अपना अपना सच Anshu द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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अपना अपना सच

अपना-अपना सच

*अंशु

"अनामिका, अगर चाचाजी या चाचीजी को पता चल गया तो।"

रागिनी की इस बात का कोई उत्तर नहीं था अनामिका के पास। वह उत्तर दे तो भी क्या दे। उसकी लंबी सांसों में जवाब कहां थे, बस सवाल छुपे हुए थे। वो सवाल जो उसका मन अपने आप से पूछे जा रहा था। पता नहीं पापा क्या कहेंगे। पता नहीं माँ क्या सोचेगी। इन प्रश्नों से अधिक विकट प्रश्न यह था कि वह जो करने जा रही थी इसके परिणाम क्या होंगे। अपना पक्ष रखना सरल तो होता है परंतु वह न्यायसंगत है अथवा स्वार्थपूर्ण, तार्किक है या दुर्बुद्धिपूर्ण- इसका निर्णय तो भविष्य की गर्त में छुपे उसके वांछित अथवा अनवांछित परिणाम ही तय करते हैं। परंतु मन भला उन परिणामों को स्वीकार भी कहां कर पाता है। अपनी भूल स्वीकारना सरल भी तो नहीं होता। और कौन तय करता है कि यह भूल थी भी या नहीं। लोग- अपने या पराये... या अपना मन। मन भी तो छल कर जाता है। जो मन किसी काम करने के लिए लगातार उसे उकसाता है, उसे सही ठहराता है, वो अचानक ही किसी अपने के प्रतिकूल विचार सुनकर उसे गलत ठहराने लगता है। मन जैसा छलिया-और कौन है भला।

परिस्थितियां तब अधिक प्रतिकूल हो जाती हैं जब आप जानते हैं कि आप जो कर रहे हैं वो गलत नहीं है। भूल भी नहीं है तब तक- जब तक कि वह किसी और के सामने, आपके आपनों के समक्ष प्रकट न हो जाए। आपको पता हो कि अगर प्रकटन हो गया तो किसी अपने के मन को ठेस लगेगी। अनामिका जो कर रही तो वह उसकी नजरों में शायद गलत नहीं था। हाँ, इसका प्रकटन भयावह हो सकता था। नहीं.... नहीं.....इस अध्याय को वह आज ही समाप्त कर देगी। जो वर्त्तमान में घटित हो रहा है उसकी परछाई वह भविष्य पर नहीं पड़ने देगी। जो कुछ भी हो रहा है वह किसी के सामने नहीं आने देगी। माँ और पापा के सामने तो बिल्कुल ही नहीं।

 "कभी भी मत बताना माँ या पापा को। पता नहीं मैं जो करने जा रही हूँ वह सही है भी या नहीं।" अनामिका की बातों से विस्मय दिखाई दे रहा था, भविष्य को लेकर संशय भी।

 अनेक विचारों और भविष्य की होनी-अनहोनियों से उद्विग्न होकर अनामिका ने अंदर प्रवेश किया। दरवाजे खोलने वाले को अनामिका ने अपना परिचय दिया- " मैं अनामिका। ....मुझे आज ग्यारह बजे आने को कहा गया था। "

 "हाँ। आइए ...अंदर आइए। मैनेजर साहब को बता देता हूँ कि आप आ गयीं। वो रिकार्ड देख रहे हैं। आपसे शीघ्र मिलेंगे।"

अनामिका गेस्टरूम में रागिनी के साथ बैठकर इंतजार करने लगी। बैठे हुए वो लगातार पैरों का हिलाना, वो अंगुलियों का आपस में रगड़ना, वो बार बार दातों से ओंठों को दबाना, वो चेहरे की सिकन, वो आंखों की बेचैनी, ये सब उसकी मन:स्थिति को बयां किए जा रहे थे। क्या उसका कार्य सफल हो पाएगा। अचनाक ही उसे भविष्य के बदले वर्त्तमान की चिंता सताने लगी। वर्त्तमान का असमंजस और भविष्य की असुरक्षा का एक साथ बोध- यह एक कठिन समायोजन था। मन का संयम आसान नहीं है। बुद्धि मन से श्रेष्ठ अवश्य है परंतु शक्तिशाली नहीं है। शक्तिशाली तो मन ही है। मन बुद्धि को कब हर लेता है पता भी नहीं चलता। 

लेकिन विकटयोग तब होता है जब बुद्धि पर मन के साथ-साथ चिंता और आशंकाओं का भी अधिकार हो जाता है। ललाट की मांसपेशियाँ सिकुड़ जाती हैं। मस्तक पर भाग्य की रेखाएँ नजर आयें या न आयें, चिंता की लकीरें साफ-साफ दिखने लगती हैं। माथे का पसीना उन लकीरों को मिटाने का भरसक प्रयास करता है लेकिन पसीने की उन बूंदों का प्रवाह उन सिकुड़ी हुई मोटी लकीरों के बीच में पनाह मांगने लगता है। उनकी उन लकीरों से आत्मीयता हो जाती है। और उस आत्मीयता के भाव में वो बूँदें इतनी तल्लीन हो जाती हैं कि अपना मूल भाव खोकर उस चिंता की लकीरों के भाव को ही आत्मसात कर लेती हैं।

और समय। समय भी बड़ी विचित्र रचना है विधाता की। पांव नहीं हैं उसके, लेकिन गति है और वह भी मनमानी। जब रोकना चाहो तो कब गुजर जाता है पता भी नहीं चलता। जब काटना चाहो तो जैसे घड़ी की सुईयां अटक जाती हैं। ऐसा लगता है जैसे आगे बढ़ने के लिए किसी की बाट जोह रही हों- अनुमति मांग रही हों। ऐसा लगा जैसे इंतजार करते हुए घंटा भर बीत गया हो। घड़ी की तरफ देखा तो ग्यारह बजकर बीस मिनट हो रहे थे। अनामिका ने बैग से अपनी बोतल निकाली। पानी का एक घूँट लिया। फिर घड़ी की ओर देखा। अभी भी ग्यारह बजकर बीस मिनट ही हो रहे थे। तभी एक लड़के पर उसकी नजर पड़ी। देखने पर लग रहा था कि शायद वहीं काम करता हो। अनामिका ने उससे पूछा- मैनेजर साहब आ गए हैं न।

"जी वह तो नौ बजे ही आ जाते हैं। कुछ काम कर रहे हैं अपने कमरे में। आप उनसे मिलने के लिए इंतजार कर रही हैं क्या...."

अनामिका ने हामी में अपनी सिर हिलाया। फिर से एक नजर घड़ी पर डाली। अभी भी ग्यारह बजकर बाइस मिनट ही हुए थे। घड़ी कहीं बिगड़ तो नहीं गयी है। दो मिनट में इतने काम कर लिए क्या। पानी भी पी लिया। किसी से बात भी कर ली। इस घड़ी को परीक्षा के केंद्र पर लगा देना चाहिए। या वहीं लगी घड़ी से बदल देनी चाहिए। वहां वाली बड़ी तेज चलती है। ये सारी घड़ियाँ एक जैसी क्यों नहीं चलती। एक घंटे में साठ मिनट। एक मिनट में साठ सेकंड। लेकिन यह सेकंड वाली सुई- सारी गड़बड़ यही सुई करती है। हर्ष, परीक्षा और नींद वाली सुई तो बहुत तेजी से चलती है विषाद और इंतजार वाली सुई जो आलसी होती है- आगे बढ़ने का नाम ही नहीं लेती।

यकायक अनामिका की नजर रागिनी पर पड़ी - जो लगातार अपनी नजरें मोबाइल पर ही गड़ाए हुई थी। उस कमरे की खामोशी को रह रह कर रागिनी का मैसेज टोन ही तोड़े जा रहा था।

"एक बार पता करें क्या मैनेजर से।"

"यार दस मिनट ही तो हुए हैं। क्यों बेचैन हुए जा रही है। थोड़ा सब्र रख न।"

"दस मिनट नहीं आधा घंटा होने को आ गया है। तुझे इस डब्बे से फुर्सत मिलेगी तब न। पता नहीं क्या करती रहती है इस डब्बे से साथ। "

अनामिका कहना तो चाहती थी एक घंटा या शायद डेढ़ घंटा। कह भी देती अगर उसने घड़ी पर पहले नजर न डाली होती। अनामिका की बातों का रागिनी ने कोई जवाब नहीं दिया। शायद अनामिका की बेचैनी ने रागिनी को अचानक यह अहसास दिला दिया था कि इस समय उसकी सबसे अच्छी सखी को उसकी आवश्यकता है। उसने मोबाइल को बंद किया और अनामिका के हाथों पर अपना हाथ रखकर उससे अहसास दिलाया कि वह उसके साथ है।

अहसास की चुप्पी शब्दों से ज्यादा ताकतवर होती है। उसे अपनेपन का अहसास दिलाने के लिए अल्फाजों की आवश्यकता नहीं होती।

"मुझे एक अजीब सा भय सता रहा है रागिनी। कैसे नजरें मिलाउँगी मैं मम्मी-पापा से। भइया गर्मी की छुट्टियों में आना वाला है। उसके लिए तो फिर भी कुछ समय मिल जाएगा। शायद उसे पता भी न चले। ...... मैं कुछ हासिल करने आयी थी। लेकिन ऐसा लग रहा है जैसे बहुत कुछ छूटा जा रहा हो।"

 "तू यूँ ही घबरा रही है। मत बताना किसी को आज के बारे में...और तेरा इरादा कोई गलत भी तो नहीं है। .... हौसला रख और सच्चाई का सामना कर।"

 "फिर भी रागिनी, बहुता घबराहट हो रही है। मैं ............"

"घर चलें..." अनामिका अपनी बात पूरी भी न कर पायी थी कि इन शब्दों ने उसके होश उड़ा दिए। वह हतप्रभ सा दरवाजे की तरफ ताकने लगी।

 "घर चलें। मैं कार में तुम्हारा इंतजार कर रहा हूँ। जब भी चलने को तैयार हो तो आ जाना।"

अनामिका को अचानक ऐसा लगा जैसे उसके उपर वज्रपात हो गया हो। वह तो चाहती था कि प्रयोजन पूरा होने के पश्चात भी कभी भी उसके घरवालों को कुछ भी पता ना चले। किसी को भी पता नहीं था कि वह यहां आई है। लेकिन यहां तो कार्य पूरा होने से पहले ही उसके पिता आ गए थे। उनके शब्दों और भावों से स्पष्ट था कि उन्हें अनामिका के यहां पर होने का प्रयोजन या तो पता चल चुका है या फिर उन्हें अनुमान हो चुका है। 

"वही हुआ न रागिनी जिसका डर था। .................. लेकिन पापा........... पापा को कैसे पता चला कि हम यहाँ हैं।"

"पता नहीं यार। मेरी भी यह समझ में नहीं आ रहा है। डर के मारे तो मेरे हाथ पैर फूल रहे हैं। एक काम करते हैं- आज रहने देते हैं तेरा यह काम। किसी और दिन सोचेंगे। मेरी मान - तो तू इस समय घर जा।"

"घर जा मतलब... तू भी चलेगी न साथ।"

रागिनी चाह कर भी इनकार न कर सकी। कर देती अगर वो सिर्फ अनामिका की सखी होती। लेकिन वह उसकी चचेरी बहन भी तो थी। चाचाजी के सवालों के जवाब तो उसे भी देने होंगे।

"देख अनामिका। यहाँ आने की बात या तो तूझे पता थी या मुझे। मैंने तो बताया नहीं और तेरे बताने का तो... सवाल ही नहीं उठता। ... मुझे ऐसा लगता है कि या तो चाचाजी इधर संयोग से आ गए होंगे और उन्होंने हमें देख लिया होगा। या किसी जानकार ने हमें देख लिया हो और उन्हें बताया हो।"

"मतलब ...।"

"मतलब ये कि मुझे लगता है कि उन्हें बस ये पता होगा कि हम यहां हैं। ....क्यों यहाँ हैं यह नहीं पता। ....कुछ बहाना कर देते हैं।"

"तुझे क्या लगता है... पापा बेवकूफ हैं।"

"एक चांस तो ले ही सकते हैं न अनामिका... देख अगर उन्हें हमारे यहां होने की वजह नहीं पता, तो शायद हम बच जायें। "

अनामिका रागिनी से सहमत नहीं थी। उसकी आंखों से आंसू छलक आए। क्या कहेगी अपने पिता को। वह तो बहाने भी नहीं बना सकती। उसकी यह गलती कहीं उसके माता-पिता को कहीं सदा के लिए दूर न कर दे। रागिनी अनामिका के आंसू पोंछना चाहती थी लेकिन अनामिका को हौसला देने के लिए रागिनी के पास  शब्द नहीं थे। रागिनी की आंखें भी नम हों आयीं। लेकिन अभी भी वह अवसर तलाश रही थी। वह कोशिश करना चाहती थी इस उम्मीद में की अभी भी सब कुछ नहीं बिगड़ा है। गाड़ी में बैठने पर उसने दोनों की ओर से सफाई देनी चाही - "चाचाजी... वो... हम दोनों बस...........।"

नीरज ने उसे बीच में ही टोकते हुए गंभीरता से कहा- "मैंने पूछा क्या ....कुछ भी ...तुम दोनों से।"

एक सन्नाटा छा गया। अनामिका और रागिनी दोनों को अहसास हो गया कि नीरज का वहां आना संयोगमात्र नहीं था। नीरज को सब पता चल चुका था। और अगर नहीं तो अनुमान तो हो ही गया होगा। अनामिका और रागिनी दोनों में से किसी को यह साहस नहीं हो सका कि वह नीरज से आगे कुछ कह सके।

ऐसा नहीं था कि नीरज बहुत सख्त किस्म का इंसान था। नीरज तो काफी खुशमिजाज था। पहले भी तो अनामिका और रागिनी नीरज के साथ कई बार यात्रा कर चूके हैं। गाड़ी कहकहों से गूँज रहा करती थी। नीरज और अनामिका की मीठी तकरारें- वो बाप-बेटी का अनूठा प्यार ….रागिनी तो इसी का आनंद लेने के लिए अपने माता-पिता के बदले अपने चाचा की गाड़ी में बैठ जाया करती थी। इतना सन्नाटा का सामना उन लोगों ने पहली बार किया था। अनामिका की नजरें झुकी हुई थीं। उसे एक ग्लानि खाए जा रही थी। आंखें तो नम नीरज की भी थीं। वो कुछ और ही उधेड़बुन में था। इसी सन्नाटे और अपनी अपनी तन्हाईयों से लड़ते वो घर पहुंच गए। रागिनी का घर पड़ोस में ही थी। वो चुपचाप अपने घर चली गयी।

"अनामिका....।"

 पापा की आवाज में एक भारीपन और दर्द तो था। फिर भी उसे ऐसा लगा जैसे पापा उसे अभी सीने से लगा लेंगे और उसे पुचकारते हुए कहेंगे कि बेटी कोई बात नहीं, हो जाता है। सब ठीक है। वह एक उम्मीद से अपने पिता की तरफ मुड़ी।

"बेटा....जो कुछ भी आज हुआ वो अपनी माँ को मत बताना। वो टूट जाएगी।"

नीरज की इस बात से स्पष्ट हो चुका था कि नीरज को सबकुछ पता चल चुका है। अब किसी संदेहमात्र की गुंजाइश नहीं रह गयी थी। किसी बहाने की कोई जगह नहीं रह गयी थी। स्पष्टीकरण दे भी तो क्या दे- यह अनामिका की समझ में अभी भी नहीं आ रहा था। वक्त घावों को भरे न भरे,.... उनपर एक परत तो चढ़ा ही देता था जिससे वह समय के साथ दिखना बंद हो जाए। उस समय तक, जब तक कोई उसे कुरेदे नहीं। अनामिका भी अब समय के भरोसे ही थी। शायद समय आज ही सब कुछ ठीक कर दे। इसी विश्वास के साथ अनामिका अपने घर की ओर बढ़ चली। मां ने हमेशा की तरफ मुस्कुराकर दरवाजा खोला। अनामिका मां से लिपट गयी।

अनामिका की नजर घर के भीतर पड़ी। बैग पैक हो रखे थे। उसके हाथ-पांव फूलने लगे। क्या माँ को भी सब पता चल गया। कौन जा रहा है घर छोड़कर। आज उसकी वजह से घर टूटने के कगार पर आ गया है। ऐसे कितने सवाल और कितनी ही अंदेशे अनामिका को परेशान करने लगे। अनामिका की आंखें छलक आयी जिसकी नमी उसकी माँ ने भी महसूस की। मां ने अनामिका को प्यार से पुचकारते हुए कहा- " तुझे न जाने कैसे सब पता चल जाता है। तुझे कैसे पता कि मैं जा रही हूँ।"

"मतलब।"

"प्रत्युष का फोन आया था। दो दिनों से तबीयता खराब हो रखी है। उलटा सीधा खा लेता है और फिर सबको परेशान करता है। शाम के फ्लाइट की टिकट भेजी है मेरे लिए। तुरंत बुलाया है।"

नीरज  - "कभी कभी मुझे भी बता दिया करो... कुछ करने से पहले।"

अनामिका को ऐसा लगा कि इशारा उसकी तरफ है।

"अरे, दस मिनट पहले ही तो बात हुई है। कब बताती। और बेटा सिर्फ मेरा नहीं है तुम्हारा भी है। समय कम था तो सोचा कि तुमलोगों के खाने का इंतजाम कर दूँ। रात का खाना पंकज के घर पर है। वैसे धरा बहुत अच्छी है। लगता ही नहीं कि देवरानी है, जैसे अपनी बहन हो। धरा कह रही थी कि जब तक मैं प्रत्युष के पास रहूँ, तुम लोग के लिए खाना वही बना कर रख दिया करोगी। वैसे तुम लोग जानो।"

"दस मिनट में बैग भी पैक हो गए और पंकज -  धरा को बता भी दिया ।... मेरा नंबर कब आने वाला था वैसे।"

"अरे धरा यहीं थी जब प्रत्युष का फोन आया था। सोच रही थी कि उसके जाने के बाद बता दूँगी। लेकिन उधर वो गयी और इधर आपने दरवाजे की घंटी बजायी। वैसे मैं तुम्हें इतना स्पष्टीकरण क्यों दे रही हूँ ...। और आप आज अचानक इस समय घर कैसे आ गए। और अनामिका तू तो शापिंग के लिए गयी थी। इतनी जल्दी कैसे आ गयी।"

"अनामिका के सर में दर्द होने लगा। मैं आसपास था तो उसे लेकर आ गया।" – अनामिका थोड़ी अचंभित थी कि पापा उसकी साइड ले रहे हैं। और सही भी है। पाप ठीक कहते हैं । माँ को पता न चले यही उचित होगा। बहुत बुरा लगेगा उसे।

"अच्छा तो मतलब मैं बेटे के पास जाउँ तो आपकी इजाजत लेनी चाहिए थी और बेटी को दर्द था तो मुझे बताया भी नहीं।"

नीरज चुप था ...यह समझने के बावजूद कि एक मजाक का माहौल चल रहा था। वैसे तर्क तो बिल्कुल सही था नमिता का। सामान्य दिनचर्या में ....सही और गलत की सीधी सी परिभाषा होती है। मैं जो कर रहा हूँ वो सही और जो दूसरे कर रहे हैं और स्वीकार्य नहीं है वो गलता। कभी हम दूसरे के नजरिए से किसी चीज को देखने की कोशिश ही नहीं करते।

"मैं भी चलूँ क्या माँ... भइया के पास।" अनामिका अब शायद अपनी दुनिया में लौट आयी थी। जहाँ प्यार था, तकरार था... और... शांति भी।

"नहीं, बिल्कुल नहीं। तू जाएगी तो तबीयत और भी बिगड़ जाएगी। दोनों भाई बहन कभी नूडल्स, कभी पास्ता, कभी चाट, कभी पकौड़े ........ यही चलता रहेगा। कोई चटपटी चीज बाकी रहेगी क्या। वैसे चिंता न कर। तबीयत इतनी खराब नहीं है। जानती तो है अपने भाई को। घर की याद आ रही होगी बस।"

"लेकिन तुम तो जा रही हो, मेरा ख्याल कौन रखेगा। पापा को तो ढंग से खाना बनाना भी नहीं आता।" अनामिका और नमिता की हंसी छूट गयी। लेकिन नीरज ने तो जैसे ये वार्तालाप सुना ही नहीं। एक उदासीनता झलक रही थी उसके मुख पर।

"क्या हुआ। मुंह क्यों लटकाए हो। आपको अलग से समझाना होगा क्या। .....बेटा ठीक है।"

"हुम्म।.......... कुछ पैसे ले जाना साथ।"

"पैसे... मेरा बेटे की सैलरी आपसे ज्यादा है। टिकट भी बिजनेस क्लास की भेजी है।"

"लेकिन बाप मैं हूँ।... वो नहीं।... पैसे लेती जाना.... कुछ उसे भी दे देना ।

नमिता चली गयी अपने बेटे की देखभाल के लिए। जल्दबाजी में देख ही नहीं पायी कि बाप-बेटी जिन्हें वो छोड़े जा रही थी... उनके मन में एक तूफान चल रहा था ।  

 ***

"जो मन में आएगा। वह करोगी क्या। अगर अक्ल नहीं हो तो चलाया भी मत करो।"- पंकज का चेहरा गुस्से से लाल हुआ जा रहा था।

रागिनी के पास कोई जवाब नहीं था। धरा अब तक सारी बातों से अनजान थी लेकिन कमरे में आते समय उसने पंकज का रागिनी को डाँटना सुन लिया था। उसने टोकते हुए कहा - "क्या हुआ इतना भड़क क्यों रहे हो।"

"कुछ नहीं। वो अनामिका के सर में थोड़ा दर्द था तो ये लोग पास वाले सरकारी अस्पताल में चले गए डर के। लेकिन फोन किया था मुझे। मैं जल्दी... पहुंच गया वहाँ।"- नीरज ने स्थिति संभालने का प्रयास किया। नीरज की नजरों ने पंकज को भी बता दिया था कि इस मामले पर उसे अभी चुप रहना है।

"ओह.. कैसी है अनामिका तू अब।"

"जी ठीक हूँ चाची। शायद थोड़ा धूप के कारण दर्द था।" अनामिका आदि नहीं थी अपने सगे-संबंधियों से झूठ बोलने को। इसलिए उसे थोड़ा बुरा लगा कि ... वह झूठ बोल रही है लेकिन कोई और चारा भी नहीं था। अगर वह सच कहती तो बाकी सारे लोग झूठे सिद्ध हो जाते वहाँ पर। इसलिए इस झूठ पर अनामिका को पछतावा नहीं था।

"अच्छा।.. ठीक है। अनामिका,रागिनी.... चलो खाना खा लो।"

अनामिका, रागिनी और धरा के कमरे से चले जाने के बाद पंकज ने अपनी चिंता साफ साफ जाहिर करते हुए कहा-"भइया....। ये काफी गंभीर विषय है। इससे निपटना भी होगा और कोई रास्ता निकालना भी होगा। जो हुआ वह सब नहीं होना चाहिए था। दोनों बच्चियों ने गलत किया है।"

"क्या नहीं होना चाहिए था पंकज।... कभी न कभी तो यह होना ही था। गलत कदाचित हमारे परिप्रेक्ष्य से हुआ होगा। लेकिन अनामिका को अधिकार है न... सच जानने का। वह तो यही जानने अनाथ आश्रम गयी थी न कि उसे जन्म देने वाले कौन हैं। इसमें गलत क्या था पंकज। हमने तो सालों पहले इस बात का अंदाजा लगा लिया था न कि एक न एक दिन ऐसा होगा। जब आज यह सब हमारे सामने है तो इसे स्वीकार करना चाहिए। और रागिनी उसकी बहन भी है और सबसे अच्छी सहली भी। मुझे तो नहीं लगता कि उसने अनामिका का साथ देकर कोई गलती की।............ तूने भी तो मेरा साथ दिया था न।"

"मतलब...। अब आप यही कहना चाह रहे हैं कि मैंने गलत किया आपका साथ देकर ।"

"नहीं तुझे गलत नहीं ठहरा रहा हूँ भाई। याद दिला रहा हूँ कि अपने साथ देते हैं। तूने मेरा साथ दिया था.... रागिनी ने अनामिका का दिया।... तेरी गलती का तो पता नहीं ... पर रागिनी ने कोई गलती नहीं की।"

"तो अब क्या सोचा है।"

"यही कि.... सच बता दूँ अनामिका को।"

"सब कुछ बता देंगे क्या..."

"पता नहीं। लेकिन इतना तो जरुर बताना चाहिए जितना जानना उसके लिए आवश्यक है।"

"और भाभी... उनको सच का पता चलेगा, तो।"

"कोशिश करूँगा कि न पता चले। और अगर पता चल गया तो जो होगा उसका सामना करूँगा ।"

"एक बार फिर से सोच लो भइया। एक सच दूसरी सच की परतें खोल देता है। और अगर सारे सच सामने आ गए तो फिर बहुत कुछ बदल जाएगा भइया। उस समय सब स्वीकार करना आसान नहीं होगा।"

"काफी सोच विचार कर ही कह रहा हूँ भाई। तू धीरज धर। जो भी होगा ठीक ही होगा।"

***

"तैयार हो जाओ। कहीं चलना है।"- अनाथाश्रम की घटना के दो दिन के बाद आज पहली बार पापा ने उससे कुछ कहा। पहले की बात होती तो पूछती कि कहाँ जाना है। बहस होती। लड़ती और फिर वो जाते तो जरूर लेकिन जगह वो नहीं जो पापा ने सोचा होता। वह जो अनामिका की पसंद होती। सच तो यह था कि नीरज कोई जगह सोचता ही नहीं था। वह तो तुक्के से कोई भी जगह बता देता ताकि अनामिका अपनी पसंद बताए। बेटी से बहस करने में उसे असीम आनंद आता। अनामिका की पसंद सबकी पसंद होती। पापा की, माँ की और भइया की। सबकी लाडली थी वो। पता था उसे कि वह मम्मी-पापा की एक गोद ली हुई बेटी है। लेकिन फिर भी थी वो लाडली बेटी अपने मम्मी पापा की। इकलौती बहन अपने भाई की। इतने सालों से सब कुछ तो ठीक चल रहा था। क्यों यह पागलपन आया-अपने जन्म देने वालों के बारे में जानने का।

पापा ने इतने दिनों के बाद कुछ कहा था। वो झटपट तैयार हो गयी। आज वो पापा से अपने सारे गिले दूर कर लेगी। माफी मांग लेगी उनसे। नहीं जानना कि उसे किसे पैदा किया। जन्म प्रमाण पत्र से लेकर सारे रिकार्ड पर उसके पापा का नाम नीरज है। उसकी माँ का नाम नमिता है। और ये सच्चाई कोई नहीं बदल सकता।

गाड़ी एक कालोनी में किसी घर के आगे रूकी।

"ये कहाँ आ गए हम पापा। मैं तो सोच रही थी कि हम कहीं बाहर खाना खाने जा रहे हैं। बहुत दिन हो गए कहीं गए हुए।"

नीरज एक पल के लिए मूर्तिवत हो गया। शायद उसे अनामिका को बता देना चाहिए था कि कहाँ जाना है। मन तो यही कह रहा था कि वहीं चले जहाँ अनामिका जाना चाहती थी। लेकिन साहस कई बार मुश्किल से आता है। आज आया था फिर न जाने कब आए। उसने कहा- "बेटा यह तुम्हारे मामा का घर है।"

"मामा का घर... कौन से मामा का घर। मामा तो मुंबई में रहते हैं। यहाँ तो हम कभी नहीं आए।"

"तुम्हारे मामा का घर बेटा। तुम्हारी माँ के भाई का घर।....... आओ तो....।"

उसने दरवाजे की घंटी बजाई। दरवाजा किसी उम्रदराज महिला ने खोला। इस महिला से नीरज और अनामिका अनजान थे और वह महिला इन दोनों से।

"मनीष जी हैं क्या घर पर।"

"हाँ................मनीष... ये आपको पूछ रहे हैं।"

मनीष ने उन दोनों को गौर से देखा लेकिन चेहरा जाना पहचाना नहीं लगा । अनामिका के लिए भी ये चेहरे अनजाने थे। कभी भी आज से पहले इनसे इनसे मुलाकात नहीं हुई।

मनीष ने अजनबियों को देखकर कहा- "जी आपलोग कौन... क्षमा कीजिए .....मैं पहचान नहीं पाया ।"

उत्तर नीरज ने दिया- "ये अनामिका है। आपकी भांजी।"

"जी..... मैं कुछ समझा नहीं।....... आपको शायद कोई गलतफहमी हुई है।.............मेरी कोई बहन या भांजी नहीं है... और इस लड़की को तो मैंने कभी पहले देखा ही नहीं ... मेरी भांजी कैसे हो गयी।"

"जी... बहन नहीं है... लेकिन कभी थी तो। और आपकी भांजी तो आपके सामने खड़ी है। आपकी बहन सुरेखा की बेटी।"

"सुरेखा की बेटी....." । मनीष आश्चर्यचकित होकर उन दोनों को देखने लगा। वह सालों बाद यह नाम सुन रहा था। कहीँ कोई ठग तो नहीं। लेकिन पहनावे से तो ठीक ही लग रहे थे। लेकिन यह बात तो सिर्फ चंद करीबी रिश्तेदार ही जानते हैं कि सुरेखा की कोई बेटी थी। और उम्र भी लगभग वही लग रही है। लेकिन फिर भी किसी भी अनहोनी के डर से वह उन दोनों को अंदर आने को नहीं कह पाया । मनीष के मन में संदेह के बादल कम नहीं हो पा रहे थे। अगर यह सुरेखा की बेटी है भी... तो इसे उसके बारे मैं कैसे पता चला। उसने अपनी शंका जाहिर की- "मैं कैसे मान लूँ कि यह सुरेखा की बेटी है।"

"सुरेखा कौन"- अनामिका ने यह नाम कभी नहीं सुना था।

"तुम्हारी माँ...... मेरा मतलब है जिसने तुम्हें जन्म दिया" नीरज के स्वर अनामिका के सामने भावुक थे लेकिन उसने उतनी ही सख्ती से मनीष की मनोस्थिति भांपते हुए उसे भी उत्तर दिया- "अनामिका यहाँ आपकी प्रापर्टी मांगने नहीं आयी है कि मैं कुछ साबित करूँ। वह बस यह जानना चाहती है कि उसके जन्मदाता कौन थे। और मैं उसका पिता समझता हूँ कि यह जानना उसका अधिकार है। और अगर फिर भी कुछ शंका हो तो गौर से इसके चेहरे को देखिए – रंग रूप सब सुरेखा पर गया है।............ यह तो बेचारी अपने जन्म देने वालों का नाम तक नहीं जानती। और दूसरी बात यह कि आपको मेरा नाम सुनकर शायद याद आ जाए।.............. मेरा नाम नीरज है।"

"नीरज....। तो आप नीरज हैं।... हाँ याद आया। सुरेखा जिक्र किया करती थी आपका।.... बड़ी मदद की थी आपने उसकी....... इसका मतलब ये सच में सुरेखा की बेटी है।... मेरी भांजी।" मनीष की आंखों में वात्स्ल्य उमड़ आया था। मनीष और उसकी पत्नी की आंखों में गंगा जमुना उमड़ आए। आंसुओं की अविरल धारा निकल पड़ी। अनामिका सब कुछ अचंभित होकर देखी जा रही थी। उसके मन में अभी तक कोई भावना पैदा नहीं हो रही थी उन लोगों के प्रति।

मनीष और उसकी पत्नी ने उन दोनों को अंदर बुला कर बिठाया। हाल चाल पूछा। कुछ पुरानी बातें हुई। उसके बाद मनीष की पत्नी कुछ पुराने एल्बम उठा लाई। जिसमें सुरेखा की तस्वीरें थीं। मनीष ने उनका परिचय कराया- ये तुम्हारी माँ है। ये तुम्हारे पापा हैं। अनामिका भावविह्वल थी। लेकिन कैसे कह दे फोटो में जो शख्स है वो उसके पापा हैं। उसके पापा तो सामने बैठे हैं। जिनकी गोद में वो झूली जिनकी अंगुलियाँ पकड़कर वो चली। जिसकी वो परी थी, वह तो उसके सामने बैठा है। उसकी ख्वाइशें उसकी जुबान पर बाद में आती थी पापा के दिल के पास पहले पहुँच जाती थीं। कैसे उसके सामने एक फोटो वाले को पापा कह दे। लेकिन एक बार फिर नीरज ने अपनी बेटी का मनोदशा भांप ली। "मैं तुम्हारा नीचे इंतजार करूँगा। टेक योर टाइम बेटा।"

"आप बैठिए तो नीरज जी....। बस नाम ही सुना था कभी मुलाकात ही नहीं हुई । इसलिए पहचान नहीं पाया। माफ कीजिएगा।"

"माफी की कोई आवश्यकता नहीं। मुझे कुछ फोन काल करने हैं....... तो सोचा नीचे जा कर करता हूँ। आपलोग आराम से अनामिका से बातें कीजिए।"

अनामिका जानती थी कि कोई जरूरी फोन काल नहीं करना है। अपनी बात झूठ न हो, इसके लिए पापा फोन कर देंगे- मां को, भइया को ,चाचा को या किसी और को। परंतु पापा सच भी तो नहीं कह रहे हैं। उनकी आंखों की नमी कुछ और कह रही है। कुछ तो चल रहा है पापा के मन में जो उसकी समझ में नहीं आ रहा। गुस्सा भी आया कि पापा उसे अकेले छोड़े जा रहे हैं अनजानों के बीच। लेकिन नीरज के मनोभाव को वह भली भांति समझती थी। पापा जा रहे हैं ताकि वो तसल्ली से अपनी मां-बाप की फोटो देख सके। उनके बारे में जान सके। अपने मामा-मामी से बातें कर सके। और पापा उसका इंतजार भी करेंगे क्योंकि पापा जानते हैं वह जरूर लौट कर आएगी।

अनामिका को अपने माँ-पापा के बारे में जानने की इच्छा पूरी हो गयी थी। मामा-मामी से ढेर सारी बातें हुई लेकिन हर पल अनामिका के मन में यह बात दस्तक देती रही कि पापा इंतजार कर रहे हैं नीचे। उसने जाने की इजाजत ली। उस घर से बाहर निकलते समय उसे ऐसा लगा जैसे वह किसी त्रिशंकु में फंस गयी है।

 ***

" मतलब आप सुरेखा जी को जानते थे पापा...."

"मां का नाम नहीं लेते.... । "

"पापा, शायद आप भूल रहे हैं। मेरी माँ का नाम नमिता है।"

नीरज ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। अनामिका की बात तो सही थी। यह तर्क अनुचित था भी नहीं। नीरज ने माहौल फिर से हल्का बनाने की कोशिश की।

"मां का नाम तो तुम अब भी ले रही हो । "

अनामिका के लिए चीजें अभी भी उलझी थीं। "पापा ...... आप बातों को घुमा रहे हैं। क्या आप दोनों एक दूसरे को जानते थे।

"हाँ..। "

"लेकिन मुझे जन्मलेते ही अनाथआश्रम में क्यों छोड़ दिया गया।"

"मैंने कहा था ऐसा करने के लिए... । "

"आपके कहने पर .... मगर क्यों पापा।"

"गलत मत समझो। परिस्थितयाँ थीं ही वैसी। उस समय हम सभी लोगों को ये सबसे आसान तरीका लगा था तुम्हें गोद लेने के लिए। सुरेखा का स्वास्थ्य काफी बिगड़ चुका था............ वह अपनी जीवन की अंतिम सांसे गिन रही थीं। तय नहीं पा रहा था कि नमिता तुम्हें स्वीकार करेगी या नहीं। तुम्हें अपने पास रखना चाहता था। तो सोचा कि अनाथ आश्रम में तुम्हें भेजकर वहीं से तुम्हें गोद ले लिया जाय। यही सही लगा उस समय। वैसे तुम ज्यादा समय नहीं थी अनाथ आश्रम में। बस कागजों के उपर थी।"

"अच्छा.... तभी जब मैं अनाथ आश्रम पहुँची.... तो आपको पता चल गया। जरूर उन लोगों ने आपको बताया होगा कि मैं वहाँ हूँ।"

"कह सकती हो... कुछ ऐसा ही।"

"मतलब आपने सब सेट कर रखा था सालों पहले।"

"सेट कर रखा था का क्या मतलब....। "

"क्या आप मेरे पापा हो................" अनामिका पूछते पूछते शर्म और ग्लानि से भर गयी। क्या पूछ रही है वह अपने पापा से। बचपन से जिसे पापा कहती आयी है उससे यह पूछ रही है कि क्या आप मेरे पापा हो। ये जिंदगी किस मोड़ पर ले आयी है अचानक उसे। उसने अपनी गलती सुधारने की कोशिश करते हुए कहा-

"नहीं... मेरा मतलब वह नहीं था....पापा। मतलब आप मेरे पापा हो और हमेशा रहेंगे। मैं ही शायद अच्छी बेटी नहीं बन पायी।"

"मैं समझ सकता हूँ तुम्हारा सवाल। मैं ही तुम्हारा पापा हूँ और रहूँगा। लेकिन मैं तुम्हारा बायोलॉजिकल पिता नहीं हूँ। तुम्हारी रगों में मेरा खून नहीं मेरा प्यार जरूर है............ डोसा नहीं खाना क्या।"

अनामिका ने बड़े अचरज के साथ देखा। कैसे कर लेते हैं पापा ये सब। उसके दिल में तो इतने बड़े तूफान चल रहे हैं। लेकिन पापा हैं जो इतने शांत। तूफान तो पापा के दिल में भी चल रहा होगा। लेकिन वो तूफान दिख क्यों नहीं रहा। कैसे दिख जाते हैं इतने शांत। इतने गंभीर वार्तालाप में कैसे कोई पूछ सकता है कि डोसा नहीं खाना क्या.....जैसे कुछ हुआ ही न हो। लेकिन उसे भी सब कुछ सामान्य करना ही होगा। उसने भी बात बदलते हुए कहा- "दिन में भइया से बात हुई थी। बिल्कुल ठीक हैं।"

"अच्छा..."

"हाँ.. लेकिन माँ अगले हफ्ते आएगी। भइया उसे तिरूपति ले जा रहे हैं कल। एक दो दिन की छुट्टी ली है। माँ को घुमाने के लिए। वैसे भइया आपसे बात करने को कह रहे थे लेकिन आप सो रहे थे। तो बात नहीं करायी। माँ भी ठीक है। आपको फोन किया था माँ ने लेकिन आपने उठाया नहीं।"

"हाँ मेरी बात हुई थी शाम में.....। लेकिन इतना विस्तार से मुझे नहीं बताया जितना डिटेल तुम्हारे पास है।"

***

रिश्ते भी बड़े अजीब होते हैं। छूट जाए तो याद भी नहीं रहते। मिल जाए तो बिसराए नहीं जाते। बचपन से जिन्हें कभी देखा नहीं था उन मामा मामी से उसकी बातें होनें लगी। मुलाकातें भी होने लगीं। अनामिका को पता चला कि उसके जन्म देने वाले पिता के परिवार में कोई नहीं बचा। दादा-दादी गुजर चुके हैं। नाना-नानी भी नहीं रहे। बस मामा-मामी ही हैं जिनसे उसके जन्मदाताओं का कोई नाता हो। मनीष को ऐसा लगा जैसे उसकी बहन वापस मिल गयी हो। लेकिन हर नजदीकियों की एक अपनी कीमत होती है। दिन के घंटे तो बराबर ही हैं। जब भी आप किसी को ज्यादा समय देने लेगें तो किसी और के समय में तो कटौती हो ही जाती है।

***

"आज मैडम के दर्शन हो गए इतने दिनों के बाद। आज हमारी याद कैसे आ गयी।" पता नहीं रागिनी की बातों में ताना था या मिलने की खुशी। फिर रागिनी को अनाथाश्रम के वाकये की याद आ गयी। उसने आगे कहा - "सब ठीक तो है न अनामिका। ...और चाचाजी कैसे हैं।"

 "पापा ठीक हैं। मैं मामाजी से मिली थी।"

 "मामाजी से ........... कौन से मामाजी से"

 अनामिकी ने रागिनी को वह सब बताया जो पिछले तीन दिनों में घटित हुआ था। "जानती हो रागिनी न जाने क्यों जब भी मामाजी से मिलती हूँ माँ के बारे में सुनते रहने को मन करता है। सच कहूँ तो ऐसा लगता है जैसे मेरी माँ बिल्कुल करीब है।"

"और पापा... । पापा का क्या .........। उसकी जरूरत तो खत्म हो गयी न। पढ़ाई लगभग पूरी हो ही चुकी है। पापा की जरूरत तो नहीं है न अब। न माँ की... न भाई की....... न हमारी........... । अब तो बस तुम्हारे जन्मदेने वाले माँ की जरूरत है, जन्मदेने वाले पिता की जरूरत होगी और मामा मामी की....." पंकज की नजरों में गुस्सा था और अपने भाई के लिए सहानुभूति। अनामिका और रागिनी को पंकज के आने का अहसास तब हुआ जब उन दोनों ने ये कड़वी बातें सुनी।

"ये आप क्या कह रहे हैं चाचाजी।"

"ठीक कह रहा हूँ। बेटी तो तुम उसी सुरेखा की हो न.... विश्वासघातिनी की बेटी विश्वासघातिनी ही तो रहेगी।"

अनामिका मूक हो गयी। चाचाजी कभी इस तरह से बात नहीं करते। आज क्या हो गया है। और चाचाजी को कैसे पता कि उसे किसने जन्म दिया है। मतलब चाचाजी सब जानते हैं। क्या पापा ने बताया ..........। इन दो तीन दिनों में। लेकिन उसे विश्वासघातिनी कैसे कहते हैं। यह सही नहीं किया चाचाजी ने। ऐसे शब्द सुनकर उसे आँसू निकल आए। "चाचाजी......... आपको ऐसे किसी पर लांछन लगाने का हक नहीं।"

"मुझे हक नहीं। ठीक कहती हो। गलती मेरी ही है। मैं ही भइया को नहीं समझा पाया। मैं ही उनकी जिद के आगे झुक गया। काश नहीं झुका होता। कम से कम यह दिन तो नहीं देखना पड़ता।"

रागिनी और अनामिका पंकज की ओर देखने लगी। रागिनी और अनामिका जिन रहस्यों को जानने के लिए कई स्थानों का खाक छान चुके थे, वो तो सारे घर में ही छुपे थे। रागिनी ने आश्चर्यपूर्ण नजरों से प्रश्न किया- "पापा। मतलब आपको अनामिका के बारे में पता था।.... आपको पता था कि वो किसकी बेटी है..... आपको पता था कि अनाथ आश्रम तक इसे चाचाजी ही लेकर गए थे।"

"यह झूठ है।.......... अनामिका को आश्रम तक भइया लेकर नहीं गए थे।"

"तो कौन ले गया था मुझे चाचाजी...पापा ने तो यही कहा था"

"भइया तो दूसरों को बचाने के लिए हमेशा इसी तरह सच को घुमा देते हैं।.......तुम्हें अनाथाश्रम भइया लेकर नहीं गए थे।... मैं लेकर गया था। न चाहते हुए भी। वजह वही थी कि भइया तुम्हें गोद लेना चाहते थे। लेकिन मैं नहीं चाहता कि भइया ऐसा करें। मुझे डर था कि तुम अपनी माँ पर चली जाओगी। मैं भइया को टूटते हारते नहीं देख सकता.... और मेरा डर आज सच होता दिख रहा है।"

अनामिका ने याद करने की कोशिश की। नीरज ने ऐसा कभी नहीं कहा कि वो उसे लेकर गया था। अनामिका को ऐसे अहसास हुआ कि चाचाजी सच कह रहे थे। पापा ने बस शब्दों को घुमा दिया। झूठ नहीं बोला लेकिन वह पूरी तरह सच भी नहीं था।

सच हमेशा अधूरे होते हैं। प्रकाश की तरह। अंधकार की तरह। हम सच का दायरा बना लेते हैं। उस दायरे में सब सच लगता है। और उस दायरे के बाहर हम कभी सोचना ही नहीं चाहते। चाहे वो दायरा दिन का हो या रात का। जो हमारे लिए दिन है वह किसी के लिए रात हो सकती है। लेकिन वह दिन है। वह हमारी सोच का दायरा है। जैसे 12 बजे भगवान के कपाट बंद कर दिए हों यह कहकर कि उनके आराम का समय है। लेकिन ठीक उसी वक्त कहीं भगवान को जगाने के लिए आरती गायी जा रही होगी। सच तो यह है कि जो सच है वह सच है ही नहीं। सच शायद सबसे बड़ा झूठ है।

सत्य की सीमाएँ टूटती हैं तो वह मिथ्या बन जाता है। अनामिका के सत्य की चाहरदीवारियाँ एक एक कर धवस्त होती जा रही थीं। चाचा की बातें उसके मन को चुभ गयी थीं। उसकी निष्ठा संदेह के घेरे में थी। माता पिता के प्रति सम्मान और समर्पण पर प्रश्नवाचक चिह्न लगाए जा रहे थे। वह चुपचाप वहाँ से चली आई। अचानक ही फिर से यह प्रश्न घर करने लगा कि पापा ने गोद लिया क्यों उसे। पापा के हठ की कोई तो वजह रही होगी। पापा से सबकुछ जानना चाहती थी। लेकिन जब वह पापा के कमरे में घुसी तो नीरज के चेहरे पर चिंता की कोई लकीरें ही न थी। अनामिका को देखकर नीरज के चेहरे पर एक आनंद था। वही आनंद जिसे अनामिका बचपन से देखती आयी है। अपनी अठखेलियों में, अपने नटखटपन में, अपनी खुशियों में, अपनी सफलताओं में। एक छोटी बच्ची भांति वह अपने पिता से लिपट गयी। उस सकून में उसे कब नींद आ गयी- पता ही नहीं चला।

***

"हेलो............" नीरज ने एक अनजाने नंबर का कॉल उठाया।

"हेलो..........नीरज जी... मनीष बोल रहा हूँ"

"हेलो.......... मनीष जी ......कहिए ....... "

"अनामिका को कई बार पोन कर चुका हूँ.........उठा नहीं रही ............. वो ठीक है न...."

नीरज ने देखा अनामिका अभी तक सो रही थी। निश्चल भाव से .... निश्चिंत....। "अनामिका सो रही है..........जब उठेगी बात करा दूँगा ........."

"नहीं नहीं उसकी जरूरत नहीं है..... मुझे असल में आपसे भी बात करनी थी....... "

"कहिए..........."

"जी आप दोनों से आज मुलाकात हो सकती है क्या..........ऐसा कीजिए आज रात का खाना हमारे यहाँ ही खाइए ........."

नीरज असहज था। मना कर देना चाहता था। लेकिन क्या अनामिका को उसके मामा से मिलने से रोकना सही है...। विशेषकर तब ...जब अनामिका पिछले चार दिनों से अपने मामा मामी से इतना घुलमिल गयी है। लेकिन उस कसक का क्या जो उसके मन में थी। उस जख्म का क्या जो सुरेखा के विश्वासघात ने दिया था। घृणा तो नहीं थी, कदाचित नाराजगी भी नहीं। पर कसक बाकी थी। नीरज इस कसक और स्नेह के बंधन के बीच का रास्ता चुनना चाहता था।

"जी रात का खाना मेरे लिए तो संभव न हो सकेगा मेरे लिए।..........लेकिन अनामिका से पूछता हूँ ....। वो चाहेगी तो चली जाएगी। "

"नीरज जी .... हमें आपसे भी बात करनी थी ....अनामिका के साथ..........किसी तरह से समय निकालिए ... अगर हो सके तो।"

"ठीक है... शाम को आता हूँ....10-15 मिनट के लिए..... लेकिन क्षमा कीजिएगा..... अधिक देर तक रूक न सकूँगा..... अनामिका चाहे तो थोड़ा रूक सकती है। "

"जी बहुत अच्छा ... आभार । "

रागिनी सुबह का नाश्ता लेकर आ गयी थी।

"चाचाजी.... दिन में खाना खाने घर पर आएंगे न।... या ...... " रागिनी की इन बातों से नीरज को लगा वह कुछ और ही कहना चाहती है।

"या .... माने। "

"या .... माने... घर पर आना जरूरी नहीं है..... आप चाहें तो किसी रेस्टोरेंट में भी जाकर खा सकते हैं... मर्जी आपकी.... ऐसा कहने को माँ ने .............बिल्कुल भी नहीं कहा .... मैं कह रही हूँ। " 

नीरज समझ चुका था कि रागिनी क्या चाहती है। और ठीक भी है। कई बार बाहर जाना मन बदलने का अच्छा बहाना होता है। तनाव चला जाता है... लेकिन यादें.... यादें कहां जाती हैं... वह तो पीछा ही नहीं छोड़ती....। नीरज उन यादों का सामना करना चाहता था।

"मन नहीं बेटा .... आज मेरा बाहर जाने को। ....... नाश्ता काफी है मेरे लिए आज ... कल चलते हैं न"

रागिनी ने जिद नहीं की। जिद करती अगर समय सामान्य होता। उसने नीरज का हाथ अपने हाथों में लिए कहा "चाचाजी .... । एक बात कहनी थी"

"क्या "

"अनामिका के लिए आप सब कुछ हैं.....वो आपसे बहुत प्यार करती है "

"पता है..... "

"और मैं भी ..... "

"वो भी पता है ......... और तू ही नहीं तेरा बाप भी ......."

"हां पता है ..... और पापा तो डरते भी बस आपसे ही हैं "  कहते कहते रागिनी की हंसी छूट पड़ी।  "लेकिन वो आपकी लाडली महारानी अनामिका है कहाँ......... "

"यहीं हूँ। तुम्हारी बकवास सुन रही हूँ।"

"अरे बेटा उठ गयी।..... पता है ...लोग तुझे सुबह से फोन किए जा रहे हैं।"

"हाँ बात हो गयी है भइया से .... सुबह सुबह नींद से जगा दिया उसने...... और पता है पापा.... उसने रागिनी का तो हाल चाल तक नहीं पूछा..."

"ओ महारानी.... प्रत्युष भइया को पता है.... रागिनी का हाल रागिनी से ही पूछना पड़ेगा।.... उसने सुबह सुबह मुझे फोन कर कर मेरा और सबका हाल चाल ले लिया है.... अच्छा छोड़ अनामिका इन बातों को... मुझे जाना है अभी.... खाने के लिए दिन में आ रही है न घर पर  या तुने भी शनिवार को चाचाजी की तरह खाने से छुट्टी ले रखी है। "

"नहीं .. एक काम कर.... आज मैं खाना बनाती हूँ.... तू आ जा... चाचाजी और चाचीजी  को लेकर... "

"ना बाबा ना... उसके लिए तू माँ से बात कर... अच्छा मैं चलती हूँ.... बाय।

"ये रागिनी भी ना.... हमेशा तूफान मेल बनी रहती है... है न पापा ।"

 "मैं प्रत्युष की बात नहीं कर रहा था। तुम्हारे मामाजी का कई बार फोन आ चुका है।"

"पता है... मैंने उठाया नहीं..... इतने सालों से तो मेरी याद नहीं आयी उन्हें। आज क्या हो गया।"

"ऐसे नहीं कहते बेटा... आखिरकार वो तुम्हारे "

"ओके सारी... " अनामिका पिता की बात पूरी होने देना नहीं चाहती थी। लेकिन उसे यह नहीं पता था कि मनीष का फोन नीरज के पास आया है।"

"बात करने चाहते हैं हम दोनों से"

"क्या...... मुझे कोई बात नहीं करनी.... "

"खाने पर भी बुलाया है..... "

"मुझे आज रागिनी के साथ बाहर खाने पर जाना है....  आप चाहें तो चल सकते हैं हमारे साथ"

"मैंने वायदा कर दिया है उनसे... "

"खाने का... "

"नहीं.... आने का"

"तो आप जाइए न पापा... मुझे क्यों ले जा रहे हैं।"

"क्योंकि .... "

अनामिका ने फिर एक बार बात बीच में ही काट दी "क्योंकि क्या पापा... आप समझते क्यों नहीं.... मेरी एक छोटी सी दुनिया है... आप, माँ, भइया, रागिनी, चाचाजी, चाचीजी.. बस... मैं इसमें बहुत खुश हूँ.... बस कुछ सवालों के जवाब चाहती थी.... और उनके जवाब के लिए भी मुझे कहीं जाने की जरूरत नहीं है ... वो हर जवाब आपके पास है शायद.... "

नीरज भी चाहता था कि वो अनामिका का साथ दे। लेकिन वह किसी के आगे झूठा नहीं होना चाहता था। इसलिए चुप रहा... काफी देर तक .. फिर धीरे के कहा.. "बेटा... मैंने वायदा किया है.... बाकी तुम्हारी मर्जी .... कोई जबरदस्ती नहीं है.... "

अनामिका ने पिता की मनःस्थिति को भांप लिया था। पिता को ग्नलानि हो ऐसा तो वह भी नहीं चाहती - "ठीक है पापा। मैं चलूँगी... लेकिन मेरी शर्त है.... एक तो आगे से आप कोई ऐसा वायदा नहीं करेंगे ........ और दूसरी बात यह कि .. मैं उनसे आज आखिरी बार बात करूँगी।"

***

 "बेटा.... अनामिका..... तुम्हें नहीं पता ... तुम्हें देखकर ऐसा लगता है कि मुझे मेरी बहन वापस मिल गयी। ... "

अनामिका फिरे से कमजोर नहीं होना चाहती थी। इसलिए उसने मनीष की बातों पर बहुत शांत प्रतिक्रिया दी-"आपने हम लोगों को बुलाया .... कोई खास कारण ... "

"हाँ ... बेटा.... आज मैं और तुम्हारी मामी आपस में बात कर रहे थे। हमारा तो कोई है नहीं... जो भी हो तुम ही हो.... "

अनामिका के मन में तो आ रहा था कि पूछे कि यह विचार उन्हें तब क्यों नहीं आया जब वो पैदा हुई थी। उस समय कहाँ था वात्स्ल्य। पूछ भी लेती अगर नीरज वहाँ उपस्थित नहीं होता।

मनीष  आगे कहने लगा- "जिंदगी का क्या भरोसा। मैं सोच रहा हूँ  कि हमारे पास जो कुछ भी है वह तुम्हारे नाम वसीयत कर दिया जाय.....  ताकि हमारे बाद यह सब तुम्हारा हो जाय। "

नहीं नहीं इस मृगतृष्णा को अपने निर्णय के आड़े नहीं आने दे सकती। अगर इतनी ही फिक्र है तो वसीयत क्यों .. अभी क्यों नहीं कर देते.... । अगर इतनी ही ममता है तो कुछ हिस्सा ही देकर दिखाएँ। ... यह तो पहले अपना भविष्य सुरक्षित करना चाहता हैं.. फिर मेरा। अनामिका के मन में न जाने और कितनी ही बातें आ रही थीं। कहना भी चाहती। कह भी देती लेकिन अपने माता-पिता के संस्कारों ने उन शब्दों को बाहर निकलने ही नहीं दिया।

"क्षमा कीजिए.. मामाजी... मैं यह सब नहीं ले सकती।"

"क्या... लेकिन क्यों..... नीरज जी... आप ही समझाइए अपनी लाडली को... "

अनामिका को भय सताने लगा कि नीरज कहीं हामी न भर दे । वह दूर जाना चाहती थी इन झंझटों से और लौट जाना चाहती थी अपने परिवार के पास।

नीरज ने हल्की मुस्कान ली। अनामिका समझ गयी कि पापा के मन में कोई तो समाधान चल रहा है इस समस्या का। या तो कोई विकल्प। अनामिका ने देखा कि नीरज के मन में किंचितमात्र भी संशय नहीं है। उन्होंने अपना मन बना लिया है। लेकिन कौन जानता था कि इस समस्या का उत्तर नीरज के सवालों में छुपा है।

"मनीष जी... क्या आपको नहीं लगता... आपकी संपत्ति का हकदार कोई और है।"

"कोई और... और कौन हो सकता है.... "

"आपका बेटा..... "

"मेरा बेटा ...... मेरा कौन सा बेटा.....  "

"आपका एक ही तो बेटा है मनीष जी....आपकी पहली पत्नी से आपका बेटा.... जिसे आपने छोड़ दिया. "

अनामिका भौंचक थी। पापा के पास क्या कोई नया रहस्य था। लेकिन ऐसा नहीं थी। यह बात वहाँ बाकी लोगों के लिए रहस्य नहीं थी। मनीष की पत्नी के लिए भी नहीं। मनीष की पत्नी ने कहा- "नीरज जी... मुझे पता नहीं कि आपको क्या पता है.... लेकिन उसे इन्होंने नहीं छोड़ा.... कोर्ट ने कस्टडी बच्चे की मां को सौंपा था..... वो अपनी मां के पास है।"

"अच्छा....। " नीरज को हंसी आ गयी "अधिकार खत्म होने से क्या उत्तरदायित्व भी खत्म हो जाता है... और वैसे भी.... वो अपनी मां के पास नहीं था। उसकी मां ने किसी और से शादी कर ली। उसके पिता ने तो आपसे की ही।..... ऐसा नहीं है कि मनीष जी को अपनी पहली पत्नी के पुनर्विवाह की जानकारी नहीं है। कुछ समय तक ने इन्होंने अपने बच्चे को पैसे भेजे। फिर इधर मनीष जी, यानि उसके पिता और उधर उसकी मां... दोनों अपनी-अपनी दुनिया में मग्न हो गए।"

मनीष की पत्नी ने देखा मनीष की आखें शर्म से झुकीं थीं। मतलब साफ था। जो कुछ कहा जा रहा था वो सच था। "क्या.. नीरज जी... मुझे तो यह सब नहीं पता।...क्या आपको पता है वो कहाँ है..... "

 "नहीं... मुझे नहीं पता वो कहाँ है... लेकिन यह तो मनीष जी को पता होना चाहिए कि वो कहाँ है .... और अगर न भी हो ... तो पता तो लगा ही सकते हैं।"

मनीष की आंखों में लज्जा थी। उसने न कभी अपने बच्चे की खबर ली न कभी अपने बहन के बच्चे की। लेकिन वह कैसे कह दे कि जो उसने अनामिका को देने का निर्णय किया था अब वो अचानक से वापस ले ले। 

अनामिका को यथास्थिति का ज्ञान हो चुका था। शायद अब सब कुछ सही होने की दिशा में था। उसने मनीष से कहा "मामाजी..... आपने मुझे विगत दिनों जो स्नेह दिया.... जिस तरह से अपनाया... उसकी मैं आभारी हूँ। परंतु हमें वास्तविकता को अपनाना चाहिए। हमलोग अपनी अपनी दुनिया में ज्यादा सुखी रह सकते हैं। यह हमारे छोटे छोटे ग्रह हैं। यहाँ से बाहर निकलने पर हम एलियन बन जाएँगे। शुरूआत में अच्छे या आकर्षक लगेंगे .....लेकिन वास्तविकता और सच्चाई का अहसास होते ही हमें शायद वही यातना भी लगने लगे। आप अपनी दुनिया बुला लीजिए। मैं अपनी दुनिया में जा रही हूँ। बात करने का मन करे तो महीने दो महीने में फोन कर लीजिएगा।"

***

अनामिका अपनी दुनिया में लौट तो आयी थी। लेकिन कुछ सवालों के जवाब पाने बाकी थे।

"पापा आज आपसे इस बारे में आखिरी बार बात करना चाहती हूँ। मैं नहीं जानती कि आपका मुझे जन्म देने वाली माँ के साथ रिश्ता क्या था । लेकिन उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि आपने मुझे गोद क्यों लिया। सच जानना चाहती हूँ जो भी हो... अगर आपको ठीक लगे तो"

नीरज ने कहना शुरू किया- मेरे पास छुपाने को कुछ है नहीं.. बेटा। मैं केवल उतना बता सकता हूँ जो मैंने देखा, महसूस किया। और सत्य क्या है।.... जो सामने है- वह वर्तमान- वही सत्य है। सुरेखा मेरे दिल के काफी करीब थी। लेकिन हमारा साथ नहीं हो पाया । हमारी राहें अलग थीं। कुछ लोगों का मानना है कि सुरेखा ने मेरा इस्तेमाल किया या फिर विश्वासघात किया। यह उन लोगों का सत्य हो सकता है, मेरा सत्य हो सकता है। लेकिन सत्य यह भी हो सकता है कि वो परिस्थितियों के अधीन थी। कारण चाहे जो हो, परंतु इसमें तुम्हारा दोष न था। सुरेखा ने जब मुझे मिलने को बुलाया तो उसे अपराधबोध था। वो ग्लानि के साथ इस दुनिया विदा नहीं होना चाहती थी। यह आत्मा और शरीर का मेल भी बड़ा विचित्र है। आत्मा कर्मफलों को ले नहीं जाता। उसे छोड़ जाता है। और शरीर प्रकृति में विलीन हो जाता है। वो बातें वहीं खत्म हो गयी।

जब तुम पैदा हुई तो तुम्हारे चेहरे पर एक चमक थी जो मुझे खिंचती चली जा रही था। हो सकता है वह लगाव सुरेखा के कारण हो लेकिन कम से कम मुझे ऐसा नहीं लगता। तुम्हें गोद लेने का कारण भी सुरेखा नहीं थी। एक अवसर था जो प्रकृति और परिस्थितियों ने प्रदत्त किया था। जन्म का मूल ही प्रकृति ही है। पालन की प्रकृति ही है। तुम मेरे परिवार का हिस्सा नहीं होती तो किसी और के पास होती। लजब तुम मेरे पास आई तो तुम हमारे परिवार का एक अभिन्न अंग बन गई ....और हो।... मेरा और नमिता का सत्य यही बन गया... कि तुम हमारी बेटी हो।

लेकिन संसार में कुछ चिरस्थायी नहीं है। न सुरेखा थी। न उसके प्रति लगाव। मेरे और सुरेखा के बीच किसी अहसान या कृतज्ञता की जगह नहीं थी।

"क्या मुझमें आपको वो दिखती हैं पापा............"

"नहीं बेटा... तुझमें बस अपनी प्यारी सी बेटी दिखती है.... अनामिका... "

"माँ को यह सब पता है क्या पापा............"- अनामिका का एक महत्वपूर्ण प्रश्न अभी भी बचा था।

"व्यक्ति बड़ा स्वार्थी होता है बेटा.... वो कुछ खोना नहीं चाहता। मैं चाहकर भी तुम्हारी माँ को कुछ बता नहीं पाया। मैं उसका अपराधी हूँ. और ऋणी भी।"

अनामिका के प्रश्नों के उत्तर मिल गए थे। वर्त्तमान ही सत्य है। उसने सत्य को स्वीकार कर लिया।

 ***

बात आई गयी हो गयी। पुरानी दिनचर्या फिर से शुरू हो गयीं।

"आपको नहीं लगता, अनामिका को सब बता देना चाहिए।"- नमिता के इस अचानक सवाल ने नीरज को चौंका दिया था।

"क्या बता देना चाहिए।"

"सुरेखा के कोई रिश्तेदार तो होंगे न। कम से कम उसका हक तो बनता है न कि जिसने उसे जना, उसकी एक तस्वीर ही देख ले..."

नीरज के चेहरे पर एक मुस्कुराहट आ गयी। यह मुस्कुराहट किसी जीत की नहीं थी। अपनी पत्नी की विद्वता की थी। वह अपराधबोध से अचानक ही मुक्त हो गया। कई बार दिल के रिश्तों में माफी मांगने की औपचारिकताएँ नहीं रह जाती। बस अपना लेते हैं एक दूसरे को।

"कुछ कहेंगे भी या मुस्कुराते रहेंगे।"

"अनामिका ने सत्य ढूँढ लिया और सत्य को स्वीकार भी कर लिया।"

"मतलब......"

"मतलब ये कि अनामिका हमारी बेटी है.............."

 

***