Exploring east india and Bhutan... - Part 12 Arun Singla द्वारा यात्रा विशेष में हिंदी पीडीएफ

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Exploring east india and Bhutan... - Part 12

Exploring East India and Bhutan-Chapter-12

सातवा दिन

 

“दीदी” मानसी लगभग दोड़ती हुई रूम में आई और आते ही विनीता से लिपट गई, जेसे वर्षों बाद मिल रही हों.

विनीता ने भी उसे प्यार भरी नजरों से देखते हुए बाहों में भर लिया.

“मानसी, यहाँ कोई और भी है” मेने शिकायत की

“ओह,भैया” कहती हुई, वह मुझ से भी बगलगीर हो गई.

“में जानती हूँ, कल बिना बोले जाने की कारण आप दोनों मुझ से नाराज हैं, पर में क्या करू, विदाई के पलों में, में  नार्मल नही रह पाती, और इमोशनल हो जाती हूँ, अपने को कंट्रोल नही कर पाती”.

“बस-बस रुको, हो गया, हम कोई नाराज नही हैं, तुम जेसी लडकी से भला कोई कब तक नाराज रह सकता है” विनीता ने उसे खींच कर अपने पास बिठा लिया.

 “अब बता भी दो, भसीन के यहाँ क्या हुआ“ मेने अपनी उत्सुकता  को शांत करना चाहा

“भैया, रानिपूल में मिस्टर भसीन का एक शानदार बँगला है, जहां एंट्री मिलना ही एक युद्ध जीतना है, एंट्री पर तेनात गार्ड, जोकि एक रिटायर्ड फोजी था, “अपॉइंटमेंट है”, उसने पूछा, मेरे मना करने पर उसने गेट खोलने से मना कर दिया, पर में भी वहीं जमी रही और, मेरे बार-बार आग्रह  करने पर और, ये कहने पर में एक अकेली लडकी इस परदेश में कहा जाऊंगी, उस भोले पहाडी ने मुझे मासूम, अबला, लडकी समझ कर अपने रिस्क पर अंदर किसी आशुतोष सर से बात की और, उसे बताया की में दिल्ली से केवल मिस्टर भसीन से मिलने इतनी दूर आई हूँ. और अंदर जो भी बंदा था, भला ही रहा होगा, की मुझे एंट्री मिल गई”.

“इमोशनल ब्लैकमेल“ मेने चुटकी ली, पर मानसी ने ध्यान नही दिया

“भैया, में अपनी ताजा-ताजा मिली सफलता की खुशी से सरोकार होते हुए अंदर चली गई. और फिर लगभग एक घंटे के इन्तजार के बाद, मेरी मुलाक़ात  मिस्टर भसीन  से हुई,  उन्होंने मुझे नही पहचाना, बेशक  में उनके ही  न्यूज़  चैनेल में जॉब कर रही हूँ, परन्तु चेनेल में इतना  सारा स्टाफ है, उस पर वे  साल में एक दो बार ही सारे स्टाफ को एक साथ एड्रेस करते हैं, तो हर एक स्टाफ का चेहरा याद रखना  किसी के लिए भी  मुश्किल काम है, उर वो तो इतने व्यस्त आदमी हैं. फिर भी वे मुस्करा कर मिले, ताजा फ्रूट जूस पिलाया, और अगले 15 मिनट में, मेरे बारे में, गंगटोक आने के बारे में, गंगटोक केसा लगा के बारे में, सारी बाते हुई.

“असली मुद्दे पर आ, सस्पेंस खत्म कर” मुझे बेचेनी होने लगी थी.

“वही तो बता रही हूँ, जेसे ही में मुख्य मुद्दे पर आई और मेने अपने आने का मकसद बताया यानी अपनी स्टोरी के बारे में बताना चाहा, उन्होंने मुस्करा कर कहा “एडिटर मिस्टर पसरीचा से मिलो”.

“ना उन्होंने मेरी स्टोरी सुनी, ना ही ये आश्वासन दिया कि में देख लूंगा. अगले एक मिनट में मेने उनको कन्वेंयेंस करने की भरपूर कोशिश की, पर मिस्टर भसीन पर कोई असर होता ना देख कर, मेरी ज्यादा बहस करने की हिम्मत नही हुई, और में उनको कीमती वक्त देने का थैंक्स कर के वापिस आ गई. और में सोचती जा रही थी, दिल्ली से रानीपूल का 1500 किलोमीटर का सफर तय करके क्या ”फ्रूट जूस” पीने आई थी”.

“ फ्रूट जूस पीने नही हम से मिलने आई थी” विनीता ने उस की हिम्मत बंधाते हुए कहा

“ये तो है” वह मुस्कराई

“हाँ में एक बात बताना भूल गई, हमारी सारी मुलकात के समय वहां एक बेहद हॉट, स्मार्ट लगभग 25 वर्षीय लडका मोजूद रहा, बाद में पता चला, उसी को गार्ड ने बाहर से इण्टरकॉम किया था, और उसी के कारण यह मीटिंग संभव हो पाई थी, नाम उसका आशुतोष था.

“हॉट” विनीता ने शरारत से कहा

 “दीदी, मानसी ने रूठने का अभिनय किया, “आगे सुनो, जब में निराश हो कर वापिस आ रही थी, तो मेरा दिल रोने का हो रहा था, और मिस्टर भासीन पर गुस्सा भी आ रहा था, दिल करता था गोली मार दूं, अरे मानो या ना मानो कम से कम पुरी बात तो सुन लो”.

“रिवाल्वर का इंतजाम करूँ” मेने गंभीर मुद्रा बना कर कहा

“हाँ कर ही दो, क्यों बेकार डींग मारते हो“ विनीता ने चिढ कर कहा

“मेरी सुनो, बाहर आते समय गेट के पास वाले लॉन में मुझे आशुतोष मिला, और उसने वह काम किया जो मिस्टर भसीन ने नही किया था यानी मुझे पुरी बात बताने को कहा, मेने भी उस कमजोर पल में अपने आने का सारा किस्सा उसके सामने रो दिया. ना जाने उसमे क्या ख़ास बात थी, अगले आधे घेंट में हम दोनों एकदम घुलमिल गये और उसने मुझे ढाढ़स बंधाते हुए कहा ‘हालांकि मिस्टर भसीन बहुत ही खडूस है, उम्मीद कम है, पर में कुछ करता हूँ’, बस अब वही मेरी आख़री उम्मीद है”.

“ख़ास बात उसमे नही तुम में है” विनीता ने उसकी होसला आफजाई की.

“और आज सुबह ही आशुतोष ने खुद कॉल करके मुझे बताया की कल से अगले सात दिन मिस्टर भसीन भूटान में रहेंगे, यही वो बात है जिसके कारण में खुश हूँ, क्योंकि मुझे आप लोगों के साथ रहने का एक और मोका मिल रहा है. मेने आशुतोष से अनुरोध किया क्या वह मुझे आज इवनिंग में मिल सकता है, ताकी मिस्टर भसीन के प्रोग्राम के बारे में खुल के बातचीत हो सके, और वह मान भी गया”

“मान भी गया, अरे तुम जेसी लडकी से मीटिंग के लिए वो मरा जा रहा होगा” मेने दिल की बात कही  

मानसी पहली बार थोड़ा शरमाई

“और अब अगर आप मुझे इजाजत दो तो में आगे आपके साथ भूटान चलूंगी”

“इजाजत ग्रांटेड” विनीता ने कहा

उसके बाद मानसी आशुतोष से मिलने चली गई, और हम दोनों कल का प्रोग्राम बनाने लगे. शाम ढल चुकी थी, और रात जवान होने लगी थी.

“क्या हसीं रात है, क्या रंगीन समां है “ मेने प्यार से विनीता को देखते हुए, खुशामदी लहजे में कहा

“तो”

“तो रात को और रंगीन बनाते है”

“कुछ नही होने वाला” विनीता ने मेरी मंसा समझते हुए कहा

“विनी, घूमना है मुझे सारा जहां, तुम्हें अपने साथ ले कें” मेने उसे खुश करना चाहा
“वरुण, सिर्फ दो  पेग वो भी स्माल” विनी ने ड्रेस बदलते हुए कहा, अब वह नाईट सूट में आ गई थी, और गजब की हसीन लग रही थी
“विनी तुम कितनी हसीन हो, ये आसमान से उच्चे पहाड़ भी तुम्हे झुक–झुक कर देख रहें हैं” मेने दिल की बात कही  
“एक लार्ज, एक स्माल, बस उसे ज्यादा नहीं, अब चाहे तुम मुझे  मिस यूनिवर्स बना दो” विनीता दोनों कानों तक मुस्कराई. फिर महफिल जम गई.

पहले सोचा गया था कि गंगटोक में रह कर मौसम साफ होने व रास्ता खुलने का इंतजार करते हैं, तो पिछले तीन दिन से इंतजार कर रहे थे, और सुना था, इंतजार का फल मीठा होता है, तीन दिन तक गंगटोक में रह कर फल पकने का इंतजार करते रहे, पर इंतजार का फल मीठा नही हुआ, गाहे बगाहे स्नो फाल व् बारिश होती रही, ना मौसम ही साफ हुआ, ना ही लाचेन, लाचुंग, नाथुला का रास्ता खुला. पिछले तीन दिनों में गंगटोक के सभी छोटे बड़े स्थानीय बाजार, मोनेस्ट्री इत्यादि  का दौरा हम कर चुके थे, अब यहाँ करने को बाकी कुछ नही बचा था, ना ही हमारे पास और समय था, उस पर मौसम जिद्दी बच्चा बना रहा. धर्मपत्नी व हमारी संसद में प्रस्ताव पास हुआ कि, अब हमारा ओर इंतजार करना ठीक नही व् आगे प्रोग्रामे के अनुसार कालिम्पोंग चला जाए.

“लाचेन, लाचुंग व् नाथुला, अभी हमारा इन्तजार करो, हम लोट कर आयेंगे’ हम दोनों ने कहा.

हमारी महफ़िल मेरी तो जम गई है , आप भी जमा लो और सुबह के लिए तेयार हो जाओ .