मृगतृष्णा तुम्हें देर से पहचाना - 5 Ranjana Jaiswal द्वारा उपन्यास प्रकरण में हिंदी पीडीएफ

मृगतृष्णा तुम्हें देर से पहचाना - 5

अध्याय पांच

गर्भ नाल का रिश्ता

मुझ पर डर हावी हो गया है बेटा | यह विचार कि तुम अपने पिता के पास हो कि तुम मेरी छत्र-छाया से दूर चले गए हो कि आज या कल तुम किसी हादसे का शिकार हो सकते हो | मैं रात-रात भर नहीं सो पाती हूँ और जब मेरी आँख लगती है तो मुझे सपने में तुम नजर आते हो, कभी बीमार कभी उदास | जब तुम मेरे पास थे तो मुझे यह सांत्वना थी कि कम से कम तुम तो मेरे पास हो, जिसे मैं सबसे ज्यादा प्यार करती हूँ किन्तु जबसे तुम दूर चले गए हो, मुझे प्रतीत होता है कि मैं ज्यादा दिन जी नहीं पाऊँगी | अब मुझे अपने आस-पास की चीजों और किसी की भी उपस्थिति से झल्लाहट होती है | मैं सोचती हूँ कि तुम्हारे सिवा मुझे किसी की जरूरत नहीं | जबसे तुम अलग हुए हो मैं मर -सी गयी हूँ | मुझे लगता है मैं अपनी जिंदगी से ज्यादा तुम्हें प्यार करती हूँ बाकी सारे संबंध निरर्थक हैं | 
ये कैसा भय है जो मुझे परेशान करता है | अक्सर सपने में मेरा दम घुटने लगता है जैसे मैं किसी सँकरी जगह फंस गयी हूँ | और भी कई ऊलजलूल बातें देखती हूँ जो नींद खुलने पर अक्सर याद नहीं रहतीं पर एक बात हमेशा याद रहती है कि उन सपनों में कोई न कोई बच्चा होता है | कभी स्वस्थ तो कभी बीमार, कभी हँसता तो कभी रोता | अक्सर साथ चलते हुए वह कहीं छूट जाता और ढूँढने पर भी नहीं मिलता | वह बच्चा जन्मजात से सात वर्ष की उम्र तक का होता है | सपने में मैं कभी उसे प्यार करती हूँ, कभी सीने से लगाती हूँ और उसके खो जाने पर रोती-तड़पती हूँ | अधिकतर तो उसे खोते और उसके लिए परेशान होकर ढूंढती अपनी आत्मा को देखती हूँ | सुबह तकिया आंसुओं से भीगा मिलता है, कभी हिचकियाँ बंधी होती हैं | इन सपनों का प्रभाव मेरे व्यक्तित्व पर पड़ना शुरू हो गया है | गुस्सा, तनाव, उलझन, आँसू इन सपनों की ही देन हैं | 
आज फिर सपने में मैं खूब रो रही थी | सपना टूटा तो पूरा चेहरा आंसुओं से भींगा था | क्यों आते हैं ऐसे सपने मुझे ? दिन भर की कठोरता क्या सोते ही कहीं खो जाती है?या यही माया है जो बर्बाद करती है या नियति मुझे खींचकर वापस उस कठोर धरती पर उतारना चाहती है ताकि मैं चीखूँ और वह अट्टहास लगाए | कितनी मुश्किल से संभाला है मैंने अपने –आप को ....!उफ, अपने अतीत की ओर झाँकते मैं काँप जाती हूँ .....क्या-क्या नहीं सहा ....कितने जख्म...कदम-कदम पर मिले ...मैंने सब कुछ सहा ...सहना ही पड़ा | थोड़ा संभली हूँ तो ये सपने !हर रात को लगता है मैं टूट रही हूँ | क्या सचमुच टूट रही हूँ मैं ?क्या इतनी कमजोर धातु से बनी हूँ मैं | मैंने तो सोचा था कि मर जाऊँगी पर टूटूँगी नहीं ...हारूंगी नहीं पर ये सपने .मुझे तोड़ना चाहते हैं ..मारना चाहते हैं | .क्या करूं मैं ?

क्या सच कहा था उसने कि मैं टूट जाऊँगी | औरत अपनी ममता से जरूर हार जाती है और इसीलिए उसने ये हथकंडा अपनाया | हथकंडा ....  उफ !इतना नीच हथकंडा .!..बच्चे को माँ से अलग कर देना | वह बच्चा जो सिर्फ मेरा था ...मेरे रक्त-मांस से बना ...मेरा सींचा पौधा ...जिसके लिए मैंने रातों की नींदें खोई थी ...अपना रक्त पिलाया था | वह थोड़ा बड़ा हो गया तो वह उसे मेरी अनुपस्थिति में पिता के अधिकार से उठा ले गया | उसका अधिकार ....!उसका अधिकार बस इतना था कि वह उसकी बलात्कार की उपज था | अब वह बच्चे के माध्यम से मुझे जीतना चाहता है  ....फिर तोड़ना चाहता है  ....फिर हमेशा के लिए मिटा देना चाहता है | कैसा है यह पुरूष !मैं लाख कठोर हूँ पर माँ हूँ, कैसे रहूँ बच्चे के बिना ?तो क्या ममता के लिए अपना अस्तित्व मिटा लूँ ?वह बच्चे के मन में मेरे खिलाफ जहर भी भर रहा है | वह बच्चे को हमेशा के लिए मुझसे अलग कर देगा | क्या करूं मैं ?

ईश्वर ने क्यों मेरे हृदय में ममता का जहर घोल दिया है ?क्या उसे भी स्त्री की दीनता पसंद है ?क्या वह भी नहीं चाहता कि स्त्री का सिर ऊंचा रहे ?शायद वह चाहता है कि वह हमेशा दबी रहे ....कभी समाज से ...कभी भावना से | फिर स्त्री को शक्ति क्यों कहते हैं ?क्या हृदय की कोमलतम भावना उसे शक्ति बनने देगी ?नहीं .कभी नहीं ..| 
आज मैं दोराहे पर खड़ी व्याकुल हूँ | एक तरफ बरबादी के रूप में मेरी ममता पुकार रही है दूसरी तरफ स्त्री का अस्तित्व अपनी पहचान के किए व्याकुल है | कोई सही राह दिखाने वाला नहीं | जब अपने भी स्वार्थ के बंधन में गलगला रहे हैं फिर किस पर विश्वास करें ?मैं समाज के सामने डट सकती हूँ  ...हजार तूफान सह सकती हूँ पर ममता के आगे कितनी कमजोर हूँ असहाय हूँ ...मेरा गीला तकिया चीख-चीखकर यह कह रहा है | 

उसने जो योजना बनाई वह सफल हो रही है ...उसने चाहा था कि मैं मर जाऊं ...मिट जाऊँ ताकि उसका  रास्ता साफ हो सके ...देखो वही हो रहा है पर क्या वह यह जान पाएगा ?नहीं, वह क्या कोई यह नहीं जान पाएगा | मेरी ऊपरी कठोरता के आवरण -तले सब छिपा है | मैंने अपने आंसुओं को सबसे छुपाया है ...उसकी यह हसरत कभी पूरी नहीं होगी कि मैं उसके पैर पकड़कर कहूँ-मुझे क्षमा कर दो ...मुझे मेरे बच्चे से मिला दो | 

मैंने कोई पाप नहीं किया है | लोग सोचते हैं मुझमें अवश्य कोई कमी होगी तभी तो पति से अलग हो गयी | कुछ तो दुश्चरित्र भी समझते होंगे पर क्या यह सच है ?.| ये सच है कि उसकी छाया तले रहने की मुझमें सामर्थ्य नहीं रही ...नहीं सह सकी मैं उसकी नाटकीयता ...पर उसने क्या किया ?सोचा है किसी ने  ...कितना दुख दिया है मुझे ?मुझे....जिसने क्या-क्या नहीं किया उसके लिए ?मुझे न घर मिला ...न अधिकार ...न कर्तव्य-निर्वाह का वक्त ही | एक तारा इस घनघोर अंधकार में मुझे आशान्वित कर रहा था ...उसे भी उसने ढँक लिया | क्यों आखिर क्यों ....क्यों इतना निर्मम है वह ! ...नए- नए हथकंडे अपनाता  है ...पर इस बार का हथकंडा...उफ!

कितनी अजीब बात है एक तरफ समय तेजी से भागा जा रहा है दूसरी तरफ समय काटे नहीं कटता| छुट्टी की चाह भी है और छुट्टी से दहशत भी | लंबी छुट्टियों से पहले ही दिल घबराने लगता है कि कैसे गुजरेंगी ये छुट्टियाँ, जबकि किसी न किसी तरह वे गुजर ही जाती हैं और फिर .….और ..और छुट्टी की चाहत होने लगती है | कैसा है ये अकेलापन, जो भरता ही नहीं ?भरे भी तो किससे ?एक भी तो ऐसा रिश्ता नहीं, जिस पर आँख बंद करके भरोसा कर सकूँ | जिसके भरोसे खुद को छोड़कर कुछ पल विश्राम कर सकूँ | क्या सबके साथ ऐसा होता है ?लगता तो नहीं ...सभी भरे-पूरे और निश्चिंत नजर आते हैं | मेरे भीतर का खालीपन अब बाहर दिखने लगा है | कितनी कोशिशें की इस खालीपन को भरने की पर शून्य के सिवा कुछ हाथ नहीं आया ...| अब तो किसी पर भी भरोसा नहीं कर पाती ...करूं भी तो कैसे ...?भरोसे के काबिल कोई मिले तो| 

तुम इसी शहर में कुछ ही दूरी पर रहता हो पर कितनी दूरी बनाकर रहते ही | मेरी कालोनी में लगभग रोज ही आते हो पर मेरे पास नहीं | एक बार शिकायत की तो मुंह बनाकर बोले –‘बस यहाँ आना ही एक काम है क्या ?बीबी है बच्चा है नौकरी है संगीत है | ट्यूशनें लेता हूँ और भी कई काम है | ’
यानि माँ के घर आना तुमें एक काम, वह भी गैरज़रूरी काम लगता है | तुम वही हो जिसके गर्भ में आने की खबर से मैं दुबारा जी उठी थी | जब मुझे बीमार हालत में तुम्हारे पिता मायके पटक गए थे | तब बार-बार आत्महत्या के ख्याल मन में आते थे | ऐसे में तुम्हारे होने की खबर ने संजीवनी -बूटी का काम किया था | दो-तीन महीने में ही मैं पूर्ण स्वस्थ हो गयी थी | तुम्हारी धड़कनों के साथ होने से मैंने पति के द्वारा दिए गए जहर को खुशी-खुशी पी लिया था | तुम मुझमें थे...यह एहसास कितना सुखद था .....मेरा अकेलापन दूर हो गया था | और आज वही तुम मुझसे मिलना गैर जरूरी काम समझते हो | तुम मेरे पास आकर जैसे मुझपर अहसान करते हो | 

कई बार मैंने कोशिश की कि तुम किराए के मकान की जगह मेरे घर आकर रहो पर तुम ‘पिता नहीं चाहते’ का बहाना बना देते हो| तुम्हारे पिता तो ये भी नहीं चाहते थे कि तुम गर्भ में आओ पर तुम आके थे न !
!अब तुम्हें इस बात को कौन समझाए ?यह सच है कि तुम्हारे पिता नहीं चाहते कि तुम मुझसे दुबारा जुड़ो [ इसीलिए तो अलग किए थे कि माँ-बेटे के बीच का जुड़ाव टूट जाए ]पर ये तो चाहते ही हैं कि मेरी संपत्ति तुम्हें मिले | तुम भी बीच –बीच में कोशिश करते रहते हो कि मुझसे मोटी रकम निकलवा सको | कभी गाड़ी खरीदने का बहाना बनाते हो, कभी जमीन, पर मैं जीते-जी अपना सब कुछ तुम्हें देकर तुम्हारी मुहताज नहीं बनना चाहती | वह भी उस अवस्था में, जबकि तुम अपने पिता के हाथों की कठपुतली हो और खुद अच्छा कमाते हो | मैं जानती हूँ कि तुम्हारे पिता का एक मात्र उद्देश्य मुझे बर्बाद देखना रहा है | तुम डायरेक्ट मुझसे धन नहीं मांगते, बहाने बनाते हो | तुम मेरे पास रहना नहीं चाहते, पर मेरे मरने के बाद बेटे का अधिकार जरूर चाहते हो| हालांकि हमेशा यही कहते हो कि मुझे आपसे कुछ नहीं चाहिए | मुझे आपकी संपत्ति की चाहत नहीं | तुम झूठ नहीं कहते कि संपत्ति के नाम पर मेरे पास है ही क्या ?एक छोटा-सा घर ही न !तुम इस बात को भी जानते हो कि मैंने अपनी वसीयत में तुम्हें ही वारिस बनाया है | बैंक में थोड़ा-बहुत जो है, वह रिटायरमेंट के बाद कुछ ही वर्षों में खत्म हो जाएगा | मैं भी क्या करूं जिंदगी भर संघर्ष करके अपनी प्राइवेट नौकरी से बस इतना ही जुटा पाई हूँ | करती भी क्या ?कोई दूसरा सहारा भी तो नहीं था | ..फिर अपनी इज्जत ...अपनी अस्मिता ...अपने स्वाभिमान के साथ आत्मनिर्भर होकर जीना एक स्त्री के लिए आसान भी तो नहीं होता | ईमानदारी...सच्चाई ....नैतिकता का बच्चों को पाठ पढ़ाने वाली शिक्षिका किसी गलत मार्ग का अनुसरण भी तो नहीं कर सकती | गलत मार्ग पर चलने के लिए जिस बेहयाई की जरूरत होती है, वह तो फितरत में कभी थी ही नहीं | व्यापारिक बुद्धि से मैं सदा शून्य ही रही | लाभ कमाने की कला मुझसे कोसों दूर रही है | मैं तो अपना हक छोड़कर आगे बढ़ती गयी थी फिर दूसरों का हक छीनने का ख्याल मन में कैसे ला पाती ?इस दृष्टि से मैं असफल स्त्री कही जा सकती हूँ | 
अक्सर मुझे यह ताना सुनने को मिल जाता है कि अभी तक भटक रही हूँ ...मुझे मंजिल नहीं मिली | लोगों की दृष्टि में मंजिल है –अपना घर-परिवार, नात-रिश्तेदार ....धन-दौलत ...गाड़ी-बंगला ....किसी भी प्रकार कमाया हुआ धन, बड़ा नाम ...पहचान ...सुरक्षा आदि | इस दृष्टि से सच ही मुझे मंजिल नहीं मिली ...पर मैंने तो इन तथाकथित मंजिलों को चाहा ही नहीं | मैंने तो इन मंजिलों को छोड़कर अपने लिए रास्ता चुना है ...निरंतर चलने वाला रास्ता ...ऐसा रास्ता जिसकी कोई मंजिल नहीं | जानती थी दुनियावी मंजिल मुझे शांति नहीं दे सकती ...सुकून नहीं दे सकती ...प्रेम नहीं दे सकती ...| 
प्रेम ....आह ! कितना लुभावना शब्द है | दुनिया के सारे बंधनों से मुक्त हूँ पर इस प्रेम के मोह से नहीं | आज भी इस मंजिल के लिए लालायित हूँ ...पर बस यही तो वह मंजिल है जो चाहने से नहीं मिलती ...मांगने से नहीं मिलती ...किस्मत से मिलती है ...और किस्मत !....हा हा ....मेरी हस्त रेखा में तो किस्मत की रेखा ही नहीं | 

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S Nagpal

S Nagpal 9 महीना पहले

Kitu

Kitu 9 महीना पहले

Sushma Singh

Sushma Singh 9 महीना पहले