Tadap Ishq ki - 10 books and stories free download online pdf in Hindi

तड़प इश्क की - 10

अब आगे............

विक्रम मल्होत्रा का नाम सुनते ही एकांक्षी के जेहन में एक अलग सी नफ़रत और गुस्सा घुमने लगा...... किरन उसे शांत रहने के लिए कहती हैं....." कुल डाउन यार ... मुझे पता है वो तुझे बिल्कुल पसंद नहीं लेकिन प्लीज़ अपने आप संभाल..."

" मुझे पता है मुझे क्या करना है..मैं उससे डरती नहीं हूं......बस नफ़रत है मुझे उसके नाम से...."

कुछ देर की शांति बाद के पूरे क्लास रूम में शोरगुल होने लगता है चार पांच लड़के हूटिंग करते हुए क्लास रूम में एंटर होते हैं... ...किरन उन्हें देखकर शाक्ड थी कि अभी जिसके आने के बारे में बात हो रही थी , ये नहीं पता था कि वो आज ही आ रहा है....किरन एक बार उस तरफ देखती और एक बार एकांक्षी को देखती जो इन सबको इग्नोर करने की कोशिश करते हुए बुक खोलकर उसमें नजरे जमाई हुई थी.....

किरन धीरे एकांक्षी से कहती हैं......" एकांक्षी ये तो आज ही आ गया...."

एकांक्षी बुक को देखते हुए कहती हैं....." मुझे पता वो आज ही आने वाला है....."

किरन उसके चेहरे को देखकर खुद से कहती हैं...." मैं तूझे इस तरह परेशान नहीं देख.....तू हर प्रोब्लम को सोल्व कर देती है मेरी , लेकिन मैं तेरे लिए कोई हेल्प नहीं कर पाती..."

एकांक्षी किरन को देखकर समझ जाती है वो उसके लिए टेंस्ड है इसलिए जबरदस्ती मुस्कुराते हुए कहती हैं...." ओए तू परेशान न हों , ये विक्रम हाॅस्पिटल से लौटा जरूर है लेकिन अगर इसने दोबारा वही गलती दोहराई तो पता नहीं ये कहीं निकल न हमेशा के लिए..."

एकांक्षी अभी किरन को समझा ही रही थी तभी दोनों हाथों को बैंच पर पटकते हुए विक्रम ने उसका ध्यान अपनी तरफ किया...

एकांक्षी उसे गुस्से में घूरती हुई कहती हैं...." What's your problem...."

विक्रम एकांक्षी के पास अपने फेस को ले जाकर धीरे से उससे कहता है....." Vikaram is back...be careful with me..."

एकांक्षी उससे कुछ कहती उससे पहले ही प्रोफेसर क्लास रूम में एंटर होते हुए कहते हैं......" गुड मॉर्निंग स्टूडेंट्स.... " सब उन्हें गुड मॉर्निंग विश करते हुए बैठ जाते हैं लेकिन विक्रम जोकि अभी भी एकांक्षी के पास ही खड़ा था उससे देखकर प्रोफेसर वर्मा कहते....." मिस्टर विक्रम मल्होत्रा प्लीज़ टेक योर सीट...."

विक्रम मल्होत्रा एक बार मुंह बनाकर प्रोफेसर को देखता है और फिर वापस एकांक्षी की तरफ देखकर अपनी सिट पर बैठ गया.....

उधर अधिराज बाहर ही एकांक्षी का वेट कर रहा था क्योंकि क्लास रुम उसके लायक कोई खास जगह नहीं जहां जाकर वो चुपचाप बैठकर छिप सके...... काफी देर तक वहीं घूमने रहने के कारण उसे अपनी और वैदेही की दुरियां याद आने लगी........

तभी अधिराज अचानक से कहता है...." नहीं हम दोबारा वैदेही को नहीं खो सकते....." आगे कुछ सोचकर कहता है..." सारंगी...अब तुम खुद को रोक नहीं पाओगी.....जिस तरह तुम हमें पाने के लिए झरने में कूद गई थी....."

फ्लैशबेक.......

वैदेही हाथ में फूलों वाली टोकरी लिए उसमें कुछ जड़ी बूटी और कुछ फूल लेकर झील की तरफ बढ़ रहीं थीं....हंसती खिलखिलाती हुई वैदेही इठलाती हुई चल रही थी हर हवा के झौंके के साथ उसके बालों से फूल गिर रहे थे... अपने घाघरे को पकड़ते हुए धीरे धीरे पगडंडी से होकर झील के किनारे पहुंच चुकी थी जहां अधिराज एक बड़े से पत्थर पर बैठकर छोटे छोटे टुकड़ों को पानी में फैंक रहा था ...

वैदेही अधिराज को चौंकाने के इरादे से अपनी हाथ की टोकरी को वहीं साइड में रखकर अपने दुपट्टे को खोलकर हाथ में लेते हुए दबे पांव आगे बढ़ती है लेकिन उसकी पायल की झनकार अधिराज के कानों तक पहुंच चुकी थी लेकिन फिर भी अनजान बनते हुए वहीं पत्थर को फैंक रहा था लेकिन साथ ही उसका ध्यान पीछे भी था.....

जैसे ही वैदेही बिल्कुल करीब पहुंचकर अपने दुपट्टे से उसके ऊपर जैसे ही आगे बढ़ती है तभी अधिराज उसके हाथ को पकड़कर अपनी तरफ खींच लेता है जिससे वैदेही सीधा आकर उसकी गोद में गिरती है....

अधिराज के उसे खींचने से वो पूरी तरह उसकी आंखों में चुकी थी.... अधिराज उसके बालों को उसके चेहरे से हटाता है , जिससे उसके छूने से वैदेही सिहर जाती है और तुरंत उसे अपने से दूर करके खड़ी होकर कहती हैं...." अधिराज...हम आपको चौंकाने वाले थे और आपने हमें ही इस तरह चौंका दिया...."

अधिराज खड़े होकर वैदेही के पास जाकर नीचे गिरे हुए दुपट्टे को उठाकर उसे देते हुए कहता है..." तुम्हारी पायल की झनकार तुम्हारे आगमन की सूचना दे देती है तो अब इसमें हमारा कोई दोष नहीं है...."

वैदेही अपने पैर से पायल निकाल कर झील में फैंक देती है जिसे लेने के लिए अधिराज तुरंत झील में कूद जाता है......

वैदेही उसकी हरकत को अचरज भरी नजरों से देखते हुए कहती हैं...." अधिराज आपने ये जानबूझकर कहा था न ...आप पानी से बाहर आ जाइए अधिराज हमें वो पायल नहीं चाहिए..."

अधिराज मुस्कुराते हुए कहता है...." ये हमारे प्रेम की निशानी है जिसे हम पाना चाहते हैं ..."

वैदेही अधिराज को बस उसकी इस बात पर हंसने लगती है लेकिन अधिराज तो कुछ और‌ ही सोच रहा था....

तभी वो डूबने का नाटक करने लगता है....." बचाओ हमें... वैदेही...हम इस पानी में...श्वास नहीं ले पा रहे हैं... हमें बचाओ..."

वैदेही अधिराज को इस तरह डुबता देख बैचेन हो जाती है और बिना कुछ समझे जल्दी से पानी में कूद जाती है....

वैदेही अधिराज को पकड़ते हुए कहती हैं....." आप पक्षीराज बेशक है किंतु आप इस तरह पानी में तैरने की भूल क्यूं कर बैठते हैं...." अधिराज कुछ नहीं कहता बस बेहोश होने का नाटक करके वहीं वैदेही पर भार बन जाता है......

वैदेही जैसे तैसे करके अधिराज को किनारे लाकर लेटाती है और धीरे धीरे उसके छाती पर हाथों से दबाते हुए पानी बाहर निकालने की कोशिश करती हुई बार बार कानों को उसकी छाती पर रखकर धड़कन सुनने की कोशिश करती है.....

वैदेही अधिराज को होश में लाने के लिए सभी तरह के नुस्खे आजमा चुकी थी लेकिन अधिराज पर कोई फर्क नहीं पड़ता जिससे वो घबराते हुए कहती हैं..." अब तो आपको होश में लाने के लिए बस एक उपाय है..."

अधिराज अपने आप से कहता है...." उसी उपाय की प्रतीक्षा हम कर रहे हैं वैदेही...."




..............to be continued............







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