मालगाड़ी का सफ़र - 2 शिव प्रसाद द्वारा हास्य कथाएं में हिंदी पीडीएफ

मालगाड़ी का सफ़र - 2

भाग - २...

 

क्वारीसाइडिंग स्टेशन को देखकर लगता था कि रेलवे प्राधिकरण ने इसके निर्माण का प्रारम्भ करने के बाद इसे प्रारम्भिक अवस्था में ही छोड़ दिया । ढाई प्लॅटफार्म थे, जिनमें से दो तो पसींजर और मालगाड़ियों के लिए थे । इन दोनों प्लॅटफार्म में उचित ऊँचाई के लिए कोई ढाँचा नहीं था, न सीमेंट का, न पत्थर का । बस मिट्टी, कंकर और घास के तिनके । ऊपर न कोई टीन-टप्पर, न खपरैल । न पीने का पानी, न शौचालय । यानी यात्रियों, विशेषतः महिलाओं, बुज़ुर्गों और बाधित लोगों को काफ़ी मशक्कत करनी पड़ती थी । तीसरे प्लॅटफार्म की जगह एक ' साइडिंग ' बनी हुई थी, एक ऊँचा ढालू जो सिर्फ़ मालगाड़ी के डिब्बों को भरने और खाली करने के लिए इस्तेमाल किया जाता था । वैसे, खनन-विशिष्ट होने के कारण यह पूरा क्षेत्र राष्ट्र के निर्माण और विकास के लिए बहुत अपरिहार्य था, अतः पूर्ण विद्युतीकरण के साथ-साथ यहाँ केवल बड़ी लाइन की ही गाड़ियाँ चलती थीं ।

आज भी ठीक ५.३५ पर यह गाड़ी इस स्टेशन से छूटी और ५.५० पर राउरकेला पहुँच गई । विनोद झट से उतरा और सामने स्थित ' अप्सरा टॉकीज़ ' की तरफ दौड़ा । रिक्शा, टेम्पो, साइकिल और पैदल चलने वालों की भीड़ को बीँधते हुए तीन सौ मीटर का यह फ़ासला उसने डेढ़ मिनट में तय कर लिया । उस ज़माने की सुपरहिट जोड़ी धर्मेन्द्र और हेमा मालिनी की फ़िल्म लगी हुई थी । ख़ुशकिस्मती से टिकट मिल गया । विनोद ने अपनी सीट पकड़ी और मूड बनाकर बैठ गया । ठीक छः बजे ब्लैक एंड वाइट न्यूज़-रील शुरू हो गई । इसका हर दृश्य और ज्ञान-भाषण विनोद को शब्दशः याद था, और क्रम भी । पहले गाँधीजी, नेहरु और सरदार पटेल, फिर सुभाष चन्द्र बोस और मौलाना आज़ाद, फिर लाल बहादुर शास्त्री और अन्ततः इन्दिरा गाँधी । और लोगों को ये सब कुछ पकाऊ लगता हो, लेकिन विनोद के लिए यह एक तरह की परीक्षा थी, सब्र और संयम की, कि फ़ीकी चीज़ खाने के बाद ही मसाले का स्वाद चखने में असली मज़ा आता है । फ़िल्म शुरू हुई और विनोद उसमें पूरा रम गया । मारपीट, हँसी-मज़ाक़, नाच-गाना और रोमांच से भरपूर, सौ प्रतिशत मसालेदार, जैसे बाहर लगे पोस्टर में लिखा था । जैसा विनोद ने चाहा था, वैसा ही.... ।

जब मध्यान्तर हुआ, तब उसकी तन्द्रा टूटी । " साला, मज़ा आ गया ! ये फ़िल्म तो फिर से देखनी पड़ेगी, " विनोद ने सीट से उठते हुए ख़ुद से कहा, एकदम मस्त होकर । फिर बाहर आया, अपनी मस्तानी चाल चलते हुए, बाज़ुओं को फेंकते हुए..... । ठेले वाले से बीस पैसे का चीनिया बादाम ख़रीदा और पोस्टरों को ताकने लगा, ताकि आगामी फिल्मों के लिए अभी से तैयारी कर ले । और एक नज़र अपनी घड़ी पर भी डाल ली । शाम के ७.३५ बजे   थे । वैसे तो यह शो ८.४५ तक ख़त्म हो जाता था । और वापस क्वारीसाइडिंग जाने वाली ट्रेन ८.५५ पे ही छूटती थी, अक़सर पाँच मिनट देर भी हो जाती थी । खै़र, मध्यान्तर के बाद फ़िल्म फिर से चालू हो गई । विनोद सीट में तन कर बैठ गया ताकि परदे का कोई भी हिस्सा छुपा न रहे, ख़ासकर हेमा मालिनी की काया और धर्मेन्द्र का           ' ऍक्शन ' ! जैसे-जैसे फिल्म अपने चरम बिन्दु पर पहुँचने लगी, विनोद अपने आह्लाद में हुमसने लगा । इसी सम्मोहन में बँधा हुआ वह तब होश में आया, जब परदे पर " समाप्त " शब्द दीखा ।

अँगड़ाई लेते उठा और एक सुस्त नज़र घड़ी पर डाली । और क्षण-भर में सुस्ती ग़ायब हो गई । नौ बजकर दो मिनट हो चुके थे । विनोद भागा स्टेशन की ओर, शिकारी कुत्ते की रफ़्तार से, और दुआ माँगता रहा कि आज पसींजर गाड़ी दस मिनट देर से छूटे । लेकिन होनी को कौन टाल सकता है ? गाड़ी छूट चुकी थी । विनोद की आँखों के सामने अँधेरा छा गया । अगली दोपहर तक दूसरी कोई ट्रेन नहीं थी । न ही क्वारीसाइडिंग की तरफ़ जाने वाली कोई बस या टेम्पो, न जेब में एक पैसा ! पैदल जाने के लिए दो रास्ते थे । एक रास्ता तो रिंग रोड होते हुए था, जो सत्रह किलोमीटर लम्बा था और सुनसान भी, साथ ही साथ, सियार और जंगली बिल्लियों का ख़तरा था । दूसरा रास्ता रघुनाथपल्ली नामक कस्बे से होते हुए जाता था, जो सिर्फ़ आठ किलोमीटर ही लम्बा था, लेकिन इसमें आए दिन चोरी-डकैती होती थी । उसके पास लुटवाने को पैसे तो नहीं थे, लेकिन चोर घड़ी और कपड़े उतार ले जाते थे । विनोद ने एक बार कल्पना की, कि वह सिर्फ़ बनियान और जाँघिये में कैसा लगेगा । कोई ख़ास बुरा नहीं, उसे लगा । उस पर से घर पहुँचते-पहुँचते तो रात के साढ़े ग्यारह बज जाएँगे, तब कौन देखने वाला होगा ? लेकिन फिर सड़कछाप कुत्तों की याद आई । वे तो ऐसे भी सब पर भौंकते रहते थे, और उसे इस हालत में देखकर तो ज़रूर दौड़ा-दौड़ा कर काट खाएँगे । वह सिहर उठा । फिर उसने अपनी घड़ी को निहारा । उसके बाबूजी की तरफ़ से एकमात्र भेंट । पिछले साल जब उसने हायर सेकेंडरी पास की थी, थर्ड डिवीज़न में, तब सत्यनारायण जी को ख़ुशी से कहीं ज़्यादा राहत हुई थी, कि चलो, नालायक ने जीवन का पहला पड़ाव तो पार किया । एछ.एम.टी. कम्पनी की घड़ी थी, पूरे पचानवे रुपयों की .... । इसलिए विनोद को भी बहुत लगाव था इससे, शरीर के अंग की तरह । कुछ देर और चिन्तन करने के बाद उसे इस समस्या का एक ही समाधान मिला, रेल की पटरियों के साथ-साथ चल कर जाना । उसने अनुमान लगाया कि नौ किलोमीटर की यह दूरी वह करीब ढाई घण्टों में तय कर लेगा । और चल पड़ा ।

अभी मुश्किल से बीस कदम चला ही था, कि बग़ल की पटरी पर खड़ी मालगाड़ी ने कुछ हरक़त की, और शान्त हो गई । शायद शंटिंग हुई थी । विनोद ने देखा कि इंजिन का रुख़ क्वारीसाइडिंग की ओर ही था । वह जानता था कि इस दिशा में एक ही लाइन थी, जो क्वारीसाइडिंग की ओर जाती थी । वह यह भी जानता था कि हर मालगाड़ी क्वारीसाइडिंग में रुकती ज़रूर है, या तो माल उतारने-चढ़ाने के लिए या सिगनल नहीं मिलने के कारण । विनोद के दिमाग में बिजली कौँधी । हाँ, क्यों नहीं ? और देखने वाला कौन है ? तिस पर टिकट खरीदने या टी.टी.ई. का झँझट तक नहीं ! इससे पहले उसने मालगाड़ी के डिब्बों को बहुत बार देखा तो था, और इस इलाके में चलने वाले सभी डिब्बे ऊपर से पूरे खुले हुए ही होते थे, शायद अयस्क-धातु भरने की आसानी के लिए । अब इस अँधेरे में ग़ौर किया तो डिब्बे के पीछे सीढ़ी दीखी । उसने अपने बाल झटके, घड़ी को छुआ, जैसे वह कोई जादुई तिलिस्मान हो, और झट चढ़ गया । सीढ़ी के ऊपरी पायदान पर पहुँचकर अन्दर झाँका, तो रुपहले-से छोटे-छोटे धातुज पत्थर आधे डिब्बे तक भरे हुए थे, शायद चूने के थे । विनोद ने इधर-उधर ताका कि कोई देख तो नहीं रहा है और फिर चुपके से पैर अन्दर डालकर ढुलक गया । हाथ-पाँव झाड़ते हुए उन खनिज पत्थरों पर खड़ा हो गया । गाड़ी कुछ हिली तो वह उन पत्थरों पे गिर गया । तब डिब्बे की दीवार को उँगलियों से पकड़कर वह तनकर सीधा खड़ा हो गया । आगे का सिगनल हरा हो गया, इंजिन ने सीटी बजाई, तो विनोद ने मुड़कर दूसरी ओर देखा । गार्ड के हाथ में हरी लालटैन लहराने लगी और मालगाड़ी एक झटके के साथ चल पड़ी । और विनोद झटके के साथ फिर नीचे गिरा । वह समझ गया कि खड़े रहने से चोट लगती रहेगी, सो उन पत्थरों पर बैठ गया । मालगाड़ी बहुत धीमी गति से बढ़ रही थी, बैलगाड़ी की तरह । पन्द्रह मिनट के बाद विनोद ने खड़े होकर डिब्बे के ऊपर से देखा, तो पाया कि अभी राउरकेला स्टेशन के आउटर सिगनल के पार ही पहुँचे थे । उसको लगा कि इस हिसाब से तो एक घण्टे से ऊपर का समय लग जाएगा । सो आराम से बैठ गया, बल्कि पत्थरों की हल्की ढलान का बिस्तर बनाकर लेट गया । मनमौजियों की फ़ितरत होती है कि अतीत या भविष्य के बारे में बहुत कम सोचते हैं, और जीवन में आगे चलकर ऐसा-वैसा कुछ हुआ तो क्या करें, इस तरह की बेक़ार उलझनों में पड़ते ही नहीं ।

            ऊपर आकाश में शरद-पूर्णिमा का भरा-भरा चाँद, धरती पर चाँदनी की शीतलता, मन्द-मन्द हवा और रात का रहस्यमय अँधेरा । विनोद आप ही मुस्कुराने लगा । चाँद को तकते-तकते उसकी बहुरंगी कल्पना में ऐसी दीप्ति आई कि अचानक उसमें हेमा मालिनी का चेहरा नज़र आने लगा । वह पुलक गया । आँखें बन्द कीं, तो हेमा मालिनी चाँद से उतर कर उसके बग़ल में आ चुकी    थी । पूरे तन-मन में एक रोमांचित सिहरन दौड़ उठी । कल्पना ने उड़ान भरी और वह प्रेम-लीला के रंगों में डूबने लगा । किशोरावस्था का अन्तिम चरण हो और उस पर मस्ती का आलम भी, तो कल्पनालोक से स्वप्नलोक की दूरी ज़्यादा नहीं होती । विनोद की आँख लग गई । वह गन्धर्व बन बादलों के पार अपनी अंकशायिनी के साथ रति-भ्रमण करने लगा । मालगाड़ी अपनी अरसौंही रफ़्तार से चलती रही, पवन इस मनचले लड़के को सहलाता रहा, चाँदनी उसे नहलाती रही, रात और गहरी होती गई .... ।

            एक अरसा बीत गया । अचानक एक विस्फोटक ध्वनि के साथ मालगाड़ी रुकी । मालगाड़ियाँ हमेशा ऐसे ही रुकती हैं । कोई और होता तो उछल कर कूद उठता । लेकिन विनोद तो सातवें आसमान के पार जा चुका था । तो, धीरे-धीरे रस और भोग-विलास की एक-एक परत को हटाते हुए उसके मस्तिष्क ने उसे जगाया । आँखें खुलीं । उस तुर्यावस्था में कुछ देर तक उसे होश ही नहीं रहा कि वह कहाँ है । बग़ल में झाँका तो उसकी स्वप्निल सुखदायिनी लुप्त थी । तब उसे ध्यान आया कि वह असल में कहाँ है । वह उठा, हँसा, बालों को झटक कर दाहिने हाथ से व्यवस्थित किया और सीढ़ी के रास्ते डिब्बे से उतर कर प्लॅटफार्म पर आ गया । ' यार, अपना ये प्लॅटफार्म आज बहुत अलग-सा, अजीब-सा लग रहा है,' वह आप ही बड़बड़ाया । उसने घड़ी देखी तो ऐसा झटका लगा कि गला सूख गया । साढ़े ग्यारह बज चुके थे । केवल नौ किलोमीटर के लिए डेढ़ घंटे ! घर में तो सब परेशान होंगे, बहुत परेशान । वह घर की दिशा में मुड़ा, तो रास्ता भी बिल्कुल नया-सा लग रहा था । तब उसने ध्यान से चारों ओर देखा । अरे, ये तो कोई और स्टेशन था, क्वारीसाइडिंग नहीं ! वह दूर दिखती हुई रोशनी की ओर चलने लगा । स्टेशन की एकमात्र बिल्डिंग के पास पहुँचा, तो रेलवे का कोई मुलाज़िम कुर्सी पर बैठा ऊँघ रहा था । विनोद ने उसके कन्धे को हिलाकर पूछा, " भाई साहब, ये कौन-सा स्टेशन है ? " उस आदमी ने खीझते हुए एक तरफ़ को गर्दन हिलाकर इशारा किया और अपनी नींद जारी रखी । विनोद ने उस तरफ़ देखा, भारतीय रेल के सर्व-व्याप्त पीले रंग के सीमेंटी बोर्ड पर लिखा था, ' बिरमित्रपुर ' । उसके होश उड़ गए । वह बिरमित्रपुर कैसे पहुँच गया ? उसने फिर से उस आदमी को जगाकर पूछा, " भाई साहब, ये कौन-सा स्टेशन है ? " अब उस आदमी की नींद और सब्र, दोनों टूट गए । " अबे दिखता नहीं है क्या ? लिखा तो हुआ है, बिरमित्रपुर । " वह चिल्लाया और ज़मीन पर थूकते हुए अन्दर सिगनल-कक्ष में जाकर लेट गया । अब विनोद की समझ में बात आई । कि मालगाड़ी क्वारीसाइडिंग को पार करती हुई निकल गई, और वह सोता ही रह गया था । तो अब ? चूँकि मनमौजियों की पूरी एकाग्रता और योग्यता वर्तमान पर ही केन्द्रित रहती हैं, इसलिए विनोद का दिमाग अब इस नई मुसीबत का हल ढूँढने में लग गया ।

वहाँ से क्वारीसाइडिंग के लिए अगली दोपहर तक कोई ट्रेन नहीं थी । हाँ, अच्छी-ख़ासी सड़क तो थी, लेकिन इकतीस किलोमीटर का फ़ासला था । पहुँचते-पहुँचते सुबह हो जाती । फिर इस वक़्त बस भी नहीं थी, न ही किसी ट्रक को रोक कर सवारी पाने की कोई सम्भावना थी । हाँ, रेलवे लाइन पर चलकर जाने से कुछ कम, यानी अठारह किलोमीटर की दूरी थी, जिसे तय करने में कम से कम चार घण्टे तो लगने ही थे । इसी विकल्प को चुनते हुए विनोद ने पटरी पर अपनी यात्रा शुरू की, तब उसे ख़्याल आया कि बीच में तो ब्राह्मणी नदी है जिस पर एक लम्बा पुल था । और अचानक यह भी याद आया कि अभी कुछ ही दिन पहले एक आदमी देर रात को उस पुल पर गया था, शराब पीने । शायद उसने सोचा होगा, ऊपर तारों का आँचल, नीचे नदी का लहरिल जल, और बीच में मदिर हलचल...., वाह, क्या समा बँधेगा ! अगली सुबह वहाँ सिर्फ दारू की बोतल मिली थी । और दो दिन बाद उस आदमी की लाश, दो किलोमीटर आगे, नदी के किनारे । विनोद को पसीना आ गया । तुरन्त रुक गया और विचारमग्न होकर वहीं, बिरमित्रपुर स्टेशन के छोर पर टहलने लगा ।

तभी वहाँ एक मालगाड़ी दूसरी दिशा से आकर रुकी । विनोद ने मुड़कर देखा, इंजिन क्वारीसाइडिंग की ओर रुख़ किए उससे करीब सौ मीटर की दूरी पर था । उसके मन में बिजली कौंधी । ' नहीं, नहीं, दोबारा नहीं ' माथे को हथेली से पीटते हुए बड़बड़ाने लगा । तो अब ? थोड़ी ही देर में इस मालगाड़ी ने लम्बी सीटी बजाई । और विनोद का दिल-दिमाग-शरीर चाकू की धार पर आ टिके । पटरी पर चलना, यानी कि उस संकीर्ण पुल पर से गुज़रना । और उसी वक़्त कोई ट्रेन आ गई तो ? नहीं, नहीं, वह घर ज़िन्दा पहुँचना चाहता था, लाश बनकर नहीं ! तो ? अब ये मालगाड़ी नहीं, तो कुछ भी नहीं । वह दौड़ा । गाड़ी हिलने लगी । विनोद ने अपनी गरी का ज़ोर लगा दिया और इंजिन के ठीक पीछे लगे डिब्बे तक पहुँच गया । सीढ़ी चढ़ी और डिब्बे के अन्दर झाँका । वो तो खाली था ! तो अन्दर कैसे जाए ? डिब्बा काफ़ी गहरा था और नीचे तक जाने के लिए अन्दर सीढ़ियाँ थीं ही नहीं । कुछ देर तक विनोद वैसे ही, बाहर लगी सीढ़ियों पर खड़ा रहा, लोहे के सहारों से जान चिपका कर । गाड़ी ने रफ़्तार पकड़ी । थोड़ी देर के लिए तो विनोद को मज़ा आया, कि ' यार, जोखिम और सनसनी से भरा करतब इसे कहते हैं । धर्मेन्द्र तो ये सब कुछ सिर्फ़ परदे पर करता है, लेकिन मैंने तो सच में कर दिखाया है । अगर कोई डायरेक्टर इस वक़्त मुझे देख ले, तो उसकी अगली फिल्म में अपना रोल पक्का... । '

            धीरे-धीरे मालगाड़ी ने अपनी रफ़्तार बढ़ाई तो विनोद को ज़ोर के धक्के लगने लगे । उस पर से हवा भी तेज़ी से चल रही थी । विनोद ने पीछे की ओर देखा, पटरी में घुमाव था, तो पूरी मालगाड़ी एक दीर्घ, भयावह सरीसृप की तरह लचक रही थी । फिर नज़र आगे की ओर फेरी, तो दूर, ज़मीन से कई गज़ नीचे कुछ चमकता हुआ दीखा । ज़रा और ग़ौर किया तो जाना कि ये तो ब्राह्मणी नदी है । यानी कि पुल नज़दीक आ चुका था । विनोद को ख़तरा महसूस हुआ, तो सीढ़ी के ऊपर चढ़ कर डिब्बे की कोर को थाम लिया । फिर उसे दोनों हाथों से कसकर जकड़ लिया और उस दीवार को लाँघकर दोनों पैर अन्दर डाल दिए । अब वह दीवार की ऊपरी कोर को पकड़े, पैरों को सीधा लटकाए, डिब्बे के अन्दर टँगा हुआ था । तभी मालगाड़ी पुल के ऊपर आ गई और उसके धक्के और झटके ऐसे तीव्र हो गए जैसे गहिला गई हो । उस पर से पुल पर दौड़ते वक़्त रेलगाड़ियाँ जिस तरह की हृदय-भेदी तुमुल करती हैं, इसका ज्ञान पसींजर गाड़ी के डिब्बे के अन्दर बैठकर नहीं होता । लेकिन यहाँ, मालगाड़ी के खुले डिब्बे में विनोद को लगा कि भूकम्प आ गया है । उसने उस अँधेरे में डिब्बे के तल तक के फासले का अनुमान लगाया । उसका अपना कद पाँच फुट दस इंच, और दोनों बाज़ू ऊपर की ओर फैलाने से पूरे शरीर की लम्बाई क़रीब सवा सात फुट की होगी । तो नीचे और चार-पाँच फुट का गिराव होगा । उसने बजरंगबली का नाम लिया और दोनों हाथों को छोड़ दिया । पछाड़ खाकर गिरा और पीछे को लुढ़क गया । पैरों के बाद उस टकराव का पूरा घर्षण उसके नितम्बों ने लिया, फिर कोहनियों ने । कुछ देर तक वह उसी हालत में सुन्न-सा पड़ा रहा, फिर धीरे से उठा और सँभल-सँभल कर हाथ-पैर हिलाने लगा । कोई हड्डी टूटी नहीं थी । फिर दीवार के साथ टिक कर खड़ा हो गया । साँसें काबू में आईं तो विनोद मन्द-मन्द मुस्कुराने लगा और बालों को झटक कर दाहिने हाथ से सँवारता रहा । उसे लगा कि तक़दीर ने उसकी दिलेरी और हुनर को आज़माने के लिए ही ये सब करवाया और वह अव्वल दर्जे पे सफल निकला ! यानी पूरी तरह से फिल्मों के लिए   फिट । वो भी, मार-पीट वाली फ़िल्में । यानी कि धर्मेन्द्र के रिटायर होते ही वे सभी रोल इसे मिल जाएँगे । साथ में हेमा मालिनी भी.... । अब तो विनोद हँसने लगा, कि ' अमां यार, रात हो तो ऐसी, बात हो तो ऐसी ! ' घर जाकर मंजू दीदी और अपने छोटे भाई-बहन को बतलाएगा तो वे आँखें फाड़-फाड़ कर सुनेंगे ! और अगले दिन दोस्तों के बीच तो.... ! कि राजतिलक के साथ उसे पूरे टाउनशिप के हीरो के सिँहासन पर बिठाया जाएगा । उसने अपने लिए ख़िताब भी चुन लिया, " मर्दों का मर्द, उभरता ऍक्शन स्टार, विनोद सिँह । "

कुछ देर के बाद वह इस भौतिकी संसार में वापस आया । घड़ी पे नज़र डाली, अँधेरे में ठीक से दीख नहीं रहा था, पर १२.३० बज रहे थे शायद । अब तो क्वारीसाइडिंग आने ही वाला होगा । उसने खड़े-खड़े छलाँग लगाई, ताकि डिब्बे की ऊपरी कोर को पकड़ ले । लेकिन फिसल कर नीचे गिरा । दो बार नाकाम होने के बाद उसने सोचा कि जल्दी क्या है, गाड़ी क्वारीसाइडिंग में कम से कम आधा घण्टा रुकेगी, तभी कुछ कर लेंगे ।

            क्वारीसाइडिंग स्टेशन के आउटर सिगनल के पास का ऊँचा खम्भा दिखाई दिया और उसके ऊपर लगी हुई तेज़ रोशनी की बत्ती भी । आ गया अपना क्वारीसाइडिंग ! विनोद ने फिर बालों को झटका, तो जैसे सस्पन्द होकर मालगाड़ी ने भी झटका लगाया और रफ़्तार बढ़ा दी । विनोद का दिल डूबने लगा । अरे, ये क्या ? कहीं उसका वहम तो नहीं ? लेकिन रफ़्तार सचमुच बढ़ चुकी थी, ६० किलोमीटर से भी ज़्यादा । विनोद पर जैसे खौफ़ का दौरा पड़ गया । वह डिब्बे की दीवारों को ज़ोर से पीटने लगा । और इंजिन-ड्राईवर का ध्यान खींचने के लिए टेरने लगा, " भाई साहब, रोकिए... । " फिर और ज़ोर से चिल्लाया, " अरे भइया, रोको, क्वारीसाइडिंग आ गया है.... । सो गए क्या ? " फिर, " अबे, रोकता है कि नहीं.... । " लेकिन उसे लगा कि तेज़ हवा और उस डिब्बे की लौह दीवारों से टकरा कर उसकी आवाज़ वापस आकर उसी के कानों में गूँज रही थी । जब उसे लगा कि क्वारीसाइडिंग निकल चुका है तो पिंजरे में बन्द जंगली जानवर की तरह छटपटाने लगा और तब...., उसकी अब तक की पूरी भड़ास निकल पड़ी । कहते हैं कि जीवन की असली शिक्षा हमें कक्षा के बाहर ही मिलती है । और हमारे देश में लड़कों के किशोरावस्था में कदम रखते  ही उनकी शिक्षा का एक अभिन्न अंग बन जाती हैं, गालियाँ । तो अब विनोद ने उस इंजिन-ड्राईवर पे ख़ूब गालियाँ बरसाईं, जिनमें उसके परिवारजनों में पारस्परिक अगम्या-गमन का महाभियोग भी था । इस दुर्धर्ष अभियान में वह थोड़ी ही देर में हाँफ गया । फिर अपना माथा थामकर डिब्बे के तले पर बैठ गया । कुछ देर में धड़कनें व्यवस्थित हुईं, तो दिमाग का पैनापन भी लौट आया । अक़सर जो लोग पढ़ाई-लिखाई की ओर बेपरवाह होते हैं, वे दुनियादारी में बहुत आगे निकल जाते हैं । विनोद को अचानक याद आया कि मालगाड़ी के डिब्बों की दीवार पर निचले तल से लगा हुआ एक किवाड़-सा होता है, अन्दर के माल को आसानी से खाली करने के लिए । तो वह उस अँधेरे में डिब्बे के तल पर रेंगते हुए, हाथों से टटोलते हुए, उस किवाड़ को ढूँढने लगा । कुछ ही देर में किवाड़ मिल गया । लेकिन काफ़ी देर हाथ फेरने के बावजूद उसको खोलने और बन्द करने वाली लोहे की कोई डाँड़ी नहीं मिली । ये कैसे हो सकता है ? विनोद का तर्कयुक्त मस्तिष्क विश्लेषण करने लगा । तब उसे याद आया । क्वारीसाइडिंग स्टेशन पर अक़सर अपने दोस्तों के साथ बैठकर घुँघनी खाते हुए उसने देखा था कि यह किवाड़ तो बाहर को खुलता है । यानी उसकी डाँड़ी, ताला, वगै़रह, सब कुछ बाहर ही होगा । अब क्या करे ? कुछ और बचा ही नहीं था, खोज-बीन करने के लिए । अब उसके लिए न चाँदनी थी, न मस्ती । बस, घनघोर अँधेरा और शून्यता ।

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सत्यनारायण जी के घर में तूफ़ान मचा हुआ था । जब ग्यारह बजे तक विनोद घर नहीं पहुँचा था, तब सत्यनारायण जी चिल्लाए थे, " उसको ढूँढूँ भी तो कैसे ? साइकिल भी तो वही लेकर गया है । "

" नहीं, वो ट्रेन में गया है । " उनकी पत्नी ने बताया ।

" ट्रेन में ? क्यों ? "

" क्या क्यों ? अँधेरे में कोई साइकिल पे जाता है क्या ? "

" क्यों नहीं जाता है ? रात के शिफ्ट के लिए मैं नहीं जाता साइकिल पे ? और मेरे साथ के बाक़ी सब भी ? "

सब चुप रहे तो सत्यनारायण जी और धधक उठे । " और ये निकम्मा भी तो देर रात तक भटकता रहता है साइकिल पर, दोस्तों के साथ .... । "

" बाबू जी । " यह उनकी बड़ी बेटी मंजू की आवाज़ थी, धीर और स्थिर । " विनोद अप्सरा टॉकीज़ में फिल्म देखने गया है । वो तो राउरकेला स्टेशन के ठीक सामने ही है न ! इसीलिए ट्रेन से जाने-आने में ही सुविधा है न ? " फ़िल्म देखने की लालसा क्या होती है, वह जानती थी । क्योंकि वह ख़ुद भी यह रुचि रखती थी । हर ऐतवार टाउनशिप में दिखाई जाने वाली फ़िल्म देखने की इजाज़त थी उसे, सो सहेलियों के संग देख लेती थी । और हर दो महीनों में एक बार वहाँ की महिला-समिति की ओर से सभी औरतों और लड़कियों को कम्पनी की बस में बिठाकर राउरकेला ले जाया जाता था, किसी टॉकीज़ में फिल्म दिखाने के लिए । इस मौके को भी मंजू कभी छोड़ती नहीं थी ।

सत्यनारायण जी कुछ देर के लिए चुप रहे । पूरे घर में अगर कोई उन्हें शान्त कर सकता था, तो वो थी मंजू । बिल्कुल लक्ष्मी मानते थे उसे । बहुत अनुरक्ति थी उन्हें अपनी इस लाड़ली से, कि बेटी हो तो ऐसी, योग्य, सुशील, सुलक्षणा ।

" तो फिर लौटा क्यों नहीं अब तक ? " सत्यनारायण जी ने मंजू को ही सम्बोधित करते हुए पूछा ।

" ट्रेन देर से चल रही होगी । होता रहता है । कुछ देर और देख लेते हैं । " मंजू ने धीमे से कहा ।

बैठक में लगी कुर्सियों के फेरे लगाते हुए सत्यनारायण जी उन दोनों को घूरे जा रहे थे । वे जानते थे कि उनकी पत्नी की ही तरह उनकी बेटी भी विनोद पर जान छिड़कती है । " न जाने इन दोनों को क्या दिखता है उस नालायक में ? मुझे तो वो बस, बिगडै़ल साँड़ लगता है । " वे आप ही बड़बड़ाने लगे । फिर इधर-उधर टहलने  लगे । कुछ देर के लिए घर निःशब्द हो गया, जैसे आसन्न झँझावात से पहले का सन्नाटा ।

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                                                                                                                                                                                     क्रमशः  .....

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