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जलन (रहस्य रोमांच कथा - भाग-1)

आलीशान बंगले के सामने दो हजार वर्ग फुट तक फैले आलीशान लॉन के बीचो-बीच घास पर साक्षी मृतावस्था में पड़ी हुई थी. इन्स्पेक्टर यशोमी लाश का मुआयना करने नीचे बैठी. यशोमी ने लाश के करीब बैठकर चारों ओर नजरे दौड़ायी. लॉन में काफी लाइटिंग की हुई थी. एक कोने में बार काउन्टर बना हुआ था तो उससे थोड़ी दूरी पर पूरी सजावट के साथ मखमली कपड़े से आच्छादित टेबल पर वेज-नॉन-वेज खाना बर्तनों में रखा हुआ था जिसमें कई तरह के पकवान रखे हुए थे. लॉन में यहां वहां कुछ बोतले, गिलास, और प्लेटे बिखरी हुई थी. लाश के थोड़ा करीब ही एक गोल मेज पर बड़ा सा केक तकरीबन आधा कटा हुआ रखा था.

            लॉन में थोड़ी-थोड़ी दूरी पर लोग तीन-तीन, चार-चार का ग्रुप बनाकर खड़े एकदूसरे से कानाफूसी कर रहे थे. लाश के मुंह से झाग निकलकर उसके कानों तक फैला हुआ था. शरीर का रंग हलका नीला हो गया था. स्पष्ट लग रहा था कि साक्षी की मौत जहर से हुई है.

यशोमी लाश का मुआयना करने के बाद अपने घुटनों पर हाथों का जोर देते हुए उठ कर सीधे खड़ी हो गई और एक सरसरी निगाह सभी लोगों पर डालते हुए बोली, “मुझे किसने फोन किया था”.

यशोमी से थोड़ी ही दूरी पर उसके एकदम सामने खड़ा एक आदमी एक कदम आगे बढ़ाता हुआ आगे आया और बोला, “मैडम मैंने ही आपको कॉल किया था”

“हं…! तुम कौन हो और मृतक से क्या रिश्ता है?”

“मैडम मेरा नाम लोकेश है और मैं साक्षी का पिता हूं”

“साक्षी कौन?”

लोकेश के जवाब से यशोमी जान तो गई थी की मृतक का नाम साक्षी है लेकिन उसके मानने से कानून नहीं मानता. सभी बातें गवाह और सबूतों के आधार पर ही सिद्ध करनी होती है. अत: यशोमी का यह सवाल अटपटा नहीं बल्कि उसके इन्वेस्‍ट‍िगेशन का हिस्सा था.

“मैडम मृतक मेरी बेटी है और उसी का नाम साक्षी है”

“ओह… ! किस बात की पार्टी हो रही थी यहां ?”

“मैडम आज साक्षी का एटीन्थ बर्थ-डे था”

“अठारवां जन्म दिन.. जिसे आप में से किसी ने उसका मरण दिन बना दिया” इतना बोलने के बाद थोड़ी देर यशोमी कुछ सोचती रही. लोकेश के एकदम करीब जाकर उसकी आंखों में आखें डालकर अगला सवाल किया, “हां.. तो मिस्टर लोकेश.. यही नाम बताया था ना.. आपने”

लोकेश ने हां में सिर हिलाया.

“तो मि. लोकश, आप मुझे ये बताएं कि आपकी बेटी की जान किसने ली होगी ?”

“मैं…. मै कैसे बता सकता हूं मैडम, मेरी बेटी तो बहुत अच्छी थी, उसका कोई दुश्मन होगा ऐसा मुझे नहीं लगता”

“दुश्मन तो है मिस्टर लोकेश… और वह दुश्मन इसी पार्टी में मौजूद भी है. इसको जो कुछ भी खिला या पिलाकर जान ली है वह यहां पार्टी में मौजूद किसी ना किसी ने ही ली है. बस आप मुझे बताएं की वो कौन हो सकता है?”

लोकेश ने वहां मौजूद सभी की ओर एक सरसरी निगाह डाली और फिर यशोमी की ओर देखते हुए बोला, “यहां तो सभी जान पहचान के ही लोग है और सभी साक्षी से प्यार करते है, किसके मन में साक्षी के लिए नफरत पनप रही थी मै कैसे बता सकता हूं”

“क्या यहां मौजूद किसी के साथ साक्षी का कभी कोई झगड़ा हुआ ही नहीं था”

“मैडम, साक्षी का किसी से कोई झगडा हुआ हो ऐसा तो मुझे मालुम नहीं, वह अपनी मां के साथ ज्यादा रहती थी शायद उसे पता हो”

“तो क्या तुम उसके साथ नहीं रहते थे?”

“साक्षी की मां से तलाक लेने के बाद मै दूसरे इलाके में शिफ्ट हो गया और तब से वहीं रह रहा हूं. मै साक्षी से जब इच्छा होती मिलने चला आता या उसकी इच्छा होने पर वह मिलने चली आती. फोन पर भी हमारी बातें कम ही होती थी.”

तभी एक हवलदार यशोमी के पास आकर उसके कान में फुसफुसाया, “मैडम, कुछ लोग सटकने की कोशिश कर रहे है”

“कौन है?” इतना बोलकर यशोमी ने गेट की ओर देखा और जोर से चिखते हुए बोली,

“यहां से कोई भी नहीं जायेगा जब तब मैं परमिशन नहीं देती. चलो…! सभी लोग इधर आ जाओं” उसने हाथों से एक तरफ इशारा कर सभी को वहां खड़े होने को कहा और उसी हवलदार की ओर देखते हुए बोली, “दामले.. इन सभी को एक लाइन में खड़ा कर सभी के नाम, पते और मोबाईल नंबर लिखो और सबकी अच्छे से पर्सनल तलाशी लो. कोई भी छूटना नहीं चाहिए, कोई भी यानी कोई भी. साथ ही सभी के नंबर लिखने के बाद कॉल करके भी देखों फोन बजता है या नहीं. जिसका फोन ना बजे उसे जाने मत देना.”  यशोमी ने थोड़ी उंची आवाज में ही हेड कान्स्टेबल दामले को यह निर्देश दिये और लोगों की ओर देखते हुए आगे बोली,

“आप को जब भी हमारा फोन आये और पुलिस स्टेशन में बुलाया जाये तो सारे काम छोड़कर पहले पुलिस स्टेशन आना होगा. जो नहीं आयेगा उसका कॉलर पकड़कर घसीटते हुए पुलिस स्टेशन लेकर आऊंगी. अभी अपना नाम, पता, मोबाइल नंबर लिखों को पूरी तलाशी देने के बाद ही यहां से जाना.”

यशोमी के साथ केवल एक महिला कान्स्टेबल और दो हवलदार आये हुए थे. अत: पार्टी में मौजूद लड़कियो और महिलाओं की तलाश स्वयं यशोमी महिला कान्स्टेबल के साथ मिलकर करने लगी. दामले पेन, रजिस्टर लेकर लिखने में जुट गया तो दूसरा हवलदार पुरूषों की तलाशी लेने लगा.

तब तक फॉरेन्स‍िक टीम भी वहां आ पहुंची. टीम ने अपना काम शुरू कर दिया. वे लॉन में मौजूद हर एक चिज का सैम्पल लेने लगे. बचा हुआ पूरा केक, केक कांटने वाला चाकू, शराब और कोल्ड्रिंक के आधे या खाली हो चुके गिलास, बोतल, केक जिस टेबल पर रखा था उसे जिस कपड़े से आच्छादित किया गया वह कपड़ा, टेबल के आस-पास जो भी छोटी से छोटी कोई वस्तूं नजर आई तो उसे भी उन्होंने उठा लिया. वीडियोग्राफी कर रहे वीडियोग्राफर के सारे इन्स्ट्रूमेन्ट जैसे, वीडियो कैमरा, ड्रोन कैमरा और वह चिप एवं डिस्क जिसमें फोटो और वीडियो रिकार्ड होकर सेव हो रहे थे ले लिय गये. लोगों से पूछा गया कि किस-किस ने पार्टी में फोटो या वीडियो बनाया है उन सभी लोगों के मोबाइल भी जमा कर लिये गये और उन्हें बताया गया कि कल इन मोबाइल से पार्टी के सारे वीडियो और फोटो कम्प्यूटर में सेव करने के बाद लौटाएं जाएंगे.

साक्षी का मृत शरीर एम्बुलेन्स में रखकर पोस्टमोर्टम के लिए सरकारी अस्पताल की ओर रवाना कर दिया गया. तभी मालती चक्कर आकर गिर पड़ी. यशोमी दौड़कर उसके पास पहुंची उसे उठाया और पुछा,

“क्या हुआ?”

मालती लड़खड़ाते आवाज में बोली “कु…..कुछ नहीं मैडम…. थोड़ा चक्कर सा आया”

“तुम्हारी बेटी मर गई इसलिए या किसी और वजह से?” यशोमी को ऐसे कड़े और वाहियात सवाल करने ही पड़ते थे.

मालती अजीब सी नजरों से यशोमी को देखने लगी. तभी वहां एक महिला आई और उलहाना देने वाले अंदाज में बोली,

“बेटी  की वजह से…. अरे नहीं मैडम ! लगता है इसके पेट में कुछ नहीं है, जो पचता नहीं वह ज्यादा लेगी तो उल्‍टी तो होगी ही ना. मेरे सामने की इसने. उसी की कमजोरी होगी” फिर उस औरत ने एक नजर मालती की ओर देखा और बोली, “सच बोला ना मैंने मालती”

मालती ने पलट कर उस औरत को देखा और सीधे खड़े होते हुए आगे कदम बढ़ाने की कोशिश की तो लड़खड़ा गई. यशोमी ने उसे फिर पकड़ लिया.

यशोमी ने लोकेश को इशारे से पास बुलाया और बोली,

“आप अपनी पत्नी…….”

“मैडम एक्स-वाईफ..”

“अं…, व्हाट एवर…. इसे इसके कमरे तक छोड़ कर आओ” और मालती के शरीर का बोझ लोकेश पर डाल दिया. लोकेश मालती को सहारा देते हुए वहां से बंगले की ओर चल पड़ा.

पूरे लॉन का एक-एक कोना छान मारकर छोटी से छोटी संदेहजनक वस्तू को जब्त कर लिया गया. इस तलाशी में उन्हें एक जगह एक विदेशी बनावट की रिवाल्वर नजर आई. जिसे यशोमी के संज्ञान में लाया गया. यशोमी ने उसे दस्ताने पहन कर हलके से पकड़ा और उलट पलट कर देखा. उसके बाद उसे जब्त किये सामन के साथ रख दिया और बोली,

“हर चिज से फिंगर प्रिंट उठाना है और जितनी जल्दी हो सके मेरी टेबल पर रिपोर्ट पहुंच जानी चाहिए”

इस पूरी प्रक्रिया में काफी समय लगता देख वहां फिलहाल बचे हुए लोग थकान महसूस करने लगे. घड़ी बता रहीं थी दो बजने वाले है. यशोमी भी इस समय वहां बचे हुए मौजूद लोगों से सवाल-जवाब करने के मूड में नहीं थी. उसे वहां का ठीक से मुआयना करना था यह मुआयना करते हुए छोटी से छोटी बातें वह अपनी डायरी में लिखते जा रही थी. उसने पूरे लॉन का और फिर घर के अंदर जाकर वहां का भी मुआयना किया.

साक्षी के बहन-भाई दोनों भी अपने अपने कमरे में चले गये. लोकेश भी वहां से जाने के लिए उतावला हो रहा था. तकरीबन सारे लोग जा चुके थे. पुलिस का काम जारी था इसलिए उसे वहां रूकना पड़ रहा था. पूरी टीम एक जगह जमा हुई और यशोमी को बताया की यहां का काम खत्म हो गया है उन्हें जाने की इजाजत दे तो यशोमी ने फॉरेन्सिक टीम को जाने की अनुमत‍ि दी और अपनी टीम की ओर मुखातिब होकर कहां,

“चलो हम भी चलते है” और लोकेश की देखकर आगे बोली, “मिस्टर लोकेश हम जब भी आपको बुलाएं हमारे सवालों के जवाब देने आ जाना.” इतना बोलकर यशोमी अपनी टीम के साथ वहां से निकल गई.

यशोमी अपने घर पहुंची तो सुबह के चार बज रहे थे. उसने अपने पर्स के चाबी निकाली, दरवाजे का लॉक खोलकर घर के अंदर दाखिल हुई. कमरे में मंद रोशनी फैली हुई थी. सबसे पहले उसने अपने बच्चों के बेडरूम की ओर देख उस ओर का रूख किया. हौले से दरवाजा खोलकर देखा उसके दोनों बच्चे सोये हुए थे. फिर धीरे से दरवाजा बंद कर वह अपने बेडरूम की ओर बढ़ी. यहां भी उसने दरवाजा धीमे से खोला और अपने बेड के करीब पहुंची. उसका पति गहरी नींद में था. एक नजर उसे देखने के बाद वह अपने वार्डरोब की ओर बढ़ी, कपड़े बदले और हौले से ही बेड पर अपने पति के बगल में जाकर लेट गई. थकान इतनी थी कि वह जल्द ही नींद की आगोश में समा गई.

आंख खुली तो देखा सूरज काफी उपर चढ़ आया है. सुबह के दस बज रहे थे. वह जल्दी से उठी और भागते हुए ही गुसलखाने में घुस गई. जब बाहर आई तो सामने ही पति चाय की प्याली लेकर खड़ा था. यशोमी ने अपने पति के हाथ से चाय की प्याली ली और जल्दी जल्दी चाय पीने लगी.

“अरे… अरे… ! धीरे… धीरे-धीरे चाय पीओ, इतनी क्या जल्दी है ? मुंह जल जायेगा. रात को तो तुम आई नहीं, सुबह भोर के समय ही आई होगी. तुम कब आकर मेरी बगल में सो गई मुझे तो पता ही नहीं चला.”

“तुम्हारे सवालों के जवाब मैं तुम्हें बाद में दूंगी मुझे अभी बहुत जल्दी है.” यशोमी चाय की खाली प्याली अपने पति की ओर बढ़ाते हुए बोली तथा अपने वार्डरोब के सामने जाकर अपना युनीफार्म पहनने लगी. युनिफार्म पहनकर यशोमी तुरंत ही किचन में पहुंच गई थी जहां उसका पति उसके लिए नाश्ता बना रहा था. यशोमी ने जैसे ही उसे खाली प्याली थमाई और बोली की जवाब बाद में देंगी वह समझ गया की यशोमी को यद‍ि पांच म‍िनट में नाश्ता नहीं मिला तो वह भूखी ही चली जाएगी. इसलिए वह सीधे किचन में पहुंच नाश्ता बनाने में लग गया था.

यशोमी ने खड़े खड़े ही नाश्ता किया. बच्चे भी अपनी मम्मी से मिलने किचन में ही आ गये. आठ और बारह साल के दो बच्चे बड़ा लडका तो छोटी लड़की थी. यशोमी ने दोनों बच्चों के सिर पर से हाथ फेरा तथा उन्हें अपनी बाहों में लेकर जल्दी जल्दी चूमना शुरू किया. बच्चों को आदत हो गई थी अपने मम्मी के इस सुपरफास्ट लाड-प्यार के तरीके की. उन्होंने भी अपनी मम्मी को उसी अंदाज में किस करना शुरू किया और उससे छिटक कर दूर खड़े हो गये.

घर के बाहर करीब एक घंटे से पुलिस की वैन खड़ी थी यशोमी के इंतजार में.  वह आते से ही बोली,

“चलो.. चलो प्रकाश बहुत देर हो गई.”

“मैडम सच में आपने आज बहुत देर कर दी. एक घंटे से इंतजार कर रहे है हम.”

“अरे.. क्या बताना रात की थकान ऐसी थी की मेरी नींद ही अब खुली और मुझे किसी ने उठाया भी नहीं.”

“मैडम नींद तो हमारी भी पूरी नहीं हुई. पर हमे आलार्म लगाकर रखना पड़ता है, हम लेट हो जाते तो आपकी भी डांट सुननी पड़ती है हमें”

“अच्छा ये सब जाने दो, रात वाले केस के कुछ अपडेट मिले है”

दामले बोला, “कहां मैडम, पयटीये तो घर पहुंचे. साली नींद लगीच रई थी के सुबा हो गई. उठकर सीधे आपके बंगले के सामने आकर गाड़ी खड़ी की. किदर से क्या मिलता, अभी तो स्टेशन जाके ही कुछ मालूम पड़ेगा.”

“ठीक है, अभी… साक्षी के बाप और मां दोनों को फोन लगाओ और पंद्रह म‍िनट में पुलिस स्टेशन में आने को बोलो. उनके बयान से ही तहकीकात की शुरूआत करते है”

“ठीक है मैडम अभी फोन मिलाता हूं” और हेड कान्स्टेबल दामले कॉल लगने में मशगुल हो गया. वैन तेजी से पुलिस स्टेशन की ओर दौड़े जा रही थी.

पुलिस स्टेशन पहुंचने पर सबसे पहले यशोमी ने अपने टेबल पर रखे हुए रजिस्टर और दस्तावेज चेक किये. तब तक थाना इन्चार्ज भी अंदर आ गया और आते ही रात से लेकर तो सुबह तक क्या क्या हुआ, कौन-कौन स्टेशन आया था सारी जानकारी देने लगा.

यशोमी ने पुछा, “रात को हम जिस केस की तफ्तीश के लिए गए थे उससे संबंध‍ित कोई व्यक्ति या जानकारी नहीं आयी.”

“नहीं मैडम. सिर्फ एक लड़का आया हुआ है. बाहर बैठा है. बोल रहा था उसका फोन हवलदार ने जप्त कर लिया था वापस चाहिए.”

“ठीक है तुम जाओं” और उसने दामले को आवाज दी, “दामले……”

“येस मैडम”

“फोन करने बोला था क्या हुआ ? हमसे पहले पहुंच जाना था उन लोगों को. आये क्यों नहीं ?”

“मैडम फोन किया, साले दोनों नवरा-बायको दवाखाने गये है. बेटी का मुर्दा लाने”

“अबे तो क्या उनको इतनी सुबह सुबह लाश पोस्टमार्टम करके मिलने वाली है. उसके लिए तो दोपहर के दो-तीन बज जायेगे तो क्या अपनी बेटी का पोस्टमार्टम भी ये पति-पत्नी खुद करने वाले है. उन्हें फिर से फोन लगाओ और बुलाओं यहां.”

“मैडम मैने दोबारा किया था… फोन. आने को रेडीच नइ है. हम ही लोग भैनxx (अश्लील गाली) अपनी नींद खराब करके सुबह सुबह डिवटी बजाने चले आते है.”

“अं…..! दामले मेरे सामने ऐसी मां-बहन की गाली देकर बात नहीं करना, पता है ना.”

“सॉरी मैडम”

पुलिस विभाग ऐसा है की यहां रात-दिन अश्लील गालियां सूनने को मिलती है जिसकी वजह से पुलिस स्वयं भी गालियां देने की आद‍ी हो जाती है.

“ठीक है एक काम करो वो मोबाइल जिनमें वीडियो रिकॉर्डिंग और फोटो है सब कम्प्यूटर में डालों और मुझे दिखाओं. आज यहीं काम करते है. उस बाहर बैठे लड़के को अंदर भेजो देखते है उससे क्या जानकारी मिलती है.”

हे.कां. दामले मोबाइल जमा की हुई थैली लेकर कम्प्यूटर रूम में चला गया. दूसरे हवलदार ने बाहर बैठे उस युवक को मैडम के केब‍िन में बुलाया. वह युवक यशोमी के सामने आकर बैठा.

“क्या नाम है तुम्हारा ?” यशोमी ने सवाल किया.

“जी.. रोहित”

“साक्षी को कैसे पहचानते हो ?”

“क्लासमेट है”

“कौन-सी क्लास में पढ़ते हो ?”

“बारहवीं…. मैम मेरा फोन”

“मिल जायेगा. पहले मेरे सवालों के जवाब दो”

“मैम पापा बहुत गुस्सा हो रहे है वो फोन के लिए. मुझे फोन लेकर जाना है”

“बोला ना मिल जाएगा…. पहले जवाब”

वह चुप हो गया. यशोमी ने आगे पूछा

“क्या वह तुम्हारी गर्लफ्रेन्ड थी ?”

“नहीं मैम, सिर्फ फ्रेन्ड”

“ओ के.. ! कब से फ्रेन्ड है वो तुम्हारी ?”

“सेवन स्टैण्डर्ड से”

“उसके पहले उसे जानते नहीं थे ?”

“जानता था मैम.. हम तो पहली क्लास से ही साथ में पढ़े लेकिन फ्रेन्डशिप सेवन स्टैण्डर्ड में हुई”

“क्या लगता है तुम्हें किसने मारा होगा साक्षी को ?” अचानक से यशोमी ने सवालों का रूख बदल दिया.

“आय डोण्ट नो मैम. मैं… मैं नहीं जानता”

“तुम तो उसके सेवन क्लास से दोस्त हो.. लेकिन जानते नहीं साक्षी को कौन मार सकता है ? दोस्त तो अपनी सारी बातें शेअर करते है. कुछ तो शेअर किया होगा उसने तुम्हारे साथ.”

“वो….. मेरे साथ अपने सीक्रेट शेअर नहीं करती थी. हम बस सिर्फ दोस्त थे.”

“उसने तुम्हें पार्टी में बुलाया इसका मतलब तुम कुछ खास तो थे उसके लिए”

“मैम उसकी दोस्ती तो भाविक के साथ ज्यादा थी वो उसके साथ रिलेशनशिप में भी थी”

“कौन भाविक ? पार्टी में आया था.. ?

“नहीं”

“क्यूं ?”

“वो…….. उनका… ब्रेकअप हो गया है. बात नहीं करते दोनों एकदूसरे से”

“क्यूं …? क्यूं हो गया ब्रेकअप ?”

“मैम.. ये तो पूरी तरह पता नहीं”

“तो आधी तरह ही बता दो”

“वो चिट कर रहीं थी”

“मतलब”

“वो किसी दूसरे को डेट कर रहीं थी”

“किसे”

“पता नहीं”

“सिर्फ कॉलेज में चर्चा थी की साक्षी का किसी दूसरे के साथ चक्कर चल रहा है और वो भाविक को इग्नोर कर रही है.”

“तुमने पूछा नहीं साक्षी को कि वो किसे डेट कर रही है”

“वो सारी बात बताती नहीं थी, कॉलेज में भी कम ही आ रही थी. हमारी मुलाकात भी नहीं होती थी ज्यादा.”

“क्या.. भाविक ने उसे मारा होगा ?”

“पता नहीं…”

यशोमी ने उससे और भी बातें पूछी पर भाविक और साक्षी के रिलेशनशिप और ब्रेकअप के अलावा और कुछ भी पता नहीं चला.

“देखों तुम्हारे फोन से डाटा लिया जा रहा है. थोड़ी देर में तुम्हे तुम्हारा फोन वापस मिल जायेगा. तुम बाहर जाकर बैठो.” और यशोमी कम्प्यूटर रूम में चली गई.

“क्या हुआ दामले …? सारे फुटेज ले लिये.”

“सुरू आहे मॅडम… एक से दूसरे में डालने में समय लगता है. पांच-दस म‍िनट वाला काम नइ है ये”

तभी कम्प्यूटर ऑपरेटर बोला, “हो गया मैडम आप देख सकते है” और अपनी कुर्सी से उठ गया. यशोमी ऑपरेटर ने खाली की हुई कुर्सी पर बैठी और एक-एक कर सारे फोटो और वीडियो ध्यानपूर्वक देखने लगी.

अब तक जितने भी फोटो वीडियो देखे उनमें यशोमी को कुछ भी अटपटा या संदेहजनक नहीं दिखा. कुछ और वीडियो देखने बाकी थे. खास कर ड्रोन से ली गई वीडियो यशोमी इत्मीनान से देखना चाहती थी. उसने वह वीडियो शुरू ही किया था कि उसका मोबाइल बज उठा. यशोमी ने कॉल रिसीव किया. दूसरी ओर से सरकारी अस्पताल के डॉक्टर की आवाज आयी,

“यशोमी, पोस्टमार्टेम हो गया है. तुम आ जाओ बॉडी रिश्तेदारों को हैंडओवर करनी है. कुछ पेपर्स पर तुम्हारे सिग्‍नेचर की जरूरत है.”

“ठीक है मै अभी पहुंच रही हूं” कहते हुए यशोमी उठी और हे.कां. दामले से कहा, “दामले, प्रकाश को बोलो गाडी निकाले हॉस्प‍िटल जाना है.”

सरकारी अस्पताल के शवगृह के बाहर काफी भीड़ थी. दस-दस, बारह-बारह का संघ बनाकर लोग खड़े थे. सब एक-दूसरे से बतियाते हुए. परिसर में एकसाथ इतनी सारी आवाजें थी कि हर किसी को एक-दूसरे से  बात करने के लिए उंची आवाज में ही बात करनी पड़ रही थी. यशोमी अपने लिए उस भीड़ में से रास्ता बनातें हुए शवगृह के बगल में बने कमरे में पहुंची. यहां भी काफी भीड़ थी. दरवाजे के पास ही टेबल कुर्सी लगाकर अस्पताल का एक कर्मचारी रजिस्टर लेकर बैठा हुआ था. लोग उसे ऐसे घेरे खड़े थे की उसके सिर का एक बाल भी नजर नहीं आ रहा था. उसी कमरे के एक कोने में टेबल के पीछे कुर्सी पर डॉक्टर बैठी हुई थी. उसके सामने भी तीन से चार लोग खड़े थे. डॉक्टर उन्हें कुछ समझा रही थी. यशोमी को देखते ही डॉक्टर ने उससे हाथ मिलाया और बोली,

“अच्छा हुआ तुम आ गई ये लोग मेरा दिमाग चाट रहे है. ये इनके केस पेपर्स है. पोस्टमार्टेम हो गया है. तुम्हारे सिग्‍नेचर के बिना लाश लेकर नहीं जायेगे ऐसी रट लगाए हुए है.”

यशोमी ने उन लोगों की ओर देखा उनमें साक्षी के पिता एवं उसके जान पहचान वाले लोग थे. यशोमी उन्हें देखकर बोली,

“क्यों.. मैने तो तुम्हें पुलिस स्टेशन बुलाया था बयान लिखाने. तुम आये क्यों नहीं ?”

“मैडम मेरी बेटी की लाश यहां अस्पताल में पड़ी थी और मै पुलिस स्टेशन आऊं”

“तो क्या तुम अपनी बेटी का पोस्टमार्टेम करने वाले थे ? देखा ना दोपहर के दो बज गये है. इतनी देर तुम लोग यहां भीड़ इकठ्ठा करके खड़े रहते हो. बाहर पूरा बाजार भरा हुआ है. लाशे यहां सजाकर नहीं रखी जाती. पोस्टमार्टेम होने के बाद परिवार वालों को सौंप दी जाती है. पर तुम लोग डॉक्टर और यहां के कर्मचार‍ियों पर विश्वास करने के बजाय उनके काम को और जटील बना देते हो. यहां ऐसा शोर मचाकर उनकी एकाग्रता को भंग करते रहते हो.”

तभी लोकेश के साथ खड़ा दूसरा आमदी बोला, “ओ … इन्सपेक्टरनी…, ये लेक्चर किसी ओर को देना. पहले यह बताओं हमारी बेटी का कात‍िल पकड़ा गया या नहीं. जब तक कातिल पकड़ा नहीं जाता हम लाश यहां से ले जाने वाले नहीं है.”  

“तुम कौन हो ?”

“एम.एल.ए. का पी.ए. हूं. बंडू राऊत नाम है मेरा. अगर शाम तक कातिल नहीं पकड़ा गया तो तुम्हारे पुलिस स्टेशन की इट से इट बजा दूंगा.”

“पहले ठीक से पिछवाडा धोना सीखो”

“क्या बोली”

“लगता है कम सुनाई देता है. मैने बोला पहले अपने एम.एल.ए. का पीछवाडा ठीक से धोना सीखों फिर हमारे पुलिस स्टेशन की इट से इट बजाना और रहा कातिल को पकड़ने का सवाल तो पहले यह बताओं तुम में से कितने लोगों ने अब तक बयान दिया है. पूरी की पूरी फैमिली लाश उठाने यहां पहुंची हुई है. क्या इस शोर में तुम सबका बयान लिखूं. फोन करके जिससे भी बात की कोई पुलिस स्टेशन आने को तैयार नहीं. हमसे कोई मिलना और कुछ बताना चाहता नहीं. चल तु ही बता कौन है कातिल और कैसे खून किया मै अभी उसे गिरफ्तार करती हूं. बता…. बता. साले.. समझता कुछ नहीं चले आते है हमें सिखाने. अब तुम लोग लाश के क्रियाकर्म में लग जाओगे. कोई करेगा बात हमारे साथ, बताएंगा की क्या हुआ? क्यों हुआ? किसने किया? हमे ही बोलोगे क‍ि दिख नहीं रहा है, सभी कितने दु:ख में है वे लाश का क्रियाकर्म करे या आपके सवालों के जवाब दे. इनसे कुछ ना पूछा जाए इसके लिए भी तुम जैसे एम.एल.ए. के पिछवाडे की बदबू हमारे नाक में जबरदस्ती घुसने की कोशिश करते हो”

यशोमी की आवाज में करारपन था. उसके मुंह से निकलने वाला हर शब्द तीर की तरह सुनने वाले के मन-मस्तिष्क को भेद रहा था. उसके चेहरे की कठोरता और आत्मविश्वास देखकर लोकेश उसके साथ खड़े लोग थोड़ा सहम गये और आगे कुछ बोल नहीं पाएं. यशोमी आगे बोली,

“मि. लोकेश अपनी बेटी की लाश लेकर जाओं और इस केस में बिना पोलिट‍िकल इन्टरफेयर के मुझे जांच पड़ताल करने दो और मुझे बताओं की तुम कब अपना बयान दोंगे मुझे. तुमसे, तुम्हारी उस एक्स वाइफ से और तुम्हारे बच्चों से बहुत से सवाल करने है.”

लोकेश अपने साथ आये आदम‍ियों को लेकर वहां से निकल गया. यशोमी ने डॉक्टर से पूछा, “क्या रिपोर्ट है डॉक्टर ?”

“जहर दिया गया है केक के माध्यम से क्यों कि उसके पेट में केक के अलावा कुछ नहीं था.”

“लेकिन केक तो काफी लोगों ने खाया वहां पर. केक में जहर होता तो जिन्होंने भी खाया उन सबकी मौत होनी चाहिए थी या कम से कम उनकी हालत तो खराब होनी ही चाहिए थी. लेकिन पार्टी में किसी और की मामुली सी भी तबीयत खराब नहीं हुई.”

“फॉरेन्सिक की रिपोर्ट आ गई है क्या उन्होंने बताया होगा ना कि केक में कुछ मिलाया गया था या नहीं.”

“फॉरेन्सिक से अभी तक तो कुछ आया नहीं. वे लोग भी शाम तक कुछ बेसीक जानकारी दे पायेगे शायद और जहां तक मुझे लग रहा है केक में कुछ भी नहीं मिलेगा.”

“यशोमी मै दावे से कहती हूं, जहर केक में ही था और इसका असर जहर खाने के बाद दस से पंद्रह म‍िनट बाद हुआ है. ये सांप का जहर है यदि सांप काट ले तो जहर सीधे खुन में मिल जाता है और पांच म‍िनट के अंदर अंदर ही मौत हो जाती है लेकिन यदि यह मुंह के माध्यम से पेट में चला जाए तो उसे खुन में मिलने के लिए समय लगता है और पंद्रह म‍िनट से आधे घंटे के बीच मौत होती है. विक्टिम में पेट में जहर केक के माध्यम से ही गया फिर धीरे-धीरे वह पूरे शरीर में फैलने लगा. उसके बाद उसकी मौत हुई.”

थोड़ी देर तक डॉक्टर यशोमी को साक्षी की मौत से संबंधित कुछ टेक्निकल बातें बताती रही.

अस्पताल के बाहर आते हुए यशोमी हे.कां.दामले से बोली,

“देखा दामले, इस केस के संबंध में रत्ती भर भी जानकारी दिए बिना ये लोग बोल रहे है कातिल को शाम तक पकड़ लो. सालों ने क्या पुलिस वालों को अलादीन का ज‍िन्न समझ रखा है. इनके मुंह से कुछ निकलते ही पुलिस वालो ने ‘जी हुजूर आका’ बोलकर चुटकी बजाते ही केस हल कर देना चाहिए”

“जाने दो ना मॅडम…. आपने साले की अच्छी बजा दी. उसके बाद एक पण सब्द नहीं बोला कोइच.”

उनकी गाड़ी पुलिस स्टेशन की ओर चल पड़ी थी. यशोमी और उसकी पूरी टीम के दिमाग में साक्षी की मौत कैसे हुई के सवाल ने धुम मचा रखी थी. समंदर में उठे तुफान की लहरों की तरह बार-बार मौत कैसे हुई और किसने की के सवाल दिमाग से आकर टकराते और बिना जवाब पाये लौट जाते.

दामले बोला, “मॅडम हम सीधे उनके घरीच चलते है वइ पर सब एक सोबत मिलेंगे. एक-एक का बयान वइ पर नोंद करेंगे.”

“कर तो सकते है दामले, लेकिन मेरा यह तरीका नहीं है. कोई भी एकाग्र होकर हमारे सवालों के जवाब नहीं देंगा. बीच में ही उठकर चले जायेगे. रसुख वाले लोग है. हम पर ही प्रेशर बनाने की कोशिश करेंगे. उससे अच्छा है उन्हें फ्री हो जाने दो उसके बाद ही उनके बयान लेंगे.”

यशोमी थोड़ी देर रूक कर कुछ सोचती रहीं फिर आगे बोली, 

“दामले, सुबह जो लड़का आया था उसने किसी भाविक का नाम बताया था. अपने खबरी लगा दो उसकी जानकारी निकलने के लिए. मुझे दोनों लड़कों की पूरी हिस्टरी जॉग्रफी चाहिए. हम यहीं से अपने जांच की सुरूआत करते है. फिर वह ड्रोन वाला वीडियो भी देखना है. शायद उससे कुछ पता चले. पर सबसे पहले भूख लगी है दामले चलो किसी होटल में चलकर कुछ खाते है.”

शाम को यशोमी के टेबल पर कागजों का पुलिंदा एक हवलदार ने लाकर पटक दिया.

“मैडम, फॉरेन्सिक के रिपोर्ट है”

यशोमी ने पहला पेपर उठाया उस पर रात को जो भी सामान जांच के लिए जब्त किया गया था वह उसकी लिस्ट थी. लिस्ट काफी लंबी थी. लिस्ट के क्रमानुसार ही सारे पेपर लगे हुए थे. हर वस्तु का उसमें विवरण और उसपर से लिए गए फिंगरप्रिंट की तथा अन्य टेक्निकल जानकारी दर्ज की हुई थी. जिसपर सबसे आखिर में फॉरेन्सिक एक्सपर्ट की टिप्पण‍ियां लिखी हुई थी.

एक-एक पेपर जांचते हुए नौ कब बज गऐ यशोमी को पता हीं नहीं चला. उसे थकान महसूस होने लगी. रात से दामले, प्रकाश और गीता उसी के साथ थे. उन्हें भी आराम की आवश्यकता थी. यशोमी ने प्रकाश से कहां की उसे घर छोड़ दे और बाकी सब को भी और वह खुद भी घर चला जाए.

रात का खाना पति और बच्चों के साथ खाने के बाद बच्चों के साथ थोड़ा समय बिताकर यशोमी जब अपने बेड पर आयी. दोनों पति-पत्नी में बातें होने लगी. यशोमी ने साक्षी के केस से संबंधित उपरी-उपरी बातें अपने पति को बताई. उसके सारे सवालों के जवाब देकर देर के आने के लिए माफी मांगकर अपने पति को संतुष्ट किया. यशोमी के साथ शादी के चौदाह साल गुजारते हुए वह जान गया था कि पुलिस की लाइफ क्या होती है. वह यशोमी को हर संभव साथ देता था. उसके किसी भी काम में रूकावट हो ऐसा उसने कभी बर्ताव नहीं किया. यशोमी भी अपने पति के इस स्वभाव से संतुष्ट थी. एक स्त्री का परिवार के लिए कम समय देना और घर की, खास कर किचन की कोई भी जिम्मेदारी न निभाने के बावजूद उनका वैवाहिक जीवन सफल और सुखकारक था.

दूसरे दिन सुबह-सुबह आठ बजे ही यशोमी की टीम मालती के घर पर थी. घर का माहौल गमगीन था. मालती के घर में उसके कुछ रिश्तेदार भी थे. लेकिन यशोमी मालती के साथ एक अलग कमरे में बैठ गई. दरवाजा बंद कर बाहर प्रकाश को खड़ा कर दिया गया. यशोमी, दामले और गीता तीनों मालती के सामने बैठे थे. दामले रजिस्टर और पेन लेकर बैठा था साथ ही उसने अपने मोबाइल का वॉइस र‍िकॉर्डिंग ऐप भी चालू कर दिया था.

यशोमी ने पहला सवाल किया, “तुम्हारा नाम ?”

“मालती… मालती पवार”

“मरने वाली तुम्हारी बेटी थी ?”

“जी हां, सबसे बड़ी बेटी”

“मुझे शुरू से जानना है कि उस पार्टी में क्या हुआ था?”

“मैडम, पार्टी आठ बजे शुरू हुई. मेहमान तो सात बजे से ही आने शुरू हो गये थे. लेकिन केक नौ बजे काटा गया. सबसे पहले उसने मुझे ही केक खिलाया उसी केक का बचा हुआ हिस्सा मैने उसे खिलाया फिर उसने अपने पापा को बाद में आरूष, रूपल और फिर जब हितेन ने उसे केक खिलाया तब लोकेश ने उसका कॉलर पकड़कर उसे घूंसा जड़ दिया था. साक्षी और उसके दोस्तों ने उन्हें झगडा करने से रोका.”

“एक-एक मिनट लोकेश ने हितने को घूंसा मारा. क्यों ?”

“सच में क्या हुआ मैने देखा नहीं पर बाद में मुझे पता चला कि साक्षी उसे अपने मुंह में केक दबा खिला रही थी जिससे लोकेश को गुस्सा आ गया”

“अच्छा उसके बाद क्या हुआ ?”

“उसके बाद साक्षी के फ्रेंड्स उसे केक खिलाने और मस्ती करने लगे थे. तभी साक्षी नीचे गिर पड़ी और उसके बाद….” मालती का गला भर आया शब्द गले में अटक गये. थोड़ी देर सांस लेने के बाद उसने फिर बोलना शुरू किया,

“वह अपना गला पकड़कर तड़पने लगी और नीचे गिर पड़ी. वह जोरों से अपने हाथ पांव हिलाने लगी. मुंह से झाग निकलने लगा. हम जब तक उसे सहारा देते, उसे उठाते उसका शरीर एकदम शांत हो गया था. आंखे खुली हुई थी. मुंह से झाग बहकर उसके कानों तक फैल गया था. हमारे एक डॉक्टर मेहमान ने उसकी नब्ज देखकर हमें बताया की वह मर चुकी है पुलिस को बुलाना पड़ेगा. लोकेश ने 100 नंबर पर डायल किया और कुछ ही देर बाद आप लोग आ पहुंचे.”

“जब ये सब हो रहा था तुम कहां थी ?”

“मै… मैने शायद ज्यादा पी ली थी और साक्षी ने केक खिलाते ही मेरा जी मचलने लगा तो मैं वही एक कोने में बने टेम्पररी वॉश बेस‍िन के पास पहुंची जहां मैने उल्‍टी की मुझे कमजोरी महसूस हो रही थी इसलिए मैं वहीं पर एक कुर्सी पर बैठी थी सब लोग साक्षी की ओर दौड़ पडे़ तो मैं भी भागकर उसके करीब पहुंची”

 “अब ये बताओं तुम्हारे और तुम्हारी बेटी के बीच रिश्ता कैसा था ? शुरू से बताना उसके पैदा होने के पहले से”

 मालती चुप रहकर कुछ देर सोचती रही तो यशोमी फिर बोली, “सोचो सोचो लेकिन सारी बातें सच सच बताना शुरू से..”

मालती ने बताना शुरू किया,

“मै जब सत्राह साल की थी उसी समय मुझे लोकेश से प्यार हो गया था. वह गरीब घर का लड़का था. इंजीनियर की पढ़ाई करके नौकरी की तलाश में था और मै ज्यूनिअर कॉलेज में पढ़ती थी. मै उससे चोरी-छुपे मिलने लगी. मेरे बाबुजी (पिता) को जब हमारे प्यार का पता चला तो उन्होंने मुझे बहुत डांटा और मेरा घर से निकलना बंद कर दिया. लेकिन जैसे ही मै अठारह की हुई मैने घर से भागकर लोकेश से शादी कर ली. हमारे शादी के कुछ महिनों बाद ही लोकश को एक प्राइवेट कंपनी में बीस हजार महीना सैलरी वाली नौकरी मिल गई.

हम एक-दूसरे के प्यार के इस कदर डूबे थे की हमने कोई प्लानिंग नहीं की और दूसरे ही साल साक्षी मेरी गोद में आ गई. मेरे बाबुजी को जब यह बात पता चली तो वे अपनी सारी नाराजगी छोड़कर हमसे मिलने आये. उन्होंने अपनी नवासी को तो खूप प्यार किया उसके लिए गिफ्ट लेकर आये. लेकिन मुझसे मेरी तबीयत पूछने के अलावा कोई बात नहीं की. चार-पाच महीनों तक वे हमसे लगातार मिलने आते रहे. उनका खुद का स्वास्थ्य गिरते जा रहा था और फैक्ट्री में धांधली हो रही थी. इसीलिए उन्होंने हमें अपने बंगले में रहने बुलाया. जिसे हमने कबुल कर लिया. आगे मैने और दो बच्चों को जन्म दिया. तीसरे बच्चे के जन्म के कुछ महीनों बाद ही मेरा और लोकेश का तलाक हो गया. इस बात से बाबुजी और भी ज्यादा नाराज हो गए और अपने मरते दम तक वे मुझसे नाराज ही रहे. साक्षी से उन्हें सबसे ज्यादा लगाव था इसलिए मरने से पहले उन्होंने अपनी पूरी प्रॉपर्टी साक्षी के नाम कर दी. यह बंगला, गांव की जमीन, घर और अपनी फॅक्ट्री सब कुछ अकेले साक्षी के नाम कर दिया. बाकी मेरे दोनो बच्चों के नाम दस-दस लाख की एफ.डी. करवा दी जिसकी म्याचूरिटी उनके अठारह साल के होने पर ही होनी थी. और मुझ पर साक्षी के बालिग होने तक प्रॉपर्टी और फॅक्ट्री की देखभाल की जिम्मेदारी का बोझ डाल दिया.

मैने अपने बच्चों की परवर‍िश अच्छी तरह से की उन्हें कोई कमी नहीं होने दी. इस पूरे प्रॉपर्टी, जमीन और फॅक्ट्री की देखभाल भी अच्छे से की. बाबुजी की दौलत में कोई कमी नहीं आने दी बल्कि उसमें इजाफा ही किया. मैने कभी नहीं सोचा की मै इस सब की सिर्फ केअर टेकर ही हूं और साक्षी के बालिग होते ही यह सब उसके हाथों में चला जाएगा. मैने तो यह सब कुछ उसे हैंडओवर करने के लिए कागजात भी तैयार कर लिए थे. उसके बर्थ-डे का मेरी तरफ से यहीं उसके लिए शानदार गिफ्ट था. लेकिन उसके पहले ही…”

और मालती फफक फफक कर रोने लगी. उसने अपने साड़ी का पल्लू मुंह में ठूंस लिया अपने रोने की आवाज को रोकने के लिए. पर जल्द ही उसने अपने को संयत किया और आंसू पोछने लगी.

“यह तो सीधी सीधी कहानी हो गई जो की तुमने अपने प्रोस्पेक्ट‍िव से सुनाई. अब यह बताओं तुम्हारे साथ उसके संबंध कैसे थे.”

“मैने बताया ना की, मैने अपने तीनों बच्चों को एक जैसी परवर‍िश दी”

“मै बात परवर‍िश की नहीं कर रही हूं”

“साक्षी तुम्हारे साथ कभी लड़ती-झगड़ती थी ?  तुम्हारे किसी बात से नाराज रहती थी ? या फिर तुम्हें उसकी कोई बात पसंद नहीं थी ? जैसे तुम्हारे पिता तुम्हारे प्यार के खिलाफ थे वैसे ही तुम भी साक्षी के प्यार के खिलाफ थी ?  या किसी और बात को लेकर तुम दोनों में कोई झगड़ा या मनमुटाव था ?... मै ये जानना चाहती हूं.”

“नहीं….  नहीं हम दोनों में ऐसा कुछ नहीं था. मै उसके किसी भी फैसले के खिलाफ कभी नहीं थी. वह किसी भाविक से प्यार करती थी मुझे उससे भी कोई एतराज नहीं था. हमारा कभी कोई झगडा नहीं हुआ…”

नजरे चुराते हुए मालती ने यह बात बोल तो दी. लेकिन सामने यशोमी थी जो झुठ और सच को पकड़ने में माह‍िर थी.

“चलो अब यह बता दो तुम्हे किस पर शक है ?”

“मै क्या बता सकती हूं, पुलिसवाली तो आप है आप ही पता लगा सकती है की कौन है मेरी बेटी का कातिल”

“वो तो मै पता लगा ही लूगी. चाहे तुम हमसे सच बोलो या झूठ और चाहे जितनी बातें छुपाओं”

मालती चुपचाप कुछ देर सोचती रही. फिर बोली, “मैने कुछ भी नहीं छुपाया है. अब थोड़े बहुत तो झगड़े सभी के घरों में होते है. बहन-भाई भी कभी कभार झगड़ते थे लेकिन कुछ ही देर में घुलमिल भी जाते थे. और वह अपने दोस्तों की बातें मुझे बताती नहीं थी.”

“मै तुमसे एक सीधा सवाल करती हूं. तुम खुद भी तो हो सकती हो अपनी बेटी की कातिल.”

“मै …मै भला अपनी बेटी को क्यों मारूंगी…”

“इस पूरी प्रॉपर्टी के लिए जो आज पूरी तरह से उसकी होने वाली थी पर अब उसके मरने के बाद यह तुम्हारे ही पास रहेगी”

“सिर्फ दो साल के लिए…. उसके बाद तो इस प्रॉपर्टी का मालिक मेरा बेटा बन जायेगा उसके अगले ही साल मेरी दूसरी बेटी इस प्रॉपर्टी में हिस्सेदार बन जाएगी. मुझे क्या मिलने वाला है ….? दो-तीन सालों के लिए फिर केअर टेकर की जिम्मेदारी” मालती की आवाज में अफसोस झलक रहा था. वह आगे बोली,

“आपको यकीन नहीं तो मै सारे डाक्युमेंट आपको लाकर देती हूं. जो मेरे बाबूजी ने बनाये थे और जो मैने चार दिन पहले साक्षी को हैंडओवर करने के लिए बनाएं है. मुझे प्रॉपर्टी का जरा भी लालच नहीं है. यदि पैसों का लालच होता तो मै भागकर लोकेश से शादी नहीं करती. मैने उसके साथ कई साल बिताएं”

“कई नहीं एक से दो साल ही. उसके बाद तो तुम्हारे बाबुजी ने यह सब तुम्हारे हवाले कर दिया था. तुम ऐशो आराम से ही जी रही थी.”

“ये सच नहीं है. बाबुजी ने मुझे यहां ला तो लिया और अपनी कंपनी के कामकाज में शामिल भी किया लेकिन मुझे सारे अधिकार कभी नहीं दिये. उनसे सैलरी पाने वाली उनकी एक वर्कर ही थी मै और उनके मरने के बाद से आज भी सैलरी पाने वाली सिर्फ केअर टेकर ही हूं.”

“हां लेकिन जैसे ही तुम अपने बाबुजी के फैक्ट्री में जाने लगी तुमने अपने पति को ही छोड़ दिया.”

“क्यों ना छोड़ती….? शक करता था मुझ पर, मारता था. कहता था साक्षी के अलावा ये दोनों बच्चे उसके नहीं है. ऐसे आदमी के साथ मै कैसे रहती. ये प्रॉपर्टी मेरे पिताजी की है जिसे साक्षी के लिए संभाल कर रखना था. यदि यह उस जुआरी के हाथ लग जाती तो वह पूरी प्रॉपर्टी को दिमक की तरह चाट गया होता. इसीलिए मैने उसे छोड़ दिया.”

“काफी अच्छा होमवर्क है”

“मैडम आप बहुत गलत दिशा में सोच रहीं है. यदि ऐसे सोचती रहेगी तो आपको कातिल कभी नहीं मिल पायेगा.”

“वह मेरी समस्या है.”

“आपके सवाल हो गए हो तो मै जाऊं.”

“ठीक है तुम जा सकती हो और हां… तुम वे सारे डाक्यूमेंट्स की फोटो कॉपी बाहर खड़े हवलदार को दे देना और तुम्हारे बेटे को अंदर भेज देना”

मालती उठकर जाने लगी तो हे.कां. दामले बोला, “एक म‍िनट मालती जी जाने से पहले अपने इस बयान के नीचे हस्ताक्षर करके जाइए.”

थोड़ी देर बाद साक्षी का भाई कमरे में दाखिल हुआ. यशोमी ने उसे अपने सामने बैठने का इशारा किया, “बैठो..! क्या नाम है तुम्हारा ?”

“आ… आरूप”

“तुम साक्षी के बड़े भाई हो या छोटे”

“छो…. छोटा भाई हूं”

“कितने साल ?”

“द… दो साल से”

“हकलाने की आदत है क्या तुम्हे ?”

“न… नो सर…….. ड …..डर लग रहा है”

“ किसका, पकड़े जाने का ? और मै सर नहीं मैडम हूं. इतना भी मत डरो की सामने लेडीज है या जेन्टस यह भी समझ ना आये. लो पानी पिओ…”

यशोमी ने गिलास उठाकर उसकी ओर बढ़ा दिया.

आरूप गटगट करके पानी पी गया. गिलास मेज पर रखकर पानी पीते समय होंठो के दोनों छोर से बहकर पानी उसकी ठोड़ी से बूंद बनकर टपका रहा था उसे जेब से रूमाल निकालकर पोछने लगा.  

“ठीक है अब….. रिलैक्स हो …? मै तुमसे अब सवाल पूछ सकती हूं ?”

“ज… जी”

“अपनी बहन साक्षी से कितना प्यार करते थे ?”

“टू …टू … मच”

“उसके लिए क्या-क्या कर सकते थे तुम ?”

“म… मै उसके लिए अपनी जान भी दे सकता था”

“या उसकी जान ले सकते थे ?”

आरूप की घबराहट और बढ़ गई

“न…नो म…मेम……….म…मैंने दी…दी… की जान नहीं… ली”

“पर अभी तुम्हारी मम्मी ने हमे बताया की तुम्हारा और साक्षी का हमेशा झगड़ा होता था और एक दो बार तुमने उस पर हाथ भी उठाया है” यशोमी ने अंधेरे मे तीर चलाया.

“म…मम्मी झूठ बोल रही है. ह…ह.. हमारा झगडा जरूर होता था पर…. पर मैने कभी ….कभी …. भी दीदी पर हाथ नहीं उठाया. उलटे वही मुझे मारती थी. बहुत गु….गुस्सेल और बिगड़ेल थी दीदी….. अपनी हर जिद पूरी करती…. उसकी इच्छा पूरी ना हो तो… तो वह घर में तोड़ फोड़ मचा देती थी. सब… सब डरते थे दीदी से…..”

“तुम्हारी मम्मी भी डरती थी ?”

“ह….हां… मम्मी भी डरती थी. दीदी पर कोई भी हाथ नहीं उठाता था. उलटे वहीं मुझे और रूपल को मारती थी”

“और किस-किस को मारा था साक्षी ने ?”

“मम्मी और पापा के अलावा मुझे, रूपल और घर के नौकरों को कभी ना कभी मारा है”

“कितने नौकर है तुम्हारे घर में ?”

“दो. ए….एक खाना बनाती है तो दूसरी पूरे घर की साफ सफाई और कपड़े धोती है”

“वैसे तुम्हारी दीदी किस बात पर ज्यादा झगड़ती थी.”

“ऐसा कुछ स्पेस‍िफिक नहीं है. सिर्फ उसकी मर्जी का कुछ न हो तो वह किसी भी बात को लेकर झगड़ती थी.”

“क्या तुम्हे लगता है की तुम्हारी दीदी को तुम्हारे मम्मी या पापा में से किसी ने जहर दिया होगा ?”

“नो… नो मैम ! मम्मी या पापा ऐसा कुछ करेंगे मै सोच भी नहीं सकता. साक्षी सबकी लाड़ली थी तभी तो वह इतनी बिगड़ैल थी. मम्मी और पापा भले ही अलग रहते हो लेकिन साक्षी की हर बात दोनों ही मानते थे. उसके किसी भी बात के लिए कभी मना नहीं करते थे. वह जब भी उन्हें कुछ खरीदने, शॉपिंग या मुवी देखने के लिए पैसे मांगती तो वे लोग झट से निकलकर दे देते थे. जबकि मुझे और रूपल को पैसों के लिए मम्मी पापा दोनों के सामने गिडगिड़ाना पड़ता था. एक बार तो मम्मी पैसे दे भी दे पर पापा हमें कभी पैसे नहीं देते थे. उनसे पैसे मांगना याने उनके लॉट्स ऑफ़ क्वेश्चन के जवाब देना पड़ता था.”

“तुम्हारी बातों से लग रहा है तुम अपनी बहन से जलते थे. क्यों ?”

आरूप ने कोई जवाब नहीं दिया तो यशोमी बोली, “जवाब नहीं दिया तुमने. तुम अपनी बहन से जलते थे ना ? उसे सब कुछ आसानी से मिल रहा है और तुम्हे नहीं.”

“ए…ऐसा कुछ नहीं है मैम…. मुझे थोड़ा गुस्सा आता था पर मै अपनी दीदी को किसी भी तरह से चोट नहीं पहुंचा सकता था.”

यशोमी ने अपना मोबाइल निकाला और स्क्रीन पर एक तस्वीर ओपन की और उसे आरूप को दिखाते हुए पूछा,

“यह लड़का कौन है ?”

आरूप बगले झांकने लगा. उसे खामोश देख यशोमी ने फिर पूछा, “बताओ कौन है यह लड़का ?” इस बार उसकी आवाज में कठोरता थी एवं स्वर उंचा था.

आरूप का शरीर कांपने लगा. शरीर पसीना पसीना हो रहा था. आंखों में खौफ स्पष्ट दिखने लगा.

“म….मेरा दो….दोस्त रईस अहमद”

“ये पार्टी में वेटर बनकर क्यों आया था ?”

“म…मैने….मैने बुलाया था उसे”

“तुम्हारे तो दूसरे भी दोस्त पार्टी में थे लेकिन वे वेटर के भेस में नहीं थे और ये दोस्त तो तुम्हारे स्कूल का भी नहीं है. तुम्हारी इससे दोस्ती कहां और कैसे हुई ? और ये पार्टी में वेटर बनकर क्यों आया था ? सारे सवालों के जवाब दो जल्दी-जल्दी. वरना अभी तुम्हे हथकड़ी पहनाकर पुलिस स्टेशन ले जाकर यही सवाल पूछूगी.”

आरूप ने रोना शुरू कर दिया. वह सोफे से उठकर जमीन पर घुटनों के बल बैठ गया और दोनों हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाने लगा.

“मुझे माफ कर दो … मुझे माफ कर दो. प्लीज फॉरगिव मी…. ले….लेकिन…लेकिन मैने नहीं मारा दीदी को. मै उससे नफरत करता था. उसे मारना चाहता था. इसीलिए मैने रईस को बुलाया था. वह पार्टी में वेटर बनकर गन लेकर आया था. वो उसे शूट करने वाला था. पर कर नहीं पाया और जब दीदी नीचे गिरकर तड़पने लगी तो वह दीवार कूद कर भाग गया.”

“ये रईस कौन है और कहां रहता है ? तुम्हारी उससे पहचान कैसे हुई ?”

“वो… वो मै एम.एल.डी. लेता हूं. कॉलेज के बाहर रईस एम.एल.डी. सप्लाई करता है. बस यही हमारी पहचान है. वो मेरा कोई दोस्त नहीं है.” आरूप नजरे चुराते हुए चुप हो गया.

“आगे बोलो”

“एम.एल.डी. खरीदने के लिए पैसे लगते थे. दीदी को तो पैसे आसानी से मिल जाते थे लेकिन मुझे नहीं और जो पॉकेट मनी मिलता था वह भी दीदी की वजह से मिलना बंद हो गया.”

“क्यों ?”

“दीदी ने मुझे ड्रग्स लेते हुए रंगे हाथों पकड़ लिया था और मम्मी से मेरी चुगली कर दी थी. चार दिनों तक मै बिना ड्रग्स के रहा तो मेरी हालत खराब होने लगी. मैने रईस से ड्रग्स मांगी उसने मना कर दिया. बोला बिना पैसों के ड्रग्स नहीं दे सकता. तुम्हे क्या परेशानी है पैसे लाने में. इतने बड़े बंगले के मालिक हो. तुम्हारी फैक्ट्री है. तुम्हे तो पैसों की कोई कमी नहीं होनी चाहिए. तब मैने उसे बताया की सब कुछ दीदी के नाम पर है. मम्मी सिर्फ केअर टेकर है. हमारे घर में सिर्फ दीदी की चलती है. अगले हप्ते वह अठारा की होते ही पूरे जायदाद की इकलौती मालिक हो जाएगी. फिर तो वह मम्मी का भी नहीं सूनेगी. और हमे उसी के भरोसे रहना होगा. उसकी मर्जी के खिलाफ कुछ किया तो वह तो हमे घर से भी निकाल सकती है.

तब रईस बोला अगर वह मर गई तो पूरी जायदाद किसे मिलेगी. उसके इस सवाल से मै चौंक गया. दीदी अठारा की होने से पहले मर जाती है तो मेरे अठारा के होने पर पूरी प्रॉपर्टी का मालिक मै ही बनने वाला हूं. जैसे ही यह बात मैने उसे बताई वह बोला यदि मुझे एक लाख रूपये देने का वादा करोगे तो मै तुम्हारी दीदी को बर्थ-डे वाले दिन ही खत्म कर दूंगा. मेरे पास एक गन है. बस मुझे किसी तरह तुम्हारे दीदी की बर्थ-डे पार्टी में एंट्री दिला देना. मैने केटरींग वाले से कहा की मेरा दोस्त काफी गरीब है उसे हमारी पार्टी में वेटर का काम दे दो. केटरींग वाला तैयार हो गया. इस तरह वह वेटर के भेस में यहां आया था. लेकिन उसे शूट करने का मौका मिले इससे पहले ही दीदी की मौत हो गई और वह डर के मारे दीवार कूदकर भाग गया.”

आरूप की सच्चाई जानकर यशोमी दंग रह गई थी. उसने दामले की ओर देखा और जैसे पूछ रही हो, “देखा दामले ड्रग्स की लत इन्सान को कैसे हैवान बना देती है. उसकी सोचने समझने की शक्ति ही छिन लेती है. अपनी ही दीदी की मौत की प्लानिंग की थी इस सोलह साल के लड़के ने.” तभी उसके दिमाग में एक सवाल और कौंध गया जिसका जवाब पाने, आरूप की ओर देखते हुए बोली,

“यानी अपने दीदी को मारने की तुमने पूरी प्लानिंग की थी लेकिन तुम्हें लगा की तुम्हारी प्लानिंग में कमी है गोली की आवाज से सब गोली चलाने वाले को पहचान जाएंगे उसे पकड़ लेंगे तो तुम्हारा भांडा फूट जाएगा. इसीलिए तुमने नया प्लान बनाया और अपनी दीदी को जहर देकर मारा जिससे रईस को एक लाख देने से भी बच गए.”

“नहीं … नहीं मैने दीदी को नहीं मारा.. मैने कोई जहर नहीं दिया हमारा प्लानिंग तो गोली से मारने का ही था गोली की आवाज किसी की समझ में ना आये इसलिए मैने जोरदार आवाज वाले पटाखों का बंदोबस्त किया हुआ था. जैसे ही मै पटाखे जलाता रईस अपना काम करने वाला था. हमारे प्लानिंग में कोई चेंज नहीं था.”

“फिर तुमने वह केक क्यों नहीं खाया जो तुम्हारी दीदी तुम्हे खिला रही थी. तुमने तो उसे अपने हाथ से एक बाइट दी लेकिन जैसे ही उसी पीस का बाइट तुम्हे लेने को कहा तो तुमने मना कर दिया और दूसरा पीस उठाकर खा लिया ऐसा क्यों किया?”

“मुझे जूठा पसंद नहीं और वो.. मुझे बड़ा पीस चाहिए था इसलिए”

“ठीक है हम मान लेते है कि तुमने अपनी दीदी को जहर नहीं दिया. अब ये बताओं तुम्हे कौन लगता है जिसने ये काम किया होगा”

“रूपल कर सकती है वो बहोत जलती थी दीदी से हमेशा मुझसे शिकायत ही करती थी और बोलती भी थी कि कभी मौका मिला तो मै दीदी की जान लेकर रहूंगी”

“रूपल ….. यानी तुम्हारी छोटी बहन”

“हां”

“क्यों जलती थी ?”

“रूपल दिखने में साँवली है और दीदी बहुत सुंदर थी. दीदी पर हर तरह के कपड़े बहुत जचते थे लेकिन रूपल कुछ भी पहने वह अजीब ही दिखती थी. दूसरे रूपल के सभी फ्रेन्ड्स भी दीदी को पसंद करते थे. रूपल का जिस पर क्रश था वह भी दीदी के ही आगे पीछे घूमता था इसीलिए”

“तो इस कारण से तुम्हें लगता है की रूपल तुम्हारी दीदी को जहर दे सकती है… या कोई और कारण है…? क्यों…कि अब साक्षी तो रही नहीं प्रॉपर्टी से वह आऊट हो गई अब यह प्रॉपर्टी तुम दोनों भाई-बहनों के हिस्से में आ जाएगी. दो साल बाद तुम्हारे और उसके एक साल बाद रूपल भी इस प्रॉपर्टी की बराबर की हिस्सेदार बन जाएगी. यदि वह साक्षी के मर्डर केस में जेल चली जाती है तो तुम अकेले ही इस प्रॉपर्टी के मालिक रहोगे, ये कारण तो नहीं है ना.”

आरूप अपने पैर के तलवे की ऊंगलियों वाला हिस्सा उपर उठाकर हौले हौले फर्श पर पटकने लगा साथ ही वह यशोमी ने नजरे चुरा रहा था.

“ठीक है आरूप तुम जाओं और अपनी बहन को भेज देना. देखती हूं, तुम्हारी बात में कितनी सच्चाई है. सच में तुम्हारी छोटी बहन की जलन ने उसकी जान ली या तुम्हारी जलन ने.”

दामले ने आरूप के बयान पर उसके हस्ताक्षर लिए. वह कमरे से बाहर चला गया.

“मॅडम केस तो बोहत ही काम्पलिकेट हो रा है. इनकी बातों से लगता है ये सभीच साक्षी को मारना चाहते थे.”

“अभी तो और लोगों के बयान लेने है. इनकी लाइफ के कुछ पन्ने बाहर वालों की नजर से भी पढ़ने है. दामले स्टेशन फोन करके स्टेशन इंचार्ज को बोलो की वह खबरीयों को साक्षी के परिवार के सभी सदस्य की कुंडली निकलने के काम पर लगा दे. साथ ही एक काम और करों दामले, चाय या कॉफी का बंदोबस्त हो जाए तो थोड़ी ताजगी आ जाएगी.”

“ठीक आहे मॅडम मै साक्षी की मां को बोलकर अभीच व्यवस्था करता हूं”

तभी रूपल भी कमरे में आ गई. दामले कमरे से बाहर चला गया तो यशोमी ने रूपल को बैठने का इशारा किया और बोली,

“अभी जो कान्स्टेबल बाहर गया है उसके आते ही हम बात चालु करेंगे तब तक तुम बैठी रहो”

थोड़ी ही देर में दामले खुद कॉफी लेकर कमरे में दाखिल हुआ. यशोमी ने अपना कप पकड़ा, पहले एक हलकी सी चुस्की ली और दामले की ओर देखकर बोली,

“दामले थँक्स ! बहुत बढ़िया कॉफी बनी है”

“अरे मॅडम थँक्स मेरेकु नइ ये घर की नवकरानी को बोलो उसने बनाई है काफी”

रूपल यशोमी और दामले की ओर देखे जा रही थी. उसे वहाँ पर बैठे दस से पंद्रह म‍िनट बित गये थे. और कोई बातचीत, कोई सवाल-जवाब नहीं हुए थे वह थोड़ा खीजते हुए बोली,

“मेरे से कुछ पुछना नहीं है तो मै जा रही रहूं” और उठ खड़ी हुई. यशोमी ने उसे इशारे से बैठने को कहा.

“मुझे कॉफी तो खत्म कर लेने दो. दामले भी कॉफी पीकर फ्रि हो जाऐगा क्या है ना तुम जो बोलोगी वह ये लिखने वाला है, वह सब टेप होने वाला है इसीलिए. तुम्हारा ही तो घर है इतमीनान से बैठो.”

रूपल बैठ गई. यशोमी और दामले भी कॉफी पीकर संतुष्ट हुए. दामले फिर अपनी पोजीशन पर बैठ गया और बोला, “मॅडम चालु करो”

यशोमी का वही पहला सवाल नाम क्या है आया तो रूपल बोली

“क्या आपको पता नहीं है मेरा नाम क्या है.”

“हमे पता है लेकिन पूछना पड़ता है. बताया ना लिखा जा रहा है और रिकॉर्ड हो रहा है.”

“रूपल…. रूपल नाम है मेरा”

“कौनसे स्टण्डर्ड में पढ़ती हो ?”

“नाइन्थ”

“तुम सबसे छोटी हो ?”

“हां, तो आपको प्राब्लम है ?”

“नहीं…, मुझे कोई प्राब्लम नहीं. पर तुम उतना ही जवाब दो जितना जरूरी है”

“मुझे कैसे पता आपके लिए कितना जवाब जरूरी है. मेरी समझ में जो आएगा वह बोलूंगी. आपको पसंद नहीं तो आपकी मर्जी.”

यशोमी रूपल के अजीब बर्ताव से थोड़ी हैरान हो रही थी. रूपल दिखने में सावली तो थी ही पर उसकी शक्ल भी परिवार के किसी सदस्य से मिलती नजर नहीं आ रही थी.

“ठीक है जैसे तुम्हे बोलना है बोलो. काफी निडर लगती हो. पुलिस से डर नहीं लगता?”

“मै क्यूं डरू. मै किसी से नहीं डरती. पुलिस से भी नहीं”

“ओके ! मत डरो. अब असली मुद्दे पर आते है. परसो बर्थ-डे पार्टी में जिसकी मौत हुई वह तुम्हारी बड़ी बहन है ना, उससे तुम्हारा रिश्ता कैसा था ?”

“जब एक ही औरत ने पैदा किया तो उस नाते से वो मेरी बहन थी और रही बात उससे मेरे संबंध की तो मै उसे अपना दुश्मन मानती थी”

रूपल की बात सुनकर यशोमी दंग रह गई. दामले भी एकदम से चौंक पड़ा और अपने जिस्म को कड़ा करते हुए मुंह खोलकर उसकी ओर देखने लगा. लिखते लिखते उसके हाथ रूक गये थे. यशोमी ने एक नजर दामले पर डाली तो दामले सहज हुआ. यशोमी रूपल की ओर देखकर बोली,

“क्यूं ? क्यूं दुश्मन मानती थी उसे ?”

“इसी काब‍िल थी वो. हमेशा मुझ पर रौब जमाती, मेरे दोस्तों को मुझ से छिन लिया था. मेरे रंग-रूप से मुझे ताने मारती. उसके पापा ने भी मुझे कभी अपने करीब नहीं आने दिया. कभी मुझसे प्यार नहीं किया. मेरे लिए वे कभी कोई गिफ्ट नहीं लाते थे.”

“तो क्या तुम्हारे पापा और उसके पापा अलग-अलग है?”

बोलने की लौ में रूपल के मुंह से यह बात निकल गई थी. वह कुछ देर सोचती रही फिर अपने कंधे उचकाते हुए बोली,

“हां”

“पर तुम्हारी मां ने तो दूसरी शादी की नहीं फिर पापा अलग…”

यशोमी का वाक्य पूरा होने से पहले ही रूपल बोली, “बच्चे सिर्फ शादी करने से ही होते है क्या ? मेरी मम्मी को और भी आदमी पसंद थे वो उनके साथ सोई. उसी का फल हूं मै.”

रूपल की स्पष्टवादिता देख यशोमी समझ नहीं पा रही थी कि यह लड़की क्या बला है. या तो उसकी कम उम्र और नादानी की वजह से वो ये सब बोल रही है या फिर सच में यह लड़की इस उम्र में बहुत ही चालाक और धूर्त है और हमें अपनी बातों से उलझा रही है.

“क्या तुम जानती हो तुम्हारे पापा कौन है ?”

“जानती हूं लेकिन बताऊंगी नहीं. तुम लोग उन्हें परेशान करोगे”

“तुम्हारी बातों से लग रहा है तुम उनसे अब भी मिलती रहती हो.”

“हां. मम्मी को उनसे रिश्ता बनाने में शर्म नहीं आई, मै तो उनकी बेटी हूं मुझे उनसे मिलने में कैसी शर्म”

“तुम्हारी मम्मी जानती है तुम उनसे मिलती हो”

“हां.. जानती है. मना भी करती है. क्योंकि अब मम्मी उनसे नहीं मिलती, इसका मतलब क्या मैं भी उनसे नहीं मिलू. एक वे ही है जो मेरे लिए गिफ्ट लाते है. मेरी तारीफ करते है जो मेरे अलावा किसी और से प्यार नहीं करते. मुझे डांटते नहीं. मेरी किसी भी बात लिए मुझे मना नहीं करते.”

“तो क्या तुम्हारी मम्मी मना करती है?”

“पापा से मिलने के अलावा और क‍िसी बात के लिए मना नहीं किया. पर साक्षी मुझ पर कंट्रोल करने की कोशिश करती है तो उसे भी कभी रोका नहीं. उसे इस बात के लिए कभी डांटा नहीं. मम्मी की यह बात मुझे अच्छी नहीं लगती थी कि वो साक्षी को कुछ बोलती ही नहीं थी”

“ठीक है तुम्हारी बातें बहुत हो गई असली मुद्दे पर आते है. तुम्हे क्या लगता है साक्षी को जहर किसने दिया होगा?”

“मुझे नहीं पता. उसे जहर देने की इच्छा तो मेरी ही थी. पर किसी और ने दिया. अच्छा हुआ मर गई.”

“उसके मरने का तुम्हें अफसोस नहीं है”

“क्यूं करू अफसोस. अब मुझसे मेरी पसंद का कोई कुछ छिनेगा नहीं”

“क्या छिना था उसने तुम्हारा ?”

यशोमी के इस सवाल पर वह निडर लड़की चुप रही. यशोमी कुछ देर जवाब की उम्मीद में उसे देखती रही जब देखा वह जवाब नहीं दे रही है तो यशोमी ने सवाल को दूसरे तरीके से पूछा,

“तुमने बताया था की उसने तुम्हारे दोस्तों को तुमसे छीन लिया है तो क्या तुम किसी लड़के को चाहती थी और उस लड़के को साक्षी ने तुमसे छीन लिया. यही बात है ना?”

रूपल ने गर्दन नीचे झुकाई और हां की शक्ल में हिला दी. यशोमी बोली, “तुम इतनी देर से इतनी निडरता से जवाब दे रही हो. इस सवाल के जवाब में तुम चुप हो और गर्दन हिलाकर जवाब दे रही हो. पहले की तरह मुंह से जवाब दो निडरता से.”

“हां … हां… हां… उसने मेरा बायफ्रेन्ड छीन लिया था. कमीनी कहीं की. रोहित ने मुझे प्रपोज किया था मै उसके साथ डेट करने लगी थी. एक दिन जब हम रेस्टॉरंट में बैठ कर अपनी डेट का मजा ले रहे थे तभी साक्षी वहां आई और हमारे बीच कबाब में हड्डी बनकर सारे डेट का मजा किरकिरा कर दिया था. उसके बाद तो रोहित साक्षी के ही गुण गाने लगा. हमेशा मेरे सामने उसकी तारीफ करता कि वो कितनी सुंदर है, उसका फिगर कितना अच्छा है. उस पर हर तरह के कपड़े जचते है. जब भी मिलता साक्षी की ही बातें मुझसे करता. मेरी तो जैसे तारीफ करना ही भुल गया था. इतना सब एक बार मिलने से नहीं होता. मुझे पता चला साक्षी उससे बार-बार मिलने लगी थी. मेरे सभी दोस्तों से मिलती थी. वे भी उसकी तारीफ करते थे. कहते तुम्हारी दीदी कितनी दिलदार है. हमे पिज्जा पार्टी दी, हमे बर्गर खिलाया, आईस्क्रीम लेकर दी. मॉल में कितना एन्जॉय कराया. तंग आ गई थी मै उससे. रोहित मुझसे कन्नी काटने लगा था. मुझे अवॉइड करता था. मुझे पता चला कि दीदी उसे किसी लॉज में लेकर गई थी. उसका खुद का बायफ्रेण्ड होकर भी वह मेरे बायफ्रेण्ड को लेकर गई आखिर वह भी मम्मी की तरह हवस की पुजारन निकली. अच्छा हुआ मर गई कमीनी”

रूपल का सारा गुस्सा बाहर निकल गया था. एक ही सांस में वह इतना कुछ कह गई जो शायद उसके दिलो दिमाग पर छाया हुआ था. यशोमी ने पानी का गिलास उसकी ओर बढ़ाया. उसने भी आराम से पानी पिया.

“अब रिलैक्स लग रहा है……. तो साक्षी ने ये सब किया तुम्हारे साथ इसीलिए तुम उस पर इतना गुस्सा हो और उसे जहर तक देने की सोच लिया था. वैसे यह बताओं साक्षी के बारे में जितनी भी बाते तुमने बताई क्या वह सब तुमने अपनी आंखों से देखा था या किसी ने तुम्हें बताया था.”

“कोई क्यूं बताएगा मुझे सब मेरे सामने ही हुआ”

“तो क्या साक्षी तुम्हारे सामने रोहित को लॉज में लेकर गई?”

“नहीं ये बात मुझे किसी ने बताई”

“किसने?”

“वो मैं बता नहीं सकती”

“तुम्हारे पापा ने ना?”

रूपल चुप रही.

“तुम्हारे पापा ने ही तुम्हें बताया ना की रोहित लॉज में गया था?”

“मै नहीं बताऊंगी यह बात मुझे कैसे पता चली. आप लोग इस बात का जवाब देने के लिए मुझ पर दबाव नहीं डाल सकते”

और रूपल उठकर खड़ी हो गई. “मै जा रही हूं मुझे जितना बताना था बता दिया. अब कुछ नहीं बताऊंगी.”

“एक आखरी सवाल. साक्षी को जहर देने के लिए तुम्हारे पापा ने तुम्हे मजबूर या प्रोवोक किया है क्या?”

रूपल एक क्षण के लिए रूकी पलट कर यशोमी को खा जाने वाली नजरों से देखा और चिखते हुए ही बोली, “नहीं. मुझे किसे ने प्रोवोक नहीं किया” और पैर पटकते हुए वहां से चली गई.” उसने अपने बयान पर हस्ताक्षर भी नहीं किये.

दामले उसके पीछे जाने लगा तो यशोमी बोली, “रूको दामले, अभी जाने दो यहां से जाने से पहले हस्ताक्षर ले लेना वो कहीं नहीं जाने वाली.”

“अब किसका बयान लेना है मैडम”

“दामले इन तीनों ने अपनी-अपनी कहानी तो बता दी लेकिन ये कहानियाँ कितनी सच्ची या झूठी है ये जानना भी जरूरी है. जाओं, जिसने हमारे लिए कॉफी बनाई उसकी तारीफ करते है उसे बुला लाओ.”

 

क्रमश:

अश्वजीत पाटील

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