टॉम काका की कुटिया - 10 Harriet Beecher Stowe द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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टॉम काका की कुटिया - 10

10 - मानवता का हृदयस्प र्शी दृश्य

जिस दिन संध्या को इलाइजा ओहियो नदी पार हुई थी, उस दिन साढ़े सात बजे व्यवस्थापिका-सभा के सदस्य वार्ड साहब घर में बैठे अपनी स्त्री से तरह-तरह की बातें कर रहे थे। नीति-विशारद वार्ड साहब और उनकी मेम के बीच जो बातें हो रही थीं, वे इस प्रकार थीं :

 मेम ने कहा - "मैं स्वप्न में भी नहीं सोचती थी कि तुम आज घर आ सकोगे।"

 "हाँ, मेरे आने की कोई आशा नहीं थी; पर दक्षिण देश की ओर जाना है, इससे सोचा कि आज की रात घर पर बिताकर कल सवेरे चला जाऊँगा। मेरा तो नाकों दम आ गया। कितने जोर से सिर में दर्द हो रहा है।"

 सिर दुखने की बात सुनकर वार्ड साहब की मेम कपूर की शीशी लाने के लिए उठीं। पर वार्ड साहब ने उसका हाथ पकड़कर कहा - "दवा की जरूरत नहीं है, यों ही आराम हो जाएगा। मारे काम के मेरा जी घबरा उठा है। नित्य नए कानून की धाराओं का मसविदा गढ़ना बड़ी आफत का काम है।"

 मेम बोली - "आजकल व्यवस्थापिका-सभा में किन-किन कानूनों का मसविदा पेश है?"

 वार्ड साहब ने बड़े अचरज में आकर मन-ही-मन कहा - स्त्रियाँ भी कानून की खबर रखती हैं। फिर प्रकट में बोले - "आजकल किसी भारी कानून का मसविदा नहीं बन रहा है।"

 "आप यह क्या कहते हैं? मैंने पत्रों में देखा है कि व्यवस्थापिका-सभा से एक ऐसा कड़ा कानून जारी होनेवाला है कि कोई भागे हुए दास-दासियों को शरण नहीं दे सकेगा। चाहे वे भूख-सर्दी से मर भले ही जाएँ, पर उन्हें कोई एक पैसे या कपड़े तक की सहायता न दे सकेगा। क्या यह सच है? मुझे तो विश्वास नहीं होता कि जिनके हृदय में कुछ भी दया-धर्म है वे ऐसा कानून जारी करेंगे! सोचिए, इससे कैसी भयंकर दशा हो जाएगी। मान लीजिए, कोई दास या दासी कहीं से भागी और दस दिन की राह काटकर यहाँ आ पहुँची। पेट भरने के लिए उसके पास एक पैसा तक नहीं है, और न सर्दी से बचने के लिए कोई फटा कपड़ा ही उसके तन पर है, भला कहिए, ऐसे अनाथ और निस्सहाय व्यक्ति को कौन ऐसा निर्दयी होगा, जो एक समय का भोजन और टिकने को स्थान देने से इनकार करेगा? मेरा तो इस बात को सुनकर ही कलेजा काँपता है। यह कानून धर्म और नीति के बिलकुल विरुद्ध है।"

 वार्ड साहब हँसते हुए कहने लगे - "प्यारी, मुझे नहीं मालूम था, तुम तो एक खासी नीति-विशारद पंडिता बन गई हो।"

 मेम बोली - "मैं आपके कायदे-कानून अथवा राजनीति की कुछ परवा नहीं करती। पर यह मुझे स्पष्ट दिखाई देता है कि ऐसा कानून जारी करना केवल निर्दयता का प्रचार करना है। जिनके पालन करने के लिए यह बनाया जा रहा है, उन्हें भी विवश होकर अपने हृदय की दया और धर्म को सर्वथा तिलांजलि दे देनी पड़ेगी। आप ही कहिए, क्या यह कानून धर्म या न्याय के अनुकूल होगा?"

 "इसके न्यायसंगत होने में क्या संदेह है?"

 "मैं तो कभी विश्वास नहीं कर सकती कि तुम ऐसे कानून को न्यायसंगत मानते हो। मैं समझती हूँ कि तुमने कभी ऐसे कानून के पक्ष में राय नहीं दी होगी।"

 "मैंने तो इस कानून का बड़े जोरों से अनुमोदन किया है।"

 "बड़ी लज्जा आती है कि तुमने भी ऐसे कानून के पक्ष में राय दी है। इससे बढ़कर घृणित और नीच कोई कानून हो ही नहीं सकता। मैं निश्चयपूर्वक कहती हूँ कि मैं इस कानून को कभी नहीं मानूँगी। देख लेना, कोई ऐसा अवसर मिला तो फिर मैं निश्चय ही इसका उल्लंघन करूँगी। ओफ, कैसा आश्चर्य है! कोई बेचारा दीन-दरिद्री मनुष्य, काला होने के कारण, गोरों के अत्याचार से दु:खी होकर भूख से मरता मेरे दरवाजे पर किसी दिन आ जाए और मैं उसे एक मुट्ठी अन्न न दे पाऊँ! मैं नहीं जानती कि किसी स्त्री का हृदय विधाता ने ऐसा पत्थर का बनाया है कि ऐसे विपदाग्रस्त मनुष्य को आश्रय देने से वह इनकार कर देगी!"

 "मेरी, तुम मेरी बात सुनो। मैं खूब जानता हूँ कि तुम्हारा हृदय बड़ा कोमल है। दया और स्नेह से भरा है, पर कभी-कभी ऐसी दया और धर्म का फल उल्टा भी हो जाता है। सर्व-साधारण के हित के विचार से हमें कभी-कभी दया, माया और स्नेह-ममता को छोड़ने के लिए विवश होना पड़ता है। आजकल जो राजनैतिक आंदोलन चल रहा है, इसमें किसी पर विशेष दया दिखलाने से मुँह मोड़े रहना बहुत जरूरी है। इसलिए इस कानून को न्याय-विरुद्ध नहीं कहा जा सकता।"

 "जान, मैं तुम्हारे राजनैतिक आंदोलन को नहीं समझती। पर यह मुझसे छिपा नहीं है कि कौन-सी बात धर्म-विरुद्ध है और कौन-सी धर्म-संगत। मेरी समझ में दीनों पर दया दिखाना, भूखे को अन्न और प्यासे को पानी देना तथा दुखियों का दु:ख दूर करना आदि मनुष्य के जीवन के प्रधान कर्त्तव्य हैं।"

 "पर इन कर्त्तव्यों का पालन करने में यदि सर्वसाधारण का अहित होता हो, तब क्या करोगी?" वार्ड साहब ने पूछा।

 "मेरा अटल विश्वास है कि कर्त्तव्य-पालन से सर्व-साधारण का अहित कभी हो ही नहीं सकता।"

 "मेरी, सुनो मैं तुम्हें अपने कथन की सच्चाई समझाए देता हूँ। यह बहुत सहज-सी बात है।"

 "मैं खूब जानती हूँ कि तर्क में तुमसे कोई जीत नहीं सकता। तुम सारी रात तर्क में बिता सकते हो और सच को झूठ और झूठ को सच साबित कर सकते हो। पर इसे जाने दो। मैं तुमसे पूछती हूँ कि अभी तुम्हारे दरवाजे पर भागा हुआ निराश्रित दास आकर एक मुट्ठी दाना माँगे, तो क्या तुम उसे भागा हुआ समझकर अपने दरवाजे से भगा दोगे? ऐसे आदमी पर क्या तुम्हें दया नहीं आएगी?"

 वार्ड साहब बोले - "ऐसे आदमी को दरवाजे से भगा देना अवश्य ही बहुत खेदजनक है; पर कर्त्तव्य के लिए क्या नहीं करना पड़ता?"

 "ऐसे निष्ठुर व्यव्हार को क्या तुम कर्त्तव्य समझते हो? इसे कभी कर्त्तव्य नहीं कहा जा सकता। गुलामों पर लोग जोर-जुल्म करते हैं, उन्हें बहुत सताते हैं, इसी से वे भाग जाते हैं। उनपर अत्याचार न हों तो वे न भागें। दास-दासी रखनेवाले यदि उन्हें न सताएँ, तो फिर कानून की जरूरत ही न पड़े।"

 "मेरी, सुनो मैं तुम्हें एक युक्ति से इस कानून की आवशकयता को समझा दूँ।"

 "मैं ऐसे निष्ठुर आचरण के संबंध में तुम्हारी युक्ति या दलीलें नहीं सुनना चाहती। मैं पहले ही कह चुकी हूँ कि तुम लोगों जैसे कानूनी आदमी भाँति-भाँति के कुटिल तर्कों द्वारा सच को झूठ और झूठ को सच साबित कर सकते हैं।"

 साहब और मेम में बातें हो रही थीं कि इतने में काजो नाम का एक नौकर वहाँ आया और बड़ी घबराहट से बोला - "मेम साहब, जरा नीचे आकर देखिए, कैसा भयानक द्रश्य है।"

 नीचे पहुँचते ही मेम ने जो देखा, उससे घबराकर वह बार-बार साहब को पुकारने लगीं। साहब ने वहाँ जाकर देखा कि एक दुबली-सी स्त्री एक बच्चे को छाती से चिपटाए हुए उनके दरवाजे पर अचेत पड़ी है। उसके दोनों पैर बहुत छिले हुए हैं। उनसे लगातार खून बह रहा है। उसके कपड़े चिथड़े हो गए हैं। वार्ड साहब देखते ही समझ गए कि वह भागी हुई दासी है। उन्होंने ऐसी सुंदर दासी कभी नहीं देखी थी। उसकी सुंदरता और उसके सुख की सुदृढ़ता देखकर साहब के हृदय में करुणा का स्रोत बह चला। वह थोड़ी देर पहले की बातचीत को भूल गए। उस स्त्री को होश में लाने के लिए वह भाँति-भाँति के उपाय करने लगे। उन्होंने बेहोश स्त्री की छाती से बालक को उठाकर अपनी गोद में ले लिया था। होश में आते ही स्त्री ने अपने बच्चे को गोद में न देखा तो "हेरी-हेरी!" कहकर चिल्लाने लगी। चिल्लाहट सुनते ही बालक काजो की गोद से अपनी माता की गोद में चला गया। तब वह कुछ शांत होकर वार्ड साहब की मेम से कहने लगी - "मुझे बचाइए! मुझे शरण दीजिए! दुश्मन के हाथ से मेरे बच्चे की रक्षा कीजिए!"

 वार्ड साहब की मेम ने कहा - "बेटी, तू डर मत। यहाँ कोई तेरा कुछ न बिगाड़ सकेगा। तू यहाँ बेधड़क होकर रह।"

 यह सुनकर उस रमणी ने कहा - "भगवान, आपका भला करें!"

 फिर मेम ने रसोईघर के पास उसके विश्राम का प्रबंध कर देने की आज्ञा दी और दास-दासियों से उसकी सेवा-टहल करने के लिए कहकर आप भोजन करने घर में चली गई। वार्ड साहब उस स्त्री का दु:ख देखकर पिघल गए थे। वे अपनी स्त्री से जाकर बोले - "कुछ समझ में नहीं आता कि यह स्त्री कहाँ से आई है। पर यह युवती बड़ी सुंदर है।"

 मेम बोली - "अभी तो वह सोई है, उठने पर उससे उसका नाम-धाम पूछूँगी।"

 कुछ देर रुककर वार्ड साहब ने फिर कहा - "प्यारी, जो कपड़ा वह पहने है, वह बहुत पुराना हो गया है। देखो तो, तुम्हारा कोई गाउन उसको आ सकता है या नहीं। वह तुमसे थोड़ी लंबी है।"

 वार्ड साहब की स्त्री मन-ही-मन में हँसने लगी और सोचने लगी कि लज्जा की कानूनी विद्या धीरे-धीरे कमजोर पड़ रही है। पर प्रकट रूप में केवल इतना ही बोली - "अच्छा देखती हूँ।"

 वार्ड साहब कुछ देर बाद फिर बोले - "प्यारी, वह स्त्री बहुत सर्दी खा गई जान पड़ती है। इसे कुछ ओढ़ने को भी देना चाहिए। मेरी पुरानी चादर इसे दे दो।"

 इतने में ही दीना नामक दासी ने आकर कहा - "मेम साहब, वह स्त्री जाग गई है। आपसे कुछ कहना चाहती है।"

 वार्ड साहब और उनकी मेम, तत्काल दोनों उस स्त्री के पास गए। मेम ने पूछा - "हम लोगों से तुम जो कुछ कहना चाहती हो, सो कहो। उस स्त्री के मुँह से बात नहीं निकलती थी। वह बार-बार लंबी साँसें ले रही थी और रो रही थी। तब वार्ड साहब की मेम उसे ढाढ़स देकर कहने लगी- बेटी, डरो मत। हम तुम्हारा कुछ भी अहित नहीं करेंगे। तुम साफ-साफ कहो कहाँ से आई हो और क्या चाहती हो?"

 कुछ देर बाद स्त्री ने कहा - "मैं केंटाकी से आ रही हूँ।" इस पर वार्ड साहब ने उससे जिरह-सी आरंभ कर दी - "केंटाकी से तुम किस तारीख को चली थी?"

 "आज ही रात को आई हूँ।"

 "रात में कैसे आई?"

 "बर्फ के टुकड़ों के सहारे चलकर।"

 सब लोग अचरज में आकर कहने लगे - "बर्फ पर से कैसे आई?"

 "परमात्मा ने ही मुझे पार लगाया। पकड़नेवालों ने मेरा पीछा कर रखा था। ऐसी दशा में नदी पार करने के सिवा मेरे बचने की और कोई सूरत न थी।"

 वार्ड साहब का दास काजो बोला - "बाप-रे-बाप! कैसा अचरज है! गली हुई बर्फ टुकड़े होकर जल पर तैर रही थी, उसी पर से पार चली आई!"

 आर्त्त स्वर में स्त्री बोली - "मैं जानती थी कि बर्फ गल रही है। मुझे मालूम था कि इस तरह बहती हुई बर्फ पर से किसी का जाना असंभव है। मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं नदी पार कर सकूँगी। मैं तो मौत का आलिंगन करने के लिए नदी में कूदी थी, पर ईश्वर की महिमा अपार है। मनुष्य उसे नहीं समझ सकता। मनुष्य नहीं जानता कि निर्बल के बल एकमात्र भगवान हैं। ईश्वर की महिमा से क्या नहीं हो सकता? मैं केवल उसी की महिमा से पार हुई।"

 इतना कहकर आकाश की ओर इस तरह देखने लगी, मानो वह ईश्वर-दर्शन करने की प्रतीक्षा कर रही हो।

 वार्ड साहब ने पूछा - "तू क्या किसी की खरीदी हुई दासी है?"

 "हाँ, पर मेरे मालिक बड़े दयालु थे।"

 "तो तेरी मालकिन तुझे बहुत सताती होंगी?"

 "नहीं-नहीं, वह तो माता की भाँति मेरा दुलार करती थीं।"

 "फिर तुमने ऐसे मालिक को छोड़कर ऐसी भयानक विपत्ति का रास्ता क्यों अपनाया?"

 यह सुनकर स्त्री वार्ड साहब की मेम के मुँह की ओर आँसू भरी आँखों से देखने लगी और बोली - "मेम साहब, पुत्र-शोक कितना दु:खदायी होता है, यह आप अवश्य समझ सकती हैं। आपको क्या कभी पुत्र का वियोग सहना पड़ा है?"

 इस प्रश्न से वार्ड साहब की मेम का हृदय एकदम विदीर्ण हो गया। वह अपने आँसू न रोक सकी। अभी एक महीना हुआ, उनका इकलौता बेटा उन्हें छोड़कर चला गया था। मेम को रोते देखकर काजो और दीना इत्यादि सभी आँसू बहाने लगे। वार्ड साहब बड़े कष्ट से आँसू रोककर हृदय के उमड़े हुए शोक के आवेग को छिपाने की चेष्टा करने लगे। वह ठहरे व्यवस्थापिका-सभा के सदस्य! आँसू बहाते देखकर कहीं लोग उन्हें निर्मल आत्मा न समझने लगें।

 कुछ देर बाद मेम ने उससे पूछा - "तुमने मुझसे ऐसा सवाल क्यों किया? आज एक महीना हुआ होगा, मेरे हृदय का सर्वस्व हेनरी मुझे अनाथ करके चला गया।"

 "तब आप मेरा दु:ख समझ सकती हैं। एक-एक करके मेरी दो संतानें काल की भेंट हो चुकीं, अब यही एक बच्चा मेरे जीवन का आधार है। मैं पल भर के लिए भी इसे आँखों से ओट नहीं कर सकती। लेकिन मेरे मालिक ने इस दुध-मुँहे बच्चे को दास-व्यापारी के हाथ बेच दिया। वह निर्दयी इसे दक्षिण देश में ले जाने की तैयारी कर रहा था। यह दुध-मुँहा बच्चा माँ को छोड़कर कभी नहीं रह सकता। मैं इसे कैसे छोड़ दूँ? इसी से दास-व्यवसायी के चंगुल से बचाने के लिए मैं इसे लेकर भाग आई हूँ। किंतु मेरे भागने के बाद खरीदार ने, मेरे मालिक के दो दासों को साथ लेकर मेरा पीछा किया। ओहियो नदी के उस पार पकड़े जाने के डर से मैं प्राणों की ममता छोड़कर नदी में कूद पड़ी। नदी को पार कैसे किया, यह मुझे याद नहीं। बस, इतना ही ध्यान है कि इधर किनारे पर आते ही सिम नामक एक दास ने मेरा हाथ पकड़कर किनारे उठा लिया और उसी की सलाह से मैं इस घर में आई हूँ।"

 "तब तुमने कैसे कहा कि तुम्हारे मालिक और मालकिन बड़े दयावान हैं? इस बालक को बेचकर उन्होंने तुम्हारे साथ बड़ी ही कठोरता का बर्ताव किया है।"

 "मैं कभी कृतघ्न नहीं होऊँगी। जब तक जीती रहूँगी, कहूँगी कि मेरे मालिक और मालकिन बड़े दयालु हैं। उन्होंने किसी भी दास-दासी पर कभी बेरहमी नहीं दिखाई। मालिक ने दास-व्यवसायी के कर्ज में जकड़ जाने के कारण लाचार होकर मेरे बच्चे को बेचा।"

 "क्या तुम्हारे पति नहीं है?"

 "हाँ, हैं। पर वह दूसरे के दास हैं। उनका मालिक बड़ा कठोर है। उसके अत्याचार से मेरा पति बड़ा कष्ट पा रहा है। सुना है कि वह मेरे पति को दक्षिण में बेचनेवाला है। अब इस जीवन में उससे भेंट होती नहीं दिखाई देती।"

 "तो अब तुम कहाँ जाना चाहती हो?"

 "मैं कनाडा जाना चाहती हूँ। यहाँ से कनाडा कितनी दूर है?"

 मेम साहब मन-ही-मन सोचने लगीं कि हाय, कैसी शोचनीय स्थिति है! यह कैसे कनाडा पहुँचेगी? प्रकट रूप से बोलीं - "बेटी, कनाडा बड़ी दूर है। पर हमसे जहाँ तक हो सकेगा, तुम्हारी मदद करने का यत्न करेंगे। आज की रात यहीं रहो। कल जैसा होगा, देखा जाएगा!"

 वार्ड साहब की मेम ने दीना को उसके सोने का प्रबंध करने का आदेश दिया और फिर अपने सोने के कमरे में चली गई। वहाँ पहुँचते ही वार्ड साहब बोले - "प्यारी, इस स्त्री के संबंध में अब क्या करना चाहिए? मैं बड़ी आफत में फँस गया हूँ। इस स्त्री की तलाश में कल खरीदार यहाँ अवश्य आएगा। मेरे यहाँ भगोड़ी दासी का निकलना बड़ी लज्जा का विषय होगा। व्यवस्थापिका-सभा का सदस्य होकर मैंने ही कल कानून बनाया कि भगोड़े दास-दासियों को जो कोई अपने यहाँ ठहरने देगा, उसे दंड मिलेगा और आज मैं ही उस कानून को तोड़ूँ! अच्छा होगा कि इस विषय में जो कुछ करना हो, आज रात ही को कर डाला जाए।"

 "आज रात को क्या किया जा सकता है?"

 मेम अच्छी तरह जानती थीं कि साहब का मन बड़ा दयालु है। वह अवश्य उस अनाथ के लिए कोई-न-कोई ठीक व्यवस्था कर देंगे। मन-ही-मन यह सोचकर वह चुप रह गईं और साहब का कानून का पक्षपात स्मरण करके मंद-मंद मुस्कराने लगीं। कुछ देर बाद साहब बूट पहनकर खड़े हो गए और कहने लगे - "प्यारी, इसके संबंध में मैं जो कुछ करना चाहता हूँ, वह तुम्हें बताता हूँ। इसे किसी निरापद स्थान पर पहुँचा देना ठीक होगा। यहाँ से थोड़ी दूर पर वान ट्रांप नामक मेरा मुवक्किल है। पहले उसके यहाँ दास-दासियों का बड़ा जमघट था, पर समय के फेर से उसकी ऐसी कायापलट हुई कि नर-नारियों को गुलाम बनाकर रखना वह पाप समझने लगा। उसने अपने सारे दास-दासियों की भलाई के लिए और भी कई काम किए। आजकल उसने यहाँ से तीन-चार कोस की दूरी पर जमीन लेकर वहाँ भागे हुए दास-दासियों के लिए ऐसे घर बना दिए हैं, जिनमें ये शरण ले सकें। वह स्वयं भी वहीं रहता है। वहाँ पहुँचा आने से कठोर दास-व्यवसायी के चंगुल से यह अभागिनी स्त्री बच सकती है। पर मेरे अलावा किसी का रात को गाड़ी हाँककर इसे वहाँ पहुँचा आना संभव नहीं।"

 "क्यों? काजो खूब गाड़ी हाँक सकता है। क्या वह नहीं पहुँचा आ सकता?"

 "वहाँ का मार्ग बड़ा दुर्गम है, राह में दो बड़ी खाड़ियाँ पार करनी पड़ती हैं। काजो को उसे रास्ते का भी पता नहीं होगा। इससे मुझे स्वयं ही जाना पड़ेगा। काजो को 12 बजे गाड़ी तैयारकर रखने को कह दो। मैं स्वयं ही इसे पहुँचा आऊँगा और लौटती बार कोलंबस होता हुआ आऊँगा, जिससे लोग समझ लेंगे कि मैं वहीं किसी काम से गया था।"

 "नाथ, दूसरों के दु:ख से सदैव तुम्हारा हृदय पसीज जाता है। तुम्हारी यह सहृदयता ही तुम्हारे ज्ञान और विज्ञता की अपेक्षा लोगों के मन में तुम पर अधिक भक्ति और श्रद्धा उपजाती है। तुम जब-तब अपने को पहचानना भूल जाते हो, पर मैं तुम्हारे हृदय से खूब परिचित हूँ। तुम चाहे जिस खयाल से चाहे जैसा कानून क्यों न बनाओ, किंतु दूसरे कानूनबाजों की तरह तुम आत्मा-विहीन होकर निष्ठुर काम में अपने को नहीं लगा सकते। यह मैं भली-भाँति जानती हूँ कि व्यवस्थापिका-सभा के सभी सदस्यों में मानवात्मा है।"

 वार्ड साहब अपनी स्त्री के मुख से अपनी सहृदयता की प्रशंसा सुनते ही प्रेम से पुलकित हो गए। सोचा कि जिन्हें ऐसी स्त्री का सुख प्राप्त नहीं, उनका मनुष्य-जन्म वृथा है। यह सोचते-सोचते वे दरवाजे पर देखने के लिए आए कि गाड़ी तैयार हुई या नहीं। फिर मेम के पास जाकर बोले - "प्यारी, मुझे एक बात याद आई है। हेनरी के जो कुछ कपड़े हैं, उन्हें चाहो तो इस अनाथ बालक के लिए दे डालो।"

 मेम ने अपने मृत पुत्र के कपड़े और खिलौने इत्यादि चीजों की एक गठरी बाँध दी। फिर रात को 12 बजे वार्ड साहब इलाइजा को लेकर गाड़ी पर चढ़ने लगे। उस समय वह गठरी इलाइजा के हाथ में दे दी। इलाइजा उस समय बार-बार मेम के प्रति अपनी हार्दिक भक्ति और कृतज्ञता-प्रकट करने की चेष्टा करने लगी, पर उसमें बोलने की शक्ति न थी। उसके हृदय की उस समय की अवस्था शब्दों द्वारा प्रकट नहीं की जा सकती। वह गाड़ी में चढ़ी हुई घूम-घूमकर मेम की ओर देखने लगी। उसकी आँखों में आँसू भर आए।

 आज वार्ड साहब में भी विचित्र परिवर्तन हो गया था। कल उनकी वक्तृता से व्यवस्थापिका-सभा का भवन गूँजता था, कल उन्होंने अनेक बार इस बात को दुहराया था कि सर्वसाधारण के हित की दृष्टि से प्रत्येक छोटे-बड़े का कर्त्तव्य है कि स्त्री-जाति की-सी सहृदयता को छोड़कर भागे हुए दास-दासियों को पकड़ा दे। कल उन्हें स्त्री-जाति मानव-हृदय की दुर्बलताओं की खान जान पड़ी थी; पर आज वही वार्ड साहब स्वयं उस दुर्बलता के शिकार बन बैठे! केवल अखबारों और रिपोर्टों में पढ़कर भगोड़ों की दुर्दशा का अनुमान नहीं हो सकता था। इसी से कल तक "भगोड़ा" शब्द देखकर उनके हृदय में तनिक भी दया नहीं उपजती थी। पर आज सामने साक्षात भगोड़े की दुर्दशा देखते ही उन्हें चक्कर आ गया, उन्हें सच्ची स्थिति का ज्ञान हो गया और जिस जाति की कमजोरी की उन्होंने निंदा की थी, उसी ने आज उनके मस्तिष्क को चकरा दिया। इससे मालूम होता है कि व्यवस्थापिका-सभा के सदस्यों में भी मानव आत्मा मौजूद है। उनमें भी मनुष्यत्व है। उन्हें सदैव समाचार-पत्रों ओर रिपोर्टों के सिवा देश की सच्ची दशा जानने का अवसर नहीं मिलता। अपनी आँखों से वे लोगों की दुर्दशा का द्रश्य नहीं देखते, इसी से उनके कथन में और वास्तविक स्थिति में बहुत अंतर होता है और जान पड़ता है कि वे मनुष्यत्व-विहीन हैं।

 वार्ड साहब ने कल जिस कानून को जारी किया था, उसका फल आज उनको ही भोगना पड़ा। घोर अँधेरी रात है। मूसलाधार वर्षा हो रही है। रास्ता कीचड़ से लथपथ है। घोड़ा इस रास्ते से गाड़ी को खींचकर आगे बढ़ने में असमर्थ है। व्यवस्थापिका-सभा के माननीय सदस्य अपने नौकर काजो के साथ गाड़ी से उतर पड़े। काजो ने घंटों घोड़े की लगाम पकड़कर आगे बढ़ाने की कोशिश की और वार्ड साहब ने पीछे से गाड़ी को ठेला, तब कहीं जाकर बड़ी कठिनाई से गाड़ी आगे बढ़ी और धीरे-धीरे उस आश्रम के पास पहुँची। घर का मालिक अभी सो रहा था। उसे बड़ी मुश्किल से जगाया। थोड़ी देर में आँखें मलते हुए वह गाड़ी के पास आया और वार्ड साहब को देखकर नमस्कार करने के लिए हाथ उठाया। मकान-मालिक का नाम था - "जान वान ट्रंप"। वह पहले केंटाकी नगर में रहता था। उसके पास अनगिनत गुलाम थे, पर अर्थलोलुपता और स्वार्थपरता के कारण उसके हृदय के उत्तम और स्वाभाविक भावों का सर्वथा नाश नहीं होने पाया। उसके दिल में यह बात बैठ गई कि देश भर में प्रचलित गुलामी प्रथा और दासों को सताना, दास और मालिक दोनों की ही आत्मा को नीचे गिराता है। दासों की दुर्दशा पर विचार करते-करते उसका हृदय पसीज गया। फिर उसने तुरंत अपने सारे दास-दासियों को गुलामी की बेड़ी से मुक्त कर दिया। साथ ही उसे दासों के दु:ख दूर करने की चिंता हुई। इस निर्जन भूमि में अनाथ दासों को शरण देने के लिए जो स्थान बना है, वह उसी चेष्टा का फल है।

 वार्ड साहब ने जैसे ही उसे इलाइजा की दुरावस्था की बात सुनाई, उसने तुरंत इलाइजा को गाड़ी से उतारकर अपने घर की एक कोठरी में उसके रहने के लिए जगह कर दी। उसे ढाढ़स देकर वह कहने लगा - "बेटी, यहाँ तुम ब्रेफिक्र होकर रहो। मजाल नहीं कि यहाँ से तुम्हें कोई पकड़ ले जाए। मेरे यहाँ बहुत आदमी हैं। यहाँ पकड़नेवालों की पैठ नहीं हो सकती।"

 वान ट्रंप ने वार्ड साहब से वह रात वहीं बिताने का अनुरोध किया, पर वह राजी न हुए। उन्होंने पहले से ही कोलंबस होकर लौटने का निश्चय कर रखा था। लोगों के संदेह करने के डर से वह झटपट गाड़ी पर सवार हो गए। चलते समय इलाइजा की सहायता के लिए वान ट्रंप के हाथ में दस रुपए का एक नोट देते गए।