मानभंजन--(अन्तिम भाग) Saroj Verma द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

मानभंजन--(अन्तिम भाग)

प्रेमप्रताप का ऐसा बदला हुआ व्यवहार देखकर मोती की प्रसन्नता की सीमा ना रही,उसे अचरज हो रहा था कि कोई भी बुरा इन्सान प्रेम की धारा में बहकर इतना स्वच्छ और निर्मल हो सकता कि वो अपने सारे दुर्गुण भूल जाएं,इसका मतलब है कि प्रेम में बड़ी ताकत होती है जो किसी भी जानवर को इंसान बना सकता है,प्रेमप्रताप का प्रयागी के प्रति स्वार्थ रहित प्रेम देखकर मोतीबाई को असीम आनंद की अनुभूति हो रही थी,उसने ये बात रूद्रप्रयाग से भी कही लेकिन रूद्र को मोती की बात पर भरोसा ना हुआ और वो उससे बोला....
मोती!तुम प्रेमप्रताप को समझने में बड़ी भूल कर रही हो ,जिस इन्सान ने हमेशा से भोगविलास का जीवन जिया हो, उसके स्वभाव में अचानक इतनी जल्दी कैसे परिवर्तन आ सकता है,ऐसे लोंग कभी भी सच्चा प्रेम नहीं कर सकते,वो केवल अभिनय कर रहा है सच्चे प्रेम का,इसमें भी उसकी कोई घटिया योजना होगी,मैं प्रयागी से कह दूँगा अब उसे प्रेमप्रताप से मिलने की कोई आवश्यकता नहीं है,अब मुझे उससे कोई प्रतिशोध नहीं लेना॥
क्यों तुम्हें अब प्रेमप्रताप से डर लग रहा है क्या?मोती ने पूछा।।
नहीं!ऐसी कोई बात नहीं है,रूद्र बोला।।
ऐसा ही है ,छोटे ठाकुर!क्योंकि तुम्हें अब प्रयागी पर संदेह कि वो कहीं प्रेमप्रताप को तो नहीं पसंद करने लगी,मोती बोली।।
मुझे प्रयागी पर कोई संदेह नहीं है,रुद्र बोला।।
तो अब तुम प्रयागी को प्रेमप्रताप से मिलने के लिए क्यों मना कर रहे हो?मोती बोली।।
वो ऐसे ही ,रूद्र बोला।।
ऐसे ही क्यों?कोई तो वजह होगी,मोती बोली।।
क्योंकि प्रेमप्रताप अच्छा इन्सान नहीं है?रूद्र बोला ।।
और जब तुमने स्वयं ही प्रेमप्रताप से प्रयागी को मेलजोल बढ़ाने को कहा था,तब तुम्हें नजर नहीं आया कि वो बुरा इन्सान है,मोती ने पूछा।।
तब मुझे प्रतिशोध चाहिए था,रूद्र बोला।।
और अब तुम्हें प्रतिशोध नहीं चाहिए,मोती ने पूछा।।
नहीं!अब मुझे कोई प्रतिशोध नहीं चाहिए,रुद्र बोला।।
ये कैसे दो चेहरे लगाकर घूमते हो छोटे ठाकुर!जब तुम्हें ये डर लगने लगा है कि कहीं प्रयागी सच में तो उसे नहीं चाहने लगी तो तुम प्रयागी से किनारा करने को कह रहे हो,तुम पुरूष और तुम्हारी पुरूषवादी विचारधारा कभी नहीं बदलेगी,तुम पुरुष सदियों से हम औरतों पर शासन करते आएं हों और तुम चाहते हो कि तुम जैसा चाहों औरत वैसा ही करें,तो क्या हम औरतों का कोई वजूद नहीं होता कि हम अपनी मरजी से अपने लिए कोई फैसला ले सकें,मोती गुस्से से बोली।।
तो क्या अपनी पत्नी को किसी गैर मर्द से प्यार करने की इजाजत दे दूँ,दुनिया थूकेगी मुझ पर,रूद्रप्रयाग बोला।।
लेकिन ये फैसला भी तो तुम्हारा ही था,जब खुद पर आई तो कैसे पर कटे पंक्षी की तरह फड़फड़ाने लगें,मोती बोली।।
तुम होती कौन हो मुझे नसीहत देने वाली?और किस नाते मुझे ये सब कह रही हो?रूद्रप्रयाग ने पूछा।।
अच्छा तो अब मैं तुम्हारी कोई नहीं होती,उस दिन तो बड़ा गिड़गिड़ा रहे थे मदद के लिए,आज स्वार्थ पूरा हो गया तो तू कौन ?मोती बोली।।
हाँ....हाँ....माँगी थी मैनें मदद,क्योंकि मुझे लगता था कि तुम मेरी दोस्त हो,रूद्र बोला।।
और अब दुश्मन हो गई,है ना!मोती बोली।।
तुम्हें जो भी समझना है ,समझ लो,एक दगाबाज़ कभी मेरी दोस्त नहीं हो सकती,रुद्र बोला।।
दुनिया के खेल निराले हैं रूद्र बाबू!जब तक किसी के इशारों पर नाचते रहे तो सब ठीक और जब उसके इशारों को मानने से इनकार कर दो तो लोंग दगाबाज़ समझने लगते हैं,ये कहते हुए मोती की आखें भर आईं...
तुम एक अय्याश के लिए हम दोनों की दोस्ती में दरार डाल रही हो मोती!रूद्र बोला।
वो अय्याश था लेकिन अब नहीं,मोती बोली।।
तुम उस पर कैसे भरोसा कर सकती हो?रूद्र बोला।।
जैसे प्रयागी ने भरोसा किया ,मोती बोली।।
प्रयागी का दिमाग़ खराब हो गया और साथ साथ तुम्हारा भी,वो प्रयागी को मूर्ख बना रहा है और वो बन रही है,रुद्र बोला।।
नहीं!ऐसा नहीं है,वो सच में बदल गया है,मोती बोली।।
ठीक है तो मैं ये तुम्हें साबित करके रहूँगा कि वो नहीं बदला,रूद्र बोला।।
ठीक है तो जाओ साबित करो,मोती बोली।।
ठीक है तो यही सही,और इतना कहकर रूद्र वहाँ से चला गया...

रूद्र दिनभर घर ना गया,उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो किससे ख़फा है,प्रयागी से,प्रेमप्रताप से,मोती से से या अपनेआप से,वो दिनभर यूँ ही भटकता रहा और साँझ हो जाने पर वो घर पहुँचा,साँझ के समय जब रुद्रप्रयाग घर पहुंँचा तो उसने देखा कि प्रयागी घर पर नहीं थी,अब उसके मन में तरह तरह के विचार उठने लगें कि आखिर वो गई कहाँ,कहीं ऐसा तो नहीं वो प्रेमप्रताप से मिलने गई हो,प्रयागी को ये क्या हो गया है,वो क्यों उस लफंगे के चक्कर में पड़कर अपनी गृहस्थी में आग लगाने पर तुली है,यही सब सोचकर वह हतप्रभ-सा बैठ गया,,
इस समय उसका हृदय क्रोध और विक्षोभ से जल रहा था, एक अज्ञात आशंका ने उसे भीतर ही भीतर बता दिया था कि वह कहाँ गई है,जब इन्सान के मन में शंका घर कर जाती है तो उसका मन विपरीत स्थितियों में उलझ जाता है,बिना सत्य की खोज किए हुए वो ऐसे विचारों को मन में लाने लगता है जो केवल मनगढन्त ही होते हैं,शंका का कोई इलाज नहीं वो लाइलाज़ है,
और उसने यही सोचकर घर के किवाड़ ऐसे ही अटका दिए ,वो भीतर कोठरी में गया तो उसका जी घबराने लगा,उसने सोचा वो थोड़ी देर खुली हवा में छत पर जाएगा,इसलिए वो सीढ़ियाँ चढ़कर छत पर पहुँचा और वो अचानक ही चौंक उठा,क्योंकि छत पर प्रयागी खड़ी थी,कुछ देर तक दोनों में से कोई भी कुछ नहीं बोला,फिर प्रयागी छत पर पड़ी चारपाई पर बैठ गई, जैसे कि वो थक गई हो,
रूद्रप्रयाग कुछ देर वहीं खड़े कुछ सोचता रहा,फिर उसने देखा कि प्रयागी हाथ में स्नान के कपड़े लेकर नदी की ओर जाने की तैयारी कर रही थी,रूद्रप्रयाग तीव्र वेग से उसके सामने जा खड़ा हुआ और धीमे परंतु तीखे स्वर से पूछा,
कहीं जा रही हो?
हांँ,प्रयागी बोली,
छोटा-सा उत्तर रूद्रप्रयाग के कानों में गूंँज उठा और वो प्रयागी से बोला,
ये सब क्या चल रहा है?वो साँझ ढ़ले घर आता है और अब तुम फिर से उससे मिलने घाट पर जा रही हो,
उसके सवाल पर प्रयागी बोली......
मैं जानती हूँ कि तुम्हें अच्छा नहीं लग रहा है लेकिन कल रात उसकी पिस्तौल छूट गई थी,वही लौटाने जा रही हूँ,
क्या जरूरत है,?रूद्र बोला,
और फिर उसने अपने बड़ी-बड़ी मद-भरी आंँखों से उसे घूरते हुए देखा और बोली,
मेरे खत भी तो उसके पास हैं उन्हें भी लेती आऊँगी,
जाना जरूरी है,रूद्रप्रयाग ने पूछा।।
पहले तो ना टोकते थे उससे मिलने के लिए,प्रयागी ने पूछा।।
पहले बात और थी,रूद्र बोला।।
तो अब क्या हो गया?जो टोकते हो,प्रयागी ने पूछा।।
प्रयागी के इस सवाल से रूद्रप्रयाग के पाँवों तले से जमीन खिसक गई,जब रूद्रप्रयाग ने ये सुना तो उसे लगा कि आकाश और धरती मिलते चले जा रहे हैं,ये कैसा अनर्थ हो रहा है,नहीं ऐसा कभी नहीं हो सकता,उसे लगा कि धरती घूम रही है और वह चक्कर खाकर धरती पर बैठ गया,
प्रयागी ने उसकी ऐसी हालत देखी तो उसके पास दौड़कर गई और पूछा.....
तुम्हें क्या होता है?तबियत ठीक नहीं है क्या?
तब रूद्रप्रयाग आंखें बंद किए ही बोला.....
सब कसूर मेरा है प्रयागी! सब कसूर मेरा है,
तब प्रयागी बोली......
ना तुम्हारा कुसूर है और ना मेरा,बस हालातों के सामने हम दोनों मजबूर हैं॥
ठीक है तो तुम जाओ उससे मिलने,उसकी पिस्तौल देकर आओ और अपने खत ले आओं,मैं तुम्हारा इन्तजार करूँगा,रूद्रप्रयाग बोला।।
ठीक है तो मैं आती हूँ और इतना कहकर प्रयागी चली गई,प्रयागी के जाते ही रुद्रप्रयाग उधेड़बुन में लग गया,उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो प्रयागी पर भरोसा करें या ना करें,वो सच ही तो कह रही थी ना!वो पिस्तौल लौटाने ही गई है ना!और अपने खत लेने गई है,वो ऐसे ही उधेडबुन में लगा रहा और करीब एक घंटे बाद मकान के किवाड़ खुलने की आवाज़ आई,वो झटपट उठ बैठा और उसने देखा वो प्रयागी ही थी,जो अब लौट आई थी,उसके हाथों में उसके कपड़ो के अलावा एक लकड़ी का छोटा सा बक्सा था,रूद्रप्रयाग ने अन्दाजा लगाया कि शायद उसी बक्से में खत होगें,
तब प्रयागी रूद्रप्रयाग के नजदीक आकर बोली....
ये लो ,ये रहे सारे ख़त इन्हें जला दो,
उसने तुम्हें खत लौटा दिए ,चाहता तो तुम्हें बदनाम करने के लिए इन खतों का इस्तेमाल कर सकता था,रूद्रप्रयाग बोला।।
अब वो सुधर गया है,पहले जैसा नहीं रहा,प्रयागी बोली।।
भरोसा नहीं होता मुझे,रुद्र ने कहा।।
अब तुम्हें हो ना हो लेकिन मुझे तो उस पर पूरा भरोसा है,प्रयागी बोली।।
तुम्हारा सच्चा चाहने वाला लगता है तभी तो शराफ़त से खत लौटा दिए,रुद्रप्रयाग बोला।।
मेरे जख्मों पर नमक लगा रहे हों,प्रयागी बोली।।
सच तो कहता हूँ कि वो तुम्हारा सच्चा आशिक निकला,रुद्रप्रयाग बोला।।
तुम्हें जरा भी शरम नहीं आती ऐसा कहते हुए,प्रयागी बोली।।
शरम कैसी? जो सच है तो सच है,रूद्रप्रयाग बोला।।
तुमने ही तो मुझे इस झमेले में उलझाया था,प्रयागी बोली।।
तब मुझे तुम पर भरोसा था,रूद्र बोला।।
तो अब मुझ पर भरोसा नहीं रहा क्या तुम्हें?प्रयागी ने पूछा।।
पता नहीं और इतना कहकर एक लम्बी साँस भरते हुए रूद्रप्रयाग वहाँ से चला गया,अपने प्रति रुद्र का अविश्वास देखकर प्रयागी की आँखों में आँसू आ गए ,लेकिन तब भी उसने मन मारकर खाना पकाया और पक जाने पर थाली परोसकर रूद्र के पास जाकर बोली....
चलो खाना खा लो।।
मुझे भूख नहीं, रूद्र बोला...
क्यों भूख नहीं?तुम ना खाओगे तो मैं भी ना खाऊँगीं,प्रयागी बोली।।
तो मत खाओ और इतना कहकर रूद्रप्रयाग मुँह फेरकर लेट गया,अब प्रयागी के लिए रूद्र का ये रवैय्या असहनीय था,वो पीड़ा से तड़प उठी,लेकिन वो कर भी क्या सकती थी?
दूसरे दिन प्रयागी ने रूद्र के सामने ही सारे खत जला दिए और अब वो घाट पर स्नान के लिए ना जाती थी,घर पर ही स्नान करके पूजा कर लिया करती थी,अब उसने पहले की तरह फिर से स्वयं को ब्यस्त कर लिया,कभी ये व्रत तो कभी ये कथा,तो कभी ब्राह्मणों का भोज तो कभी कन्याओं का भोज,गरीबों को दान-पुण्य,बस कुछ भी कर के स्वयं को ब्यस्त रखना ही उसने अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया था,
अब पहले की तरह रूद्रप्रयाग भी स्वयं को काम में ब्यस्त ना रखता था,वो अब अपना ज्यादातर समय घर पर ही बिताने लगगा,जब रुद्र को प्रयागी पर भरोसा हो गया तो दोनों के बीच का मनमुटाव भी धीरे धीरे खतम होने लगा,जिन्दगी अपनी रफ्तार से आगें बढ़ रही थी ,प्रेमप्रताप ने अब मंदिर मे डेरा जमा लिया था,वो अब ना तो अपनी हवेली जाता और ना ही किसी तवायफ़ के यहाँ,दिनरात भगवत गीता और रामायण का पाठ करता और मंदिर में जो भी प्रसाद के रूप में उसे दे जाता तो वो वही खा लिया करता,उसका ये रवैय्या उसके पिता भानुप्रताप को पसंद नहीं आया और उसके वैराग्य लेने की वजह को जानकर वे गुस्से से आगबबूला हो उठे और उन्होंने रूद्र और प्रयागी से बदला लेने का मन बना लिया,वो ये भी जान गए कि इन सबके पीछे का कारण मोतीबाई ही है,इसलिए वें मोती को भी मज़ा चखाना चाहते थे,
इसलिए उन्होंने शहर के दरोगाजी के पास जाकर सिफारिश लगाई कि मोतीबाई ने ही मेरे बेटे की ये हालत की है,आप मोती को रूद्रप्रयाग का नाम लेकर बदनाम करें क्योंकि उसके पास रूद्रप्रयाग भी जाता था,मैं आपको मुँहमाँगा दाम दूँगा,ये कहकर भानुप्रताप ने सोने के दस सिक्के दरोगा के जेब में डाल दिए,अब क्या था दरोगा खड़े खड़े बिक गया और गाँव आ पहुँचा,मोती के कोठे पहुँचा,मोती के यहांँ जाकर उसने बहुत शराब पी, एक बोतल पी जाने के बाद दूसरी बोतल खाली कर डाली और ज़ाम पर ज़ाम छलकने लगें बिना सोडा और पानी मिलाएं उसने इतनी पी कि उसे होश ना रहा और वो वहीं मोती के यहांँ सो गया,

आधी रात बीत गई थी,दरोगा अब भी मोतीबाई के यहाँ ही सो रहा था, हवलदार मंगूलाल को दरोगा से बहुत चिढ़ थी,क्योंकि वो कभी भी कोई काम ना करता था,सारे काम तो वो हवलदारों से करवाता था और लोगों से मनमानी घूस लेता था,कभी कभी तो हवलदारों को वो पीकर ऐसी गाली गलौज करता था कि जैसे कि सभी हवलदार उसके बंधुवा मजदूर हो,उसके गुलाम हो,मंगूलाल तो वैसे भी नफरत करता था दरोगा से और फिर उसने भानुप्रताप को दरोगा की जेब में सोने की अशर्फियाँ डालते हुए भी देख लिया था,जिससे वो उससे चिढ़ा बैठा था क्योंकि दरोगा ही सारी घूस खा जाता था वो हवलदारों को कुछ नहीं देता और फिर दरोगा ने जबसे मंगू की बीवी को देख लिया था तो उस पर बेहूदा फब्तियांँ कसता था, वो उसपे फिदा था,मंगूलाल ये कतई नहीं चाहता था कि कोई भी उसकी बीवी पर बुरी नज़र डाले,उसे मन ही मन दरोगा से घृणा थी,इसलिए उसे मौका मिल गया उससे अपनी खुन्नस निकालने का...
इसलिए मंगूलाल ने दूसरे दिन सुबह लगाई बुझाई का काम शुरू किया,वो दरोगा से बोला....
हुजूर!वो मोतीबाई है ना!रात वो कहती थीं कि दरोगाजी तो बस पैसे के भूखे है और ये भी कहती थी कि रात वो नशे में थे होश कहाँ था उन्हें?उन्होंने सब बक दिया, भला यह भी कोई बात हुई कि एक औरत को बदनाम करने की ठानकर आएं हैं,अब मैं देखती हूँ कि कैसे वो प्रयागी और रूद्रप्रयाग को बदनाम करते हैं,मुझे सारी सच्चाई पता है वें कुछ नहीं कर पाऐगें और उस भानुप्रताप को भी मैं देख लूँगी कि कितना पैसें वाला बनता है,
मंगूलाल की बातें दरोगा को ऐसी लगी जैसे कि किसी ने उसके बदन पर जलती सिगरेट छुआ दी हो,लाल मिर्च का बदन पर लेप लगा दिया हो,
वो गुस्से से तमतमा उठा और बोला....
क्या कहा हवलदार मंगूलाल?और फिर बड़ी बेसब्री से पूछा.....
और क्या क्या कहती थी? मैं तो नशे में था?
बस यही कहती थी हुजूर!मंगूलाल बोला।।
अच्छा!तो उसके दिमाग़ ज्यादा खराब हैं,मुझे कहती है कि ज्यादा चढ़ गई थी,दरोगा बोला,
अब आग में घी पड़ गया था और दरोगा के आत्मसम्मान को बहुत बड़ा धक्का लगा था,वो गुस्से से लाल हो उठा,उसका गुस्सा सूरज के समान धधक रहा था,मंगूलाल मन ही मन मुस्कराया....
आज मैं उसे ना छोड़ूगा,अब देखता हूँ वो स्वयं को बदनाम होने से कैसे रोकती है?प्रयागी ही स्वयं उसकी दुश्मन हो जाएगी,देखते जाओ,दरोगा बोला।।
ऐसा क्या करेगें आप?मंगूलाल ने पूछा।।
तुम ये अफवाह फैलाओ कि रूद्र का मोतीबाई के साथ चक्कर है,वो वहाँ हर रात जाता है,जब ये बात प्रयागी को पता चलेगी तो अपनेआप ही धमाका हो जाएगा,जिसमें रूद्र जलेगा,मोती जलेगी और प्रयागी भी जलेगी,दरोगा बोला।।
ये तो आपने बहुत अच्छी तरकीब निकाली,मंगूलाल बोला।।
जिन्दगी भर यही किया है मैनें,दरोगा बोला।।
लेकिन प्रयागी तक ये बात पहुँचाएगा कौन?मंगूलाल ने पूछा।।
गाँव की दो चार गरीब औरतों को खरीद लों,प्रयागी के घर में मेहरी भी तो काम करती होगी,पहले उसे खरीदो,उसके कान में बात डाल दो तो प्रयागी तक ये अफवाह स्वयं पहुँच जाएगीं,दरोगा बोला।।
लेकिन ये ठीक रहेगा,मंगूलाल ने पूछा।।
यही ठीक रहेगा,साँप भी मर जाएगा और लाठी भी ना टूटेगी,मतलब हम कुछ करेगें भी नहीं और सबकुछ हो भी जाएगा,दरोगा बोला।।
जी!हुजूर!सही कहा आपने,मंगूलाल बोला।।
और फिर देखते ही देखते सगरे गाँव में ये खबर फैल गई कि रूद्रप्रयाग का मोतीबाई के साथ चक्कर है,बड़ी इज्ज़त वाला बना फिरता है देखो तो दो कौड़ी की तवायफ़ के कोठे पर पड़ा रहता है,ये बात जब प्रयागी तक पहुँची तो उसने रुद्र से पूछा.....
लेकिन रूद्र ने इस बात से बिल्कुल इनकार कर दिया क्योंकि वो सच में मोती के पास नहीं जाता था,वो तो अब ज्यादातर समय घर पर ही रहता था,दोनों के बीच ये गलतफहमी दरार नहीं बन पाई और दरोगा की हार हुई और उसे गाँव से बाहर जाना ही पड़ा,प्रेमप्रताप ने पिता ने भी दरोगा को खूब खरी खोटी सुनाई,
अब उस बात को भी दो ढ़ाई महीने बीत चुके थे जब प्रेमप्रताप प्रयागी के घर आया था और अपनी पिस्तौल भूल गया था लेकिन तभी एक रोज़ शाम के वक्त प्रयागी चक्कर खाकर गिर पड़ी......
रूद्रप्रयाग ने फौरन वैद्य जी को बुलवाया,वैद्य जी आएं और उन्होंने प्रयागी की नाड़ी जाँची,नाड़ी जाँचकर वें बोलें.....
मेरा अन्दाजा है कि ये शायद माँ बनने वालीं हैं लेकिन एक बार दाईमाँ को बुलवाकर इनकी जाँच करवा लीजिये,उनकी जाँच पर ही ये तय होगा कि मैं सही हूँ या नहीं....
दाई माँ को भी बुलवाया गया,दाईमाँ ने प्रयागी की जाँच की और उन्होंने कहा कि.....
वैद्य जी का अन्दाजा बिल्कुल सही है,बहुरानी उम्मीद से है,बधाई हो !
ये सुनकर दोनों पति पत्नी की खुशी का ठिकाना ना रहा,खुशी के मारें दोनों की आँखें भर आईं,उस रात प्रयागी ने घर में घी के दीप जलाएं,प्रयागी ने रूद्र के मनपसंद पकवान तले और फिर खाने के बाद दोनों पति-पत्नी आपस में अपनी खुशियाँ बाँटने लगें,प्रयागी बोली....
मुझे यकीन था कि एक दिन जरूर हम दोनों की जिन्दगी में ये खुशी का क्षण आएगा,मैं आज बहुत खुश हूँ,
सही कहती हो,मैं भी बहुत खुश हूँ,तुम्हारा कितना इलाज करवाया लेकिन कोई फायदा ना हुआ और आज बिना इलाज के ही ये चमत्कार हो गया,रूद्र बोला.....
हाँ!मुझे डाँक्टर कहा करते थे कि तुम में कमी नहीं है,हो सकता है तुम्हारे पति में कमी हो ,उन्हें एक बार इलाज के लिए लाओ,लेकिन मैनें किसी डाँक्टर की बात नहीं सुनी और आज देखों ऊपरवाले ने मेरी झोली खुशियों से भर दी,प्रयागी बोली।।
तुमने डाक्टर की बात क्यों नहीं मानी?रूद्र ने पूछा...
मुझे तुम पर पूरा यकीन था और फिर प्रयागी रूद्र के अंकपाश में समा गई,सुबह दोनों ने इस खुशी के पल को भगवान के साथ बाँटने का सोचा और वें सुबह सुबह मंदिर पहुँचे.....
लेकिन मंदिर की सीढ़ियों पर जब रूद्रप्रयाग ने प्रेमप्रताप को देखा तो उसका माथा ठनका,वो उसे देखकर कुछ परेशान सा हो गया और उसे उस रात की बात याद आ गई जिस रात प्रेमप्रताप उसके घर आया था और अपनी पिस्तौल भूल गया था,उसके दिमाग़ में वो बात घर कर गई कि उस रात प्रेमप्रताप आया था तो कहीं ऐसा तो नहीं कि ये बच्चा......क्योंकि प्रयागी रात को बता रही थी कि उससे डाक्टरों ने कहा था कि उसके अंदर कोई कमी नहीं है अपने पति को भी इलाज करवाने के लिए ले आओ.....
वो इसी सोंच में डूबा हुआ था कि प्रयागी बोली....
क्या सोचते हो?मंदिर के भीतर चलो....
और कश्मकश़ में उलझा रूद्रप्रयाग मंदिर के भीतर तो चला गया लेकिन उसका मन पूजा करने में नहीं लगा,उसका दिमाग़ घूम रहा था और ना जाने कितनी शंकाओं ने उसे आकर घेर लिया था,पूजा करने के बाद दोनों घर पहुँच़े,तब प्रयागी ने उससे कहा....
देखा ना प्रेमप्रताप कितना बदल गया है वो मंदिर की सीढ़ियों में बैठा था,लोंग कहते हैं कि वो अब वहीं रहने लगा है,उसने अब अपनी हवेली के सारे ऐश-ओ-आराम भी छोड़ दिए हैं.....
तुम बहुत तरफदारी कर रही हो प्रेमप्रताप की,रूद्र ने ताना मारते हुए कहा....
क्यों ना करूँ उसकी तरफ़दारी ?वो सुधर जो गया है,प्रयागी बोली।।
या फिर और कोई बात है,रूद्र ने कहा।।
मैं तुम्हारा मतलब नहीं समझी,प्रयागी बोली।।
मेरा मतलब तो आइने की तरह एकदम साफ है,रूद्र बोला।।
कहना क्या चाह रहे हो?साफ साफ कहो ना!प्रयागी बोली।।
वही तो कह रहा हूँ जो मैं कहना चाहता हूँ,रूद्र बोला।।
मुझे समझ नहीं आ रहा,खुलकर कहो,प्रयागी ने तेज आवाज़ में कहा....
यही कि डाक्टरों ने तुमसे कहा था कि तुम में कोई कमी नहीं है,तुम इलाज के लिए अपने पति को लेकर आओ,इतने सालों से कोशिश करने के बावजूद हम दोनों माँ बाप नहीं बन पाएं लेकिन उस रात प्रेमप्रताप आया था और....,कहते कहते रूद्र रूक गया.....
और....क्या?......कहते कहते रूक क्यों गए?...आगें बोलो....और क्या....,प्रयागी चीखी।।
तुम सुनना ही चाहती हो तो सुनो,यही कि ये बच्चा मेरा नहीं प्रेमप्रताप का है,रूद्र एक साँस में सब कह गया.....
क्या कहा तुमने?..ये बच्चा तुम्हारा नहीं है...प्रेमप्रताप का है,ये कहते तुम्हें तनिक भी लज्जा नहीं आई....हे भगवान!ये सुनने से पहले मैं मर क्यों ना गई?प्रयागी चीखी।।
अब ज्यादा सती सावित्री बनने का नाटक मत करो,मुझे पता है कि ये बच्चा उसी का है,रूद्र ने एक बार फिर विष उगला......
ठीक है तुम्हें ऐसा लगता है तो मैं ये प्रमाणित करके रहूँगी कि ये बच्चा तुम्हारा है और जिस दिन तुम्हें सच्चाई पता चलेगी ना तो तुम कहीं के ना रहोगें,प्रयागी बोली.....
प्रयागी की आँखें गुस्से से लाल थी और उनसे आँसू बहे जा रहे थें,वो दीवार से टेक लगाकर बैठ गई और घुटनों में अपना मुँह छुपा लिया,इधर रूद्र भी ऐसे बैठा था जैसे कि वो युधिष्ठिर हो और वो जुएँ में अपना सबकुछ हार चुका हो,
ऐसे ही सुबह गुजर गई और काम करने आई मेहरी को प्रयागी ने दरवाजे के बाहर से ही लौटा दिया,ना सुबह रसोई बनी और ना दोपहर को ,दोनों ऐसे ही खामोश बैठे रहें ,साँझ हुई लेकिन प्रयागी अपनी जगह से टस से मस ना हुई ,अँधेरा गहराने लगा था और उसने अभी तक दीपक भी ना उजियारा,तभी रूद्र उठा और हाथ मुँह धोकर लालटेन जलाई फिर बाहर चला गया,वो मोती के पास पहुँचा और रो रोकर उसे सारा हाल कह सुनाया,तभी मोती बोली.....
तुम उस पर संदेह कर रहे हो,इतने सालों बाद तुम्हारे घर खुशी आई है और तुम उसे अपनाने की जगह कोस रहे हो,
तो क्या करूँ?खुश कैसे रहूंँ?रूद्र ने पूछा।।
उसे माँफ करके अपने बच्चे को अपना लो,इसी में सबका भला है,वो तुम्हारा ही खून है,प्रयागी ऐसा हरगिज़ नहीं कर सकती,वो केवल तुम्हें ही चाहती है,मोती बोली।।
सच कहती हो ना!रूद्र बोला।।
हाँ!बिल्कुल सच! अब तुम अपने घर लौट जाओ,रात बहुत हो चुकी है,मोती बोली।।
शायद तुम सच कहती हो और फिर इतना कहकर रूद्र मोती के कोठे से चला आया....

रात गहरी हो चली थी,रूद्र खुशी खुशी घर लौटा ,किवाड़ खोलकर वो भीतर गया,लेकिन प्रयागी घर पर नहीं थी,उसने पूरा घर छान मारा लेकिन उसे प्रयागी कहीं ना मिली,एकाएक लालटेन की रौशनी में उसकी नज़र उसके पुराने लोहे के सन्दूक पर गई,जिसमें वो अपना जरूरी सामान रखता था,उसने देखा कि वो खुला पड़ा था,ये देखकर वो एक पल को सन्न रह गया क्योंकि उसकी चाबी प्रयागी के पास ही रहती थी,
एकाएक रूद्र को कुछ ध्यान आया और वो उसमें उसे ढूढ़ने लगा,बहुत खोजने पर वो वस्तु उसे नहीं मिली और जिसे वो खोज रहा था वो उसकी लाइसेंसी पिस्तौल थी,जो अब वहाँ से नदारद थी,अचानक रुद्र के मस्तिष्क में ये विचार कौंधा कि कहीं प्रयागी तो उस पिस्तौल को नहीं ले गई,हे भगवान वो कुछ अनर्थ ना कर दे,आज मैनें उसके मान के टुकडे़ टुकड़े कर दिए,ऐसा तो नहीं वो मुझसे रूठकर कुछ ऐसा वैसा कर दें....बुरे ख्यालों ने रूद्र को घेर लिया...
पूरा गाँव खामोश सा नींद के आग़ोश में खोया था और प्रयागी,अब्यवस्थित सूती धोती के सीधे पल्लू में खुले सिर , खुले बाल और हाथ में पिस्तौल लेकर बस बेसुध सी चली जा रही थी,एकाएक वो मंदिर की सीढ़ियों के पास रूकीं और उसने किसी को पुकारा,वो प्रेमप्रताप था वो बोली...
प्रेमप्रताप!सो गए या जागते हो,
प्रेमप्रताप ने अपने चेहरे से चादर हठाते हुए और आँखें मिचमिचाते हुए कहा.....
कौन?प्रयागी है क्या?इतनी रात को तुम यहाँ क्या कर रही हो?
कुछ प्रमाणित करने आई थी,प्रयागी बोली....
क्या...?प्रेमप्रताप ने पूछा...
और फिर प्रयागी ने पिस्तौल प्रेमप्रताप की ओर तानते हुए उसके सीने में दो गोलियाँ चला दी,प्रेमप्रताप सीढियों पर अचेत होकर गिर पड़ा और उसके शरीर से खून की धारा बह चली,फिर प्रयागी ने जरा भी देर ना करते हुए अपने माथे पर पिस्तौल रखकर गोली चला ली,वो भी यूँ ही अचेत होकर गिर पड़ी,जिस धरती पर उसका सिर गिरा था वो धरती रक्तरंजित हो गई,
गोलियों की आवाज़ सुनकर कुछ ही देर में वहाँ भीड़ इकट्ठी हो गई,जब तक रूद्रप्रयाग वहाँ पहुँचा तो बहुत देर हो चुकी थी,प्रयागी ने उस रात ये प्रमाणित कर दिया था कि उसने अपने सतीत्व को कभी भंग नहीं होने दिया,वो सती थी और सती ही मरी,रूद्र ने उस पर लाँछन लगाया था,उसके मान के टुकडे़ टुकड़े कर दिए थे और ये कष्ट उसके लिए असहनीय था,उसका रूद्रप्रयाग ने मानभंजन किया था जिसे वो सह ना सकी और स्वयं को ईश्वर के चरणों में समर्पित कर दिया,प्रयागी के जाने के बाद रूद्रप्रयाग पागल सा हो गया,उसने प्रयागी पर संदेह किया और उस पर लाँछन भी लगाया ,वो ये सदमा सह ना सका और उसकी मानसिक स्थिति बिगड़ गई,रुद्र पागल सा गाँव की गलियों में आवारा फिरता रहता था इसलिए मोती को उस पर दया आ गई,वैसे भी वो उसे अपना अच्छा दोस्त मानती थी इसलिए वेश्यावृत्ति छोड़कर वो रूद्र का ख्याल रखने लगी....
तो ये थी प्रयागी के मानभंजन की कहानी,मास्टर जी बोले।।
जी!यही कहानी थी प्रयागी की,पुजारी जी बोलें,
इतने में पुजारिन जी बोलींं....
चलिए खाना तैयार है आप दोनों खाना खा लीजिए,
और फिर मास्टर जी और पुजारी जी साथ में खाना खाने बठ गए.....

समाप्त.....
सरोज वर्मा...