द्वारावती - 4 Vrajesh Shashikant Dave द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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द्वारावती - 4

4

उत्सव भागता रहा, भागता रहा। वह उसी दिशा में दौड़ रहा था जिस दिशा से वह आया था।
वह भागता रहा। सोचता रहा –
‘क्यों भाग रहा हूँ मैं?’
किन्तु उसे कोई उत्तर नहीं मिला। बस वह भागता रहा। वह उसी स्थान पर आ गया जहां उसे बाबा मिले थे। वह किनारे कि रेत पर बैठ गया। कुछ क्षण के पश्चात वह रेत पर ही सो गया। शीतल हवा ने उसे निंद्राधिन कर दिया।
सूरज खूब चढ़ गया। उसकी तीव्र किरणों से उत्सव जाग गया। तीव्र धूप से बचने के लिए कोई स्थान ढूँढने लगा। उसने दूर किसी टूटे हुए मकान को देखा। वहाँ जाने के लिए वह उठा किन्तु चल न सका।
सन्मुख उसके वही बाबा थे। कह रहे थे,”वत्स, तुम भाग क्यों आए?”
उत्सव क्रोधित हो गया, ‘यही वह व्यक्ति है जिसने मुझे भटका दिया।’
“बाबा, आपने मेरे साथ ऐसा क्यूँ किया?”
“क्या किया? कुछ कहो तो... ।”
“आपने मुझे पंडित गुल के पास भेजा था किन्तु वह.... ।”
“किन्तु वहाँ एक युवती मिली जो अपने आप को पंडित गुल कह रही थी। यही न?”
“जी, यही तो... ।”
“वोह सत्य कह रही थी। वही पंडित गुल है।”
“यह कैसे हो सकता है बाबा?”
“क्यों नहीं हो सकता?”
“एक युवती पंडित कैसे हो सकती है?”
“वत्स, तुम्हारी समस्या क्या है, पंडित का युवती होना अथवा युवती का पंडित होना?”
“दोनों स्थिति मेरे लिए विस्मय से भरी है।”
“तो तुम विस्मय से भयभीत हो। विस्मय का सामना करने का साहस रखना होगा, अन्यथा पूरा जीवन व्यतीत हो जाएगा किन्तु तुम अपने प्रश्नों के उत्तर नहीं पा सकोगे।”
“किन्तु एक युवती, एक स्त्री पंडित कैसे हो सकती है?”
“क्यों नहीं हो सकती?क्या ज्ञान पर किसी जाती विशेष का एकाधिकार है?”
“किन्तु... ।”
“वत्स, अनेक विद्वान स्त्री का उल्लेख हमारे शास्त्रों में उपलब्ध है। स्त्री का पंडित होना कोई नयी बात तो नहीं।”
“किन्तु वह तो तब की बात थी। आज के युग में... ।”
“वत्स, तुम बात बात पर भटक जाते हो। क्या यह तुम्हारा स्वभाव है?”
“मैं नहीं जानता।”
“यही कारण है कि तुम अपने प्रश्नों के उत्तर नहीं पा सके हो। ज्ञान, पंडिताई यह सब किसी समय विशेष अथवा जाती विशेष के बंधनों से मुक्त होते हैं। प्रत्येक युग में प्रत्येक व्यक्ति ज्ञान प्राप्त करने का अधिकार रखती है। प्रत्येक युग में स्त्रीयों ने भी ज्ञान को प्राप्त किया है। इस युग में यह सौभाग्य गुल को प्राप्त हुआ है। ज्ञान कभी लिंगभेद नहीं देखता।”
“तो उसे पंडित के बदले ... ।”
“हमें पंडिता कहना चाहिए। क्या यही तुम्हारे विस्मय का समाधान है?”
बाबा के शब्दों ने उत्सव को मौन कर दिया।
“जाओ, वत्स। पुन: जाओ। पंडित गुल से मिलो। वही तुम्हें तुम्हारे लक्ष्य तक मार्गदर्शन करेगी।”
“जैसी आपकी आज्ञा।” उत्सव ने हाथ जोड़ दिये। किन्तु आंख बंद नहीं की तथा द्रष्टि झुकाई भी नहीं। वह बाबा को देखता रहा।
“कल्याण हो तुम्हारा, वत्स।” कहते हुए बाबा समुद्र की तरफ चलने लगे। पानी के भीतर उतरने लगे। देखते ही देखते समुद्र के भीतर ओझल हो गए।
एक नये विस्मय ने उत्सव की आँखों में जन्म ले लिया।
‘कोई ऐसे कैसे समुद्र के भीतर अद्रश्य हो सकता है?’
‘यह बाबा मायावी लगते हैं।’
‘ऐसा ही लगता है। मेरी प्रत्येक बात से वह परिचित हैं। मैं जो करता हूँ वह सब उसे ज्ञात हो जाता है। मेरी प्रत्येक चेष्टा पर उसकी द्रष्टि हो जैसे। मेरे मन के भावों को पढ़ लेते हैं। मेरी जिज्ञासा जान लेते हैं। मेरी दुविधा को समज लेते हैं। मुझे कोई ना कोई मार्ग प्रदर्शित कर देते हैं। क्या यह बाबा मेरे भीतर उतर जाते हैं? या मेरे भीतर ही तो नहीं बसे?’
‘नहीं,भीतर नहीं बसे हैं वह मेरे। यदि ऐसा होता तो वह मेरे सन्मुख कैसे आते? मुझसे बात कैसे करते?’
‘बात कहते ही अद्रश्य हो जाते हैं। अभी अभी तो समुद्र के भीतर चले गए!’
‘बड़े मायावी हैं यह बाबा।’
‘किन्तु कौन है यह बाबा?’
‘कोई तो है जो रूप बदलकर मेरे सन्मुख आ जाता है, मुझे शांत कर जाता है। मार्ग दिखलाता है।’
‘मार्ग? उसने जो मार्ग दिखाया है उस पर चलना है तुम्हें, उत्सव।’
‘उत्सव? मुझे स्मरण हो गया। मेरा नाम उत्सव है। मुझे चलना होगा पंडित गुल के पास।’
उत्सव चलने लगा। पंडित गुल के पास आ गया।