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गर्मी की छुट्टियाँ!

गर्मियों की छुट्टियाँ

भोर हो आयी थी । ट्रेन धीरे धीरे जंक्शन की ओर बढ़ रही थी । इसी तरह कुछ ४५ साल पहले यह ट्रेन रेंगते हुए सुबह पटना पहुँच गयीथी। पापा का चेहरा मुझे याद आ गया । सब हालाँकि सामान्य सा ही लग रहा था पर इस बार हम नाना जी के पास नहीं बल्कि ताऊ जीके घर रुकेंगे । हम दोनो भाइयों को इस से मतलब नहीं था। ट्रेन का सफ़र खतम हुआ था और हमेशा की तरह हम छुट्टियाँ बिताएँगे ।पतंग उड़ाना , छत पर बैठ कर आम खाना और कॉमिक्स पढ़ने की कल्पना कर रोमांचित हो रहे थे । हमारे चचेरे और ममेरे भाइयों औरबहनों के ऊपर दिल्ली के सिनमा घरों के बारे में डिंग़े मारना । कुछ ये सब ही हमारा उद्देश्य और जीत होती । उनकी किताबों को देख उनपर हिक़ारत भरी टिप्पणी करना ।

हिचकोले खाती ट्रेन अचानक रुक गयी। इस बार कोई मामा नहीं आए थे । कुली ने समान उठाया और पहली बार मैंने पापा को थोड़ापैसे के लिए परेशान देखा।

मुझे कुछ अटपटा ज़रूर लगा किंतु बचपन में कहीं नयी जगह जाने की ख़ुशी में सब भूल गया।

टांगा घर के सामने रुका तो देखा कुछ लोग हमारी अगवानी करने आए थे । मुझे कुछ अजीब देहाती से लगे । पिता के रिश्तेदारों में कुछ नीरस और बोझिल सा व्यक्तित्व है । पर मुझे शायद कुछ दिन ही यहाँ गुज़ारने हैं फिर नाना जी के पास चले जाएँगे । यह सोच कर हम दोनो ने एक दूसरे को दिलासा दिया। कुछ ही समय में मुझे और छोटे को भूख लग आयी । परंतु माँ यहाँ की मालकिन ना थी , इसघर की रसोई में उनका आधिपत्य ना था । उनकी आँखों में हल्की सी झिड़की का भाव तैर आया पर खुद को सम्भालते हुए अपनीजिठानी से बोलीं, ये दोनो बहुत शैतान हैं । रात को खाया नहीं अब भूख -२ कर के दिक् कर रहें हैं । जिठानी हंसते हुए बोली , बेटे तोतुम्हारे ही कुछ गुण तो तुम्हारे आएँगे ही । फिर मुँह फेर कर अपनी बेटी को आवाज़ दे कर बोलीं, अरे रात की रोटियाँ होंगी थोड़ा अचारके साथ के आ। रोटी वह भी बासी! उन्हेंपराँठे खाने की आदत थी ।

शुरुआत के दिनों में बच्चे खेलने कूदने में व्यस्त रहे परंतु शीघ्र ही उनको समझ आ गया की उनकी उपस्थिति शायद बड़ी चची और उनकेबच्चों को पसंद नहीं थी । यों तो उस जमाने में रिश्तेदारों के यहाँ जाना आम बात थी किंतु बच्चे भी समझदार होते हैं वह भी सब समझगए । उन्होंने भी सभी सवाल एक गठरी में बांध कर मन के एक कोने में फेंक दिया ।

उनकी आँखों में अब शरारत नहीं एक डर सा दिखता था । माँ का निरुपाय असहाय होना मोनु को बहुत खलता था । चची की तीखी ज़बान और माँ के ऊपर उनके वजन को ले कर कटाक्ष बड़े ही बुरे लगते ।

बड़े भाइयों ने उनका इम्पोर्टेड टेप रिकॉर्डर भी छीन लिया। पिताजी भी कुछ कह ना पाए शायद यह उनका सरेंडर था।

धीरे धीरे मोनु और सोनू को भी पता लगा की पिताजी किसी केस में फँस गए हैं । उनको रोज़ कचहरी के चक्कर काटने पड़ते हैं  औरशायद उनको अभी यहीं रह कर पढ़ना होगा । इन सब के बीच माँ का अपमान उनकी जिठानी और उनके बच्चे द्वारा रोज़ाना की बात होगयी । पिताजी अति व्यस्त और उनके भाई उनके लिए क्या कर रहें हैं सोनू -मोनू को कुछ पता नहीं था। उनकी गर्मी की छुट्टियाँ अचानकएक भयानक स्वपन में बदल गयी। वो दिल्ली की यादों में खोए रहते ।

गरमियाँ खतम होने को आयीं किंतु उनके स्कूल जाने का कोई अता- पता नहीं था । पिता जी की व्यस्तता देख वे दोनो चुप रहते । तभी एक दिन उन दोनो का पटना के स्कूल में दाख़िला होगा, यह समाचार सुन दोनो के हृदय में उदासी और ख़ुशी की लहर एक साथ दौड़ गयी। नयी किताबों  की महक, नई अभ्यास पुस्तिका पर नए पेन से अक्षर उकेरना जो वे लगभग भूल से गए थे  अब वे दुबारा कर सकेंगे । यह सोच करबच्चे खुश थे पर कहाँ दिल्ली का स्कूल और कहाँ पटना का कॉन्वेंट स्कूल। थोड़ी निराशा पर जीवन की लय का चाहे जैसे भी वापसआना बच्चों को अच्छा ही लगा ।

admission के पश्चात नई uniform पहन दोनो ख़ुशी से फूले नहीं समा रहे थे । स्कूल हालाँकि काफ़ी जर्जर अवस्था में था किंतु फिर भी  अच्छा ही लगा ।

बरसात का मौसम शुरू हो गया था स्कूल को शुरू हुए कई हफ़्ते हो चले थे पर किताबों का कहीं पता नहीं था ।

छोटा मोनू समझ नहीं पा रहा था आख़िर क्यों वे किताबों के बिना स्कूल जा रहे हैं ।

नानीघर में अब पहले वाली स्थिति नहीं थी । पिता जी वहाँ नहीं जाते थे । उनकी ज़िद की किसी को भी परवाह नहीं थी । मंझले मामा कई बार ताने देते । इतने ही अच्छा है तो केस हुआ क्यों ? पिता के समक्ष उनकी कोई हैसियत ना थी । किंतु वे अब उनके रहन सहन एवं पहनावे पर कटाक्ष करते । 

उनकी भी अजीब अवस्था थी । हाल ही में  उनकी पत्नी की आग लगने से मौत हो गयी थी, उनकी चार बेटियाँ एक दूसरे का सहारा थी ।लोग दबी ज़ुबान में उनके विषय में बातें बनते । घर की सभी औरतें खुसफुस करतीं। नौकरानियाँ भी उनके विषय में बात करतीं । किंतु उनकी बेटियों की परिस्थिति सोनू मोनु से बेहतर थी । मामा अक्सर मीठा लड्डू या कलाकंद ले कर आते किंतु सोनू मोनू को कोई ना पूछता। वे उनके सामने बैठ कर चटकारे लगा कर खाते। 

किताबों को ले के छोटा भाई कुछ ज़्यादा दिक् करता था । उसे उम्मीद थी कि आज शाम पिताजी ज़रूर किताबें लाएँगे और उनको पढ़ करवो कक्षा में फ़र्स्ट आ जाएगा । बच्चे का  पिता में अगाध विश्वास होता है । उनकी निगाह में पिता सर्वशक्तिशाली हैं  और किसी भीइच्छा को चुटकियों में पूरी कर देंगे । फिर एक दिन पिता आख़िरकार किताबों का गट्टर उठा कर के आए । 

लेकिन अब परीक्षा सिर पर आ गयीं किताबें भी आ गयीं थी पर पिता को उनको पढ़ाने का समय ना था । पिता जी कुछ पुराने नए काग़ज़ों में उलझेरहते । उनके साथ छोटे मामा और बड़े चाचा का बड़ा लड़का साथ कचहरी जाता । गर्मियों के बाद बारिश की रिमझिम अच्छी लगती थी किंतु वे दोनो बच्चे लगातार मूसलाधार वर्षा के लिए अभ्यस्त ना थे । ताऊजी का घर उनकी तरह ही कंजूस और नीरस सा लगता । उस उबाऊ वातावरण में दोनो बच्चे घुटा-२ सा महसूस करते । 

उन्हें नाना का विशाल महल जैसे घर की याद आती । उस मकान की छत पर पतंग उड़ाने का संयोग इस वर्ष नहीं बन पाया । उनके बल मन ने एक दिन पता नहीं क्यों, निर्णय लिया कि आज नानीघर ज़रूर जाएँगे । उस दिन भी बहुत बारिश हुई थी । घर जाने का रास्ता जलमग्न हो गया था ।  पानी में भीगते हुए दोनों नानीघर पहुँच गए । पर उनका कोई ख़ास स्वागत नहीं हुआ । ठंडे चावल और बिना घी की दल खाने को मिला ।और शाम को उन दोनो को रिक्शॉ  पर बिठा कर ताऊ जी के घर के लिए  रवाना कर दिया । शाम के धुँधलेपन में रिक्शॉ धीरे - धीरे घर की और चाल पड़ा सोनू तो चिंतित था मोनू को कुछ आभास नहीं था कि, कितने निर्दली उनका  घर पर राह देख रहे थे। रिक्शॉ के रुकते ही बड़े भाई को पिता के भतीजे ने एक ज़बरदस्त चाँटा लगाया और कहा ये आवारा बनेगा । अपमान से बड़े भाई सोनू का चेहरा काला पड़ गया । उनको अंदर जाने की कोई आज्ञा नहीं मिली । वे दोनो अपराधी की तरह बरामदे में खड़े रहे ।

पिता के आते ही दोनो की पेशी हुई । एक बार फिर बड़े सोनू की बुरी तरह से पिटाई हुई । छोटे मोनू को छोड़ दिया  गया। पिता का रौद्र रूप देख माँ बेटा और बहन तीनो सहम गए थे उस दिन बच्चों की खाना माँगने की हिम्मत नहीं हुई ।

चाचा के चारों बच्चे और उनकी माँ आज जी भर खुश थे । पिता बचपन में उनको पढ़ाते थे और वे उनकी पिटाई भी कर  देते थे । आज उन सब के दिल में एक अजीब सी ठंडक सी थी । जैसे कि इसी पल के प्रतीक्षा थी । बच्चों के कोमल गालों पर पिता का थप्पड़ लगना, मानो सबको एक तरह से एक लाइसेन्स सा मिल गया था। अब जैसे सोनू मोनू किसी अभिजात्य वर्ग से निकाल दिये गए हों। उन्होंने गली के डरपोक कुत्तों की तरह सहमना सीख लिया।

पिता ने हालाँकि उनको बाद में पुचकार लिया । लेकिन उनके मस्तिष्क में पिता की भाव भंगिमा उत्तरोत्तर क्रोधी व्यक्ति के रूप में घर कर  गयी । सोनूमोनू दोनो अब उस तरह से दिक् नहीं करते थे । और तो और उन्होंने केवल नमक़ के साथ रोटियाँ खाना भी सीख लिया था । पराँठे यदा कदा ही बनते थे ।

उनको इस प्रकार से देख सारे चचेरे और ममेरे भाई  अब हिक़ारत से देखते । छोटा मोनू  अभी भी बहुत छोटा था । उसको कभी -२ अनायास ही लोग प्यार कर लेते थे । दोनो के अंदर खाना खाने के प्रति अजीब सी ललक सी पैदा हो गयी थी । वे दोनो कम से कम चार पाँच रोटियाँ खाजाते । पढ़ाई-लिखाई तो मानो जैसे बंद ही हो गयी थी। सोनू और मोनू दोनो अपनी अपनी कक्षा में  उत्तीर्ण ना हो पाए ।

पिता के क्रोध का भय से दोनो को झूठ बोलने की आदत पड़ गयी । बड़े सोनू को सब भोली कह के छेड़ते। हालाँकि उसे बड़े  भाइयों से लड़ना नहीं आता था । पर उसके अंदर एक अन्याय की भावना ने घर बना लिया। बीच का होने के कारण उसकी कोईसुनता नहीं ना उसको कोई छोटा समझता । स्वभाव से चंचल होने के कारण उससे कुछ ना कुछ ऐसा हो जाता की वह ग़लत ही साबितहोता ।

गर्मी के दिन और बरसात भी बीत चली अब सर्दी धीरे- धीरे दस्तक दे रही थी । सोनू और मोनू  की पढ़ाई अब कुछ सामान्य स्थिति में आ चुकी थी अब उनको पिता के ऊपर चल रहे मुक़दमे का पता चल चुका था । बालसुलभ भोलापन अब यह समझ चुका था की पिता की अवस्था अब पहले जैसी ना थी । उनके मन में अब भय ने अपना स्थान बना लिया था ।

माँ अक्सर उदास ही रहती । उनकी जिठानी के सामने एक ना चलती । उनका काम केवल खाना पकाना था । उनके पर हर रोज़  तानो की झड़ी सी लगी रहती । उनका व्यवहार बिलकुल बचकाना था मानो उनको किसी ने दीन-दुनिया के विषय में कुछ बताया न था ।वे दिन भर काम में व्यस्त रहतीं । बच्चे उनके साथ होते  दुर्व्यवहार से व्यथित रहते परंतु उनके पास भी  कोई विकल्प ना था । बड़ा सोनू अक्सर दिवास्वप्न देखता की वह अत्यधिक शक्तिशाली बन कर अपने बड़े भाइयों की पिटाई कर देगा । उसकी कल्पना में ननिहाल के स्वच्छंद सुख भरे दिनों की यादें सजीव हो जाती । कई बार वह अपने छोटे भाई को कहता, देखना , एक दिन मैं बड़ा आदमी बन इन सबसे आगे निकल जाऊँगा । छोटे को ये सब बातें समझ नहीं आती पर वो भाई का साथ देना चाहता था ।वह उसकी हाँ में हाँ मिलाता। 

सर्दियों अब ज़ोर पकड़ चुकी थी । हवा तीर समान  महसूस होने लगी थी । सोनू मोनू   के पास गरम कपड़े ना थे । इतनी लम्बी छुट्टियों की  उम्मीद ना थी । यह साल दूसरों के घर ही बीत गया । लेकिन अब माँ हर इतवार को नियम अनुसार मैके जाने लगी थी। बच्चों को भी इंतेज़ार रहता । ताऊजी के घर रूखा सूखा खाते खाते उनकी जीभ पकवान खाने को तरसती , ननिहाल में उन्हें हालाँकि कोई विशेष सम्मान और प्यार ना मिलता । माँ की भाभियाँ और डॉक्टर मौसाजी की पत्नी या मौसी माँ की आलोचना से बाज ना आती । उनकी जली-कटी बातें सुन बच्चों का मन कातर  हो आता। किंतु वे अपने ममेरे भाई बहनों के साथ खेल कूद में व्यस्त हो जाते । छोटे मामा सदैव उनको छोड़ने के लिए ताया जी के घर तक आते । रात के अंधेरे में सोनू को डर लगता । नाना के कमरे में रखी अँगीठी की आँच बहुत अच्छी लगती ।पर मजबूरन उन्हें छोड़ कर घर जाना पड़ता, नाना बाबू वकील थे , उनकी अच्छी प्रैक्टिस  चलती थी । मुवक्किल बरामदे डेरा डाले पड़ेरहते । नोट बोरों में कस के आते, परंतु वे जितनी तेज़ी से आते उतनी ही तेज़ी से खर्च होते। सारी सुविधाओं और पैसे पर मामा के बच्चों का आधिपत्य होता । इस पर भी बड़ी दीदी समझाती की यह घर फिर भी तायाजी के बदसूरत और बदबूदार घर से अच्छा है ।

माँ सब में बड़ी थीं किंतु उनका उनके मैके में कोई सम्मान ना था । ये बात बड़े सोनू को बहुत खलती । एक दिन उसने मामा के व्यवहार की शिकायत नाना से कर दी। नानाजी के चेहरे पर एक उदासी की छाया आयी परंतु उन्होंने खुद को सम्भाल कहा , बुट्टी बाबू तेरे मामा और माँ भाई बहन हैं । जैसे तुम और दीदी लड़ते हो उसी तरह वे दोनों भी लड़ते हैं। सोनू उनकी बात से संतुष्ट ना था । बालक का कोमल मन माँ के प्रति अन्याय और तिरस्कार को स्वीकार ना कर पाया । नाना से उसका मोह थोड़ा -२ भंग हो गया । उनको वह अति प्रभावशाली व्यक्ति समझता था जो किसी भी समस्या का हल ढूँढ लेंगे। उसने बहुत सोच समझ  कर पिता को भी बताया । पिता का चेहरा बुझ सा गया । बालों में हाथ फेर कर उन्होंने कहा कुछ दोनो की बात है, फिर हम  दिल्ली चले जाएँगे । वहाँ तुम्हारे दोस्त तुम्हारा इंतज़ार कर रहें है ।

सर्दियाँ बीत गयी नया साल भी आया । एक शादी में जाना था , सोनू के पास कुछ पहनने को ना था । माँ अपनी फ़्रेंड के बेटे के लिए बुनाई कर रहीं थीं वही स्वेटर सोनू को पहना दिया । नीले और पीले रंग का स्वेटर बड़ा ही सुंदर लग रहा था । नए स्वेटर के पहनने सेशादी में जाने का उत्साह मानो चौगुना हो गया । कुछ पलों के लिए सोनू खुद को राजकुमार सा महसूस कर रोमांचित हो रहा था । शादी में कुछ गिफ़्ट देना था ये एक विकट समस्या थी । एक शर्बत सेट जो देखने में बड़ा पर दाम में कम ख़रीदा गया । जिठानी और उनके ५बच्चे अपनी टिप्पणी से बाज नहीं आए  मानो पिता के केस का कारण जैसे माँ ही थी । शादी में अच्छा खाना और नए कपड़े पहन कर सोनू और मोनू ख़ुश थे । शादी में सब पीठ पीछे सोनू के पिता की बुराई कर रहे थे । सोनू के लिए यह बर्दाश्त के बाहर था । उसने दो बच्चों के साथ झगड़ा कर लिया । हालाँकि,पिता ने उसकी पिटाई नहीं की किंतु उनके मुख पर दुःख का भाव उमड़ आया । वे सोनू औरमोनू को ले कर वापस चले आए । बड़ी बहन ने सोनू से कहा - तुमने सारा मज़ा ख़राब कर दिया ! छोटा मोनू बोला - दीदी, भाई ने ठीक किया ! उसने मुझे भी मारा था । दीदी चुप हो गयीं , आत्मसम्मान को ठेस लगी थी तीनों के लिए पिता परमेश्वर थे, उनका अपमान उनसे सहन ना हुआ । तीनो ने मंत्रणा की और निश्चय किया की जो भी उनके माता पिता के विषय में ग़लत शब्द बोलेगा  उससे कोई बात नहीं करेगा और मौक़ा पाते ही उसकी धुलाई करेंगे । इस निश्चय के बाद तीनों भाई बहन सन्तुष्ट थे ।

उनका खोया  सम्मान उनके आँखों में वापस आ गया ।
अब नया साल भी शैने:-२ बीत रहा था । मुक़दमे में क्या चल रहा था कुछ -२ समाचार मिलते थे । पिता ने अब शेव फ़ोम छोड़ कर साबुन से शेव करना शुरू कर दिया  मीलों पैदल चलते । उनका दमकता चेहरा कालिमा सा लिए हो गया था । किंतु उनकी गरिमा में कोई कमी ना थी । वह अब भी सफ़ेद कुर्ता पजामा  और कोल्हापुरी चप्पल पहनते थे और तेजस्वी व्यक्तित्व के मालिक थे । मुक़दमा घिसट रहा था ।


आज बहुत चहल पहल थी । आज फ़ैसले का दिन था । पिता तैय्यार हो कर जा रहे थे और माँ मुँह छुपा कर रो रहीं थीं । आज यदि फ़ैसला पिता के पक्ष में ना आया तो वे अरेस्ट कर लिए जाएँगे । उनको कारागार में बंदी बनाया जाएगा । बचपन कि यादें धूमिल सी हैं।सोनू को याद नहीं पर उस दिन वे ननिहाल में थे । एक अजीब सी खामोशी फैली हुई थी । सब चुप थे , बड़े अपने कामों में व्यस्त थे ।सबके कान फ़ोन की घंटी सुनने के लिए बेचैन थे । उन दिनों कोई ख़ास फ़ोन नहीं आते थे । पर उस दिन कई फ़ोन आए। या सोनू का फ़ोन पर ही ध्यान था । अचानक घंटी बजने का स्वर से सबकी तंद्रा टूटी । सोनू को याद नहीं पर किसी ने कहा - केस जीत गए !! कुछ पल के लिए जैसे समय ठहर गया । फिर सोनू मोनू को भी इस उल्लास का मतलब समझ आया । 

पिता ने उस दिन बच्चों को हनुमान मंदिर बुलाया था । कई दिनों से पिता से ना के बराबर मुलाक़ात हुई थी । माँ ने उन दोनों को जैसे तैसे रिक्शॉ मेंबिठा कर स्टेशन के समीप हनुमान मंदिर ले गयीं। पिता को देख दोनों हर्ष से लिपट गए ।

छोटे मोनू को पिता ने बोला - बड़े हो कर तुम्हें ये याद नहीं रहेगा! मोनू बोला पापा मैं ये दिन कभी नहीं भूल पाऊँगा ।

केस के पश्चात पिता दिल्ली को रवाना हो गए । बच्चे अभी भी पटना में ही पढ़ रहे थे किंतु उन्हें पता था की वे अब दिल्ली में पढ़ेंगे इसलिए बड़े सोनू ने तो पढ़ना छोड़ सा दिया । पिता के दो चार पत्र आए उनके सोनू मोनू को प्यार लिखा होता । माँ की स्तिथि में कोई ख़ास परिवर्तन ना था । पर अब वे ननिहाल में रह रहे थे । ताऊ जी के भयानक महल से वे बाहर आ चुके थे । अब उनके पास दिल्ली का टिकट था वे अब दुबारा से DTC की बस पर बैठ सकेंगे । पहले पटना से दिल्ली का ट्रेन का सफ़र सोनू को दुखी और भयभीत कर देताथा । गर्मियों की छुट्टियों के बाद वे निरुत्साहित हो ट्रेन में बैठते । इस बार उसे ट्रेन का बेसब्री से इंतज़ार था ।

राजेश सहाय 

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