अचार्य पण्डित हंस नाथ मणि नंदलाल मणि त्रिपाठी द्वारा जीवनी में हिंदी पीडीएफ

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अचार्य पण्डित हंस नाथ मणि


मुर्द्वन्व विद्वान संत योगी विलक्षण व्यक्तित्व आचार्य पण्डित हंस नाथ मणि
त्रिपाठी--

संदर्भ---अनूठा व्यक्तित्व

संसार और समय अपनी गति की निरंतरता से चलते रहते है जहाँ करोड़ो प्राणि जन्म लेते एव जीवन छोड़ते है। मनुष्य संसार का इकलौता प्राणि है जिसकी जीवन यात्रा का मूल्यांकन परिवार समाज एव राष्ट्र अन्तर्राष्ट्र स्तर पर होता है कुछ मनुष्यों को उनकी अपेक्षा योग्यता के अनुसार सम्मान उपलब्धि हासिल हो जाती है तो कुछ ऐसे भी लोग होते है जिनमे योग्यता और क्षमताओं से अधिक भाग्य समय के पुरष्कार स्वरूप प्राप्त हो जाता है तो कुछ मनुष्य योग्यता, ज्ञान ,कर्म, धर्म ,दायित्व बोध में श्रेष्ठ होते हुये भी समय संसार की निरंतरता में उचित स्थान सम्मान प्राप्त नही कर पाते क्योकि उनके जीवन समाज उनकी परिस्थितियों की बेड़ियों की जंजीरों द्वारा जकड़ कर रखा जाता है ऐसे ही एक व्यक्तित्व के विषय मे कुछ भी कहना लिखना उसके आदर्शों पर चल पाना सौभाग्य एव अभिमान की बात होती है ।।

जन्म जीवन और संघर्ष---

मैं ऐसे ही मुर्द्वन्व विद्वत विभूति आचार्य पण्डित हंस नाथ मणि त्रिपाठी जी के विषय मे जानकारियों को साझा कर अपने सौभाग्य पर अभिमानित हूँ।
आचार्य पण्डित हंस नाथ मणि त्रिपाठी का जन्म उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल देवरिया जनपद के आखिरी छोर बिहार के सीमावर्ती कस्बा लार बाज़ार से लगभग आठ किलोमीटर पूरब रतन पूरा गांव में सन ऊँन्नीस सौ पांच में एक अत्यंत साधारण ब्राह्मण के राम चरित्र मणि त्रिपाठी के द्वितीय पुत्र के
रूप में हुआ था पिता रामचरित्र मणि त्रिपाठी के मुख्य आय का स्रोत खेती एव पांडित्य कर्म ही था धीरे धीरे पण्डित रामचरित्र की तीनों संताने समय के साथ बढ़ती रही हंस नाथ जी को शुरू से ही पढ़ने लिखने में रुचि थी लेकिन परिवार में शिक्षा के प्रति जागरूकता मात्र पांडित्य कर्म के लिये आवश्यक शिक्षा की आवश्यकता और मर्यादा की लक्ष्मण रेखा ने हंस नाथ की बालमन अंतरात्मा को झकझोरती हज़ारों प्रश्न खड़ा करती किंतु विवश बालक हंस नाथ कुछ भी कर सकने में असमर्थ अंत विवश होकर बालक हंस नाथ ने घर छोड़ दिया और भटकते भटकते भारत की सांस्कृतिक शैक्षिक नगरी काशी पहुंचे काशी में ना तो उनकी पारिवारिक पहुंच या संबंध था ना ही उनको ही व्यक्तिगत जाजने वाला कोई था फिर भी किशोर हंसः नाथ ने हिम्मत नही हारी एव काशी पहुंचकर अपने आशाओं का आश्रय खोजने लगे मगर उनको पूछने वाला कोई नही अन्तः हार कर काशी के अस्सी घाट पर बैठ गए और अपने भाग्य भगवान भरोसे दिन रात मौसम से बेपरवाह गंगा के किनारे बैठे रहते पैसा उनके पास था ही नही खाने पीने के लिये भी क्या करते जब भी भूख सताती वही गंगा जी के रेत की बालू अपने अंजली में लेते और उसे ही आहार स्वरूप ग्रहण करते और गंगा जल पान कर पुनः गंगा तट पर बैठ जाते कहते है काशी में कोई भूखा नही रहता इस प्रकार किशोर हंस नाथ ने काशी की अक़्क्षुण महिमा मर्यादा को गरिमा मय बनाये रखा रेत का बालू किसी भी स्वस्थ व्यक्ति को खिला दीजिये उंसे कुछ ही पल में जीवन मृत्यु के बीच संघर्ष करना पड़ेगा लेकिन किशोर हंस नाथ जी के लिये सर्वेश्वर भगवान भोले नाथ का प्रसाद ही था लोग अस्सी के गंगा तट पर आते जाते और किशोर हंसः नाथ को देखते चले जाते इस प्रकार नौ दिन का समय बीत गया दसवें दिन एक संत जो प्रतिदिन अस्सी घाट आते और किशोर हंस नाथ को बैठे देखते अंतत दसवें दिन उन्होंने हँसनाथ से प्रश्न किया तुम कौन हो यहॉ क्या कर रहे हो मैं देख रहा हूँ कि तुम पिछले नौ दिनों से निरंतर गंगा तट पर बैठे माँ गंगा को निहार रहे हो क्या चाहिये तुमको तब हंस नाथ ने अपना परिचय देते हुये बताया कि वह शिक्षा के उद्देश्य से आया है और कहते है कि काशी शिक्षा की नगरी है मुझे पढ़ना लिखना है तब उस संत ने बड़े आदर भाव से किशोर हंसः नाथ से बोले तुम सही स्थान पर आए हो भगवान भोले नाथ एव माँ गंगा तुम्हारी मनोकामना अवश्य पूर्ण करेगी और बोले तुम मेरे साथ चलो अंधे को क्या चाहिये दो आंख हंस नाथ को लगा जैसे उन्हें दो आंख ही प्राप्त हो गयी तुरंत उस संत के साथ चल दिये उस संतपुरुष ने हँसनाथ की शिक्षा रहने खाने आदि की समूर्ण व्यवस्था की और हँसनाथ ने शिक्षा के लिये स्वयं को समर्पित कर दिया जब उनकी शिक्षा के प्रारंभिक चरण चल ही रहे थे कि उस संत का महापरिनिर्वाण हो गया जिसने हंस नाथ की शिक्षा आदि की व्यवस्था की थी वह ड़ोर ही टूट गई जो सहारा बन कर आई थी हंस नाथ ने हिम्मत नही हारी और अपनी शिक्षा की आराधना में प्राण पण से जुटे रहे बहुतमुश्किलों चुनौतियों का सामना करना पड़ा भूखे सोना पड़ा अपमान की पीड़ा झेलनी पड़ी और मानव जीवन के सबसे दुष्कर दौर से भी गुजरना पड़ा फिर भी संकल्प की शक्ति ने हंस नाथ का साथ नही छोड़ा पहन के लिये तन पर वस्त्र नही थे अतः दृढ़ निश्चयी हँसनाथ ने वस्त्र ना धारण करने की प्रतिज्ञा कर ली और जीवन पर्यन्त एक धोती और चादर चाहे गर्मी हो सर्दी हो या कोई भी मौसम वस्त्र के नाम पर उनके पास रहते अन्तः हंस नाथ की दृढ़ता शिक्षा के प्रति समर्पण रंग लाई और उन्होंने उनतीस वर्ष की आयु तक संस्कृत व्याकरण ,साहित्य,ज्योतिष आयुर्वेद ,वेद वेदांत ,संस्कृत भाषा आदि छः विषयो में आचार्य की उपाधि को अपने लिये विभूषित किया और निकल पड़े जीवन के कुरुक्षेत्र के मैदान में ।।

विद्वत समाज परिषद की स्वीकारोक्ति एव देशाटन--

उनकी प्रथम मुलाकात तत्कालीन विद्वत समाज के एक से बढ़कर एक मुर्द्वन्व तत्कालीन महापुरुषों से हुई जिनके द्वारा आचार्य पण्डित हंस नाथ की योग्यता को चुनौती दी गयी और परखा गया और अंततः सम्मान के साथ स्वीकार कर उन्हें समम्मानित किया गया सर्व प्रथम वह वह कानपुर पहुंचे प्रारम्भ जैसे वारणसी था उनके लिये वैसे ही कानपुर, कानपुर ना तो कभी गए थे ना ही उनका कोई परिचित था यदि कुछ भी था उनके पास तो वह थी उनके द्वारा काशी से प्राप्त शिक्षा की मनमोल संपत्ति कानपुर में भी ना रहने का कोई ठिकाना ना ही कोई जान पहचान स्वभाव से दृढ़ आचार्य हंस नाथ मणि जी ने कानपुर के फूलबाग में सुबह पांच बजे से आठ बजे तक गीता उपदेश प्रारंभ किया कानपुर उस समय उत्तर प्रदेश की विकसित हो रही उद्योग नगरी थी धनाढ्य वर्ग के वरिष्ठ सदस्य सुबह सरसीया और परमट पर स्नान करते और फूल बाग आते जाते एक अन्जान व्यक्ति के सामने रुकते गीता उपदेश सुनते धीरे धीरे आचार्य हंस नाथ की ख्याति एक मुर्द्वन्व विद्वान के रूप में होने लगी इसी दौरान उनकी मुलाकात स्वामी नारदानंद सरस्वती से हुई कुछ दिनों बाद आचार्य पण्डित हंस नाथ मणि त्रिपाठी जी तब भारत के मशहूर शहर कोलकत्ता पहुंचे जहाँ उनकी मुलाकात भारत के महान मनीषि संत मुर्द्वन्व विद्वान करपात्री जी से हुई करपात्री जी ने आचार्य हंस नाथ की योग्यता को कई प्रतिस्पर्धा चुनौतियों की परीक्षा से परखा और बोले (आजान बाहु हंस नाथ तुम निश्चित रूप से सर्वश्रेष्ठ आचार्य और मुर्द्वन्व विद्वत् शिरोमणि हो मैं करपात्री तुम्हारी योग्यता विद्वता के लिये तुम्हें आयु में छोटे होते हुये भी प्रणाम करता हूँ) अब तुम भारत वर्ष में कही भी जाओ तुम्हे तुम्हारी योग्यता ज्ञान का आदर सत्कार सम्मान निश्चित प्राप्त होगा ।।
कलकत्ता में तत्कालीन जरी के बड़े व्यवसायी श्री राम जी आचार्य हंस नाथ जी से दीक्षा प्राप्त कर पहले शिष्य होने का गौरव प्राप्त किया कुछ दिनों कोलकाता प्रवास के बाद पुनः अपने पैतृक गांव आचार्य पण्डित हँसनाथ मणि त्रिपाठी लौट आये।।

जन्मभूमि की सेवा--

अब उनकी ख्याति दूर दूर तक फैल चुकी थी अब उनके पास पिता राम चरित्र जी की जिम्मेदारी को साझा करना और पारिवारिक सामाजिक उत्तर दायित्व का निर्वह मुख्यधेय्य जीवन की अनिवार्यता बनकर खड़ी हो गयी आचार्य पण्डित हंस नाथ जी ने अपने छोटे भाई उमाशंकर मणि त्रिपाठी को आर्युवेद की शिक्षा दिलवाया जिसके बाद तत्कालीन सरकार के द्वारा सरकारी हॉस्पिटल में उमाशंकर मणि त्रिपाठी की नियुक्ति चिकित्सक के रूप में हो गयी इस बीच उन्होंने अनके सामाजिक एव धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन किया और करवाया मशहूर सन्त देवरहवा बाबा जी अपने लगभग सभी यज्ञ अनुष्ठानों में आचार्य पण्डित हंस नाथ जी को विद्वत कार्य का नेतृत्व देकर निश्चित रहते क्योकि देवरहवा बाबा सिद्ध संत थे विद्वत परिषद से उनका कोई लेना देना नही था ।।

मित्रता या शिष्यता का प्रेम----

आचार्य पण्डित हंस नाथ के अपने पैतृक गांव प्रवास के दौरान उत्तर प्रदेश एव देश मशहूर शिक्षा विद डॉ प्रेम बल्लभ जोशी जी से मुलाकात हुई प्रेम वल्लभ जी अल्मोड़ा के मूल निवासी थे जिनको लार बाज़ार में स्थापित स्वामी देवानंद शिक्षा संथान द्वारा संचालित कालेज के निर्माण एव पुरुद्धार के लिये लार मठ द्वारा प्रधानाचार्य पद पर आमन्त्रित किया गया था हालांकि प्रेमवल्लभ जी को किसी पद का लोभ तो था ही नही जिसके चलते वे पूर्वांचल के अति पिछड़े क्षेत्र में कार्य करे उनका शौक़ था हाल ही में आजाद हुए राष्ट्र भारत मे शिक्षा के बुनियादी ढांचे को बनाना जिसके चलते उन्होंने स्वामीदेवानंद विद्यालय को अपना कार्य क्षेत्र चुना और स्वामी देवा नंद कालेज की मज़बूत बुनियाद और विकास की आधार शिला रखी की मुलाकात आचार्य पण्डित हँसनाथ मणि त्रिपाठी से हुये दोनों एक दूसरे से खासा प्रभावित हुये आज तक यह मैं नही समझ पाया कि दोनों में गुरु कौन था शिष्य कौन प्रेमवल्लभ जोशी जी आचार्य पण्डित हंस नाथ मणि त्रिपाठी की बहुत इज़्ज़त किया करते थे आलम यह था कि उस समय समूचे लार क्षेत्र में दोनों की विद्वता एव सकारात्मक सम्बन्धों की चर्चा खास होती एका एक प्रेम वल्लभ जोशी जी के इलाहाबाद जाने के कारण आचार्य पण्डिन्त हंसः नाथ मणि जी को भी गांव से मोह भंग होने लगा और उन्होंने अपने बड़े भाई विश्वनाथ मणि त्रिपाठी से सादर अनुमति लेकर एक बार फिर बाहर जाने का फ़ैसला कर लिया इधर प्रेम वल्लभ जी उत्तर प्रदेश के शिक्षा निदेशक हुए एव सेवा निबृत्त हुये एव उनके दो पुत्रों मोहन चंद जोशी उत्तर प्रदेश प्रशासनिक सेवा में चयनित होकर सरकार एव शासन के अनेको पदों को सुशोभित कर रहे थे एव जीवन जोशी कानपुर अर्थर्टन वेस्ट कॉटन मिल में श्रम कल्याण अधिकारी के तौर पर कार्य शुरू किया ।।

कर्मक्षेत्र कानपुर----

आचार्य हंसः नाथ मणि जी गांव छोड़कर पुनः कानपुर पहुंचे अब उनके लिये कानपुर अब अनजान नही था एव विद्वतख़्याती के कारण उन्हें अब जहां जाते सम्मान प्राप्त होता तत्कालीन नगरपालिका कानपुर अध्यक्ष मिया लारी जो मूल रूप से लार के ही रहने वाले थे एव मशहूर टेनरी व्यवसासी थे बहुत इज़्ज़त करते थे और उनके दो अनन्य भक्त शिष्य कानपुर में उनके आदर्शों के अनुयायी थे जिसमें प्रमुख थे बादशाही नाका सब्जी मंडी निवासी वर्तन व्यवसायी राम आश्रय जी एव राम भरोसे जी विराहना रोड घी के व्यवसासी पण्डित एव ओमर वैश्य कालेज के प्राचार्य केदार नाथ बाजपेयी जी अतः आचार्य हंसः नाथ जी ने कानपुर को ही अपनी स्थायी कर्म भूमि के रूप में चुना शहर के मसहूर उद्योगपति सिंघानिया के कमला रिट्रीट में विशेष अवसरों पर उन्हें आमन्त्रित किया जाता हालांकि सिंघानिया परिवार में कोई उनका परम्परागत शिष्य नही था फिर भी जब कभी कोई आवश्यकता पण्डित जी को होती सिंघनिया परिवार से ऊँचीत सहयोग किया जाता आचार्य की ख्याति दिन प्रति दिन बढ़ती जा रही थी लेकिन कभी भी आचार्य ने ख्याति प्राप्ति या धनार्जन के लिये प्रायास नही किया उन्हें मात्र भगवान की भक्ति एव जन कल्याण कार्यो में ही मन रमा रहता।।

कन्यादान एव कन्या विवाह---

उन्होंने अपने जीवन मे कन्या दान बहुत किया अपने सीमित संसाधन में उनके द्वारा बीस बच्चीस कन्याओं का विवाह एव कन्या दान किया गया आचार्य से एक पंजाबी महिला से मुलाकात हुई जिसके पति द्वारा उसकि बीमारी के चलते छोड़ दिया गया था आचार्य उस त्यगता को साथ लेकर गांव आये उसका लगभग पंद्रह महीनों तक अपने अति सीमित संसाधन में चिकित्सा किया और स्वस्थ होने पर बड़े धूम धाम से उसका विवाह बलिया जनपद के बेल्थरा में एक गणमान्य राजपूत परिवार में किया जो आज भी गर्व है एव एक मिशाल है जिसकी चर्चा बेल्थरा एव लार अक्सर होती रहती है।।

आचार्य का शिष्यत्व गौरव अभिमान---

उनके जीवन को एक शिष्य होने के नाते मुझे नजदीक से जानने समझने का मुझे अवसर सौभग्य प्राप्त है जो मेरे लिये आत्म अनुभूति गर्व एव अभिमान है अमूमन सभी को अपने माता पिता गुरु मार्गदर्शक आदरणीय एव प्रिय सम्मानीय होते है मै एक अकेला विश्व का शिष्य हूँ जिसने गुरू की खोज नकारात्मकता से शुरू किया प्रारम्भ में मैं आचार्य पण्डित हंस नाथ के घोर आलोचकों एव विरोधियों से मिलने की कोशिश करता एक तो उनका ना ही कोई विरोधी था ना ही आलोचक जो लोग कुछ नकारात्मक बाते आचार्य जी के संदर्भ में कहते उनके पास कोई तथ्य तर्क साक्ष्य नही होते मुझे एक तरह से आचार्य पण्डित हंस नाथ मणि त्रिपाठी जी के जीवन एव उनके सम्पूर्ण जीवन पल प्रहर को खोजने जानने का शुभअवसर प्राप्त हुआ है कारण मैं उनके आखिरी पल का अंतिम शिष्य हूँ मैं उनके रक्त से संबंधित भी हूँ लेकिन उनके शिष्यत्व के बाद सभी मर्यादाएं छोटी पड़ जाती है उन्होंने मुझे स्वय अपने जीवन के विषय मे कुछ भी लिखने या चर्चा करने से मना किया था लेकिन मैं स्वयं के साथ न्याय नही कर रहा था अतः मैंने निश्चित तौर पर धृष्ठता करते अपने प्रिय गुरु क्षमा की याचना करता हूँ।।

मानव सेवा --

आचार्य पण्डित हंस नाथ मणि त्रिपाठी जी द्वारा अपने आयुर्वेद ज्ञान से हज़ारों हज़ार लांगो को जीवन दान दिया गया या अभिशप्त जीवन से छुटकारा दिलाया गया जिनकी गणना कर पाना लगभग असंभव है आचार्य का सबसे बड़ा गुण यह था कि वह किसी का कल्याण या उपकार पैसे के लिये नही करते सिर्फ ईश्वर का आदेश मानकर अपने कर्तव्य दायित्व के बोध का निर्वहन करते और सिद्ध सफल होते।।मानवता के प्रति आचार्य के मन मे इतनी संवेदना थी कि स्वय आचार्य ने बहुत दिनों तक सिर्फ रोटी और पानी ही आहार स्वरूप ग्रहण किया ।।

मंदिर निर्माण---

आचार्य के गांव के ही पास पड़ोसी ग्राम परासी चकलाल निवासी स्वर्गीय सदा नंद मिश्र जी जिनकी कोई संतान नही थी ने अपनी आठ एकड़ जमीन आचार्य जी को सौंप दी लेकिन आचार्य जी ने भगवान राधा कृष्ण का भव्य मंदिर बनवाया और वह आठ एकड़ जमीन भगवान के मंदिर की व्यवस्था हेतु आय के स्रोत के लिये जोड़ दिया चूंकि आचार्य जी को फुर्सत नही रहती वह सदैव बाहर ही रहते जिसके कारण कुछ तुच्छ स्वार्थि ढोंगियों द्वारा पहले मन्दिर का पुजारी बनकर कुछ दिन बिताने के बाद स्वय मलिक बन बैठे उस मंदिर के राधा कृष्ण की अष्ट धातु की मूर्ति गायब है जिसे धूर्तो द्वारा चोरी बताया जाता है आज वह मन्दिर नही बृजबल्लभ दास की ख़ानदानी विरासत बन चुकी है आज उस मंदिर पर उसी के परिवार का कोई अपराधी प्रबृत्ति का ढोंगी संत रहता है एव ईश्वर नाम पर भोग कर रहा है सिर्फत यह कि स्वर्गीय सदानंद के भाई बंधु भी उसी परम्परा के डोंगी के साथ खड़े नजर तब भी आते थे अब भी आते कभी मिलकर नही सोचा कि पारिवारिक विरासत मन्दिर को एक दर्शनीय स्थल के रूप में विकसित किया जाय।।

आचार्य द्वारा चमत्कार का चमत्कार---

1-आचार्य जी के जीवन मे एक बार अजीब चुनौती खड़ी हो गयी आचार्य जी के शिष्य राम आश्रय जी के चार बेटे थे जिसमें बड़े बेटे की मृत्यु बादशाही नाका सब्जी मंडी छत से गिरने के कारण हो गयी लगभग चार पांच वर्ष की आयु में हुई छत से गिरने के बाद कानपुर उर्सला हॉस्पिटल के चिकित्सको ने बच्चे को बचाने का बहुत प्रायास किया किंतु बच्चे को बचा नही सके जिसके कारण रामाश्रय बहुत दुखी रहने लगे हालांकि उनके पास तीन संताने और भी थी मगर बडा बेटा होने के कारण व्यवसायिक कारोबार उसीके नाम से था कभी कभार रामाश्रय जी कहते रहते की महाराज जी क्या मृत्यु के बाद उसी शरीर परिवार माता पिता परिवार के मध्य पुनर्जन्म सम्भव है आचार्य जी शिष्य रामाश्रय की बात सुन कर चुप होकर कोई जबाब नही देते लेकिन एक ही प्रश्न अपने प्रिय शिष्य की वेदना की आवाज में सुनते सुनते उनके अन्तर्मन से भी वेदना का एहसास कराती एक दिन आचार्य जी से राम आश्रय जी ने वही प्रश्न नित्य की भांति पूछा अब आचार्य जी शिष्य की वेदना सहन नही हो सकी उन्होंने रामाश्रय जी से कहा मैं निश्चित रूप से तुम्हारे उसी पुत्र को उसी शरीर मे जन्म लेकर जीवित करने की प्रतिज्ञा करता हूँ उन्होंने रामाश्रय को वचन देते हुये उन्ही के घर पर अनुष्ठान यज्ञ शुरू किया और एक वर्ष सिर्फ दो चम्मच घी प्रतिदिन पीकर अनुष्ठान पूर्ण किया और डेढ़ साल बाद उनके घर एक स्वास्थ्य बालक ने जन्म लिया जिसके माथे पर घाव का बडा निशान आंखे लाल थी सर पर वही निशान था जो छत से गिरने के बाद डॉक्टरों द्वारा टांके लगाए गए थे और आंख का रंग लाल छत से गिरने के बाद रक्तस्राव के कारण हुये थे किसी को मृत बेटे के पुनर्जन्म का विश्वास नही था मगर ज्यो ज्यो वह बालक बड़ा होता गया त्यों त्यों वह अपने पूर्व जन्म की चार पांच वर्ष की यादों को बताता और घर परिवार समाज वाले उसकी प्रमाणिकता को सत्यापित करते आज वह बालक कम से कम पैंतालीस छियालीस वर्ष का है जो उसी परिवार में पूर्व जन्म में पांच वर्ष तक बड़ा बेटा था वह सबसे छोटा है यह आज के वैज्ञानिक युग मे चमत्कार से बड़ा चमत्कार है आचार्य जी के इस चमत्कार पर संसय इसलिये नही किया जा सकता क्योंकि आज भी कानपुर के ब्लाक में रामाश्रय जी परिवार है जो स्वय इस सत्यार्थ को प्रमाणित कर सकते है यह आचार्य हंस नाथ मणि जी की योग्यता ज्ञान और चमत्कार का एक असंभव का संभव उदाहरण जो यदि किसी के द्वारा आज किया जाता तो वह विश्व के सबसे ताकतवर ईश्वरीय अंश में शुमार होता किंतु आचार्य जी ने ना तो तब कोई प्राचार या लोभ अपनी इस असाधारण उपलब्धि के लिये किया ना ही अपने किसी संबंधि को इस प्रकार के चमत्कारों से लाभान्वित होने दिया क्योंकि उनका स्पष्ठ मत था कि परम शक्ति सत्ता को जब भी कुछ किसी से कराना होता है कोई निमित्त या माध्यम भेज देते है वही मैं भी हूँ और उसके संकेतो निर्देशो के अनुपालन में जीवन समर्पित करता जा रहा हूँ।।

2-उनके कलकत्ता के प्रथम शिष्य

जरी व्यवसासी को मशहूर जरी व्यवसासी को अलपायु थी और काल सर्प योग के साथ मार्केस था उन्होंने आचार्य से प्रश्न किया आचार्य क्या मेरा अल्पायु योग समाप्त नही हो सकता तब आचार्य ने श्री राम जी से बताया था यह ईश्वरीय विधान है इसे समाप्त करना तो असम्भव है मगर आपको मोक्ष प्राप्त हो इसके लिये मैं अवश्य प्रायास करूँगा और हुआ भी यही श्री राम जी कोलकत्ता से बैज नाथ देवघर भगवान भोले नाथ को जल चढ़ाने एव रुद्राभिषेक करने आये थे ज्यो ही पूजन समाप्त हुआ श्री राम जी ने सर बैद्य नाथ ज्योतिर्लिंग पर रखा उनके प्राण पखेरू उड़ गए वहां सभी पुजारियों ने देखा कि श्री राम जी के शरीर से एक प्रकाश दीपक की भांति आकाश की तरफ जा रहा है सबने इस दिव्य आत्मा के महानिर्माण के साक्षी बने जो आज भी वहां चर्चा में कभी कभार आता रहता है।


योग का चमत्कार---

मृत्यु से लग्भग बारह वर्ष पूर्व उन्होंने कही भी आना जाना बंद कर दिया था
और अपने पैतृक गांव चले आये
मृत्यु से लगभग चार माह पूर्व आचार्य को सीने में भयंकर दर्द हुआ तुरंत चिकित्सक आये और उन्होंने बताया कि आपको हृदयाघात हुआ है और आपकी स्थिति में कोई बच नही सकता और मेडिकल साइंस में कोई तकनिक ऐसी नही है कि इस प्रकार की गम्भीर हृदय बीमारी में किसी को भी बचाया जा सके आप सिर्फ योग के बल पर हृदय घात की गंभीरतम स्थिति में भी प्रशन्न प्रतीत हो है तब आचार्य ने बड़े संयत होकर कहा आप विद्वत चिकित्सक हमे देखने आए मैं धन्य एव कृतार्थ हुआ मुझे इस शरीर से अपने कुछ मानवीय अपराधों का मोल चुकाना है अतः मैं चार माह तक इस पीड़ा का भोग करते हुये शरीर का त्याग कर दूंगा और हुआ भी यही उनतीस अट्यूबर सन ऊँन्नीस सौ छियासी को उन्होंने इस संसार से विदा लिया।।वास्तव में विलक्षण प्रतिभा के व्यक्तित्व कभी कभार जन्म लेते है और युग सृष्टि और संसार को सकारात्मक दृष्टि की प्रेरणा से सिंचित कर ईश्वरीय अवधारणा के सत्यार्थ का प्रतिनिधित्व करते युग के ईश्वरीय सत्ता की वास्तविकता का प्रतिनिधित्व कर युग को कृतार्थ करते है।।


नन्दलाल मणि त्रिपाठी पीताम्बर गोरखपुर उत्तर प्रदेश