ज़िद्दी इश्क़ - 8 Sabreen FA द्वारा कुछ भी में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

ज़िद्दी इश्क़ - 8

हॉस्पिटल में एक औरत मशीनों में लिपटी हुई होशो हवास की दुनिया से बहुत दूर थी।

एक आदमी उसके हाथों को पकड़े हुए उसे ही देख रहा था और उसके हाथों को अपने होंठो से लगाए हुए किसी सोच में गुम था।

मोबाइल पर आने वाले कॉल ने उसे उसकी सोच से बाहर निकाला और उस आदमी ने पॉकेट से अपना फोन निकाल कर आने वाले कॉल का नाम देखा। स्क्रीन पर कॉलर नाम देखते ही उसके माथ पर बल पड़ गए।

उस आदमी ने आराम से उस औरत का हाथ बेड पर रखा और उसके माथे पर किस कर के बेड से कुछ दूर फासले पर जाकर कॉल अटेंड ही।

कॉल अटेंड करते हैं दूसरी तरफ से जो कहा गया उसको सुनकर आदमी के एक्सप्रेशन बदल गए।

"मुझे तुमने मायूस किया है एम मैंने तुम्हें एक काम दिया था तुम वोह भी नहीं कर सके।"

उस आदमी ने फोन पर मौजूद आदमी से कहा। दूसरी तरफ से फिर से कुछ कहा गया जिसे सुनकर उस आदमी ने आगे कहा।

"यह आखरी मौका है एम अगर तुमने इस बार मेरा काम नहीं किया तो मैं तुम्हें जिंदा रहने के लायक नहीं छोडूंगा।"

अपनी बात पूरी करते ही उसने दूसरी तरफ की बात सुने बिना ही फोन कट कर दिया।

.........

सोफिया जब उठी तो सबसे पहले उसने बैग से अपना मोबाइल निकाल कर चार्ज पर लगाया और फ्रेश होने के लिए वॉशरूम में चली गई। फ्रेश होने के बाद वह सीधा किचन में गई क्योंकि कल रात थकी होने की उसने कुछ भी नहीं खाया था।

जब वह किचन में आई तो उसे फ्रीज पर एक नोट मिला जो उसके डैड ने लिखा था।

सोफिया बेटा नाश्ता तैयार कर दिया है तुम खा लेना और मुझे एक जरूरी काम से दो-तीन दिन के लिए शहर से बाहर जाना है तो अपना ख्याल रखना।

सोफिया ने मुंह बनाते हुए नोट पढ़ा और पढ़ने के बाद उसने उसे फेंक दिया। उसे अकेले नाश्ता करना बिल्कुल पसंद नहीं था। उसने बेदिली से नाश्ता गरम किया और लेकर टीवी लांच में आकर टीवी ऑन करके नाश्ता करने लगे।

सोफिया ने नाश्ता करने के बाद बर्तन धोए और अपना फोन उठाकर माहेरा को कॉल किया। मोबाइल पर रिंग जा रही थी लेकिन कोई फोन नहीं उठा रहा था।

वह जानती थी उसे रामिश पर अंधाधुन विश्वास नहीं करना चाहिए, लेकिन वोह रामिश पर भरोसा करना चाहती थी क्योंकि वोह जब भी उसे देखती थी उसकी धड़कने तेज हो जाती थी।

वोह रामिश को बहुत ही पसंद करती थी लेकिन खुद से भी छुपाती फिर रही थी क्योंकि उसे लगता था रामिश उसे पसंद नहीं करता और अगर उसे पता चल गया तो क्या ही करेगा।

वोह जब भी उसके सामने होता था और उससे बात नहीं करता था तो यह देखकर पता नहीं क्यों सोफिया की सांसे अटक सी जाती थी।

वह उसके बारे में सोच ही रही थी कि तभी उसके फोन की बेल बजी जो उसे सोचो कि दुनिया से बाहर लाई।

सोफिया ने फोन उठाकर देखा तो माहेरा के डैड उसे कॉल कर रहे थे।

सोफिया कॉल उठाने से पहले सोचने लगे की अब वोह क्या बहाना बनाएं।

"हेलो अंकल कैसे हैं आप और आंटी कैसी हैं?"

सोफिया ने जल्दी से फोन उठाते कहा।

"हम दोनों ठीक हैं बेटा वोह माहेरा हमारा फोन नहीं उठा रही है सब ठीक तो है। "

जाकिर साहब ने परेशान होकर पूछा।

"जी जी अंकल वोह बिल्कुल ठीक है असल कल से उसका फोन नहीं मिल रहा है, ऊपर से उसका मोबाइल साइलेंट पर है और कहीं रखकर भूल गई है, इस वाजह से नहीं मिला आप फिकर ना कीजिए वह बिल्कुल ठीक है। "

सोफिया ने सफाई से झूठ बोला।

"अच्छा ठीक है बेटा जब वोह तुम से मिलोगी तो मेरी बात करवा देना।"

जाकिर साहब ने सोफिया की बात सुनने के बाद कहां।

"ओके अंकल।'

सोफ़िया ने झा और जल्दी से फोन कट कर दिया।

...…....

माज़ और रामिश बैठ कर माहेरा की सिक्योरिटी के बारे में सोच रहे थे, क्योंकि उन्हें यकीन था की वह भागने की कोशिश जरूर करेगी हालांकि रामिश ने मेंशन की सिक्योरिटी डबल करवा दी थी।

लेकिन उन्हें इस बात का डर था की अगर वोह किसी तरह पुलिस के पास पहुंच गई तो उनके लिए खतरा और बढ़ जाएगा क्योंकि उनके खिलाफ सबूत मिलते ही पुलिस अपना काम शुरू कर देगी।

"माज़ मेरे पास एक आईडिया है अगर तुम्हें बुरा ना लगे तो और अगर तुम.........."

रामिश ने माज़ की तरफ देखते हुए कहा।

"क्या आईडिया है?"
माज़ ने उसके चेहरे को देखते हुए कहा।

उसकी बात सुनकर रामिश उसके करीब बैठ गया और अपना आईडिया बताने लगा।

"लेकिन यह कैसे हो सकता है......... वोह कभी भी इसके लिए तैयार नहीं होगी।"

माज़ ने सोचते हुए कहा।

वोह जनता था माहेरा कभी भी इसके लिए तैयार नही होगी।

उसकी बात सुनकर रामिश उसके पास आया और उसके चेहरे को अपने हाथों में लिए इधर उधर करके देखने लगा।

"क्या हुआ ऐसे क्यों देख रहा है?"

माज़ ने चिढ़ कर कहा।

"माज़ येह तू ही है ना कहि तेरा कोई हम शक्ल तो नही आ गया।"

रामिश ने हैरान हो कर कहा।

"बेटा अगर तूने तीस सेकंड में मुझे नही छोड़ा तो मैं तेरा चेहरा ज़रूर बदल दूंगा।"

माज़ ने गुस्से से रामिश को घूरते हुए कहा जो उसके गालो को पकड़ कर खींच रहा था।

"यार मैं तो इसीलिए चेक कर रहा था क्योंकि मुझे तो याद नही की तूने कभी किसी की मर्ज़ी से कुछ काम किया हो तेरे दिल मे जो आता था तू हमेशा वही करता था। कहि तुझे उससे प्यार वयार तो नही हो गया।"

रामिश ने एक्ससिटेड हो कर माज़ की तरफ देख कर पूछा।

माज़ ने मुस्कुराते हुए उसकी तरफ देखा और फिर कहा।

"तुझे एक बात पता है?"

"क्या?" रामिश ने कंफ्यूज हो कर कहा।

"यही की दोस्त और बीबी को कभी विश्वास दिलाने की जरुरत नहीं होती, क्योकि..
दोस्त कभी शक नहीं करता और बीबी कभी यकीन नहीं करती। लेकिन यहां तू मुझे शक्की बीवी लग रहा है।"

माज़ ने अपनी आंखों को छोटा करके रामिश को देखते हुए कहा।

"बेटा माज़ मुझे तेरे इरादे नेक नही लग रहे है।"

रामिश ने अपनी शर्ट को पकड़ते हुए कहा।

"अबे गधे तूने मुझे समझ क्या रखा है।"

उसकी बात का मतलब समझ कर माज़ ने चिढ़ कर उस पर पिलो फेंक कर कहा।

रामिश ने पिलो पकड़ कर हस्ते हुए कहा।

"अच्छा माज़ मैं सोफ़िया के लेने जा रहा हु क्योंकि मैं ने उससे कहा था कि आज मैं इसे माहेरा से मिलवाने लाऊंगा और अगर मैं ने ऐसा नही किया तो वोह पुलिस के पास चली जायेगी।"

"बेटा रामिश इसे ऐसे कहो की तुम सोफ़िया से मिलना चाहते हो और माहेरा का बहाना बना रहे और ज़रूर तुमने ही उससे यह भी कहा होगा कि तुम खुद उसको लेने आओगे।"

माज़ ने मुस्कुरा कर रामिश को देखते हुए कहा।

रामिश उसकी बात सुनकर गड़बड़ा गया और फिर खुद को कंट्रोल करते हुए बोला।

"तु जनता है मैं ने कभी किसी लड़की में कोई दिल चस्पि नही ली और ना ही कोई लड़की मुझे अपनी तरफ अट्रैक्ट कर पाई, लेकिन सोफ़िया की बात ही अलग है क्योंकि जब मैं उसे देखता हूं ना दिल करता है बस उसी को देखता रहू, वोह हर वक़्त मेरे हवासों पर छाई रहती है।"

"लेकिन मैं इस बात से डरता हूँ कि कहि हमारे दुश्मन उसे हमारी कमज़ोरी न समझ ले और मुझसे बदला लेने के लिए उसे अपना निशाना ना बना ले। इसीलिए मैं खुद को उससे दूर रखने की कोशिश करता हु।"

"मगर यह जो दिल है उससे दूर जाने को तैयार ही नही है। और तुझे क्या लगता है जब उसे यह पता चलेगा कि मुझे यह तक पता नही है कि मेरा बाप कौन है तो क्या वोह मुझ से प्यार कर पायेगी, यह फिर वोह मेरे साथ रहना चाहेगी।"

सब कुछ कहने के बाद रामिश ने आखिरी बात कड़वे लहजे में कहि।

"कितनी बार मना किया है यह बकवास बाते मत सोचा करो लेकिन नही तुम्हे तो मेरी सुननी ही नही है। लगता है तेरे पास आज कल बहोत फालतू टाइम है इसीलिए अपने दिमाग में यह खुराफात भर रहा है।"

"कितनी बार समझ समझाया है तुम मेरे भाई हो और यही तुम्हारी पहचान है और अगर वोह भी तुमसे प्यार करती है तो उसे भी इन सब बकवास से कोई फर्क नही पड़ेगा। अब दफा हो जा यहां से इससे पहले की मैं तेरे चेहरे का नक़्शा बिगाड़ दु।"

माज़ ने गुस्से से उसे अपने पास से धकेलते हुए कहा।

रामिश जाने लगा कि तभी माज़ ने उसे आवाज़ दी।

"तुम फिक्र मत करो माहेरा को कैसे मनाना है मुझे अच्छे से पता है, तुम बस मुझे उसकी फैमिली की इनफार्मेशन निकाल कर देदो।"

"ओके समझ लो काम होगया, रात तक तुम्हे सारी इनफार्मेशन मिल जाएगी।"

रामिश ने पीछे पलट कर मुस्कुराते हुए कहा।

"इससे पहले की मेरा दिमाग फिर से खराब हो अपनी बंदर जैसी शक्ल मेरे सामने से गयेब कर।"

माज़ ने उसकी बत्तीसी को देख कर चिढ़ कर कहा।

उसकी धमकी सुनकर रामिश मुंह लटकाते हुए वहां से चला गया।

..........

माहेरा कमरे में बैठ कर कब से अपना दिमाग चला रही थी की उस कमरे में कोई खिड़की भी नही थी। माहेरा ने पूरा कमरा छान मारा लेकिन उसे बाहर निकलने का कोई रास्ता दिखाई नहीं दिया।

वोह गुस्से से उठकर कमरे में टहलने लगी कि तभी उसका पैर टेबल से टकराया और वोह नीचे गिर गयी। वोह अपने पैरों में उठने वाली दर्द की टीसों को नज़र अंदाज़ करके खड़ी हुई तो देखा कि उसका नाखून टूट कर उसके अंगूठे में चुभ गया था और वहां से खून निकल रहा था।

अभी माहेरा बेड पर बैठकर अपना पैर देख ही रही थी की दरवाजा खोल कर सुबह वाली औरत अंदर आई और उसे पैर पकड़े देखकर उसके करीब गई, उसके पैर से निकलने वाले खून को देख कर बोलो।

"हिलना मत मैं अभी वाशरूम से फर्स्ट एड बॉक्स लाती हु।"

जब कि उसकी बात को सुनकर माहेरा अपनी अक्ल के घोड़ो को दौड़ाने लगी।

दरवाज़ा खुला देख कर माहेरा खुशी से पागल हो गई।

वोह औरत जैसे ही अंदर गयी माहेरा ने उसे वाशरूम में लॉक किया और कमरे से बाहर निकल गयी।

माहेरा कमरे से निकल कर बाहर जाने का रास्ता ढूंढने लगी।

वोह आपने ही ध्यान में पीछे की तरफ देख कर चल रही थी कि तभी वोह सामने किसी से टकरा गई।

माहेरा को ऐसा लगा जैसे वोह किसी दीवार से टकरा गई हो।

"हाये......मेरा सिर।"

माहेरा ने अपना सिर उठा कर ऊपर देखा तो उसकी सिटी पिट्टी गुल हो गयी।

सामने दीवार की जगह माज़ खड़ा था।

माज़ को देख कर माहेरा की सांसे ही अटक गई और वोह उल्टे कदम लेती हुई पीछे जाने लगी।

..................

माज़ अपने स्टडी रूम में बैठा कोई फ़ाइल पढ़ रहा था जब उसकी नज़र कंप्यूटर स्क्रीन पर गयी जिम माहेरा अपने कमरे से निकल कॉरिडोर से जोते हुए राइट साइड की तरफ जा रही थी।
यह देख कर माज़ के चेहरे पर स्माइल आ गयी।

वोह माज़ के स्टडी रूम की तरफ ही आ रही थी।

माज़ खड़ा हुआ स्टडी रूम के बाहर कॉरिडोर में आ कर खड़ा हो गया।

माहेरा जो इधर उधर देख कर चल रही थी जब माज़ से टकराई तो उसे ऐसा लगा जैसे वोह किसी दीवार से टकरा गई।

माज़ को देखते ही हुए माहेरा एक पल के लिए डर गए और फिर खुद को नॉर्मल करते हुए अपने कदम पीछे लेने लगी।

माज़ ने उसे पीछे कदम लेते देखा तो उसका बाज़ू पकड़ कर उसे घसीटते हुए उसके साथ चलने लगा।

"छोड़ो मुझे जंगली इंसान मुझे अपने घर जाना है तुम मुझे यहां कैद करके नहीं रख सकते। मैं दोबारा से भागने की कोशिश करूंगी और तब तक करूंगी जब तक यहां से निकल कर तुम्हें पुलिस को ना पकड़ वा दूं और जब तुम जेल की हवा खाओगे तब तुम्हे पता चलेगा कैद होंने के बाद कैसा लगता है।"

माहेरा चीखते हुए कह रही थी लेकिन माज ने उसकी बातों को सुने बिना ही उसे बेडरूम में ले जाकर बेड पर धक्का दिया और वॉशरूम का दरवाजा खोल कर माहेरा ने जिस औरत को बंद किया था उसे बाहर निकाला और बोला।

" रोजी मैं इस बारे में तुमसे बाद में बात करता हूं अब तुम बाहर जाओ और दरवाजा बंद कर देना"

"जी सर।"

रोजी ने कहा और कमरे से बाहर निकल गई लेकिन दरवाजा बंद करना ना भूली।

माहेरा जो बेड से उतर रही थी माज़ को अपनी तरफ आते देख अपनी जगह ही जम गई।

माज़ बेड के करीब आया और माहेरा पर झुकते हुए उसके बालों को अपनी मुट्ठी में जकड़ा और गुस्से से बोला।

"तुम माज़ शेर खान की मिल्कियत हो, मेरी परमिशन के बिना तुम यहाँ उठ तो क्या हिल भी नही सकोगी। आज के बाद से तुम सास भी मेरी मर्ज़ी से लोगी, तुम मेरी मिल्कियत हो यह बात तुम जितनी जल्दी समझ जाओ तुम्हारे लिए उतना ही अच्छा होगा।"

"मैं तुम्हारी कोई मिल्कियत नहीं हूं सुना तुमने और ना ही मैं तुम्हारी कोई गुलाम, तुम एक पागल इंसान जिसने मेरी मर्जी के खिलाफ मुझे यहां इस कमरे में कैद कर रखा है। जाओ जाकर अपने दिमाग का इलाज कराओ.......आह......."

वोह जो माज़ से तेज़ आवाज़ में बात कर रही थी अपने बालों पर उसकी पकड़ और तेज़ होते देख उसकी ज़ुबान को बरेक लग गया।

"शी........ मुझे ऊंची आवाज सुनना बिल्कुल पसंद नहीं और हां तुम उस दिन से मेरी मिल्कियत हो जिस दिन मैंने तुम्हारी जान बचाई थी। शायद तुम भूल रही हो कलब में और तुम्हारे फ्लैट में मैंने ही तुम्हारी जान बचाई थी इसलिए अब तुम्हारी मर्जी हो या ना हो तुम्हें यही मेरे साथ रहना होगा।"

माज़ अपने दूसरे हाथ के अंगूठे से माहेरा के निचले होंठ को धीरे धीरे सहलाते हुए बोला।

जब कि उसका अंगूठा अपने होठों पर महसूस करते हुए माहेरा के दिल की धड़कने तेज़ होगयी और उसकी सांसे भी तेज चलने लगी जैसे ऑक्सीजन की कमी हो गई हो...

माहेरा ने उसका हाथ अपने होठों से हटाया और खुद पर काबू करते हुए माज़ से बोली।

"मैं ने तुम्हारी मदद नही मांगी थी तुम खुद आए थे।"

"हम्म, कह तो तुम ठीक रही हो लेकिन बचाया तो मैं नहीं था।
और अब जब तुमने यहां से भागने को कोशिश की ही तो तो तुम्हे उसकी सजा भी मिलेगी और सज़ा येह है कि तुम्हें बहुत शौक है ना यहां से भागने का तो अब से तब तक तुम्हें खाना नहीं मिलेगा जब तक तुम्हारी अकल ठिकाने नहीं आ जाती।"

माज़ ने उसके बालों को छोड़ते हुए कहा और बिना उसकी बात सुनें कमरे से बाहर निकल गया।


कहानी जारी है..........