सपने - (भाग-5) सीमा बी. द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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सपने - (भाग-5)

सपने.....(भाग-5)

"आस्थू तूने कुछ तो कारास्तानी की है, जो शैतानों जैसे मुस्कुरा रही है".....कमरे में आते ही स्नेहा ने दरवाजे को लॉक करते हुए पूछा......आस्था जवाब न दे कर बस मुस्करा रही थी। "अब बस कर मुस्कराने की और मुझे बता क्या माजरा है"? "ओ मेरी नेहु आज मैंने उस लड़के को सब सच बता दिया कि मुझे शादी नहीं करनी, मुझे थियेटर और फिल्मों में काम करना है"..... स्नेहा उसकी बात सुन कर थोड़ी परेशान हो गयी," यार आस्थू सच कह देना तो अच्छी बात है, पर अगर उन लोगो ने तेरे पापा को सब बता दिया तो तुझे बताने की जरूरत नहीं कि अंकल जी तेरा क्या हाल करेंगे"!" तू टैंशन मत ले वो मेरा दोस्त बन गया है, वो किसी को कुछ नहीं कहेगा और शादी के लिए न कहने का कोई न कोई कारण ढूँढ ही लेगा"!
आस्था कि बात सुन कर स्नेहा को थोड़ी राहत तो मिली पर हैरानी भी हुई। "क्या बात है? आस्थू मैं तो हैरान हो गयी कि तूने उसे दोस्त भी बना लिया वो भी 10-15 मिनट में और नई नई दोस्ती पर तुझे यकीन भी है कि वो किसी को कुछ न बताएगा और शादी के लिए न भी बोल देगा"!! "हाँ तू देखती जा, वो मना ही करेगा और रही दोस्ती की बात तो वो मुझे उसका कहा मानना पड़ा नहीं तो हमारा काम कैसे बनता?? आस्था की बात में वजन तो था और कारण भी सटीक था.......यहाँ कमरे में स्नेहा उसकी हिम्मत और समझदारी पर पीठ ठोक रही थी और उधर बाहर आस्था के पापा जी चिंतन मनन में लगे थे कि लड़के वालों ने तुरंत जवाब काहे नहीं दिया? निखिल भी अपने पापा की चिंता को समझ रहा था, इसलिए वो बोला," पापा वो लोग फोन कर देंगे, आप चिंता मत कीजिए"! "निखिल चिंता तो हो ही जाती है, आस्था तो नौकरी भी नहीं करती और आज कल के लड़को को लड़की भी नौकरी वाली ही चाहिए होती है, इसलिए ही उसके पीछे पड़ा रहता हूँ कि कंपीटिशन की तैयारी करे या आगे पढ़ ले और टीचर बन जाए,अब स्नेहा उसकी सहेली भी तो आगे पढ़ रही है.....पर क्या करें हमारी को तो नाच गााने से ही फुर्सत नहीं है, तभी तो ज्यादा चिंता हो रही है"। विजय जी की बात सुन कर निखिल सोच में भी सोच में पड़ गया, वो जानता था कि पापा को अगर कहूँगा कि, "आस्था को एडमिशन लेने दो तो वो गुस्सा हो जाएँगे, पहले वहाँ से जवाब आ जाए तभी कोशिश करूँगा बात करने की, अभी कुछ कहने का मतलब नहीं वैसे ही टैंशन में हैं.....यही सोच वो चुपचाप अपने कमरे में चला गया। किचन में निकिता और अनिता जी भी इसी बात पर चर्चा कर रही थी......मतलब घर के हर कोने में बस लड़के और आस्था की शादी का हॉट टॉपिक चल रहा था। कुछ देर में स्नेहा चाय नाश्ता करके घर चली गयी और सास बहु रात के खाने की तैयारी करने लगीं। आस्था अपने कमरे में कपड़े बदल कर लेटी थी और आगे कैसे और क्या किया जाए कि वो अपने सपने को पूरा कर सके!! तकरीबन रात के 9 बजे के आस पास विजय जी के पास रमेश जी का फोन आया ...."विजय यार हमारी आस्था भाई साहब और भाभी जी को बहुत पसंद आयी है, जिसे सुन कर विजय जी के चेहरे पर चमक आ गयी, पर भाई शेखर मना कर रहा है, कहता है लड़की और उसकी उम्र में 7-8 साल का फर्क है और इतना फर्क जनरेशन गेप में आ जाता है....2-3 साल का अंतर होता तो चल जाता"! विजय जी के चेहरे की चमक फीकी पड़ गयी और आँखे सिकुड़ गयी, जो बता रहा था कि वो कुछ सोच रहे हैं। फोन पर, "कोई बात नहीं यार, बच्चों की पसंद पहले देखनी चाहिए"! कह कर उन्होंने फोन रख दिया और कमरे से बाहर आ गए.....!! खाना टेबल पर लग गया था, अनिता जी विजय जी को खाना खाने के लिए बुलाने आयी तो उन्हें फोन पर बात करते हुए सुन कर बाहर ही रूक गयी......बातों से आइडिया तो हो गया था कि रमेश जी का फोन था, पर पति के चेहरे की उदासी देख वो चुप ही रहीं और उनके पीछे पीछे टेबल की तरफ चल दी......खाना परोसते हुए अनिता जी ने पूछ ही लिया, "निखिल के पापा फोन पर किससे बात कर रहे थे"?
" रमेश का फोन था, वो कह रहा था कि लड़के के माँ बाप को हमारी आस्था बहुत पसंद आयी, कहते हुए वो सबके चेहरे देख रहे थे....वो आगे बोले,पर लड़के का कहना है कि आस्था और उसकी उम्र में ररफी फर्क है तो उसे लगता है कि उम्र का फर्क सोच में भी फर्क लाता है, इसलिए उसने मना कर दिया है...अब और लड़का ढूँढना पड़ेगा जबकि मुझे लगा था कि हमारी तलाश आज पूरी हो गयी"! कह कर वो चुपचाप खाना खाने लगे। सब चुपचाप खाना खा रहे थे पर आस्था का मन तो खुशी से नाचने का कर रहा था....पर उसने अपनी भावनाओं पर काबू रखा।खाना खाने के बाद निखिल जो पापा को अपने मन की बात कहने का मौका ढूँढ रहा था, वो आज मिल ही गया, ये सोच उसने विजय जी को कहा," पापा मैं और निकिता सोच रहे थे कि हमारी आस्था अभी इतनी बडी भी नहीं हो गयी कि वो शादी और घर परिवार को संभाल सके, शेखर जी ने सही कहा है। आपके और मम्मी की शादी का टाइम कुछ और ही था, 8-10साल का फर्क ज्यादा नही समझा जाता था, पर अब ऐसा बिल्कुल ही नहीं है। लड़के लड़कियाँ पहले पढ़ लिख कर करियर बनाते हैं, फिर शादी के बंधन में बँधते हैं जैसे आपने मेरी और निकिता की शादी करवायी थी.....अभी हमें आस्था की शादी के बारे में न सोच कर उसे उसके पैरों पर खड़े होने का मौका देना चाहिए। इसके लिए उसे आप उसकी मर्जी के कोर्स में एडमिशन लेने दीजिए"। निखिल की बात सुन कर उन्हें गुस्सा तो बहुत आ रहा था, पर अब बेटा बड़ा हो गया है और सामने बहु भी है तो उन्होंने अपने आप का रोका और बोले," जो ये करना चाहती है, उसमें पता नहीं भविष्य बनेगा या नहीं, बेकार में समय और पैसे की बर्बादी करेगी और फिर वही घूम फिर कर शादी ही तो करनी है, अगर ये आगे पढना चाहती है तो बेशक पढे.पर ड्रामा वगैरह नहीं चलेगा"....का समझे"!! आस्था भी वहीं थी और दोनो की बातें सुन रही थी, अचानक उसे स्नेहा की बात याद आ गयी और तुरंत बोली," पापा अगर मैं पढाई के साथ साथ अपना शौक भी पूरा कर लूँ तो चलेगा न"? आस्था की बात सुन कर विजय जी बोले, वो कैसे करोगी, जरा मैं भी तो सुनूँ? " पापा मैं M.A में एडमिशन ले लेती हूँ जैसे स्नेहा कर रही है और साथ ही थियेटर जॉइन कर लूँगी, आपसे प्रॉमिस करती हूँ कि पढाई भी अच्छे से करूँगी"! विजय जी बेटी की बात सुन कर चकरा से गए, मिसेज सक्सेना ने भी बेटी का एक सपना पूरा करने की गुहार लगायी और साथ ही निकिता ने भी प्लीज पापा जी आप मान जाइए, इसका थियेटर के दाखिले की फीस वगैरह हम दोनो देख लेंगे......बहु के मुँह से ऐसी बात सुन कर तो वो थोड़ा मुस्कुरा दिए और बोले, "ठीक है तो कर लो अपनी मर्जी ,अब तो खुश हो सब"!
आस्था को तो यकीन ही नहीं हुआ कि वो सपना देख रही है या सच में हुआ है ऐसा.......वो खुशी के मारे अपने पापा के गले लग गयी, थैंक्यू पापा...थैंक्यू भाई,
थैंक्यू भाभी.....कह कर अपने कमरे में भाग गयी और तुरंत स्नेहा को फोन लगा कर खुशखबरी सुनायी.....बहुत देर तक दोनो सहेलियाँ बातें करती रही। आस्था तो आँखे झपकना भी नहीं चाह रही थी।
मैं आ रही हूँ, अपने सपने पूरे करने......!!
अब दिल्ली दूर नहीं.....पर क्या सचमुच मेरे सपने पूरे होंगे....ये भी तो एक चिंता थी..........आस्था को !!
क्रमश: