टॉम काका की कुटिया - 17 Harriet Beecher Stowe द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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टॉम काका की कुटिया - 17

17 - नई मालकिन

 मिस अफिलिया कर्त्तव्य-परायण थी। हम उसे कर्त्तव्य-मत्त नहीं समझते। कर्त्तव्य-पालन में वह कभी पीछे नहीं हटती, दुर्गम पर्वत उसके कर्त्तव्य-मार्ग में कभी बाधा नहीं डाल सकता। अगाध समुद्र या प्रचंड अग्नि कर्त्तव्य-पालन से विमुख नहीं कर सकती। हृदय की अनिवार्य निर्बलता के साथ वह सदा घोर संग्राम किया करती थी। यदि वह उस विकट संग्राम में कभी हार जाती तो अपनी निर्बल प्रकृति का ध्यान करके बहुत खिन्न होती थी।

 अत: इन कारणों से उसका हार्दिक धर्म-विश्वास उसे प्रसन्न बनाकर उल्टा कभी-कभी उसके अंत:करण को विषाद के अंधकार से पूर्ण कर देता था।

 पर बड़ा आश्चर्य तो यह देखकर होता था कि अफिलिया जैसी कर्त्तव्य-परायण, धीर-गंभीर प्रकृतिवाली और विवेकशील स्त्री, चंचलमति अगस्टिन को प्यार करे। इन दोनों की प्रकृति में जरा-भी समता नहीं थी। दोनों के स्वाभाव में 36 का-सा संबंध था। लेकिन मिस अफिलिया लड़कपन से ही बड़े चाव से अगस्टिन को धर्म-शिक्षा दिया करती और अपने सगे छोटे भाई की भाँति उसका दुलार करती थी। अगस्टिन का स्वाभाव चंचल होने पर भी वह बड़ा स्नेहशील था। इसी से मिस अफिलिया लड़कपन से उसे प्यार करती थी और यही कारण था कि अगस्टिन के प्रस्ताव पर वह तुरंत उसके घर आने को राजी हो गई। अगस्टिन के घर का काम-काज सँभालने तथा इवान्जेलिन के पालन-पोषण का भार उठाने के लिए वह बड़ी खुशी से अगस्टिन के साथ नवअर्लिंस आ गई। जहाज नवअर्लिंस पहुँचने को हुआ तो मिस अफिलिया बड़ी फुर्ती से माल-असबाब बाँधने लगी। इधर इवा से बार-बार कहने लगी- "तेरी गुड़िया कहाँ है? कैंची कहाँ है! खिलौने कहाँ हैं? अपने सब खिलौने गिन डाल। कितनी लापरवाही रखती है। अभी तक इन चीजों को नहीं गिना?"

 इवा ने कहा - "बुआ, अब तो हम लोग घर ही चलते हैं, इन सब चीजों को लेकर क्या होगा?"

 अफिलिया - "क्या होगा? घर ले चल, वहाँ ठिकाने से रख देना। बच्चो को अपनी वस्तुएँ सावधानी से रखनी चाहिए।"

 इवा - "बुआ, मुझे यह सब रखना नहीं आता।"

 अफिलिया - "अच्छा, तू देख, मैं सब ठीक कर देती हूँ। एक यह तेरा बक्स है। यह खिलौना दो; कैंची तीन और फीता चार। सब चार चीजें हुईं। बेटी, मैं जानती हूँ, तू अकेली अपने बाबा के साथ आती तो ये सब चीजें खो जातीं।"

 इवा - "हहं, मैंने यों ही कितनी ही बार कितनी चीजें खो दीं और बाबा ने सब चीजें मुझे फिर खरीद दीं।"

 अफिलिया - "वाह, कैसी अच्छी बात है। एक बार एक चीज को खो देना और फिर उसी को खरीद लेना।"

 इवा - "बुआ, यह तो बड़ी सीधी बात है।"

 अफिलिया - "सीधी बात है! यह हद दर्जे की लापरवाही है। घोर लापरवाही।"

 यों ही बार-बार "लापरवाही, लापरवाही" करते हुए मिस अफिलिया सारी वस्तुएँ बक्स में भरने लगी। जब बक्स भर गया तो इवा ने कहा - "बुआ, बक्स तो भर गया, अब इसमें और चीजें नहीं समाएँगी। अब क्या करोगी?"

 यह सुनकर अफिलिया बोली - "नहीं समाएँगी। जरूर समाएँगी; क्यों नहीं समाएँगी?"

 इतना कहकर बक्स के कपड़ों को जोर से दबाने लगी। अफिलिया का रुख देखकर मानो संदूक बेचारा डर गया। अफिलिया ने सारी चीजों को संदूक में रखकर हँसते हुए कहा - "अभी तो संदूक में और भी चीजें रख देने को जगह खाली है। तू इस संदूक पर खड़ी हो जा, मैं चाबी से बंद कर दूँ।"

 इस प्रकार अफिलिया संदूक से संग्राम में जीतकर इवा से बोली - "तेरे बाबा कहाँ हैं? जा, उन्हें बुला ला। कह दे, हम लोग तैयार हैं।"

 इवा - "बाबा तो नीचे के कमरे में खड़े एक आदमी से बातें कर रहे हैं और नारंगियाँ खा रहे हैं।"

 अफिलिया - "जा, दौड़कर बुला ला। जहाज अब घाट-किनारे पहुँचने ही वाला है।"

 इवा - "बाबा कभी जल्दी नहीं करते। बुआ, तुम इधर आओ। वह देखो, अपना घर दिखाई पड़ता है।"

 अफिलिया - "हाँ, देख लिया। जा, झटपट अपने बाबा को बुला ला। लो, जहाज किनारे आ गया और अगस्टिन अभी भी देर कर रहा है।"

 जहाज घाट पर आ लगा। सैकड़ों कुली जहाज पर चढ़ आए। उनमें से एक मिस अफिलिया से बोला - "मेम साहब, अपना बक्स मुझे दीजिए।" दूसरा कुली बोला - "मेम साहब, ये बिस्तरे मैं उठाता हूँ।" तीसरा बोला - "मेम साहब, यह संदूक मेरे सिर पर उठा दीजिए।" कुलियों का तो यह हाल था और मिस अफिलिया अपनी सारी चीजों को अपने सामने रखकर खड़ी खजाने के संतरी की भाँति पहरा दे रही थी। उसके मुख का रुख और तीव्र दृष्टि देखकर कुली डर के मारे वहाँ से खिसकने लगे। इधर अगस्टिन को देर करते देखकर अफिलिया छटपटाने लगी। कोई पंद्रह मिनट के बाद बिना किसी घबराहट के अगस्टिन ने अफिलिया के पास आकर अन्यमनस्क भाव से पूछा - "बहन, तुम तैयार हो?"

 अफिलिया बोली - "मैं एक घंटे से तैयार बैठी हूँ। मैं तुम्हारे देर करने से बहुत उकता रही थी।"

 अगस्टिन ने कहा - "उकताने की कौन-सी बात थी! अपनी गाड़ी किनारे खड़ी है। भीड़ छँट जाने दो तो आराम से उतरकर चल चलेंगे।"

 इतना कहकर अगस्टिन ने एक कुली से कहा - "अरे, हमारा सामान गाड़ी पर रखवा देना।"

 यह सुनकर मिस अफिलिया ने कहा - "मैं उसके साथ जाकर अपने सामने सब चीजें ठीक से गाड़ी पर रखवाती हूँ। तुम यहाँ खड़े रहो।"

 अगस्टिन - "तुम्हारे साथ जाने की आवशकयता नहीं है। यह सब आप ही ठीक से रख देगा। हम लोग साथ ही चलते हैं।"

 अफिलिया - "लेकिन यह बैग और बक्स तो मैं कुली को नहीं दूँगी। मैं इन दोनों को स्वयं ही ले चलूँगी।"

 अगस्टिन - "अपनी वह उत्तर प्रदेश की चाल छोड़ दो। इस देश की रीति-नीति सीखो। बक्स और बैग तुम ढोओगी तो लोग तुम्हें दासी समझेंगे। डरो मत! सब चीजें इस आदमी को उठाने दो। वह सब चीजें बड़ी सावधानी से गाड़ी पर रख देगा।"

 इसी समय इवा बोली - "टॉम कहाँ है?"

 अगस्टिन ने उत्तर दिया - "टॉम नीचे है। इवा, टॉम को अपनी माँ के पास ले जाना। कहना कि टॉम को गाड़ी हाँकने के लिए लाए हैं। अब उस शराबी कोचवान को गाड़ी नहीं हाँकने दी जाएगी।"

 इवा - "बाबा, टॉम बड़ा अच्छा कोचवान रहेगा। वह कभी शराब नहीं पीएगा।"

 इसके बाद मिस अफिलिया और इवा को साथ लेकर अगस्टिन जहाज से उतरकर अपनी गाड़ी पर चढ़ा। मिस अफिलिया ने गाड़ी पर चढ़ने के पहले सब चीजें एक-एक करके सँभाल लीं। थोड़ी ही देर में गाड़ी एक सजे-सजाए द्वार पर पहुँच गई। बाहरी दरवाजा पारकर गाड़ी के भीतर पहुँचते ही इवा उतरने के लिए छटपटाने लगी और अफिलिया से बार-बार कहने लगी - "बुआ, देखो, हमारा घर कैसा सुंदर है? तुम्हारे घर ऐसा बगीचा नहीं है।"

 अफिलिया मुस्कराकर बोली - "हाँ घर तो सुंदर है, पर ईसाई का-सा घर नहीं जान पड़ता। मालूम होता है, किसी गैर-ईसाई का घर है।"

 सेंटक्लेयर को अपने लिए "गैर-ईसाई" शब्द सुनकर बड़ी प्रसन्नता हुई। गाड़ी दरवाजे पर लगते ही टॉम सबसे पहले उतरा और घर की शोभा देखकर आश्चर्य से चारों ओर देखने लगा। मिस अफिलिया के साथ सेंटक्लेयर के गाड़ी से उतरने पर घर के बहुत-से हब्शी दास-दासी दरवाजे पर आकर जमा हो गए। सेंटक्लेयर दास-दासियों पर कभी अत्याचार नहीं करता था। उसके घर इन दास-दासियों को किसी प्रकार की तकलीफ न थी। खाने-पीने का सब तरह से आराम था। इससे उसके लौटने पर सबको विशेष आनंद हुआ। उसका हँसमुख चेहरा देखने के लिए वे सब बड़े उत्सुक थे। इन दास-दासियों में एक लंबा पुरुष था। वह बड़ा ठाट-बाट बनाकर दरवाजे पर सबके आगे आकर खड़ा हुआ। उसके पहनावे और रौब-दाब से लग रहा था कि वह इस घर के गुलामों का सरदार है। अपने पीछे बहुत-से दास-दासियों को एकत्र देखकर, उनपर रौब झाड़ने के लिए उसने तोबड़ा-सा मुँह बनाकर कहा - "अरे काले भाई-बहनों, तुम लोगों की करतूतों से मुझे कभी-कभी बहुत ही शर्मिंदगी उठानी पड़ती है। अपने पैर मिलाकर, एक लाइन में खड़े होओ। आजतक तुम लोगों ने विलायती ढंग पर खड़े होना तक भी नहीं सीखा। तुम लोगों के इस तरह खड़े रहने से मालिक के घर में जाने का रास्ता रुक गया है।"

 यह वक्तव्य सुनकर सब दास-दासी एक किनारे हटकर खड़े हो गए।

 सेंटक्लेयर ने दरवाजे पर पहुँचते ही एडाल्फ नामक इस प्रधान से हाथ मिलाया और उसका नाम लेकर कहा - "एडाल्फ, अच्छे तो हो?"

 इस प्रकार सेंटक्लेयर द्वारा आदर पाने पर एडाल्फ ने मालिक के स्वागत के लिए जो भाषण रट रखा था, वह सुनाना शुरू किया। एडाल्फ का भाषण सुनकर सेंटक्लेयर ने हँसते हुए कहा - "भाषण तो खूब तैयार किया है।"

 इतना कहकर वह तुरंत घर में चला गया।

 मकान में जाते ही इवा दौड़ती हुई अपनी माँ के कमरे में पहुँची। पलंग पर लेटी अपनी माता के गले से लिपट गई और बार-बार उसका मुख चूमने लगी। पर उसकी माता ने अपने कल्पित रोग के कारण कमजोर बनी रहने की वजह से उसको गोद में तो लिया ही नहीं, बल्कि गले से लिपटकर इवा के बार-बार मुँह चूमने से कुछ झुझलाकर बोली - "जा-जा, बहुत हो गया, बहुत हो गया! ठहर जा, मेरे सिर में दर्द बढ़ जाएगा।"

 सेंटक्लेयर ने अपनी स्त्री के कमरे में पहुँचकर उसका मुँह चूमा और मिस अफिलिया की ओर उँगली करके कहा - "प्यारी! देखो तुम्हारी रोग की बात सुनकर अफिलिया बहन आई हैं।"

 मेरी पलंग से नहीं उठ सकी। केवल अधखुले नेत्रों से अफिलिया की ओर एक बार देखकर धीमे स्वर में उसका स्वागत किया। सब दासियाँ जब कमरे के द्वार पर आकर खड़ी हुईं तो उनमें मामी नाम की एक दासी के गले लिपटकर इवा उसका मुँह चूमने लगी। उस वृद्ध ने इवा को अपनी छाती से लगाकर उसका मुँह चूमा। उसकी आँखों से आनंद के आँसू बहने लगे। वह बड़ी चाह से इवा के मुँह की ओर देखने लगी। उसने जिस प्रकार इवा को अपनी छाती से लगाया था, उससे तो यही जान पड़ता था कि वही इवा की माता होगी। कुछ देर के बाद इवा ने मामी की गोद से उतरकर घर की हर दासी का मुख चूमा।

 इवा को इस भाँति दासियों का मुँह चूमते देखकर मिस अफिलिया को बड़ा अचंभा हुआ। इस पर वह सेंटक्लेयर से बोली - "अगस्टिन, क्या तुम्हारे इस दक्षिण देश में दास-दासियों के साथ ऐसा ही व्यव्हार किया जाता है? भाई, हम लोग तो दास-प्रथा के विरोधी होते हुए भी नौकरों को इतना मुँह नहीं लगाते, इतना आदर नहीं देते। हम लोग वेतनभोगी चाकरों को कभी अपने समान नहीं समझते। दास-दासियों पर दया करना उचित है पर मुँह लगाना ठीक नहीं।"

 अफिलिया बहन के ईसाई धर्म संबंधी भाषण का स्मरण करके सेंटक्लेयर मन-ही-मन हँसा, पर प्रकट में कुछ नहीं बोला। फिर वह कमरे से बाहर निकलकर मामी, जिमी, पली, सूकी इत्यादि हर एक दासी का हाथ पकड़कर कुशल पूछने लगा। किसी-किसी दासी के गोद के बच्चे के सिर पर हाथ रखकर दुलार करने लगा। सेंटक्लेयर के चले जाने पर इवा ने नारंगी की टोकरी उठाकर उसमें से एक-एक नारंगी सब दास-दासियों के बच्चो को दी। उन लोगों को वे खिलौने भी बाँट दिए, जो वह उनके लिए लाई थी। फिर सेंटक्लेयर ने बरामदे में आकर एडाल्फ से कहा - "एडाल्फ, यह जो नया आदमी मेरे साथ आया है, इसका नाम टॉम है। सब पर तुम बड़ी हुकूमत दिखाया करते हो, पर देखना, खबरदार, इस आदमी पर कभी रौब न गाँठना। तुम्हारे-जैसे काले बंदरों के मूल्य की अपेक्षा इसके दूने दाम लगे हैं।"

 एडाल्फ ने कहा - "सरकार, आप तो मजाक करते हैं।"

 सेंटक्लेयर ने एडाल्फ के कोट की ओर देखकर कहा - "वाह-वाह! तुमने मेरा यह कोट कैसे पहन लिया।"

 एडाल्फ कुछ शरमाकर बोला - "हुजूर, इस कोट में ब्रांडी के बहुत दाग लग गए थे। इससे बड़ी बदबू आती थी। मैंने सोचा, अब आप इसे थोड़े ही पहनेंगे। इसे आप जरूर ही फेंक देते, इसी से मैंने पहन लिया।"

 एडाल्फ की बात पर सेंटक्लेयर हँसने लगा। इसके बाद वह टॉम को लेकर अपनी स्त्री के कमरे में गया। स्त्री से कहा - "प्यारी, तुम सदा शिकायत किया करती हो कि मैं तुम्हारे आराम का खयाल नहीं करता। यह देखो, तुम्हारी गाड़ी हाँकने के लिए एक अच्छा कोचवान लाया हूँ। यह आदमी कभी शराब मुँह से नहीं लगाता। गाड़ी हाँकने में बड़ा निपुण है। यह इस तरह गाड़ी हाँकेगा कि गाड़ी में चढ़ने पर तुम्हें जरा भी तकलीफ न होगी। आराम से ले जाएगा।"

 सेंटक्लेयर की स्त्री मेरी ने फिर आँखें खोलकर एक बार टॉम की ओर देखा और दबे स्वर से बोली - "कुछ दिन हमारे यहाँ रहा कि शराब पीना सीखा।"

 सेंटक्लेयर - "नहीं, यह कभी शराब नहीं पीएगा। यह शराब के पास नहीं फटकता।"

 मेरी - "न पीता तो अच्छा ही है। पर मुझे यकीन नहीं आता।"

 फिर सेंटक्लेयर ने एडाल्फ को बुलाकर कहा - "एडाल्फ! टॉम को रसोईघर में ले जाओ। देखो, मैंने जो कहा है, सो याद रखना। टॉम पर बहुत हुकूमत मत जताना।"

 एडाल्फ के चले जाने पर सेंटक्लेयर ने अपनी अपनी स्त्री को बुलाकर कहा - "प्यारी, जरा इधर आओ।"

 मेरी - "रहने दो अपना यह बनावटी प्यार। तुम्हें यहाँ से गए पंद्रह दिन से ज्यादा हो गए, बीच में कभी खोज-खबर भी ली कि मैं मरती हूँ कि जीती हूँ।"

 सेंटक्लेयर - "क्या इन पंद्रह दिनों में मैंने तुम्हें पत्र नहीं लिखा?"

 मेरी - "बस, वही दो लाइनों का कार्ड। ऐसी चिट्ठियाँ तो नौकरों को लिखी जाती हैं। इतने दिनों में बस दो लाइनों का एक कार्ड मिला था।"

 सेंटक्लेयर - "डाक निकलने ही वाली थी, इससे जल्दी में कार्ड लिखकर डाल दिया था। अब उस बीती बात पर झगड़ने से क्या लाभ है? देखो, यह फोटो देखो। मैं इवा का हाथ पकड़े खड़ा था। क्यों, तस्वीर अच्छी आई है या नहीं?"

 मेरी - "यों हाथ पकड़कर क्यों खड़े हुए? कोई लड़की का हाथ इस तरह पकड़कर खड़ा होता है?"

 सेंटक्लेयर - "खैर, मान लो खड़े होने का ढंग बुरा था, पर देखो, तस्वीर अच्छी आई है या नहीं?"

 मेरी - "मेरी राय से तुम्हें क्या लेना-देना! तुम्हें क्या मेरी राय कभी पसंद आती है?"

 इतना कहकर मेरी ने तस्वीर उठाकर सिरहाने पटक दी। सेंटक्लेयर मन-ही-मन कहने लगा - "पापिनी का मन किसी तरह नहीं भरता। चूल्हे में जाए ऐसी स्त्री। (प्रकट रूप में) अच्छा, बोलो, तस्वीर अच्छी आई है या नहीं?"

 मेरी - "सेंटक्लेयर, मुझे परेशान न करो। तुम्हें अक्ल तो कुछ है नहीं। तुम मेरा दु:ख नहीं समझते। मैं इधर तीन दिन में बड़ी कमजोर हो गई हूँ। मुझे हल्ला-गुल्ला बिलकुल नहीं सुहाता। घर में तुम्हारे आने से मानो बाजार-सा लग गया है। मेरा दम निकल जाता है। सिर-दर्द के मारे मरी जाती हूँ।"

 मिस अफिलिया अभी तक बिलकुल चुपचाप बैठी थी। सिर-दर्द की बात सुनकर उसे बातें करने का मौका मिला। वह बोली - "क्या यों ही बराबर आपको सिर-दर्द सताया करता है? मैं समझती हूँ, आप सवेरे उठते ही यदि चिरायते का काढ़ा पीएँ तो आपको कुछ आराम हो सकता है। इब्राहिम साहब की स्त्री इन सब रोगों की खूब दवाइयाँ जानती हैं। उनसे मैंने सुना कि इस रोग के लिए चिरायते का काढ़ा बड़ा गुणकारी है।"

 यह सुनकर सेंटक्लेयर ने कहा - "तो कल ही मैं एक बोतल चिरायते का अर्क ला दूँगा। अच्छा, दीदी, अब तुम अपने कमरे में जाकर कपड़े बदल डालो।"

 मामी को बुलाकर कहा - "अफिलिया बहन के लिए जो कमरा ठीक की हो वह बता दो। देखो, बहन को किसी तरह की तकलीफ न होने पाए। बहुत अच्छी तरह से इसकी सेवा करना।"