जी ही आ गए है।

{ नानकचंद जी की दृष्टि अचानक बाहर की ( दाईं ओर) ओर पड़ती है।}

नानकचंद जी : (हाथ जोड़कर विनम्रता से) आइए–आइए चौबे जी आइए।

(चारों चौबे भंग पीकर कृष्ण–गोपी लीला गाते और नाचते–कूदते दाईं ओर से मंच पर प्रवेश करते है। नानकचंद जी उनके चरण पखारकर आसन देते है।)

चौबे १ : (बैठते हुए) लाओ जजमान भोग बिलासी ले आओ। ( नानकचंद जी डेढ़ पाव भांग जो वहीं भिगोकर रखी थी लाकर देते हैं। चौबे जी उसको धोते हैं फिर उसमें बादाम और इलायची मिलाकर पीसते हैं तथा उसमें दूध छोड़कर दो लोटे पानी में गड़बड़ करके पहले द्वारकाधीश को भोग लगा फिर एक छोटी–सी कटोरी भर निकाल कर नानकचंद जी व परिवार में बांटी गई बाकी बची भंग चारों चौबे चढ़ा गए।)
चौबे २ : (एक लम्बी डकार मारकर) लाओ जजमान भोग ले आओ।
नानकचंद जी : महाराज भोग अभी बिल्कुल तैयार हो रहा है, कृपया तब तक आप आराम करें।

चौबे १ : ऊं......हूं! ठीक है जी हम तो आराम कर लेंगे जजमान। चलो भाइयों आओ (चारों जाकर लेट जाते हैं तथा भांति–भांति की क्रियाएं करते रहते हैं।)
{किशोर मुन्शीराम व नानकचंद जी अन्दर (बाईं ओर) जाते है। तथा चारों चौबे अपनी भांति–भांति की क्रियाओं में व्यस्त हैं।}
नानकचंद जी : (कुछ देर में अन्दर से आते हुए) चलो जी भोग तैयार है।
(चारों की आंखें बंद है, सभी को नशा हो चुका है। वे चारों एकसाथ बोलते है।)
चारों चौबे : भोग (फुर्ती से उठने का प्रयास करते है।)
चौबे ४ : चलो भाई भोग लगाओ, जल्दी जूते पहनो (जूतों को निकालने का प्रयास करता है परंतु असफल रहता है) जजमान ओ जजमान हमसे जूते ही नहीं पहने जा रहे हैं कृपया हमें जूते तो पहनाओं।
नानकचंद जी : महाराज आपने जूते निकाले ही कब थे जो आपको जूते पहनने की आवश्यकता आ पड़ी।
चौबे ४ : अच्छा! भंग अच्छी थी जजमान। कुछ क्षण रुककर अच्छा चलो जी जजमान कहां चलना है। (अभी भी चारों चौबों की आंखें बंद है और नशा अपने उच्च स्तर पर है। चारों उठने का प्रयत्न करते हैं परन्तु नशे में बार-बार लुढ़क जाते हैं।) चौबे १ : जजमान! लगता है हम उड़ रहे हैं। हमें पकड़ो तो सही हम कहीं ऊंचे ना उड़ जाए।
चौबे २ : (हँसने लगता है) देखो भाइयों यह ऊंचाई से डरता है, हम तो......(उठने का प्रयास करता है, धड़ाम से नीचे गिरता है) आई मां !
चौबे ३ : क्यों जी अब ठीक हो? हम तो अब उठते ही नहीं। जजमान चलो अब तुम ही ले चलो हमें आसन तक। (अन्दर से बालक मुंशीराम भी आ जाता है और दोनों उनको अन्दर भोजन कराने के लिए ले जाते हैं। चारों चौबे आशीर्वाद देते हुए अन्दर चले जाते है।)

(चारों चौबों के अन्दर जाने के अगले ही क्षण बाहर से गुरूजी और दोनों शिष्य प्रवेश करते है।)

गुरूजी : देखा तुम लोगों ने ऐसी ही घटनाओं का मेरे जीवन में कोई अंत नहीं है। और कुछ घटनाएं तो इतनी मार्मिक थी कि मेरे आकण्ठ विलासिता में डूबे रहने पर भी उन्होंने मेरे अन्तर को झकझोर/झंझोड़ दिया और मैं ईश्वर के अस्तित्व के प्रति शंकाकुल हो उठा। जैसे इसी घटना को देख लो कैसे स्वयं को ईश्वर भक्त बताने वाले यह चौबे भक्ति का स्वाॅंग भर रहे है। अपने जीवन में मैंने इनके जैसे ही अनेकों पण्डों और पुजारियों को देखा व मंदिरों और मठों में नारियों पर होते अत्याचार को देखा, उन नारियों की रक्षा भी की। परन्तु ऐसे भी अवसर आए जब मैं स्वयं प्रलोभन में फंसा। हां इसके साथ ही साथ मेरे मन में अपने कृत्यों के प्रति प्रायश्चित की भावना भी जन्म ले रही थी। प्रायः प्रत्येक घटना के बाद मेरे मन में प्रश्न उभरता था कि जो कुछ मैंने किया वह ठीक है या गलत। जब मैं पंडों, पुजारियों से नारी की रक्षा के लिए पागल हो उठता हूं तो फिर मैं स्वयं क्यों प्रलोभनों में फंस जाता हूं। इस द्वंद्व ने ही मेरे अंतःकरण में निरन्तर प्रश्नाकुलता की अग्नि को जलाए रखा।
यही कारण था कि मेरे मन से नारी के प्रति आसक्ति अब समाप्त होती जा रही थी। मुझे याद है कि मेरे मित्र की पत्नी ने कैसे मुझे धर्म भाई बनाया और कैसे इस घटना ने नारी के प्रति मेरे मन में जो अतिरिक्त आसक्ति थी उसको भी समाप्त करने में सहायता की। इसके बाद मथुरा में एक डिप्टी कलेक्टर की बेटी के साथ गुसाईं जी ने जो व्यवहार किया उस घटना ने तो मुझे हिला ही दिया। (एक लम्बी गहरी सांस लेते है, कुछ देर सब ओर शान्ति। तभी अन्दर से चारों चौबों के शब्द सुनाई देते हैं।)
गुरू जी : लो, हो गया चौबों जी का भोजन। जो डेढ़–डेढ़ सेर लच्छेदार मलाई, दो–दो सेर पेड़े उन पर भाजी पकौड़ी आदि के साथ तीस–तीस पुरियाॅं की तह और अन्त में मलाई की पूर्णाहुति लेकर उठे हैं। (अचानक बाहर से जयकारों की ध्वनि सुनाई देती है तीनों देखनें के लिए दाईं ओर से बाहर की ओर चले जाते हैं।)

( चारों चौबें डकार मारते हुए अन्दर से आते हैं, नशे के कारण उनसे चलना हलना भी भारी हो रहा है। नानकचंद जी उनकी हथेलियां पर एक–एक रूपया दक्षिणा रख देते हैं तथा उन्हें प्रणाम करते हैं।)

चौबे ४ : (चलते–चलते अचानक रुककर) ओहो जजमान सत्यानाशी, सत्यानाशी तो रह ही गई जजमान। देखो जजमान अब सत्यानाशी भी हो जाए तो आपका बहुत भला हो।

( नानकचंद जी छटांक–छटांक भर भांग देते हैं। चारों चौबें चले जाते हैं और नानकचंद जी अन्दर की ओर चले जाते हैं। अगले ही क्षण दाईं ओर से गुरुजी व दोनों शिष्य मंच पर आते हैं।)

गुरूजी : देख रहे हो इनको, इन्हें सत्यानाशी भी चाहिए। (तंज कसते हुए) जब यह हमारे घर से निकले तो मेरे पिताजी ने एक लम्बी सांस ली उन्हें भ्रम था की कहीं इन लोगों के पेट न फट जाए और ब्रह्म हत्या का पाप उन्हें न लग जाए परंतु आश्चर्य तो यह था कि जब शाम को मैं विश्रामघाट पहुंचा तो सत्यनाशी के रगड़े सब कुछ भस्म करके चारों चौबें कुश्ती लड़ रहे थे तथा इस प्रतीक्षा में थे कि कोई “ लडुआ खिलाने वाला जजमान मिल जाए"।(तीनों आसन बिछाकर बैठ जाते है। गुरूजी जी बोलते रहते है।)
इन जैसे पंडों और पुजारियों के कारण ही तो स्वामी दयानन्द जी द्वारा मेरे सभी प्रश्नों के दिए गए उत्तरों से मैं प्रभावित तो हुआ परन्तु सन्तुष्ट न हुआ। मैंने उनसे कहा भी कि “आपने मुझे चुप तो करा दिया परन्तु यह विश्वास नहीं दिलाया कि परमेश्वर की कोई हस्ती भी है।” मुझे याद है तब कैसे वह हँसे और फिर गम्भीर स्वर में बोले – देखो तुमने प्रश्न किये, मैंने उत्तर दिये, यह युक्ति की बात थी। मैंने कब प्रतिज्ञा की थी कि मैं तुम्हारा परमेश्वर पर विश्वास करा दूंगा।तुम्हारा परमेश्वर पर विश्वास उस समय होगा जब वह प्रभु तुम्हें स्वयं विश्वासी बना देंगे। और मैं उसे समय की प्रतीक्षा करने लगा। इस प्रतीक्षा में पहली बार ईश्वर की अनुभूति मुझे तब हुई जब एक अबोध बालिका ने मेरे जीवन को एक नई दिशा दी। (गुरूजी खड़े होकर बताना प्रारम्भ करते है।)

एक दिन मैं शराब में धुत एक वेश्या के कोठे से घर लौटा और मेरी हालत इतनी खराब थी की उल्टियां पर उल्टियां लग रही थी व मुझे स्वयं के होने तक का बोध नहीं था। तब मेरी धर्मपत्नी जो अभी अबोध बालिका ही थी उसने कैसे एक मां की तरह मेरी परिचर्या की, कैसे उसके हाथ में मैं बालकवत था। उस समय का करुणा और शुद्ध प्रेमसे भरा उसका मुख मैं कभी नहीं भूल सकता। मैंने उस समय ऐसा अनुभव किया मानो मातृशक्ति की छत्रछाया के नीचे निश्चिंत लेट गया हूं। मेरी पथरायी हुई आंखें बंद हो गई और मैं गहरी नींद में सो गया। रात को सम्भवतः एक बजा था जब मेरी आंख खुली। वह चौदह–पन्द्रह वर्ष की बालिका अभी तक मेरे मेरे पैर दबा रही थी। मैं तुरन्त उठ खड़ा हुआ और मेरी आंखों से न जाने क्यों अनायास ही आंसु टपक पड़े। मैंने उसे पास बैठाकर कहा, “ देवी! तुम बराबर जागती रही और भोजन तक नही किया। अब भोजन करो।” उत्तर ने मुझे और व्याकुल कर दिया परन्तु उस व्याकुलता में भी आशा की एक झलक थी। शिवदेवी ने कहा–“आपके भोजन किये बिना मैं कैसे खाती और अब भोजन करने में क्या रूचि है?” मैंने अपनी गिरावट की कथा सुनाकर देवी से क्षमा की प्रार्थना की परन्तु उधर से जो उत्तर मिला उसने मुझे पूर्णतः झकझोर दिया। वह बोली–“आप मेरे स्वामी हो, यह सब कुछ सुनाकर मुझ पर पाप क्यों चढ़ाते हो? मुझे तो यह शिक्षा मिली है कि मैं नित्य आपकी सेवा करूं।” इस प्रकार उस रात हम बिना भोजन किये ही सो गए। इस घटना ने मेरे जीवन को इतना झकझोर दिया कि पहली बार मेरे हृदय की गहराईयों तक इसकी झनझनाहट पहुंची।
परन्तु मज्जागत संस्कार क्या आसानी से मुक्ति देते है, उन पर बार–बार चोट पड़ती थी और संवेदनशील होने के कारण वह प्रभावित होते थे जैसे एक अपराधी ने मेरे पिताजी के सामने अपराध यह कहते हुए स्वीकार कर लिया था कि –“ भगवान राम से अधिक रामकर दासा ”। इस घटना का मेरे ऊपर इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि रामायण पर मेरी श्रद्धा बढ़ती गई।
ऐसी अनेकों घटनाएं मेरे जीवन में घटी जिनसे मुझे ईश्वर के अस्तित्व को लेकर हर बार पहले से अधिक दृढ़ विश्वास होता चला गया, ईश्वर के प्रति मेरी श्रद्धा और अधिक बलवती होती चली गई। इसी बीच एक घटना ऐसी घटी जिसने मेरा जीवन पूर्णतः बदल दिया। परन्तु यदि यह घटना भी मैं तुम्हें सुनाऊंगा तो तुम्हारे व दर्शकों के साथ यह अन्याय होगा देखो विभु की आंखों में नींद कैसे क्रीड़ा कर रही है।(कृपाल हँसता है तथा विभु नींद से बाहर आने का प्रयत्न करता है।) इसलिए आओ बाहर चलो और इस घटना को स्वयं देखो।
दोनों शिष्य : जी गुरुदेव (तीनों बाहर चले जाते है। मंच पर धीरे–धीरे हल्का–सा अन्धकार छा जाता है)

।। पूर्ण अन्धकार ।।

शाम का समय है बाहर से चार मित्रों की एक मण्डली आती है, जिनमें से जवान मुन्शीराम भी एक है।(मंच पर धीरे–धीरे प्रकाश होता है।) चारों मित्र हँसी–ठिठोली करते हुए आते है। मंच पर आकर तरह–तरह की भंगिमाओं से मित्रवत आचरण करते है। हाथ में शराब की बोतले है तथा चखने के लिए कुछ अन्य खाने की वस्तुएं है। घर के बाहर के कमरे में एक मेज रखी है तथा कुछ कुर्सियां व अन्य सजावट की वस्तुएं रखी है।

गुरूजी : (पर्दे के पीछे से) यह है मेरी मित्र मण्डली, मेरे वकालत की परीक्षा देने के लिए लाहौर जाने की खुशी में मेरे मित्रों ने आज दावत रखी है। (एक मित्र अन्दर से आता है, हाथ में कांच के गिलास है।) और यह है हमारे मेजबान मित्र, एक बहुत बड़े वकील।

(सभी मित्र चखना और शराब का आनन्द ले रहे है। शराब के इस माहौल में एक मित्र आप से बाहर हो जाता है। उसको घर छोड़ने के लिए मुन्शीराम व एक अन्य मित्र चले गए बाकी सब शराब के नशे में अपनी मित्रता की कसमें खा रहे है। थोड़ी देर में मुंशीराम अकेले ही लौटकर आते है तथा मेजबान मित्र अचानक अन्दर जाते है बाकी सभी अपने–अपने कार्यों में व्यस्त है। थोड़ी देर बाद बाकी मित्र भी चले जाते है केवल मुंशीराम रह जाते है। वह शराब की दूसरी बोतल खोलकर पीने ही वाले थे कि अचानक अन्दर से किसी लड़की की चीख सुनाई देती है तथा वह लड़की लाचार हालत में बाहर आती है और रोते हुए खड़ी हो जाती है। मुंशीराम उसकी ओर क्षणभर देखते है व शराब को छोड़कर अन्दर जाते है तथा कुछ क्षण बाद ही अन्दर से अपने मेजबान मित्र को पीटते हुए आते है। वह लड़की रोते हुए अपने कपड़ों को सही करते हुए बाहर निकल जाती है। मुन्शीराम मेजबान मित्र को वहीं गिरा छोड़कर शराब वाली मेज पर पहुंचते है तथा शेष बोतल को समाप्त करने के लिए बोतल उठाते है परन्तु अचानक गिलास उठाकर इतनी शक्ति से फेंकते है कि गिलास दीवार में टकराकर चूर–चूर हो जाता है। मुन्शीराम अपनी पूरी शक्ति के साथ चिल्ला उठते है।)

मुन्शीराम : मार दूंगा। (मानो मति को खो चुके हो) नहीं नहीं मर गया। हां, आज वह भोग–विलास में डूबा हुआ मुन्शीराम मर गया, मर गया।(कहते–कहते शान्त हो जाते है, शरीर ठंडा होने लगता है। तथा वहीं बेशुध होकर गिर पड़ते है।)

गुरूजी : (पर्दे के पीछे से) यह मुन्शीराम के अन्धकारमय जीवन की अन्तिम रात्रि थी। (अन्दर आते हुए) इस मुन्शीराम के जीवन ने यह प्रमाणित कर दिया कि अन्धकार ही प्रकाश की उंगली पकड़ कर लाता है। क्योंकि यह मुन्शीराम जो यहां बेशुध पड़ा है इसी का भविष्य मैं हूं, मैं यानि श्रद्धानन्द। (पर्दे के पीछे मीठी ध्वनि सुनाई देती है तथा मंच पर धीरे–धीरे अन्धकार हो जाता है।)

।। पर्दा गिरता है ।।

पढ़ने के लिए धन्यवाद🙏🙂!



यह नाटक श्री श्रद्धानन्द जी की आत्मकथाश्री ‘कल्याण मार्ग का पथिक’ पर आधारित है।


Rosha