रुपये, पद और बलि - 10 S Bhagyam Sharma द्वारा जासूसी कहानी में हिंदी पीडीएफ

रुपये, पद और बलि - 10

अध्याय 10

"जोसेफ ! अभी तुम कहां से बोल रहे हो बताया ?" घबराए हुए आवाज से कौशल राम ने पूछा- जोसेफ दूसरी तरफ से बोला।

"सर अमनंजीकरें टेलिफन बूथ से बोल रहा हूं।"

"कौन सी जगह ?"

"परनीअप्पा थिएटर के पास से।"

"ठीक है, तुम टेलीफोन बूथ में ही रहो। सुधाकर को कार से भेजता हूं।"

"सर, मुझे डर लग रहा है।"

"डरो मत ! कोई भी तुम्हें कुछ नहीं कर सकता" कह कर कौशल राम ने रिसीवर को रख वहीं से अपने बेटे को आवाज दी।

"सुधाकर !"

"क्या बात है अप्पा ?"

"जोसफ को पहचान लिया गया ।"

"इज इट ? उसे कैसे भी बचाना पड़ेगा!"

"बेवकूफी की बातें मत कर ! उसे किसी भी तरह खत्म करना पड़ेगा । यदि रेस के घोड़े के पैर में लग जाए, या घर का कुत्ता पागल हो जाए तो क्या करते हैं पता है? उसे शूट कर देते हैं।"

"आप... अप्पा !"

आवाज को खींचा सुधाकर।

"क्या है रे ?"

"जोसेफ मेरा दोस्त है, मेरे साथ पढ़ा हुआ है। उसके पास कोई नौकरी नहीं थी इस एक कारण से उसको अपने योजनाओं में हमने शामिल किया। उसने हमारे लिए दो हत्याएं की !"

"मुफ्त में किया क्या ? उसके हिसाब से पैसा तो दे दिया ना। यह देखो सुधाकर, अभी पुलिस वालों ने उसे सूंघ लिया, उसे ज्यादा दिन हम नहीं बचा सकते। उसे जिंदा छोड़ दें तो हमें फंसना पड़ेगा ! हम पुलिस में फंस जाएं तो क्या होगा पता है? मिनिटों में अपने परिवार का नाम बदनाम हो जाएगा। केस कोर्ट में जाएं तो तुझे और मुझे एक दिन सुबह फांसी पर चढ़ना होगा।"

सुधाकर का शरीर रोमांचित हुआ।

"कैसे... अप्पा उसे खत्म करें ?"

"इधर पास में आकर बैठो - कौशल राम ने धीमी आवाज में कुछ बोलना शुरू किया।

कार तेज गति से - पारनीअप्पा थिएटर को पार करते ही टेलीफोन बूथ को सुधाकर ढूंढने लगा । बूथ प्लेटफार्म के ऊपर था। उसके अंदर एक आदमी की छाया थी। कार को धीरे सरकाते हुए बूथ के पास रोका तो अंदर से जोसेफ बाहर आया।

वह डरा हुआ था - उसका चेहरा सफेद पड़ गया था वह पसीने से तरबतर था। आसपास देखते हुए आकर कार के अंदर बैठ गया।

कार को सुधाकर तेजी से भगा के ले गया।

"क्या हुआ जोसेफ ?"

"पता नहीं कैसे सुधाकर। मैं जिस कमरे में ठहरा था उस कमरे के सामने पुलिस खड़ी हुई थी। मैं बिना आवाज के वहां से खिसक लिया।"

"तुमने सेंट्रल स्टेशन में माणिकराज को खत्म किया उस समय तुम्हें भीड़ के साथ कुछ देर वहीं रहना था। भीड़ को छोड़कर भाग कर आउटर लाइन में नहीं जाना था। ऐसे भागने के कारण ही उस पोर्टर ने तुम्हें देख लिया। पोर्टर और ऑटो रिक्शा वाले के पहचान पुलिस वालों से कनेक्ट हो गया होगा। तुम्हें जिस ऑटो वाले ने उतारा उसने उस एरिया को बता दिया होगा। उस एरिया को हरेक अंगुल-अंगुल पुलिस छान रही होगी। इंक्वायरी करके तुम्हारे जगह का पता लगा लिया होगा।"

"अब क्या करें सुधाकर ?"

"कुछ दिन तुम्हें छुप कर रहना पड़ेगा।"

"कौन सी जगह ?"

"इचमपाक्म में हमारा एक गेस्ट हाउस है तुमको मालूम है ना ?"

"हां।"

"वहां तुम रुक जाओ !" पुलिस वहां आ गई तो ?"

"कैसे आएगी...?" कल अप्पा मिनिस्टर बनने वाले हैं। एक मिनिस्टर के घर को इतने आराम से पुलिस वहाँ तलाशी लेगी क्या ?

"अब हम इचमपाक्म जा रहे हैं ?"

"हां...."

"सुधाकर...."

"बोलो"

"मैं एक योजना बताऊं क्या ?"

"बताओ।"

"उस इचमपाक्म गेस्ट हाउस में ठहरने के बदले मैं अपने गांव चला जाता हूं...? उस छोटे से गांव में कोई पुलिस मुझे ढूंढने नहीं आएगी...."

"नहीं जोसेफ ! इस समय जो स्थिति है उसमें तुम्हारा बस या ट्रेन से ट्रैवल करना ठीक नहीं। पुलिस ने पता नहीं कहां-कहां जाल बिछाया होगा.... किसी भी एक जाल में तुम जरूर फंस जाओगे...."

"वैसे भी सुधाकर ! मैं पुलिस के हाथों में पड़ जाऊं तो तुम्हें या तुम्हारे अप्पा का नाम मैं नहीं बताऊंगा। चाहे मेरी जान पर ही क्यों न बन जाएं लेकिन तुम्हारा नाम या तुम्हारे पिताजी के नाम को नहीं लूँगा ।"

"उसकी जरूरत ही नहीं पड़ेगी जोसेफ ! तुम्हें पुलिस में फंसने लायक छोड़ देंगे क्या....?"

उसके बोलते समय ही -

जोसफ फड़फड़ाने लगा।

"सुधाकर.... वहां देखो।"

उसने देखा।

गली के कोने में पुलिस की जीप खड़ी थी - दो पुलिस अधिकारी रोड के बीच में खड़े होकर आने-जाने वाले वाहनों को खड़ा कर पूछताछ कर रहे थे।

सुधाकर ने कार की गति को कम किया। जोसेफ बोला "कार को मोड कर वापस जाते हैं सुधाकर। वे मुझे ही ढूंढ रहे हैं।"

"अब कार को वापस करो तो आफत.... उन्हें संदेह नहीं होना चाहिए। उन्हें संदेह ना हो इसलिए पुलिस से मीट करते हैं।"

"सुधाकर..."

"डरो मत हिम्मत रखो.... आराम से ...बैठो... इस तरह पसीना-पसीना मत हो...! पहले अपने धूप के चश्मे को उतार...."

उसने उतारा।

"साधारण ढंग से रहो.. बैठो.."

"हां- हां" उसके सिर हिलाते समय ही - कार पुलिस के जीप के पास आ गई।

"पुलिस अधिकारी कोई प्रश्न पूछे तो तुम जवाब मत देना..... तुम मुंह खोलना ही मत... मैं ही बात कर लूंगा।"

"कार पुलिस के जीप के पास आई।

पुलिस के अधिकारियों ने हाथ देकर रोका। तेजी से चलकर कार के सामने आगे की तरफ से झुके।

"कहां से आ रहे हो ?"

"अमनंजीकरै से"

"आपका नाम" -पूछते हुए पीछे बैठे जोसेफ को देखते ही अधिकारियों के माथे पर आश्चर्य की लाइन पड़ी।

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Kaumudini Makwana

Kaumudini Makwana 7 महीना पहले