परिवार, सुख का आकार (भाग 2) - बिखराव रिश्तों का Kamal Bhansali द्वारा मानवीय विज्ञान में हिंदी पीडीएफ

परिवार, सुख का आकार (भाग 2) - बिखराव रिश्तों का

परिवार, व्यक्तित्व निर्माण में एक अच्छी भूमिका निभा सकता है, इस तथ्य पर वैसे तो कोई शंका का कारण नजर नहीं आता फिर भी निवारण के लिए इतना कहना जरुरी है, कि संसार की महान से महान विभूतियों ने स्वीकार किया है, कि उनकी सफलता में परिवार का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

शालीनता का अगर कोई स्कूल है, तो मेरी नजर में परिवार ही है। परिवार आज भी है, पहले भी था और शायद आगे भी रहे, परन्तु क्या परिवार की गरिमा पहले जैसी है, यह चिंतन की बात है, इस पर हमे गंभीरता से विचार करना चाहिए। आखिर एक स्वच्छ और शालीन परिवार कैसे बनता है ? आइये, थोड़ी चेष्टा करते है, समझने की, शायद भविष्य, इसकी जरुरत समझे। पहले "परिवार", अपने इसी नाम से जाना जाता था, सयुंक्त परिवार (Joint Family), बाद में अविष्कार हुआ, अब छोटा परिवार का (Nuclear Family) अर्थ तंत्र की देन है, दोनों ही हमारी समझ और समय की देन है। परिवार शब्द की जब व्याख्या करे तो हमारे सामने दादा, दादी, माँ, बाप, भाई, बहन और भाभी के अलावा और भी रिश्तों का माहौल नजर आता है, जिन्होंने इस तरह के पुरे परिवार को कभी देखा, निश्चिन्त ही उन्होंने एक पूर्ण प्रेम भरे वातावरण का सुखद अनुभव किया होगा।

क्या सब परिवारों में शांति, प्रेम और भाईचारा रहना संभव था ? इस प्रश्न का उत्तर भी सहजता से दिया जा सकता है, जिस परिवार में अनुशासन और त्याग की भावना रहती है, वैसे परिवार प्राय: सुख का अहसास करते है, दुःख की आद्रता इन्हे कमजोर नहीं करती। हमारे हाल ही में हुए दिंवगत भूतपूर्व राष्ट्रपति और वैज्ञानिक A.P.J Abdul Kalam के अनुसार "अगर कोईं राष्ट्र को भ्रष्टाचार मुक्त रखकर सुंदर बुद्धिमान राष्ट्र बनाना है, तो परिवार के तीन सदस्यों की अहम् भूमिका का आदर करना होगा, वो है, माता पिता और शिक्षक"। किसी भी राष्ट्र की समृद्धि में परिवार की भूमिका को छोटा नहीं समझना चाहिए, क्योंकि परिवार बिना संस्कार और सेवा की भावना आना मुश्किल ही लगता है। देश को, समाज को, यहां तक की हर प्राणी को सेवा की जीवन के हर मोड़ पर जरुरत होती है, यह आप और हम अच्छी तरह जानते है।

भावनाओं के सन्दर्भ में परिवार काफी मजबूती प्रदान कर सकता है, अगर सदस्यों का आपसी तालमेल समझदारी पूर्ण हो, और एक दूसरे की कमियों को दूर करने में सहायक बने, तो निश्चित है, परिवार आर्थिक समृद्धि की नई ऊंचाइयां तो छुएगा, साथ में जीवन भी सही आनन्द प्राप्त करेगा। एक कहावत है, "एक अकेला चना, भांड नहीं फोड़ सकता", एकल परिवार के सीमित सदस्यों में एक प्रकार की घुटन अनुभव कई बार महसूस की जा सकती है, क्योंकि उनके पास जीवन का कमजोर अनुभव होता है।

आखिर पुराने परिवार को टूट कर बिखरने की नौबत क्यों हुई ? तो इस सन्दर्भ में सबसे प्रमुख कारण अति स्वतन्त्रता की चाह और नैतिकता का असन्तुलित होना है। नैतिकता बन्धन रखती है, और थोड़ा सा बन्धन भी आज असहाय लगता है। कुछ लोगो का चिंतन है कि "आर्थिक जरूरत की असीमित्ता और शिक्षा का प्रसार इसका कारण है"। मुझे लगता है, यह मन्तव्य पूर्ण सत्य नहीं है, अर्थ हर काल में प्रमुख रहा है, शिक्षा सदियों से पसन्द की जाती रही है, उसे जीवन का मार्गदर्शक माना गया है। कमी तो अपनी आस्था में ही नजर आ रही है, इसका कारण भी सुविधाकारी जिंदगी और उसके लिए असत्य का भरपूर प्रयोग, सच तो यही होना चाहिए कि परिवार सत्यता की धरती पर ही फलताफूलता है, वरना नाम मात्र का परिवार होता है।

आज के वातावरण में जो परिवार अपनी क्षमता का सही प्रयोग करता है, वो देश काल में अपनी साख लम्बे समय तक कायम रख सकते है। हमारे देश में भी बहुत से परिवार है, जिनका नाम आज भी शान से लिया जाता है। भारत जातिवादी का देश रहा है, आज भी यहां जाति का ख्याल वैवाहिक सम्बंधों के समय पूरा रखा जाता रहा था, इसका एक सही कारण यह है, कि धर्म, संस्कार के अनुरूप परिवार का वातावरण कायम रहे, हर सदस्य अपने आपको परिवार के वातावरण में सहज अनुभव करे। परन्तु अब यह ख्यालात बदल रहे है, नारी की भूमिका घरेलू कामकाज के प्रति कमजोर पड़ रही है। पहले नारी घर की आंतरिक व्यवस्था को सक्षमता प्रदान करती थी, पुरुष आर्थिक और सामाजिक सीमा का प्रहरी था। आज दोनों ही अर्थ की तलाश में भटक रहे है।

शिक्षा जिसमे पहले नैतिकता का समावेश ज्यादा होता था, आज उसने दिमाग को सिर्फ एक ही काम में लगा दिया, "अर्थ व नाम" की अधिकता कैसे प्राप्त की जा सकती है। निश्चिन्त है, व्यक्तित्व तो कमजोर होना ही था, मानसिक रोगों की बढ़ती गति ने जीवन को अस्वस्थकारी और एकांगी कर दिया। अभिमान को पहले शान कहते थे, जो उनकी विशेष आदतो के रुप में सिर्फ परिवार के भीतर पनपता, उसमे परिवार के हर सदस्य अपनी विशेषता मानता। जैसे कोई परिवार में कोई सदस्य किसी के बड़े बूढ़े के सामने तर्क नहीं करता, तो यह उस परिवार की शालीनता भरी शान समझी जाती। कोई समय था, परिवारों की इज्जत के अनुसार नाई विवाह के सम्बन्ध तय करा देते, एक नारियल का आदान प्रदान ही सम्बन्ध की पुष्टि करने के लिए पर्याप्त था। आखिर इतना विश्वास पहले कैसे था, जब इसका चिंतन करता है, तो गीता का यह श्लोक काफी कुछ स्पष्ट कर देता है।

नासतो विधते भावो नाभावो विधते सत:।
उभयोरपि दृष्टोSन्तस्त्वन्योस्तत्त्वदर्शिभिः ।।

श्लोक का सार, संक्षेप यही कहता है, सत्य कभी बदलता नहीं, असत्य ही बदलता रहता है, फिर भी मनुष्य असत्य को ही ज्यादा अपनाता है, वो उसकी ही अधीनता स्वीकार करता है, उसके अनुसार असत्य के बिना काम चल नहीं सकता। पहले हर घर में सुबह की शुरुआत धार्मिक चेतना के अनुसार ही होती थी, और हर सदस्य को बोध रहता था, कि उसके आचरण से परिवार की गरिमा को ठेस न पँहुचे। आज यह सब बातें असत्य ही लगती है, क्योंकि विश्वास की कमी धीरे धीरे दैनिक जीवन में अग्रसर हो रहीं है।

यथार्थ में यह आदमी के व्यक्तित्व की एक सबसे बड़ी कमजोरी, परिवार के साथ नहीं चलने से आती है।
ध्यान रहे, इस लेख का उद्धेश्य कतिपय नहीं है, कि पुरानी बातों का गुणगान किया जाय, हाँ यह जरुर प्रयास है, कि जीवन पुरानी अच्छी बातो का मूल्यांकन करता रहे,अपने व्यक्तित्व को प्रखर और उन्नतिमय करे, आखिर जीवन जीने के लिए हमें कुछ समय ही प्रदान किया गया है। जीवन अगर शिष्ट होकर, विशिष्ट बने, तो गलत क्या है ? आज सब कुछ पास होते हुए भी जब आदमी अपनी एक बचकानी हरकत से जीवन का जब गलत रुप समाज के सामने लाता है, तो दुःख का ही अनुभव होता है, कि भूल, समय से पहले सुधरी क्यों नहीं ? जीवन को करोना के घातक प्रभाव ने इतना तो संकेत दे दिया, "बिना चिंतन के विकास से , विनाश का प्रारम्भ भी हो सकता है"। लेखक: कमल भंसाली

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