सम्राट् समुद्रगुप्त Mohan Dhama द्वारा जीवनी में हिंदी पीडीएफ

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सम्राट् समुद्रगुप्त

समुद्रगुप्त गुप्त राजवंश के चौथे राजा और चंद्रगुप्त प्रथम के उत्तराधिकारी थे। पाटलिपुत्र उनके साम्राज्य की राजधानी थी। वे वैश्विक इतिहास में सबसे बड़े और सफल सेनानायक एवं सम्राट् माने जाते हैं। समुद्रगुप्त, गुप्त राजवंश के चौथे शासक थे और उनका शासनकाल भारत के लिए स्वर्णयुग का प्रारंभ कहा जाता है। समुद्रगुप्त को गुप्त राजवंश का महानतम शासक माना जाता है। वे एक उदार शासक, वीर योद्धा और कला के संरक्षक थे। उनका नाम जावा पाठ में तनत्रीकमंदका के नाम से प्रकट है। समुद्रगुप्त के कई अग्रज भाई थे, फिर भी उनके पिता ने समुद्रगुप्त की प्रतिभा को देखकर उन्हें अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। इसलिए कुछ इतिहासकारों का मानना है कि चंद्रगुप्त की मृत्यु के बाद उत्तराधिकारी के लिए संघर्ष हुआ, जिसमें समुद्रगुप्त एक प्रबल दावेदार बनकर उभरे। कहा जाता है कि समुद्रगुप्त ने शासन पाने के लिए अपने प्रतिद्वंद्वी अग्रज राजकुमार काछा को हराया था। समुद्रगुप्त का नाम सम्राट् अशोक के साथ जोड़ा जाता रहा है, हालाँकि वे दोनों एक-दूसरे से बिल्कुल भिन्न थे। एक अपने विजय अभियान के लिए जाने जाते थे और दूसरे अपने धुन के लिए जाने जाते थे। समुद्रगुप्त भारत के महान् शासक थे, जिन्होंने अपने जीवनकाल में कभी भी पराजय का स्वाद नहीं चखा। वि.एस. स्मिथ के द्वारा उन्हें ‘भारत के नेपोलियन’ की संज्ञा दी गई थी।

समुद्रगुप्त के पिता गुप्तवंशी सम्राट् चंद्रगुप्त प्रथम और माता लिच्छवि कुमारी श्रीकुमारी देवी थी। चंद्रगुप्त ने अपने अनेक पुत्रों में से समुद्रगुप्त को अपना उत्तराधिकारी चुना और अपने जीवनकाल में ही समुद्रगुप्त को शासनभार सौंप दिया था। प्रजाजनों को इससे विशेष हर्ष हुआ था, किंतु समुद्रगुप्त के अन्य भाई इससे रुष्ट हो गए थे और राज्य में गृहयुद्ध छिड़ गया। इन प्रतिद्वंद्वियों में सबसे आगे राजकुमार काछा थे। काछा के नाम के कुछ सोने के सिक्के भी मिले हैं। गृहकलह को शांत करने में समुद्रगुप्त को एक वर्ष का समय लगा। इसके पश्चात् उसने दिग्विजय यात्रा की। इसका वर्णन प्रयाग में अशोक मौर्य के स्तंभ पर विशद रूप में उत्कीर्ण है। पहले इसने आर्यावर्त के तीन राजाओं-अहिच्छव का राजा अच्युत, पद्मावती का भारशिववंशी राजा नागसेन और राज कोटकुलज-को विजित कर अपने अधीन किया और बड़े समारोह के साथ पुष्पपुर में प्रवेश किया। इसके बाद उसने दक्षिण की यात्रा की और क्रम से कोशल, महाकांतर, भौराल पिष्टपुर का महेंद्रगिरि (मद्रास प्रांत का वर्तमान पीठापुरम), कौट्टूर, ऐरंडपल्ल, कांची, अवमुक्त, वेंगी, पाल्लक, देवराष्ट्र और कोस्थलपुर (वर्तमान कुट्टलूरा), बारह राज्यों पर विजय प्राप्त की।

जिस समय समुद्रगुप्त दक्षिण विजययात्रा पर था। उस समय उत्तर के अनेक राजाओं ने अपने को स्वतंत्र घोषित कर विद्रोह कर दिया। लौटने पर समुद्रगुप्त ने उत्तर के जिन राजाओं का समूल उच्छेद कर दिया उनके नाम हैं—रुद्रदेव, मतिल, नागदत्त, चंद्रवर्मा, गणपति नाग, नागसेन, अच्युत नंदी और बलवर्मा। इनकी विजय के पश्चात समुद्रगुप्त ने पुनः पुष्पपुर (पाटलिपुत्र) में प्रवेश किया। इस बार इन सभी राजाओं के राज्यों को उसने अपने साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया। आटविक राजाओं को इसने अपना परिचारक और अनुवर्ती बना लिया था। इसके पश्चात् इसकी महती शक्ति के सम्मुख किसी ने सिर उठाने का साहस नहीं किया। सीमाप्रांत के सभी नृपतियों तथा यौधेय, मानलव आदि गणराज्यों ने भी स्वेच्छा से इसकी अधीनता स्वीकार कर ली। समहत (दक्षिण पूर्वी बंगाल), कामरूप, नेपाल, देवाक (आसाम का नागा प्रदेश) और कर्तुपुर (कुमायूँ और गढ़वाल के, पर्वत प्रदेश) इसकी अधीनता स्वीकार कर इसे कर देने लगे। मालव, अर्जुनायन, यीधेय, माद्रक, आभीर, प्रार्जुन, सनकानीक, काक और खर्परिक नामक गणराज्यों ने उसकी अधीनता स्वीकार कर ली। दक्षिण और पश्चिम के अनेक राजाओं ने इसका आधिपत्य स्वीकार कर लिया था और वे बराबर उपहार भेजकर इसे संतुष्ट रखने की चेष्टा करते रहते थे, इनमें देवपुत्र शाही शाहानुशाही, शप, मुरूंड और सैहलक (सिंहल के राजा) प्रमुख थे। ये नुपति आत्मनिवेदन, कन्योपायन, दान और गरुड़ध्वजांकित आज्ञापत्रों के ग्रहण द्वारा समुद्रगुप्त की कृपा चाहते रहते थे। समुद्रगुप्त का साम्राज्य पश्चिम में गांधार से लेकर पूर्व में आसाम तक तथा उत्तर में हिमालय के कीर्तिपुर जनपद से लेकर दक्षिण में सिंहल तक फैला हुआ था। प्रयाग प्रशस्ति में समुद्रगुप्त के सांधिविग्रहिक महादंडनायक हरिषेण ने लिखा है—‘पृथ्वी भर में कोई उसका प्रतिरथ नहीं था। सारी धरित्री को उसने अपने बाहुबल से बाँध रखा था।’ इसने अनेक नष्टप्राय जनपदों का पुनरुद्धार भी किया था, जिससे इसकी कीर्ति सर्वत्र फैल गई थी। सारे भारतवर्ष में अबाध शासन स्थापित कर लेने के पश्चात् इसने अनेक अश्वमेध यज्ञ किए और ब्राह्मणों दीनों, अनाथों को अपार दान दिया। शिलालेखों में इसे ‘चिरोत्सन्न अश्वमेधहर्त्ता’ और ‘अनेकाश्वमेधयाजी’ कहा गया है। हरिषेण ने इसका चरित्रवर्णन करते हुए लिखा है—‘उसका मन सत्संगसुख का व्यसनी था। उसके जीवन में सरस्वती और लक्ष्मी का अविरोध था। वह वैदिक धर्म का अनुगामी था। उसके काव्य से कवियों के बुद्धिवैभव का विकास होता था। ऐसा कोई भी सद्गुण नहीं है, जो उसमें न रहा हो। सैकड़ों देशों पर विजय प्राप्त करने की उसकी क्षमता अपूर्व थी। स्वभुजबल ही उसका सर्वोत्तम सखा था। परशु, बाण, शंकु आदि अस्त्रों के घाव उसके शरीर की शोभा बढ़ाते थे। उसकी नीति थी साधुता का उदय हो तथा असाधुता कर नाश हो। उसका हृदय इतना मृदुल था कि प्रणतिमात्र से पिघल जाता था। उसने लाखों गायों का दान किया था। अपनी कुशाग्र बुद्धि और संगीत कला के ज्ञान तथा प्रयोग से उसने ऐसे उत्कृष्ट काव्य का सृजन किया था कि लोग ‘कविराज’ कहकर उसका सम्मान करते थे।’ समुद्रगुप्त के सात प्रकार के सिक्के मिल चुके हैं, जिनसे उनकी शूरता, शुद्धकुशलता तथा संगीतज्ञता का पूर्ण आभास मिलता है। इसने सिंहल के राजा मेघवर्ण को बोधगया में बौद्धबिहार बनाने की अनुमति देकर अपनी महती उदारता का परिचय दिया था। वह भारतवर्ष का प्रथम आसेतुहिमाचल का सम्राट् था। इसकी अनेक रानियों में पट्टमहिषी दत्त देवी थी, जिनसे सम्राट् चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य ने जन्म लिया था।

विदेशी राज्यों के साथ संबंध
देशी शासकों से निपटने के बाद समुद्रगुप्त ने विदेशी शासकों के साथ भी अपने राजनीतिक संबंध सुनिश्चित किए। विभिन्न विदेशी शासकों ने उसके साथ मित्रता की प्रार्थना की, फलतः समुद्रगुप्त ने उन पर आक्रमण नहीं किया और उनसे मित्रता संबंध स्थापित किए। इन विदेशी शासकों ने आत्म-निवेदन, कन्याओं की भेंट तथा अपने राज्य से शासन करने के लिए गरुड़ की मुहर से मुद्रित आज्ञा पत्र या राजपत्र माँगकर इस मित्रता को स्थिरता प्रदान की। हरिषेण ने प्रयाग प्रशस्ति में इन विदेशी राज्यों का उल्लेख इस प्रकार किया है—
“दैवपुत्रशाहिशाहानशाहिशकमुरूण्डैः सैहलकादिभिश्च सर्वद्वीपवासिभिः।” इसको कुछ विद्वानों ने देवपुत्र शाही, शाहानुशाही, शक, मुरुंड तथा सैंहल बताया है, जबकि कुछ अन्य विद्वानों को मत है कि दैवपुत्र शाही और शाहानुशाही एक ही शक्ति हैं। ‘दैवपुत्रशाहानुशाहि’ की उपाधि किदार-कुषाण शासकों के द्वारा पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत में ग्रहण की गई थी। समुद्रगुप्त ने इन्हें भी अपनी अधीनता स्वीकार करने के लिए विवश किया। ‘शक-मुरुंड’ को कुछ विद्वानों ने एक ही माना है और उनके अनुसार शकों को भी, जो गुप्तों के उत्थान से पहले काफी शक्तिशाली हो चुके थे, समुद्रगुप्त ने अपने आधीन किया, परंतु कुछ अन्य विद्वान् शकों की ही भाँति मुरुंडों को भी एक अलग जाति मानते हैं, जिन्हें समुद्रगुप्त ने अपने आधीन किया। सैहलक का अर्थ विद्वानों ने लंका निवासी लगाया है। समुद्रगुप्त के लंका से संबंध की पुष्टि अन्य साक्ष्यों से भी होती है। ह्वेनसांग के वर्णन से भी ज्ञात होता है कि लंका के तत्कालीन शासक मेघवर्ण अथवा मेघवर्मन ने अपना एक दूत समुद्रगुप्त के पास भेजकर बोध गया में एक बौद्ध बिहार बनावाने की अनुमति माँगी थी। समुद्रगुप्त ने यह आज्ञा प्रदान भी कर दी थी तथा मेघवर्ण ने एक विशाल बौद्ध मठ का निर्माण कराया तथा उसमें बुद्ध की एक रत्न जटित प्रतिमा भी स्थापित की। ह्वेनसांग ने लिखा है कि लंका नरेश ने अपने देश के समस्त रत्न भी समुद्रगुप्त को भेंट कर दिए।

समुद्रगुप्त ने विभिन्न राज्यों के साथ विभिन्न नीतियाँ अपनाई, जिनका उल्लेख प्रयाग प्रशस्ति में मिलता है। इससे यह भी पता चलता है कि समुद्रगुप्त एक महान् विजेता होने के साथ-साथ एक दूरदर्शी राजनीतिज्ञ एवं कूटनीतिज्ञ भी था। अशोक के पश्चात् समुद्रगुप्त ने ही एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की। इन विजयों के परिणामस्वरूप समुद्रगुप्त के साम्राज्य की सीमा काफी विस्तृत हो गई। डॉ. आर.सी. मजूमदार के अनुसार समुद्रगुप्त के साम्राज्य में कश्मीर, पश्चिमी पंजाब, पश्चिमी राजपूताना, सिंध और गुजरात के अतिरिक्त शेष सारा भारत सम्मिलित था और छत्तीसगढ़ तथा उड़ीसा के प्रदेश तथा पूर्वी तट के साथ-साथ दक्षिण में चिंगलपुर तक या उससे भी आगे तक के प्रदेश सम्मिलित थे। डॉ. विमल चंद्र पांडेय ने लिखा है कि समुद्रगुप्त की दिग्विजय के परिणामस्वरूप संपूर्ण उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल का कुछ भाग तथा मालवा का कुछ भाग गुप्त साम्राज्य के अंतर्गत आ गया। डॉ. आर.के. मुखर्जी के अनुसार समुद्रगुप्त ने अपना साम्राज्य पूर्व में ब्रह्मपुत्र तक बढ़ाया था, परंतु इन विजित प्रदेशों के अतिरिक्त भी ऐसे बहुत से प्रदेश थे, जिन्होंने समुद्रगुप्त के प्रभुत्व को स्वीकार कर लिया था एवं उसे कर तथा उपहार प्रदान करते थे। इस प्रकार उसका साम्राज्य तो विस्तृत था ही, परंतु उससे अधिक विस्तृत था उसका अधिकार क्षेत्र।

अश्वमेध यज्ञ
अपनी दिग्विजय के उपरांत समुद्रगुप्त ने अश्वमेध यज्ञ किया। समुद्रगुप्त के अश्वमेध की पुष्टि विभिन्न साक्ष्यों से होती है। इनमें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है समुद्रगुप्त की अश्वमेध प्रकार या अश्वमेध शैली की मुद्राएँ। इन स्वर्ण मुद्राओं में एक ओर एक यूप अथवा यज्ञ स्तंभ के समक्ष अश्व खड़ा है तथा दूसरी ओर समुद्रगुप्त की महारानी (राजमहिषी) खड़ी है, जिसके दाहिने हाथ में चँवर है और बाएँ हाथ में एक वस्त्र है, जो संभवतः तौलिया है। इन सिक्कों पर ‘अश्वमेध पराक्रमः’ लिखा हुआ है। समुद्रगुप्त की पौत्री (चंद्रगुप्त द्वितीय की पत्नी) प्रभावती के पूना ताम्रपत्र में समुद्रगुप्त की ‘अनेकाश्रुमेधयाजिनः’ कहा गया है। ब्रिटिश संग्रहालय में एक यूप से बँधे हुए एक रैप्सन का यह विचार है कि यह समुद्रगुप्त के अश्वमेध की ही मूर्ति होगी। गुप्त अभिलेखों में समुद्रगुप्त के लिए चिरोत्सत्राश्वमेधाहर्तुः कहा गया है, जिससे पता चलता है कि उसने बहुत समय से न होनेवाले अश्वमेध यज्ञ का पुनः अनुष्ठान किया। प्रभावती के पूना ताम्रपत्र से तो समुद्रगुप्त के अनेक अश्वमेध यज्ञों का संकेत मिलता है, परंतु डी.सी. सरकार ने इसको स्वीकार नहीं किया है। विभिन्न विद्वानों ने इस बात की ओर संकेत किया है कि यद्यपि हरिषेण की प्रयाग प्रशस्ति में समुद्रगुप्त की संपूर्ण उपलब्धियाँ अंकित हैं, परंतु उसके अश्वमेध यज्ञ का वर्णन नहीं है, परंतु डॉ. विमल चंद्र पांडेय का विचार है कि यद्यपि इस प्रशस्ति में समुद्रगुप्त के अश्वमेध का स्पष्ट शब्दों में तो वर्णन नहीं है, परंतु उन सब स्थितियों का उल्लेख है, जो अश्वमेध यज्ञ के लिए आवश्यक होती है। भारतीय श्रौत सूत्रों में अश्वमेध का और अश्वमेध यज्ञ में अंतर्निहित स्थितियों का उल्लेख है। प्रयाग प्रशस्ति में अश्वमेध यज्ञ के सभी अंगों का वर्णन है, जिससे पता चलता है कि समुद्रगुप्त के समय में यह सारी स्थितियाँ पूर्ण की गई थीं। इस आधार पर डॉ. पांडेय का अनुमान है कि प्रयाग प्रशस्ति में समुद्रगुप्त के अश्वमेध यज्ञ का वर्णन है।

समुद्रगुप्त की प्रशासनिक व्यवस्था
समुद्रगुप्त ने न केवल एक विस्तृत साम्राज्य की ही स्थापना की, वरन् उस साम्राज्य को संगठन भी प्रदान किया। उसकी प्रशासनिक व्यवस्था के संबंध में प्रयाग प्रशस्ति तो बहुत अधिक प्रकाश नहीं डालती, परंतु कुछ पदाधिकारियों का उल्लेख अवश्य मिलता है, जो थे—
1. संधि विग्रहिक : यह युद्ध और संधि का मंत्री था, जो आधुनिक विदेश मंत्री के समकक्ष रहा होगा।
2. कुमारामात्य : यह विषय या जिले का अधिकारी था।
3. खाद्यत्पाकिक : यह अधिकारी रंधनागर अथवा राजकीय भोजनालय का प्रधान होता था एवं महादंडनायक भी था।
4. तिलाभट्टक : यह भी महादंडनायक था।

इस प्रकार केंद्रीय शासन में अनेक विभाग थे, जो पूर्णरूपेण संगठित हुए व्यवस्थित थे। उसका शासन केंद्रीकरण की नीति पर आधारित था। साम्राज्य अनेक प्रांतों में विभक्त था, जिनका शासन प्रांतपति करते थे, परंतु केंद्र का उन पर पूर्ण नियंत्रण था। यही कारण था कि उसके आधीन राजाओं अथवा प्रांतपतियों ने कभी उसके प्रभुत्व से मुक्त होने अथवा विद्रोह करने का साहस नहीं किया। इतना ही नहीं, उसके पश्चात् भी काफी समय तक पर्याप्त शांति एवं व्यवस्था बनी रही।

समुद्रगुप्त भारतीय इतिहास के कुछ महान् शासकों एवं विजेताओं में गिना जाता है। उसने अपने पराक्रम से एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की। वस्तुतः गुप्तवंश की महानता की आधारशिला उसी ने रखी थी। समुद्रगुप्त ने अपने विजय अभियानों को जिस प्रकार विभिन्न श्रेणियों में विभाजित किया और सबके साथ अलग-अलग प्रकार का व्यवहार किया, यह उसकी बुद्धिमत्ता एवं कूटनीतिज्ञता का प्रमाण है। विद्वानों का विचार है कि यदि उसने समस्त विजित प्रदेशों को अपने साम्राज्य में मिला लिया होता तो संभवतः उसकी मृत्यु के पश्चात् साम्राज्य बिखर गया होता, परंतु ऐसा न करके उसने साम्राज्य को स्थायित्व प्रदान किया और अपने उत्तराधिकारी के लिए एक संगठित राज्य छोड़ा। समुद्रगुप्त एक बहुमुखी प्रतिभा संपन्न व्यक्ति था, जिसकी उपलब्धियाँ सैनिक के साथ-साथ व्यक्तिगत भी थीं। उसके अपने सिक्कों तथा हरिषेण की प्रयाग प्रशस्ति से उसकी उपलब्धियों पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है। उसकी विभिन्न मुद्राओं से उसके प्रभुत्व, सामरिक शक्ति, अजेय पराक्रम एवं अश्वमेध यज्ञ का ज्ञान होता ही है, परंतु साथ ही साथ उसकी साहित्यिक अभिरुचि एवं संगीत प्रेम के अतिरिक्त धार्मिक प्रवृत्ति एवं दयालुता का भी परिचय मिलता है। वह स्वयं एक कवि एवं विद्वानों का आश्रयदाता था, जिसे कविराज भी कहा गया है। उसके एक सिक्के पर वीणा बजाते हुए उसका चित्र उसके संगीत प्रेम का परिचायक है। उसके दरबार में बहुत सारे कवि एवं विद्वान् थे, जिनमें उसका योद्धा कवि हरिषेण प्रमुख है। रुढ़िवादी हिंदू होते हुए भी उसने बौद्ध विद्वान् बसुबंधु को भी संरक्षण दिया था और उससे बौद्ध धर्म की दीक्षा भी ली। श्रीलंका के शासक मेघवर्ण को बोधगया में एक बौद्ध मंदिर बनवाने की स्वीकृति देकर उसने अपनी धार्मिक उदारता का परिचय दिया। प्रयाग प्रशस्ति में हरिशेष ने उसे कुबेर, वरुण, इंद्र तथा यमराज के समान कहा है, जिसने अपनी तीक्ष्ण पांडित्यपूर्ण प्रतिभा तथा संगीत ज्ञान से देवराज इंद्र के गुरु कश्यप, तुम्बुरू तथा नारद आदि को भी लज्जित कर दिया। वह महादानी था, जिसकी बुद्धि सदैव कृपण, दीन, अनाथ एवं आतुर मनुष्यों की सहायता में लगी रहती थी। महान् योद्धा होते हुए भी वह अत्यंत दयालु था और भक्ति तथा विनीत भाव से उसके कोमल हृदय को जीता जा सकता था, परंतु वह असाधु का विनाशक था एवं साधु के उत्थान का कारण। एरण अभिलेख के अनुसार वह तुष्ट होने पर कुबेर था और रुष्ट होने पर यमराज। इस प्रकार समुद्रगुप्त में विभिन्न गुणों का मिश्रण था एवं वह एक संपूर्ण व्यक्तित्व था।

सम्राट् समुद्रगुप्त की उपलब्धियों के आधार पर विन्सेंट स्मिथ ने उसे ‘भारतीय नेपोलियन’ कहा है। वस्तुतः उसकी उपलब्धियाँ नेपोलियन से भी अधिक थीं, क्योंकि यदि प्रयाग प्रशस्ति के वर्णन को स्वीकार किया जाए तो समुद्रगुप्त को कभी भी पराजय का मुख नहीं देखना पड़ा। उसने तो आजीवन सफलताएँ प्राप्त की और लगभग 50 वर्ष तक अत्यधिक गौरव एवं प्रतिष्ठा के साथ शासन किया। उसे न तो एल्बा एवं सेंट हेलेना में निर्वासित जीवन व्यतीत करना पड़ा और न ही वाटरलू की पराजय का अपमान ही सहन करना पड़ा। वह निश्चित रूप से दिग्विजयी शासक था। समुद्रगुप्त के इतिहास का सबसे मुख्य स्रोत वर्तमान इलाहाबाद के निकट, कौशांबी में चट्टानों पर उत्कीर्ण अभिलेखों में से एक पर उत्कीर्ण एक शिलालेख है। इस शिलालेख में समुद्रगुप्त के विजय अभियानों का विवरण दिया गया है। इस शिलालेख पर लिखा है—“जिसका सुंदर शरीर, युद्ध के कुल्हाड़ियों, तीरों, भाले, बरछी, तलवारें, शूल के घावों की सुंदरता से भरा हुआ है।” यह शिलालेख भारत के राजनीतिक भूगोल की वजह से भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें विभिन्न राजाओं और लोगों का नाम अंकित है, जोकि चौथी शताब्दी के प्रारंभ में भारत में उपस्थित थे। इनमें समुद्रगुप्त के विजय अभियान के बारे में लिखा गया है, जिसके लेखक हरिषेण हैं, जो समुद्रगुप्त के दरबार के एक महत्त्वपूर्ण कवि थे। सम्राट् समुद्रगुप्त ने 335 ई. में सिंहासनारूढ़ होकर 380 ई. तक शासन किया।