भक्ति माधुर्य - 2 Brijmohan sharma द्वारा आध्यात्मिक कथा में हिंदी पीडीएफ

भक्ति माधुर्य - 2

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राम हनुमान प्रथम मिलन
यह प्रसंग रामायण का अत्यंत ही मधुर अमृतमय प्रसंग है |

“ आगे चले बहुरि रघुराया ....

रूप स्वामि भगवंत |” ( श्किन्धाकांड )

जब राम व लक्ष्मण सीता को ढूंढते हुए रिष्यमूक पर्वत के समीप से गुजरते हैं तो उन दो महावीर योद्धाओं को देखकर वानर राजा सुग्रीव बहुत भयभीत होता है | वह हनुमान से कहता है, “ अरे हनुमान तुम अपना वेश बदलकर जाकर पता करो कि ये दो योद्धा कौन है ? कहीं बालि ने तो इन्हें मुझे मारने के लिए यहाँ नहीं भेजा है ? यदि ऐसा हुआ तो तुम दूर से ही मुझे इशारा कर देना | मै तुरंत इस पर्वत से दूर भागकर अपनी प्राण रक्षा करूँ |”

इस पर हनुमान ब्राम्हण का वेश बनाकर राम के समीप जाकर उनसे पूछते हैं:

“हे वीर क्षत्रिय योद्धाओं के समान दिखाई देने वाले आप कौन हो ? आप इतने सुंदर ओजस्वी युवक इस भयानक वन की भीषण गर्मी में क्यो भटक रहे हो ? आप कितने सुंदर एवं मनोहर हो ! आपके चरण अत्यंत कोमल हैं जबकि इस वन की भूमि बड़ी कठोर है।

मुझे कुछ ऐसा प्रतीत होता है जैसे आप साधारण मनुष्य न होकर स्वयं भगवान हो जिन्होने भक्तों, प्रथ्वी के उद्धार और दानवों के संहार के लिए अवतार लिया है। हे प्रभु ! शीघ्र बतलाइये, आपके दर्शन मात्र से मेरा मन अत्यंत हर्षित हो रहा है व मेरा रोम रोम रोमांचित हुआ जाता है | आप सत्य बतलाइये आप कौन हो?'

इस पर राम ने कहा,” हे ब्राम्हण देवता ! मेरा नाम राम है व यह मेरा छोटा भाई लक्ष्मण है |

हम दोनों अयोध्या नरेश महाराजा दशरथ के पुत्र हैं | मै पिता की आज्ञा का पालन करते हुए इस वन में चौदह वर्ष का बनवास व्यतीत कर रहा हूँ | हमारे साथ मेरी रूपसी पत्नि सीता भी थी जिसका किसी दुष्ट राक्षस ने अपहरण कर लिया है |

हे ब्राम्हण देवता ! हम उसे ढूंढते हए भटक रहे हैं। हमने अपना परिचय तो दे दिया। क्रपया अब आप भी अपना परिचय दीजिए।“

हनुमान अपने स्वामी को पहचान कर उनके चरणों में गिर पड़ते हैं ।

वे कहने लगे-“ हे प्रभो! मैं तो एक साधारण वानर हूं और मैंने एक साधारण वानर की तरह आपको न पह्चान कर आपसे अपना परिचय पूछा\। आपकी माया कितनी प्रबल है? आपकी माया के कारण सभी प्राणी संसार में भटक रहे हैं । मैं तो एक वानर ठहरा जब बड़े बड़े ऋषि मुनि आपको नहीं पहचान पते तो मेरी क्या बिसात है ? किन्तु आपने भी अपने इस सेवक को भ्रमित करने के लिए ऐक साधारण मानव के रूप में परिचय दिया | हे प्रभो मैं अनेक दोषों से युक्त सांसारिक माया मोह में फंसा हुआ प्राणी हूँ | ऐसा कहकर हनुमान पुनः व्याकुल होकर श्रीराम के चरणों पर गिर पड़े |

इस पर श्रीराम ने हनुमान को बड़े प्यार से उठाते हुए अपने हृदय से लगा लिया | श्रीराम ने उन्हें प्रेमाश्रुओं से भिगो दिया। | वे कहने लगे :

'ओ प्यारे हनुमान ! जरा भी बुरा मत मान। तू मुझे लक्ष्मण से दूना प्यारा है क्योंकि तू मेरा अनन्य भक्त है\। जो भक्त सम्पूर्ण सृष्टि, चर अचर को भगवान की अभिव्यक्ति समझकर, प्रभु को स्वामी व स्वयं को सेवक मानकर सदैव मेरा स्मरण करता रहता है, वह मेरा अनन्य भक्त है। यद्यपि संसार मुझे समदर्शी कहता है किन्तु फिर भी मेरा सेवक जो मुझे अनन्य भाव से भजता है, वह मुझे बहुत प्रिय होता है | वह सदैव मेरे हृदय में निवास करता है।

यह कितना प्यारा प्रसंग है कि जिसे पढ़कर किसी भी सच्चे भक्त के अश्रु रोके नहीं रुकेंगे। इस सुमधुर भक्तिपूर्ण काव्य को कवि ने इतनी सुंदरता से व्यक्त किया है कि मुझ समान सामान्य लेखक लिए इसके ह्रदयस्पर्शी मार्मिक भावों को व्यक्त करना असंभव है।

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pradeep Kumar Tripathi

pradeep Kumar Tripathi मातृभारती सत्यापित 10 महीना पहले