इश्क़ ए बिस्मिल - 23 Tasneem Kauser द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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इश्क़ ए बिस्मिल - 23

वह लोग घर पहुंच गए थे, उमैर ने कार से उतर कर अज़ीन को गोद में उठा लिया था और उसे लेते हुए उपर अपने कमरे कि तरफ़ जा रहा था, अरीज उसके पीछे पीछे थी जबहि आसिफ़ा बेगम की नज़र उन तीनों पर पड़ी।
“यह क्या नाज़ नखरे उठाए जा रहे हैं?” उमैर वहीं रुक गया था और मां को देखने लगा था, वहीं दूसरी तरफ़ अरीज का ख़ून सूख गया था। उमैर कुछ कहने ही वाला था कि तभी उनके पीछे से आवाज़ आई थी।
“क्या हुआ? सब खैरियत?” ज़मान ख़ान औफ़िस से अभी अभी लौटे थे।
उनकी आवाज़ पर उमैर ने मुड़कर पहले उन्हें देखा और फिर अरीज को। आसिफ़ा बेगम उनकी मौजूदगी में कुछ आगे कह ना सकी।
अज़ीन का सर पट्टी में लिपटा देख ज़मान ख़ान काफ़ी परेशान हो गए थे। उमैर चाहता था कि जवाब उसकी जगह अरीज दे इसलिए वह चुप रहा था और इंतजार में था कि वह अपना मुंह खोले।
उसकी ख़ामोशी से अरीज समझ गई थी कि वह क्या चाहता है, इसलिए उसने कहा था “अज़ीन झूले से गिर गई थी, तो उसे चोट आ गई।“
“उफ़्फ़! आपको ध्यान देना चाहिए था बेटा। लगता है बहुत ज़्यादा चोट आई है?” वह काफ़ी परेशान हो गए थे।
“जी पांच स्टीचेज़ लगी है, मगर डरने की कोई बात नहीं है।“ अभी भी जवाब अरीज ने दिया था। उमैर को अरीज की चालाकी पर हंसी आ गई, वह सोच रहा था कि हदीद का नाम अरीज ज़मान ख़ान के सामने अकेले में लेगी।
ज़मान ख़ान ने उमैर को देखा था मगर परेशानी में ध्यान नहीं दिया था कि वह घर लौट आया है, यकायक उन्हें ख़्याल‌ आया तो उन्होंने उन तीनों से उमैर के कमरे में जाने को कहा। उमैर ने भी शुक्र का सांस लिया था कि इस सवाल जवाब से उसकी फिलहाल जान छूटी।
वह उन दोनों को कमरे में छोड़कर वहां से निकल गया।
आंखें देखी तो मैं देखता रह गया,
जाम दो और दोनों ही दो आतिशा,
आंखें या मैकदे के वो दो बाब हैं,
आंखें उनको कहूं या कहूं ख़्वाब हैं,
आंखें नीची हुई तो हया बन गई,
आंखें ऊंची हुई तो दुआ बन गई,
आंखें उठ कर झुकी तो अदा बन गई,
आंखें झुक कर उठी तो क़दा बन गई
आंखें जिनमें है क़ैद आसमानों ज़मीन,
नर्गिसी, नर्गिसी
सुर्माई, सुर्माई।
नर्गिसी, नर्गिसी, सुर्माई, सुर्माई।
हुस्न जानां की तारीफ मुमकिन नहीं
आफ़रीं आफ़रीं आफ़रीं आफ़रीं
तू भी देखे अगर तो कहे हमनशीं
आफ़रीं आफ़रीं आफ़रीं आफ़रीं
हुस्न जानां की तारीफ मुमकिन नहीं।
अरीज और अज़ीन को घर छोड़कर वह बेमक़सद सड़कों पर गाड़ी दौड़ा रहा था। रात काफ़ी ज़्यादा हो गई थी मगर उसे कोई परवाह नहीं थी। गुस्सा अपनी जगह दिलो दिमाग पर अजीब सी हलचल मची हुई थी, वह अपनी कैफियत समझने में नाकाम हो रहा था यह जानते हुए कि उसके ज़हन में वह दुश्मन की आंखें छप गई थी और वह कब से उन ख़्यालों को झटकने की कोशिश में लगा था,
उसने एक दफ़ा कहीं नुसरत फतेह अली खान की यह ग़ज़ल सुनीं थी और उसे बहुत हंसी आई थी। उसके ख़्याल था कि दुनिया में कोई इतना खूबसूरत और आकर्षक नहीं हो सकता। ग़ज़ल का दूसरा नाम झूठी तारीफें होती है, यह एक ख़्याली दुनिया होती है जहां सच का कोई ज़िक्र नहीं होता। मगर आज वह उन बातों को सच मानने पर मजबूर हो गया था और आज वह खास कर म्यूज़िक प्लेयर पर यह ग़ज़ल सुन रहा था। अपनी आंखों देखी की तस्दीक कर रहा था, और उसे सब सच लग रहा था।
सुबह रोज़ की तरह आज भी उसकी आंखें जल्दी खुल गई थी। अज़ीन अभी तक सोई हुई थी। वह पूरे कमरे में एक कोना से दूसरे कोने तक बेमक़सद फिर रही थी। यह कमरा उसका क़ैदखाना था और क़ैद खाना चाहे कितना भी ख़ुबसूरत हो, वहां सिर्फ़ और सिर्फ़ घुटन ही मिलती है।
बहुत देर के बाद उसके कमरे में नसीमा बुआ आई थी, उन दोनों के लिए नाश्ता लेकर। नाश्ता टेबल पर रख कर उन्होंने रूम रेफ्रिजरेटर खोला था, और उसमें जितनी भी खाने पीने कि चीज़ें थी, उन्हें ट्राली में भरकर कमरे से चली गई थी। अरीज ने पहले ही उस रेफ्रिजरेटर को हाथ नहीं लगाया था इसलिए उसे ना तो कोई परवाह थी ना फ़िक्र की वह फ़्रिज भरा है या खाली।
घड़ी में 9 बज रहे थे, अरीज ने अज़ीन को उठाकर उसे ब्रश करवाया, उसे फ़्रेश करवा कर उसने नाश्ता की ट्रे के उपर से नैपकिन उठाया और नाश्ते को देखती रह गई, प्लेट में सिर्फ़ दो रोटियां (जो दिखने से ही बासी लग रही थी) और छोटी सी प्याली में बहुत थोड़ा सा अचार था। अरीज बहुत मुश्किल में पड़ गई थी। उसे अपनी फ़िक्र नहीं थी, उसे भूख सहने की आदत हो गई थी, वह एक रोटी खा कर पूरा दिन गुज़ार सकती थी। उसे अज़ीन की फ़िक्र थी, वह खाने पीने में बहुत चूज़ी थी और पीछे भी। अच्छा खाना तो उसके गले से मुश्किल से उतरता था, यह खाना तो हर्ग़िज़ उससे खाया नहीं जाएगा। उपर से उसका इतना ख़ून बह चुका था, उसे तो अच्छे ग़ज़े, फल की ज़रूरत थी। इस खाने से सिर्फ़ पेट भरा जा सकता था, बढ़ते हुए बच्चे की ज़रूरत पूरी नहीं की जा सकती थी। उसे अब समझ आया था कि नसीमा बुआ ने फ़्रिज खाली क्यों की थी।
अरीज ने एक लम्बी सांस खींचकर, अज़ीन के प्लेट में रोटी और अचार लेकर उसे खिलाने बैठ गई। अज़ीन ने निवाला लेने से पहले ही बूरा सा मुंह बनाया, अरीज ने पुचकार कर निवाला उसके मुंह में डाल दिया। थोड़ी देर रोटी चबाने के बाद रोटी उसके हलक में फंस गया, वह खांसने लगी, अरीज ने जल्दी से उसे पानी पिलाया। अगला निवाला लेने से अज़ीन ने साफ इंकार कर दिया। उसके काफ़ी मनाने पर भी वह नहीं मानी, तो अरीज हारकर बैठ गई।
उसे समझ आ गई थी कि उन्हें आगे भी ऐसा ही खाने को दिया जाएगा, मगर उसे यह समझ नहीं आ रहा था कि वह अब आगे क्या करें। ‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌उसके दिमाग़ में बस जोब करने की औपशन आ रही थी ताकि हाथ में कुछ पैसे आ जाए तो वह अज़ीन की ज़रूरतों के लिए किसी के आगे हाथ ना फैलाए, लेकिन कल वाले हादसे के बाद क्या अज़ीन को यहां अकेले छोड़कर जाना सही रहेगा? वह कशमकश में थी। उसे ऐसा लग रहा था कि वह आसमान से गिर कर खजूर में अटकी थी। उसकी मुश्किलें आसान होने की बजाय और बढ़ गई थी।