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फ्लेम्स ऑफ लव - भाग 2

वामिका ने ऑफिस में कदम रखा। यह बीस मंजिल वाली एक बड़ी इमारत थी और बेहद शानदार लग रही थी। वह रिसेप्शन के पास गई वहां पर एक लड़की बैठी हुई थी उसने उससे कहा, "मेरा नाम वामिका श्रीवास्तव है मैंने आज ही एक रिसेप्शनिस्ट के तौर पर ज्वाइन किया है"। वह लड़की अपनी सीट से उठी और उसका हाथ खींचकर उसे अपने साथ ले गई। वो उसे लेकर एक केबिन में गई और फिर उसने उसे एक आईडी कार्ड दिया जिसपर वामिका का नाम लिखा हुआ था।
"इस कम्पनी में तुम्हारा स्वागत है मिस श्रीवास्तव..मेरा नाम तृषा है और हम दोनों रिसेप्शन पर साथ में काम करने वाले हैं" उस लड़की ने वामिका से मुस्कुराते हुए कहा फिर वह उसे लेकर रिसेप्शन पर चली गई।
"एक दो दिन बाद हमारे बॉस मिस्टर पाटनकर आने वाले हैं" तृषा ने वामिका से कहा। "ओह! वो अक्सर विदेश में ही रहते हैं न", वामिका ने उससे पूछा। "हां...तुम देख रही हो ये जो लोग आज इतना काम कर रहे हैं न ये सब बॉस के गुस्से से बचने के लिए है..अगर तुम कुछ समय पहली आई होती तो देख लेती कि ये लोग कितने कामचोर हैं और जो हमारा मैनेजर है वो... छोड़ो तुम बस उससे दूर ही रहना" तृषा ने उससे कहा। बस इसी वे तरह दोनों बातें करने में और एक दूसरे को जानने में व्यस्त थी।
अचानक एक आदमी उनकी ओर आया। "क्या आप मिस वामिका श्रीवास्तव हैं?" उसने वामिका से पूछा, "जी हां मैं ही हूं" वामिका ने कहा
"आपको मैनेजर ने अपने केबिन में बुलाया है क्योंकि आपने आज ही ज्वाइन किया है इसलिए आप एक बार आकर अपना परिचय उन्हें दे दीजिए" उस आदमी ने कहा।
"ठीक है में आती हूं" वामिका ने कहा और फिर वह आदमी वहां से चला गया।
"ध्यान रखना अपना ऑल द बेस्ट और मेरी बात याद रखना" तृषा ने उससे कहा।

वामिका लिफ्ट से छठी मंजिल पर गई उसके सामने मैनेजर का ऑफिस था उसने दरवाज़े पर दस्तक दी "कम इन" सुनकर वह अंदर चली गई अंदर उसने देखा की एकांश कुर्सी पर बैठा हुआ था और उसकी टेबल पर मैनेजर का लोगो रखा हुआ था उसने जरा इधर–उधर नज़रें दौड़ाई और देखा की बाएं तरफ एक बड़ी से खिड़की लगी हुई थी और एक किनारे पर छोटा सा फ्रिज और एक काफ़ी मेकिंग मशीन रखी हुई थी। उसे कुछ न बोलते हुए देखकर एकांश ने उसका ध्यान खींचने के लिए अपना गला साफ़ किया। वामिका ने उसकी तरफ देखा और कहा,"हेलो सर मैं वामिका श्रीवास्तव हूं मैंने आज ही ज्वाइन किया है"
"ओके तो तुम हो वो नई रिसेप्शनिस्ट हमें तुम्हारा इंटरव्यू पसंद आया था इसलिए हमने तुम्हें चुना" उसने वामिका को अजीब नज़रों से घूरते हुए कहा। वामिका थोड़ा असहज हो गई थी लेकिन उसने ये भाव
अपने चेहरे पर नहीं आने दिए और आत्मविश्वास से बोला,"मैं आपकी बहुत आभारी हूं सर, मुझे चुनने के लिए धन्यवाद"। एकांश ने अपना सर हिलाया और फिर उसे जाने को कहा।
उसके जाने के बाद एकांश ने धीमी आवाज़ में खुद से कहा,"इतना आत्मविश्वास... उसके बाद वह मुस्कुराया, मुझे इसे तोड़ना अच्छा लगेगा।

वामिका वापस रिसेप्शन पर आ चुकी थी वहां पर तृषा उसका इंतज़ार कर रही थी उसे आते हुए देखकर तृषा उसके पास गई और पूछा,"क्या हुआ सब ठीक तो था न?" "हां सब ठीक था उन्होंने बस मेरा परिचय लिया और फिर वापस भेज दिया" वामिका ने कहा।
यह सुनने के बाद तृषा ने एक गहरी सांस ली और फिर वे दोनों कैफेटेरिया में लंच के लिए चले गए।
"तो आप सप्ताहांत में कहां जाना पसंद करोगी, क्या तुम मेरे साथ घूमना चाहोगी?" तृषा ने वामिका से पूछा।
"मुझे माफ करना...मैं सप्ताहांत में अपनी माँ से मिलने जाना चाहूंगी, मैं हमेशा उनसे मिलने जाती हूं" वामिका ने कहा।
"कोई बात नहीं ये तो अच्छी बात है कि तुम अपनी मां से मिलना चाहती हो...तो फिर हम अब दो दिन बाद मिलेंगे" तृषा ने मुस्कुराते हुए कहा।
अद्वित भारत पहुंच चुका था वह एयरपोर्ट से सीधे अपने अपार्टमेंट में गया। उसे अपने माता-पिता के साथ रहना पसंद नहीं था। जब वह चार साल के था तब उनकी माँ का निधन हो गया था। क्योंकि उस समय वह बहुत छोटे बच्चे थे इसलिए उनके पिता ने दूसरी महिला से शादी कर ली ताकि वह उनकी देखभाल कर सकें लेकिन उसकी सौतेली मां ने कभी भी उसके साथ अपने बेटे की तरह व्यवहार नहीं किया, उसने उसकी ठीक से देखभाल नहीं की और उसके पिता ने भी उसके सौतेले भाई एकांश को उससे अधिक प्राथमिकता दी। बचपन से ही उसके पिता उसकी सभी पसंदीदा चीज़े एकांश को दे देते थे अगर वह उनसे कहता कि उसे चहिए। क्रियोन से लेकर उसके पसंदीदा जूतों तक और यहां तक कि जब उसने अपनी पहली गाड़ी खरीदी थी वो भी उसके पिता ने उसके सौतेले भाई को दे दी थी। वह जानता था कि उसका भाई निक्कमा और कामचोर है और मैनेजर के पद के लिए बिलकुल भी लायक नहीं है लेकिन अपने पिता के जोर देने के कारण उसको उसे वो पद देना पड़ा। अब उसके भाई की नजर उसकी कंपनी और दौलत पर थी जो उसने बहुत मेहनत से कमाई थी। इसलिए उसे अपने परिवार के साथ रहना पसंद नहीं था वह अकेले रहना पसंद करते था।
उसका अपार्टमेंट शहर के बाहरी इलाके में था। यह एक आलिशान अपार्टमेंट था। इसमें एक किंग साइज़ बेडरूम, एक शानदार रसोईघर, बाथरूम, होम थिएटर और एक अतिथि कक्ष था। घर की दीवारें सफेद रंग की थी और उसमें बहुत ही सुंदर कलाकृतियां थी। वह कला प्रेमी था। उसने अपने इनडोर प्लांट्स भी लगा रखे थे ताकि उन्हें देखकर उसे शांति मिल सके। वह नहा कर आया और अपने दाएं हाथ अपने असिस्टेंट मिस्टर वर्मा को कॉल लगाया। मिस्टर वर्मा काफी वर्षों से उसके साथ काम कर रहे थे और वे उसके सबसे विश्वसनीय व्यक्तियों में से एक थे।
"मिस्टर वर्मा क्या अपने मिस्टर जॉय के साथ मेरी मीटिंग फिक्स्ड कर दी है?" अद्वित ने मिस्टर वर्मा से पूछा।
"जी सर सोमवार दस बजे मीटिंग शुरू हो जाएगी" दूसरी तरफ़ से मिस्टर वर्मा ने बोला "ठीक है मैं तैयार रहूंगा आप भी मीटिंग के लिए तैयारी कीजिए ये डील मेरे लिए बहुत जरूरी है" अद्वित ने कहा और फिर उसने फोन रख दिया। उसके बाद उसने अपने लिए काफ़ी बनाई और लैपटॉप लेकर काम करने लगा।
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~फ्लेम्स ऑफ लव~



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