दुष्चक्र - 2 Kishanlal Sharma द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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दुष्चक्र - 2

रिश्वत,भरस्टाचार,ऊपरी कमाई या गलत तरीके से कमाया पैसा आदमी को व्यसनों की तरफ अग्रसित करता है।शराब पीने की आदत,वेश्यागमन,जुआ आदि की लत ऐसे पैसे से ही पड़ जाती है।
वह सर्विस में आया तब बेहद ईमानदार और सच्चरित्र था।रिश्वत से उसे सख्त चिढ़ थी।लोगो को रिश्वत लेते और बेईमानी के पैसे से गुलछर्रे उड़ाते हुए देखकर बेहद दुख होता था।साथियों को वह समझाता।उन्हें उपदेश देता।भरस्टाचार से होने वाले नुकसान के बारे में वह अपने साथियों को बताता।उसने अपने सहकर्मियों को सुधारने का भरसक प्रयास किया था।पर वह उन्हें नही सुधार पाया था।उल्टे समय बीतने के संग वह उनके रंग में ही रंग गया था।सर्विस में आने से पहले वह सभी व्यसनों से दूर था।लेकिन साथियों की संगत में रहकर धीरे धीरे उसे शराब,सिगरेट आदि व्यसनों की आदत लग गयी थी।शराब की लत तो उसे इस कदर लग चुकी थी कि वह शराब के बिना नही रह सकता था।शाम होते ही उसे शराब की तलब महसूस होने लगती।शराब के लिए तड़पने लगता।
वह कुर्सी पर बैठा कभी बाएं दरवाजे की तरफ कभी सामने के दरवाजे से प्लेट फ़ॉर्म को देखने लगता।सिर्फ यात्री ही आ रहे थे।माल बुक कराने कोई नही आ रहा था।ज्यो ज्यो घड़ी की सुई खिसक रही थी।उसे लग रहा था।अब माल बुक कराने वाला कोई नही आएगा।
सामने प्लेटफॉर्म पर ट्रेन खड़ी थी।उसमें इंजन आकर लग चुका था।ट्रेन छूटने में 15 मिनट शेष बचे थे,तभी एक आदमी बंडल उठाये हुए आया।
"कहा जाना है?उस आदमी के हाथ मे बंडल देखते ही नारंग की आंखों में चमक आ गयी।
"बरेली।"बंडल तौल मशीन पर रखते हुए वह बोला
"कितने बंडल है?"
"पांच।"
"जल्दी करो।ट्रेन जाने का समय हो गया है,"नारंग ने जोर से आवाज लगाई थी,"रमजान।"
"आया साहब--नारंग की आवाज सुनकर रमजान ने बाहर से ही जवाब दिया था।
माल बुक होता रहता है तो रमजान भी अपनी ड्यूटी पर मुस्तेद रहता है।उसे भी हर व्यापारी से पैसे मिलते हैं।आज माल बुक कराने के लिए कोई नही आ रहा था इसलिय जब से वह ड्यूटी पर आया तब से बाहर प्लेटफॉर्म पर घूम रहा था।रिश्वत और भरस्टाचार या ऊपरी पैसे में भी नशा होता है।जब कर्मचारी को वेतन के अलावा अतिरिक्त पैसा मिलता रहता है,तो कर्मचारी मुस्तेदी और पूरे लग्न से अपनी ड्यूटी करता है।अगर ऊपरी पैसा न मिले तो उसका मन काम करने में बिल्कुल नही लगता हैं।
बंडल बाहर रिक्शे में रखे थे।उस बूढ़े आदमी ने जल्दी जल्दी बंडल लाकर तौल मशीन पर रख दिये थे।
"रक सौ पच्चीस,"रमजान बंडलों का वजन करके बोला था।
'लाओ मुझे टिकट दो।"नारंग लगेज टिकट बनाते हुए बोला,"बीस और पन्द्रह कुल पैतीस रु दो।"
"कितना किराया हुआ?"
"बीस रु।"
"लेकिन आप तो पैंतीस रु मांग रहे है।"
"बीस रु किराए के और पन्द्रह रुपये पांच बंडल बुक कराने के।"
"साहब मै कोई व्यापारी नही हूँ।मैं तो सरकारी मुलाजिम हूँ और सरकारी कागज लेकर जा रहा हूँ,"वह बुड्ढा बोला,"अगर आप पैसे ले रहे है तो मुझे रसीद दीजिए।बिना रसीद मुझे पैसे कैसे मिलेंगे।"
ऊपर के पैसे की रसीद नही मिलती।वह गिड़गिड़ाता रहा पर नारंग ने उसकी नही सुनी।तभी ट्रेन ने सिटी मारी और उस बूढ़े ने जल्दी जल्दी बंडल डिब्बे में रखे और दुखी मन से चला गया।

"रमजान क्वाटर ले आओ,"नारंग ने पन्द्रह रु उसे दिए थे।
रमजान चला गया।नारंग खुश था,पैसे आये वरना उसे जेब से पीनी पड़ती।रमजान क्वाटर दे कर चला गया।नारंग का ठेला खूंटी पर लटका था।वह ड्यूटी पर नही पीता था।उसके एक हाथ मे शराब का क्वाटर था दूसरे से वह थैला उतार रहा था।वह ठिगने कद का था और खूंटी ऊची।वह जरा सा उछला तब न जाने कैसे पव्वा उसके हाथ से फिसला और नीचे गिरते ही टूट गया।शराब बिखर गई।वह पथराई आंखों से शराब को देख रहा था।तब उसे उस बूढ़े का चेहरा दिख रहा था जो पैसे वापस देने के लिए गिड़गिड़ा रहा था