तुम दूर चले जाना - 10 Sharovan द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

तुम दूर चले जाना - 10

उसने गौर से एक बार दीपक को देखा- निहारा- जी भर के वह उसको देखती रही- टकटकी लगाये। बिना पलक झपकाए- सोचा, शायद दीपक ने उससे कोई मजाक कर दिया हो? उसे विश्वास भी नहीं हो पा रहा था। शायद दीपक ने उसके असीम प्यार को पहचानना चाहा हो? उसकी परीक्षा ली हो? मगर नहीं, दीपक की खामोशी उसके दिल के सारे बिगड़े हुए जजबात पेश कर रही थी। चेहरे की गंभीरता ने उसकी सारी परेशानियों का जिक्र कर दिया था। इसके साथ ही उसकी झुकी-झुकी निगाहें, बेदम दृष्टि, तथा फीकी पड़ गयी मुखमण्डल की सारी आभा उसके एक गुनहगार प्रेमी होने की साक्षी दे चुकी थी। दीपक कितना अधिक उदास था? किस कदर वह एक हारा हुआ व्यक्ति लग रहा था। किरण स्वयं ये सब अपनी आँखों से देख चुकी थी और अभी भी देखे जा रही थी। इसके बावजूद भी वह ये सब बर्दाश्त नहीं कर सकी। उसने इस वास्तविकता को स्वीकार भी नहीं करना चाहा। कुछ कहना चाहा, मगर कह नहीं सकी। उसे अपनी परिस्थिति पर दया भी नहीं आ सकी। केवल तरस गयी। होंठ तड़प और फड़ककर ही शांत हो गये। जी में उसके एक बार ये आया भी कि इस कठोर परिस्थिति में भी वह दीपक के पैरों पर गिर पड़े। गिड़-गिड़ाकर अपना ठुकराया हुआ प्यार वापस माँग ले, परन्तु वह ऐसा चाहकर भी नहीं कर सकी- नहीं कर सकी तो वह और भी अधिक तड़प गयी। बेबस हो गयी. आँखें तरसती ही रह गयीं। होंठ अपने प्यार का सिला माँगने के लिए बेताब हो गये। पलकें काँप गयीं. और दिल की सारी हसरतें, मृत कामनाओं की अर्थी बनकर अपने प्यार का जनाजा उठता हुआ देखकर जैसे रो पड़ी थीं। आरजूएँ पलभर में ही दफन हो चुकी थीं। किरण दीपक को देखती थी- देखती थी और सोचती थी- सोचती थी कि कितनी अबला हो गयी थी वह उस समय, जबकि वह इस युवक के प्यार में बहक गयी थी। अपना सन्तुलन खो बैठी थी। कितना अधिक उसने उसे चाहा था। किसकदर उस पर वह विश्वास कर बैठी थी? क्यों वह इसके प्यार में फँस गयी थी? क्यों वह इसे प्यार कर बैठी? प्यार भी किया था, तो क्यों वह उस पर विश्वास कर बैठी? विश्वास भी किया तो क्यों वह इस हद तक पहुंच गयी? यहां तक कि उसने उसको अपना सब-कुछ सौप दिया- अपना प्यार-मन-मस्तिष्क, तन, मन, कौमार्य और अपनी सारी जिन्दगी वह इस युवक पर लगा गयी- इस कदर चाहने लगी कि उसने आगा-पीछा कुछ भी नहीं देखा? फिर ये सब होने के पश्चात क्यों उसका प्यार छला गया? क्यों उसके ही साथ ये सब हो गया? दीपक क्यों छिन गया? क्यों वह फरेबी निकला? क्यों उसने उसके साथ प्यार का इतना विषभरा नाटक खेला? अब ऐसी स्थिति में वह क्या करे और क्या नहीं? वह कहाँ जाये और कहाँ नहीं? सोचते-सोचते किरण फूट-फूटकर रो पड़ी- रो पड़ी तो दीपक भी उसे देखकर तड़प गया। किरण रोती रही। दीपक उसे रोता हुआ देखता ही रहा। बुत समान। सारी घाटी उसकी वेदना से वाकिफ थी। चीड़ बहुत खामोशी से उसका रुदन सुन रहे थे। आते-जाते प्रत्येक बादल का टुकड़ा भी जैसे उसकी सिसकियाँ सुनकर थम जाता था- क्षणभर के लिए। पहाड़ी जवान अभी तक उन दोनों के खयालों से बेखबर कहीं अपने में ही खो-सा गया था। उसे क्या ज्ञात था कि जिस प्यार के जोड़े को वह एक साथ अपने खच्चरों पर बैठाकर लाया था, वही अब अलग हो चुका है। प्यार के इस बन्धन का नाता शायद सदा के लिए अब दूर भी हो चुका था !

शाम डूबने लगी और जब दिन ढले दूर क्षितिज में सूर्य की अन्तिम किरण अपना दम तोडने लगी, तो इसके साथ ही किरण भी उदास हो गयी। दीपक को वह चाहकर भी नहीं देख पा रही थी। वह स्वयं भी उदास था। हालात ही ऐसे थे कि दोनों में से कोई भी पहल नहीं कर पा रहा था, जबकि दोनों ही एक-दूसरे के दुख ओर दर्द से पूर्णत: भिज्ञ थे। किरण का तो दिल ही टूट गया था- बुरी तरह- इस कदर कि इस टूटे हुए दिल की आवाज को शायद कोई भी नहीं सुन सकता था- खुद दीपक भी- पहाडी जवान बार-बार उन दोनों को निहारता। कुछेक पल देखता, परन्तु उनकी गम्भीरता और खामोशी देखकर जैसे क्षुब्ध हो जाता था- चुपचाप ही।

दिन समाप्त हुआ जा रहा था और इन दोनों प्रेमियों को लौटने की परवाह भी नहीं थी। दोनों ही जैसे बेसुध थे, गुमसुम, अपने ही खयालों में जैसे भटक गये थे। पहाडी जवान से जब अधिक धैर्य हो नहीं सका तो वह दीपक के पास आ गया- धीरे से- बड़े अदब और शांत स्वर में उसने कहा,
"बाबू शाब ! "
"... ?" खामोशी रही.
दीपक ने चुपचाप उसे निहारा तो वह आगे बोला,

"चलेंगे नहीं अब? रात हो जायेगी तो बड़ा मुश्किल हो जायेगा? "
"हां, चलना तो है ।" कहकर दीपक उठ गया। चुपचाप। बहुत आहिस्ता से किरण के करीब आया। एक अपराधी की भाँति वह उससे बोला,
"किरण ! चलोगी नहीं?"
इस पर किरण बिना कुछ कहे उठ बैठी। खच्चर पर बैठी और उसके पश्चात् दूसरे खच्चर पर दीपक भी बैठ गया। पहाडी जवान ने दोनों खच्चरों की लगामें पकड लीं और फिर इसके पश्चात वही घंटियों की टुन . . .टुन. . . टुन, सारे वातावरण में मानो किरण के दिल का उफनता हुआ दर्द बनकर सिसकनें लगी।

किरण चुप थी- चुप ही नहीं बेहद उदास भी। चेहरे की सारी रौनक, सारी मुस्कान क्षण भर में ही न जाने कौन-सी घाटी में जाकर खो गयी थी। दिल की सारी उमंगें, सारा उल्लास पता नहीं किस पर्वत के पीछे जाकर समाप्त हो चुका था। किरण की इस उदासी के पीछे जैसे सारा वातावरण ही उदास था। चीड़ भी खामोश हो गये थे। पर्वत भी अन्धकार के कारण काले पड गये थे और सारी पहाड़ी प्रकृति मानो गम के काले और विषादभरे आँसू बहाने लगी थी। हवाओं में जैसे सिसकियां भर आईं थीं। किरण के रुदन के सहारे ही वह सारा इलाका भी मानो रो रहा था. खच्चर चले जा रहे थे। दीपक चुप था और खच्चरों के गलों में बँधी हुई घंटियों की आवाजें सारे माहौल में किरण के दर्द का हमकदम बनकर साथ दे रही थीं- टुन… टुन. …टुन… टुन।

फिर इन्हीं घंटियों की दर्दभरी वेदना में किरण को अचानक ही प्लूटो की याद आ गयी। एक लम्बे अरसे के पश्चात, उसे आज प्लूटो फिर याद आ गया था। ऐसे में उसे याद आया कि ऐसा ही कोई समय था जबकि वह प्लूटो के साथ थी। भरतपुर में। एक बैलगाड़ी में बैठी हुई वह रामलीला का मेला देखने जा रही थी। तब भी घंटियों की यही आवाज थी। बैलों के गलों में बँधी हुई घंटियों के कारण- यही शोर था। ऐसी ही कोई डूबती हुई शाम थी जबकि वह प्लूटो के साथ बैलगाड़ी में बैठी चली जा रही थी- मेले में। एक अल्हड़ लड़की के समान सारी दुनियावी चिन्ताओं से बेखबर। तब वह कितना खुश थी। खुश भी क्यों नहीं होती? प्लूटो उसके साथ था, गाड़ीवान बना हुआ। उसका पथप्रदर्शक समान। उन लोगों के साथ ही और भी अन्य लोग तब मेले में जा रहे थे। गाँव के सभी लोग- स्त्री, बूढे, बच्चे, जवान, युवक और युवतियाँ सभी जा रहे थे। अधिकांशत: पैदल ही थे। कुछेक साइकिलों और अन्य सवारियों पर भी थे। तब किरण बार-बार प्लूटो को छेड़ देती थी। प्लूटो ने अपने ग्रामीण मित्र से उसकी बैलगाडी कुछ देर के लिए माँग ली थीं, ताकि वह केवल किरण के साथ बैठकर इस समय का आनन्द उठा सके। इसी कारण किरण बार-बार उसको टोक देती थी- 'रिमार्क' कस देती थी, जैसे की, 'कैसे गाड़ीवान हो?', 'क्या नये आये हो? ', "बैलों से क्या याराना हो गया?' आदि और प्लूटो उसकी इन बातों को सुनकर केवल मुस्कुरा भर देता था-कनखियों से देखता हुआ।

… मार्ग लम्बा था। मेला दूर पड़ता था और प्लूटो किरण की बातों में मुरकुराता हुआ चला जा रहा था। बैलों को कभी-कभार वह हाँक भी लगा देता था, ग्रामीणों की भाषा में। इस पर किरण खिल-खिलाकर हँस देती थी- अपने मोतियों जैसे दाँत चमका देती थी।

अचानक ही प्लूटो ने बैलों को ऐड़ लगायी। दो-तीन चाबुक लगा दिये तो बैलों की गति भी तीव्र हो गयी। गाड़ी धूल-भरे, कच्चे, ऊबड़-खाबड़ मार्ग पर भी भागने लगी। खेतों के बीच में ये मार्ग बना हुआ था। इसलिए खेतों के मध्य लगाया गया सिंचाई का पानी कहीं-कहीं सड़क पर भी आ गया था, जिससे मार्ग में कहीं-कहीं स्थानों पर गड्ढ़े हो गये थे, परन्तु प्लूटो को इन सबकी कहां परवाह थी। वह तो अतिशीघ्र जैसे मेले में पहुँच जाना चाहता था। इसी कारण वह बैलों को अभी भी दौड़ा रहा था। गाडी गति में आ गयी थी। किरण भी गाड़ी में उछल-उछल-सी जाती थी। बैलों के गलों में बँधी हुई घंटियों की आवाजें भी तेज हो गयी थीं। प्लूटो की गाड़ी को भागता देख, उसके आगे-पीछे अन्य गाड़ीवानों ने भी अपनी-अपनी गाड़ियां गति में तीव्र कर दी थीं- और गाड़ियां भागी जा रही थीं- द्रुतगति से। बेसब्री के साथ। इस प्रकार कि जैसे किसी प्रतियोगिता की दौड़ हो रही हो? इसी उत्साह में प्लूटो आगे, सब से आगे निकलना जा रहा था। इतने सुनहरे और अनूठे वातावरण में किरण के पास जैसे सारी दुनिया का सुख आ गया था। उसके कदमों में जीवन-भर की खुशियां अपनी मुस्कानें बिखेर रही हों- ऐसा ही वह सोच रही थी- दिल-ही-दिल में। फिर सोचती भी क्यों नहीं? सब कुछ तो उसके पास था। उसके बिलकुल करीब- उसका साजन-दिली प्यार- प्यार की सारी हसरतें उसके कदमों में थीं। प्लूटो उसका अपना था। उसका अपना हमदम, हमसफर बना हुआ। उसकी जीवन-नैया का माँझी। ऐसे में सुहाना वातावरण। उल्लास भरा माहोल। ढेरों-ढेर खुशियाँ … और उसे क्या चाहिए था?

... दिल के इन्हीं सोच-विचारों में किरण ने एक बार प्लूटो को निहारा- चुपचाप- अकेले-अकेले ही- कनखियों से देखा- सोचा, कितना अच्छा है उसका प्लूटो। किस कदर प्यारा- प्यार भरा ! उसका चुनाव कितना सुन्दर है। किस कदर अनुपम? कल को यही प्लूटो उसका जीवन-साथी भी बनेगा। कितनी मुद्दतों से उसने प्लूटो को पाया है। भाग्य से उसे श्रेष्ठ साथी मिल गया है। शायद ये उसके किसी पूर्व जन्म का ही प्रतिफल है जो उसको हर तौर से एक सुयोग्य साथी मिल गया है- उसका प्यार कितना अच्छा है। किस कदर भला- जो केवल उसका ही है- केवल उसी अकेली ही का। किसी अन्य का प्लूटो पर कतई भी अधिकार नहीं है- हो भी नहीं सकता है। कभी भी नहीं। वह तो उसी का है- उसी का ही होकर रहेगा भी। आज़, कल और आनेवाले कल के हरेक पलों में भी वह उसी का ही बनकर रहेगा भी।

गाड़ी चली जा रही थी- बैल भागे जा रहे थे। साथ ही अन्य गाडियां भी दौड़ती चली जा रही थीं। मेले में जानेवालों की भीड़ भी बढ़ती ही जा रही थी। मेला काफी नजदीक आ गया था। दूर से ही उसकी विद्युत बत्तियां मुस्कुराती हुई-सी दिखने लगी थीं, परन्तु इन सबसे बेखबर किरण अपने ही ख्यालों में गुम हो गयी थी। प्यार की मीठी-मीठी कल्पनाओं की मधुर स्मृतियों में वह सोचते-सोचते न जाने कहाँ चली आयी थी? इस कदर बेखबर थी कि उसे इस समय अपने ख्यालों और अपनी ही बातों के अतिरिक्त किसी अन्य की परवाह भी नहीं थी। मन-ही-मन वह सोचती थी और भविष्य में पानेवाली खुशियों की पूर्व कल्पना करते ही वह प्रफुल्लित भी हो जाती थी। ऐसी थी उसकी कल्पना- कल्पनाओं में बसा हुआ उसका प्यार- प्यार की सारी हसरतें- आरजूएँ और दिल की वह ढेर सारी तमन्नाएँ जिनकी आस पर वह जी रही थी।

किरण अभी तक इन्हीं विचारों में लीन थी। बैल चले जा रहे थे। गाड़ी की गति कुछ धीमी भी पड़ गयी थी। प्लूटो स्वयं भी खामोश था, परन्तु बैलों के गलों में बँधी हुई घंटियों तथा घुंघुरुओं का शोर सारे वातावरण को झंकृत किये हुए था। घंटियाँ बज रही थीं. . . टुन . . .टुन. . . टुन . . .टुन . . .

यकायक घंटियों का स्वर अचानक-से झनझनाहट में परिवर्तित हो गया- इस प्रकार कि गाड़ी एक ओर को धक्का खाकर पलट-सी गयी… किरण की जैसे ही तन्द्रा टूटी, तो वह अचानक ही चीख मारकर भयभीत हो गयी- प्लूटो ने तथा मेले में जानेवाले अन्य लोगों ने इस दुर्घटना को देखा तो सब-के-सब गाड़ी के पास आ गये। गाड़ी के बाँयें ओर के पहिये का धुरा टूट गया था, जिसके कारण पहिया निकलकर कुछ टेढ़ा पड़ गया था और गाड़ी का झुकाव एक और को हो गया था.. और इसी दुर्घटना की स्मृति के माध्यम से किरण का दु:खी मन अपने आप ही वास्तविक स्थिति में आ गया। "चायना पीक' की चोटी काफी ऊपर रह गयी थी। खच्चर नीचे उतर आये थे। नैनीताल की झील दूर से ही जैसे उनके स्वागत में अपना दामन फैलाये मानो प्रतीक्षा कर रही थी परन्तु किरण को अब ये झील भी अपने ही समान उदासियों का समुद्र प्रतीत हो रही थी। दीपक चुप था। चुप ही नहीं अत्यन्त गम्भीर भी हो गया था। एक अपराधी की भाँति वह किरण से नजरें भी नहीं मिला पा रहा था।

चलते-चलते किरण का मन फिर दु:खी हो गया- दु:खी हो गया इस कारण कि प्लूटो के साथ हुई घटना और इस आज की घटना में कितनी अधिक समानता थी। उस दिन जब वह प्लूटो के साथ थी, तब भी घंटियों का स्वर था और आज़ जब वह दीपक के साथ है, तब भी घंटियों का स्वर उसका दर्द बनकर सारे वातावरण का मन दुखी कर रहा है। प्लूटो के साथ उसका प्यार अचानक ही ठोकर खा गया था। गाड़ी गिर पड़ी थी। एक अपशकुन-सा हो गया था और आज़ भी खच्चर को ठोकर लगी थी, जिसका परिणाम भी उसको प्राप्त हो गया है। प्लूटो के साथ बैलगाड़ी में हुई दुर्घटना के पश्चात वह उससे सदा को दूर हो गयी थी और आज के बाद भी वह दीपक का साथ कभी भी नहीं पा सकेगी। चाहकर भी वह दीपक को अपना नहीं कह सकेगी। ये कैसी विडम्बना है? उसके साथ विधि का न जाने कौन-सा न्याय है कि जिसके कारण उसको ये सब प्राप्त हुआ है। कभी उसने सोचा भी नहीं था कि कभी ऐसा वक्त भी देखना पड़ेगा। आज एक लम्बे अरसे के पश्चात उसको प्लूटो फिर याद आ गया था, परन्तु प्लूटो से अधिक उसे दीपक ने परेशान कर दिया था। दीपक पर कभी-कभी उसे क्रोध भी आ जाता था, मगर इस क्रोध से कहीं अधिक उसको अपने से ही ग्लानि हो रही थी। स्वयं को ही वह बुरा-भला कहती थी। अपने आप को ही दोष दे रही थी। कोसती थी। सोचती थी कि उसे ऐसा क्या हो गया था कि वह दीपक के चक्कर में पड़ गयी। ऐसा उसने इस पुरुष में क्या देख लिया था कि जो वह इस पर हर तरीके से मर-मिटी थी। इतना अधिक कि बिना आगा-पीछा सोचे वह अपना सब कुछ लुटा गयी- सब कुछ दाँव पर लगाकर एक ही बार में सब हार भी गयी।

किरण इसी प्रकार सोचती थी और रोती थी- बार-बार उसकी पलकों में आँसू भर आते थे। आँखें सोचने ही मात्र से छलक भर जाती थीं। दिल में सैकड़ों दर्द हो उठते थे। कलेजा जैसे कहीं भीतर-ही-भीतर फट जाता था। गला भर-भर आता था। बाँहें बार-बार अपने बिछुड़े हुए प्यार के गले का हार बनने के लिए तरस कर ही रह जाती थीं ।

- क्रमश: