कोयला भई ना राख--भाग(२) Saroj Verma द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

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कोयला भई ना राख--भाग(२)

डाँक्टर शैलजा के जाने के बाद अम्बिका ने बाक़ी के रूपये उठाएं और उन्हें गौर से देखते हुए बोली....
तेरे लिए मैं क्या से क्या बन गई?काश तू इस दुनिया में ना होता तो लोंग इतना नीचें कभी ना गिरते,तूने तो ईश्वर का दर्जा ले लिया है,तू ईश्वर तो नहीं लेकिन ईश्वर से कम भी नहीं,क्या क्या नाच नचवाता है तू लोगों को,ख़ैर अब खिलखिला मत मेरे पर्स में जाकर आराम कर और अम्बिका ने उन रूपयों को अपने पर्स में आराम करने के लिए छोड़ दिया और फिर मन में सोचने लगी...
स्त्री का घर नहीं होता, वो तो शरणार्थी है. ये सब बचपन से सुनते आ रही थी कि बेटी पराया धन है, बेटे वंशधर होते है. स्त्री के पास अपना कुछ नहीं होता-ना घर ना नाम ना परिवार ना इज़्ज़त ना जाति ना धर्म, सब कुछ पुरुष का दिया हुआ. ये सब उसकी अम्मा कहा करती थी,शायद इसलिए अम्मा ने मुझे इस भाड़ में झोंक दिया,लेकिन इसमें पूरा दोष अम्मा का नहीं था बाबा का भी था....
वो ही तो पहली बार ये बात अम्मा से खुसपुसाते हुए बोले थे कि एक बार ही करवाऐगें अम्बो से ये काम फिर रूपए मिल जाने पर एक दुकान खोल लेगें,उससे ही खर्चा पानी चलता रहेगा,कम से कम कुछ तो ठौर हो जाएगा,नहीं तो चार चार लड़कियों को कैसे ब्याहेगें भला? और अम्मा बाबा की बात सुनकर मजबूरी में राज़ी हो गई थी.....
तभी अम्बिका का मोबाइल फोन बज उठा,उसने देखा तो उसकी छोटी बहन लक्ष्मी का फोन था,मन तो नहीं था बात करने का लेकिन मजबूरीवश उसने फोन कान पर लगाकर हैलो बोला....
उधर से आवाज़ आई ....
कैसी हो बड़ी जिज्जी?
बढ़िया हैं,तू बता कैसी है,अम्बिका ने लक्ष्मी से पूछा।।
हम भी ठिकई हैं,लक्ष्मी बोली।।
कुछ परेशानी है तो बोल,अम्बिका ने पूछा।।
ऊँ का है जिज्जी पूर्णिमा जीजी का ब्याह है तो हमें नए कपड़े लेने थे,लक्ष्मी बोली।।
तो का अम्मा कपड़े नहीं दिलवा रही है तुम्हें,अम्बिका ने पूछा।।
कपड़े तो दिला रही है लेकिन हमें एक सोने का हार भी पसंद आ गया है उसके लिए मना कर रही है,अगर तुम पैसे भेज दो तो हम ऊँ हार ले लेगें,लक्ष्मी बोली।।
ठीक है मैं अम्मा से बात कर लूँगी,आज ही घर पैसे भेजे हैं उसमें से हार के पैसे ले लेना,अम्बिका बोली।।
तुम कित्ती अच्छी हो बड़की जिज्जी! चलो अब हम फोन रखते हैं और ये कहकर लक्ष्मी ने फोन रख दिया...
लक्ष्मी के फोन रखने के बाद अम्बिका का मन दुःखी हो गया उसने सोचा देखो तो कभी फोन नहीं करती और अगर आज फोन कर लिया था तो पहले मेरा हाल चाल तो पूछ लेती झूठ ही सही मुझे कुछ तो तसल्ली हो जाती,बस अपना काम निकलते ही फौरन फोन रख दिया और लक्ष्मी क्या घर का हर सदस्य यही तो करता है उसके साथ,वो पास पैसा बनाने की मशीन है,उसके शरीर और दिल पर क्या गुजरती है इससे किसी को क्या मतलब?
कभी अम्मा ने ये नहीं कहा कि बस अब ये काम छोड़ और घर बसा ले क्योकिं वो अच्छी तरह से जानती है कि अगर मैनें ये काम छोड़ा तो सबकी अय्याशियों पर अवरोध लग जाएगा,वें जो सब पड़ोसियों और रिश्तेदारों को अपना मँहगा मँहगा सामान दिखाकर जलाते है तो वो बंद हो जाएगा,जिस अम्मा ने अपनी जवानी के दिनों में ब्यूटीपार्लर का मुँह नहीं देखा था वो इस उम्र में ब्यूटीपार्लर जाकर फेशियल और ब्लीच करवाती है,नित नए नए सोने के गहनों से सँजी रहती है,मेहमानों को काजू-बादाम का नमकीन चाय के साथ परोसा जाता है,ये सब शान मेरी वजह से ही तो है।।
तभी कमरें में नर्स आई और अम्बिका का ध्यान भंग हुआ,नर्स बोली....
बच्चों के माँ-बाप आपसे मिलना चाहते हैं....
लेकिन क्यों? मुझे किसी से नहीं मिलना,उनका काम पूरा हो गया और मुझे मेरी पेमेंट मिल गई,बस दुकानदार और ग्राहक का रिश्ता यहीं खत्म,अम्बिका बोली।।
लेकिन वें आपको शुक्रिया अदा करना चाहते हैं,नर्स बोली।।
मैनें कह दिया ना ! कि मुझे किसी से नहीं मिलना,अम्बिका बोली।।
लेकिन वो लोंग जिद कर रहे हैं,नर्स बोली।।
अम्बिका कुछ देर सोचती रही फिर बोली....
अच्छा! उन लोगों से कहो कि वें मुझसे मिल सकते हैं।।
ठीक है तो मैं उन्हें अभी अन्दर भेजती हूँ,इना कहकर नर्स चली गई....
कुछ ही देर में दम्पति अम्बिका के कमरें थे पत्नी का नाम सुनैना और पति का नाम संदीप था फिर सुनैना ने अम्बिका से पूछा....
अब आप कैसीं हैं अम्बिका जी?
जी! कैसी हो सकती हूँ भला? अम्बिका ने रूखाई से जवाब दिया।।
जी! मैं समझ सकता हूँ आपके मन की पीड़ा,संदीप जी बोले ।।
उनकी बात सुनकर अम्बिका हँस पड़ी.....
हा...हा...हा...हा....अपनों ने तो नहीं समझी,आप ने समझ ली मेरे मन की पीड़ा इसके लिए धन्यवाद,अम्बिका हाथ जोड़ते हुए बोली।।
मैं आपसे कुछ कहना चाह रही थी,सुनैना बोली।।
जी! कहिए! अम्बिका बोली।।
जी! मैं चाह रही थी कि आप कुछ दिन बच्चों के साथ रह लेतीं तो उन्हें बाहर का दूध नहीं देना पड़ता,सुनैना बोली।।
मैं ने पहले ही कहा था कि बच्चों के पैदा होने के बाद मेरा उनसे कोई भी रिश्ता नहीं रहेगा,लेकिन आप मेरे पैरों में ममता की बेड़ियाँ पहनाना चाह रहीं हैं,अम्बिका बोली।।
डाँक्टर ने कहा है कि बच्चों को माँ के दूध की आवश्यकता है,सुनैना बोली।।
ये कभी नहीं हो सकता,अम्बिका बोली।।
जब इतना एहसान किया है हम पर तो एक और एहसान कर दीजिए,संदीफ जी गिड़गिड़ाए....
मुझे छुट्टियांँ मनाने बाहर जाना है,मैं यहाँ और नहीं रूक सकती,मेरा दम घुटता है यहाँ,अम्बिका बोली।।
कृपया! मेरी बात मान लीजिए,मैं आपके सामने हाथ जोड़ती हूँ,सुनैना बोली।।
देखिए आप मुझे मजबूर मत कीजिए,अम्बिका बोली।।
मैं आपको मजबूर नहीं कर रही बस विनती कर रही हूँ आपसे,सुनैना बोली।।
ठीक है तो मुझे थोड़ा समय दीजिए सोचने का,अम्बिका बोली।।
और फिर अम्बिका का जवाब सुनकर वें दम्पति चले गए और इधर अम्बिका उधेडबुन में लगी हुई थी,शाम होने को आई थी लेकिन अम्बिका को कुछ सूझ नहीं रहा था,तभी डाँक्टर शैलजा आईं और बोलीं...
कैसी हो?
बस!जिन्दा हूँ,अम्बिका बोली।।
अम्बिका की बात को अनसुना करते हुए डाक्टर शैलजा बोली...
तुम्हारे पैसे मैनें तुम्हारे बाबा के एकाउंट में ट्रांसफार्मर करवा दिए हैं,
ठीक है,कोई तो खुश है इस जहाँ में मेरी कुर्बानी से,अम्बिका बोली।।
लेकिन उन बच्चों के माँ बाप खुश नहीं थे तुम्हारा जवाब सुनकर,डाक्टर शैलजा बोलीं....
तो क्या करूँ? उन बच्चों के पास रहूँगी तो मेरी ममता उनसे जुड़ जाएगी,फिर उन्हें छोड़ने में मुझे बहुत कष्ट होगा,अम्बिका बोली।।
देखों वें बहुत ही अमीर लोंग हैं,विदेश में उनका कारोबार है और वें वहीं रहते हैं,बच्चों की चाह उन्हें भारत खीच लाई इसलिए इतने महीनें वें भारत में रह गए,वें कह रहे थें कि तुम जहाँ भी छुट्टियाँ मनाने जाना चाहती हो तो जाओ और वें भी बच्चों को लेकर तुम्हारे साथ जाने को तैयार हैं,तुम्हें बच्चों को केवल सुबह और शाम ही फींडिंग करवानी होगी ,बाकी समय तुम कुछ भी करो तुम्हारी मर्जी और वो तुम्हारे रहने और किराएं का भी पूरा पूरा खर्चा उठाने को तैयार हैं,मेरे ख्याल से तुम्हें इस बारें में एक बार सोचना चाहिए,डाक्टर शैलजा बोलीं।।
तो क्या करूँ ? हाँ बोल दूँ,अम्बिका बोली।।
जैसी तुम्हारी मर्जी,मैंने तो केवल सलाह दी है,डाक्टर शैलजा बोलीं।।
मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा,अम्बिका बोली।।
तुम्हारे पास सोचने का समय है,मुझे एक दो दिन में जवाब देकर बता देना,डाक्टर शैलजा बोलीं।।
और फिर डाक्टर शैलजा ने अम्बिका का चेकअप किया,कुछ इंजेक्शन लगाएं और चली गई...
इधर अम्बिका फिर उधेडबुन में लग गई.....

क्रमशः....
सरोज वर्मा.....