भूलते-भागते क्षण Anand M Mishra द्वारा पत्रिका में हिंदी पीडीएफ

भूलते-भागते क्षण

अभिजीत बनर्जी को नोबेल पुरस्कार

14 अक्टूबर 2019 का दिन भारत के लिए एक अच्छी खबर लेकर आया। भारतीय मूल के अभिजीत बनर्जी को वर्ष 2019 के लिए अर्थशास्त्र के लिए विश्व का प्रतिष्ठित नोबेल पुरस्कार देने की घोषणा की गयी। वे कोलकाता में पैदा हुए और उन्होंने प्रेसिडेंसी कॉलेज से पढ़ाई की। अभिजीत बनर्जी ने जेएनयू से अर्थशास्त्र में मास्टर्स भी किया। फिलहाल वह अमेरिका की एमआइटी कैंब्रिज में हैं। खास बात यह है कि अभिजीत को यह पुरस्कार जिन तीन लोगों के साथ मिला है, उनमें एक उनकी पत्नी एस्थर डुफलो हैं और एक उनके सहकर्मी मिखाइल क्रेमेर भी हैं। अभिजीत बनर्जी को दुनिया में गरीबी हटाने के उपायों के लिए शोध पर नोबेल मिला है। यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। इसके पहले अर्थशास्त्र में नोबेल पुरस्कार अमर्त्य सेन को दिया गया था। बंगाल बुद्धिजीवियों की भूमि रही है। वहीँ से रवीन्द्रनाथ टैगोर, स्वामी विवेकानंद आदि अनेक महापुरुष निकले हैं। लेकिन कल भारतीय मीडिया में जो फोकस बन रहा था वह यह था कि उनकी पढाई चर्चित जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय से हुई है। जेएनयू पिछले कुछ सालों से काफी चर्चा में रहा है। वे हार्वर्ड यूनिवर्सिटी और प्रिंसटन यूनिवर्सिटी में भी शिक्षक रह चुके हैं। वे वर्तमान में मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के फोर्ड फाउंडेशन इंटरनेशनल में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर हैं। 2019 के आम चुनावों में कांगेस पार्टी की ‘न्याय योजना’ बनाने में उन्होंने काफी मदद की थी। ‘न्याय योजना’ में भारत में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले 20% परिवारों को हर महीने 6 हजार रूपये देने की बात कही गयी थी। जिससे की गरीबी दूर करने में मदद मिलती। मगर दुर्भाग्य से जनता ने ‘न्याय योजना’ को नकार दिया। हम यह भी कह सकते हैं कि कांग्रेस पार्टी जनता को ‘न्याय योजना’ समझा पाने में कामयाब नहीं हुई। नोबेल पुरस्कार देने वाली समिति ने ‘न्याय योजना’ को समझ लिया। नोबेल पुरस्कार जीतने के बाद अर्थशास्त्री अभिजीत बनर्जी ने कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था डगमगाती स्थिति में है। उन्होंने कहा कि इस समय उपलब्ध आंकड़ें यह भरोसा नहीं जगाते हैं कि देश की अर्थव्यवस्था जल्द पटरी पर आ सकती है। उन्होंने कहा, 'भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति डगमगाती हुई है। उन्होंने इस बात पर खुशी जताई कि दुनिया के सबसे गरीब लोगों पर फोकस काम के लिए उन्हें सम्मान मिला है। यह उन सभी लोगों के लिए सम्मान है, जो जमीन पर गरीबी मिटाने के लिए काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह पुरस्कार दर्शाता है कि हम अक्सर कल्याण के लिए सिर्फ बातें करते हैं, लेकिन ऐसे पुरस्कार के लिए यह हमेशा मायने नहीं रखता। अभिजीत बनर्जी ने प्रथम और सेवा मंदिर नाम के दो एनजीओ की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि इन संगठनों ने जमीनी स्तर पर काम किया और उन्होंने इनसे काफी कुछ सीखा है। वह अपनी निजी अनुभव से कह सकते हैं कि ये संगठन हमारे लिए काफी अहम हैं। पुरस्कार मिलने के बाद तो उन्हें बधाई देने वालों की लाइन लग गयी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर कहा कि “अभिजीत बनर्जी को अल्फ्रेड नोबेल की स्मृति में अर्थव्यवस्था के लिए 2019 का स्वेरिजेस रिक्सबैंक पुरस्कार प्राप्त करने के लिए ढेरों बधाई। गरीबी उन्मूलन के लिए अभिजीत ने उल्लेखनीय योगदान दिया है। देश को अभिजीत पर गर्व है।” कांगेस के पूर्व अध्यक्ष ने ट्वीट कर कहा कि “अभिजीत को नोबेल जीतने के लिए बधाई। गरीबी मिटाने और भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने वाली न्याय योजना में अभिजीत ने अहम भूमिका निभाई। हालांकि अब हमारे पास मोदीनॉमिक्स है जो अर्थव्यवस्था को चौपट कर रही और गरीबी को बढ़ा रही।” स्वराज इंडिया पार्टी के प्रसिद्द नेता श्री योगेन्द्र यादव ने तो उन्हें जेएनयू में अपना बैचमेट बताया। वे मोदी की नोटबंदी के विरोधी हैं। जो भी हो यह हम भारतीयों के लिए बेहद ख़ुशी का पल है। इस वक्त ‘गरीबों के लिए’ उनकी शोध पर हम केवल सकारात्मक सोचें तथा एक भारतीय होने के नाते ‘गरीबों के अर्थशास्त्र’ पर खुशियाँ मनाएं तथा बांटे।

कलियुग में ईमानदारी

अच्छी ख़बरों के लिए आँखें अब तरस जाती हैं। आए दिन हत्या, लूटमार, आगजनी आदि की खबरों से समाचार-पत्र प्रायः भरे रहते हैं। एक रूपये के गायब होने से भी मन में इतनी पीड़ा होती है कि सप्ताह भर तक मन खिन्न रहता है। बहुत से लोग तो दिन-दहाड़े डकैती भी कर लेते हैं। अपने रसूख तथा रुतबे का इस्तेमाल कर गरीब, असहाय आदि को सताने में लोगों को मजा मिलता है। ऐसे में एक ऐसी खबर जानने को मिली तो मन में सुकून मिला। सातारा, महाराष्ट्र के एक 54 वर्षीय मजदूर धनाजी जगदाले को बस स्टैंड पर 40,000 रुपए पड़े मिले और उनकी ईमानदारी जीवित रही। मालिक को खोजकर उनको रकम दी। इनाम में 1,000 रुपए की पेशकश से धनाजी ने सिर्फ सात रूपये लिए, कारण यह थी कि उनके पास गाँव जाने का किराया केवल तीन रूपये ही थे। और तो और यह खवर पढ़कर एक प्रवासी भारतीय ने पांच लाख रूपये देने चाहे तो उन्होंने नम्रतापूर्वक मना कर दिया। उन्होंने कहा कि लोग केवल ईमानदारी से रहें। ऐसा उन्होंने इसीलिए कहा होगा क्योंकि, एक मेहनती व्यक्ति जानता है- दर्द मेहनत की एक पाई के गुम होने का, जिसके पैसे गुम हुए है, उसके घर में मचे शांत कोहराम का दर्द वे जानते है, मेहनत की कमाई गुम होने का मतलब, वे , जानता है। ऐसे लोगों को वास्तव में नमन करने का मन करता है। उनके ईमान और ईमानदारी के जज्बें को जितना अधिक फैलाया जाए – उतना अधिक अच्छा है। यह घटना हमें बताती है कि मेहनती व्यक्ति कभी बेईमान नही होते। इन्ही जैसों की वजह से मानवता जीवित है। आज के दौर में ऐसी ईमानदारी की उम्मीद कहां होती है? ये बेमिसाल हैं । सलाम है इन्हें। इनसे सभी को सीख लेने की ज़रूरत है। ईमानदारी, जिम्मेदारी, समझदारी, बहादुरी तथा भागीदारी ये सभी गुण जिसके पास है - वही जीवन में ख़ास प्रणेता होते हैं। आत्मविजयी ही विश्वविजेता होते हैं। इस ईमानदारी के कृत्य के लिए उनको कोटिशः धन्यवाद है। निश्चित रूप से यह मनुष्य करोड़ों आमजनों में हटकर तथा बढ़कर है। ईमानदारी इन्सान की सकारात्मक मानसिकता है, जिसके कारण वह अपने कर्तव्य पूर्ण निष्ठा व सच्चाई से निभाता है। इसलिए ईमानदार इन्सान सभी को पसंद होते हैं। बेईमान इन्सान भी ईमानदार इन्सान पर विश्वास रखते हुए उससे सम्बन्ध रखना पसंद करते हैं। इसके लिए प्रेमचंद की कहानी ‘नमक के दारोगा’ की याद आती है। पंडित अलोपिदीन बेईमान होते हुए भी दारोगा बंशीधर के ईमानदारी के कायल हैं। कहानी के पात्र मुंशी बंशीधर की नौकरी जाने पर पुनः उन्हें अपने फर्म में ऊँची तनख्वाह पर नौकरी की पेशकश करते हैं। कभी-कभी निरपराध तथा बेकसूर भी अपनी ईमानदारी को साबित नहीं कर पाते हैं। जीवन में ईमानदारी सफलता एवं सम्मान का प्रमाण पत्र है तथा बुरे समय में यदि परिवार भी सहायता करने से मना कर देता है तो ईमानदार इन्सान को समाज से सहयोग अवश्य प्राप्त होता है। यही ईमानदारी का पुरस्कार होता है। इसीलिए बड़े-बूढ़े बोलकर गए हैं कि ईमानदारी सर्वोत्तम नीति है। अंत में ईश्वर से प्रार्थना है कि धनाजी जगदाले को दीर्घायु बनायें।

श्रीकृष्ण और जरासंध

क्रोध के आक्रमण से स्वास्थ्य और कार्यकुशलता की समाप्ति तीन महीने के भीतर हो सकती है. इस बात के लिए इतिहास की एक घटना को देखते हैं और समझने का प्रयास करते हैं.

एक बार भगवान श्रीकृष्ण जो कि एक कुशल रणनीतिकार थे जरासंध को मारने के लिए निकल पड़े . लेकिन जब भी जरासंध श्रीकृष्ण से लड़ने के लिए अपने शहर से बाहर निकलता तो वे युद्ध के मैदान से भाग जाते. तो क्या श्रीकृष्ण जरासंध से डरते थे ? हर्गिज नहीं. लेकिन श्रीकृष्ण जरासंध का वध करने का उपयुक्त साधन खोजना चाहते थे. श्र कृष्ण की एक रणनीति थी. जब भी श्रीकृष्ण जरासंध को चुनौती देने जाते , वे क्रोधित हो जाते. वह श्रीकृष्ण का पीछा करने के लिए निकलता. श्रीकृष्ण पीछे हटते चले जाते. इन रणनीति को कई बार दोहराकर, जरासंध को निरर्थक उसकी सीमा में ही उसकी अपनी ताकत खर्च करने के लिए बनाया गया था. एक आदमी की ताकत उसके गुस्से से काफी कम हो जाती है. एक व्यक्ति का जीवन-काल ईर्ष्या, क्रोध और घृणा की कैंची से कट जाता है. ईर्ष्या एक आदमी के जीवन को छोटा करने का मुख्य कारण है; जब मनुष्य क्रोध करता है, तो उसका पूरा शरीर कांपने लगता है. उसका खून गर्म हो जाता है. रक्त को फिर से ठंडा होने में तीन महीने लगते हैं. क्रोध का एक क्षण खाने के छह महीने से प्राप्त ऊर्जा का उपभोग कर सकता है. यह तरीका एक व्यक्ति को गुस्सा दिलाता है. इस तरह जरासंध को व्यवस्थित रूप से कमजोर करके ,श्रीकृष्ण ने उसे नौ बार क्रोधित किया; सही समय अआने के बाद लगभग पकड़ा और उसे खत्म करके ही दम लिया. इतने दिनों से जरासंध बच रहा था लेकिन वह श्रीकृष्ण की रणनीति को नहीं समझ सका. अपने गुस्से के कारण वह इतना कमजोर हो गया था कि मुकाबले में कमजोर हो गया और अंतिम बार में उसे आसानी से काबू में पाया गया. ध्यान रहे कि जरासंध से श्रीकृष्ण स्वयं नहीं भिड़े थे. लड़ने के लिए महाबली भीम को लगाया था. भीम और जरासंध के पास अथाह शक्ति थी. सीधे मुकाबले में श्रीकृष्ण जरासंध को हरा नहीं सकते थे. इसीलिए भीम को तैयार किया और जरासंध रूपी दुश्मन को समाप्त किया. यही रणनीति बहुत जगह प्रबंधन भी अपने कर्मचारियों के साथ अपनाता है. कर्मचारियों को गुस्सा दिलाकर या असावधान कर अपना हिसाब पूरा करता है. कर्मचारी गुस्सा करेगा और गलती होगी उसी वक्त प्रबंधन उसे दबोच लेगा. लेकिन अभी वक्त क्रोध के दुष्परिणाम को देखने का है. क्रोध के कारण जरासंध अपने ताकत को कम कर बैठा.

जब हम मतभेदों पर ध्यान देते हैं, तो घृणा, क्रोध, द्वेष और ईर्ष्या के ऐंठन हम सब पर हावी हो जाते हैं. क्रोध मस्तिष्क को रक्त पहुंचाता है; तापमान बढ़ जाता है; रक्त में परिवर्तन की संरचना; टॉक्सिन्स इसमें इतनी मात्रा में प्रवेश करते हैं कि यह नसों को घायल कर देता है और हमसब को समय से पहले ही आपको बूढ़ा बना देता है.

हमलोग बहुत शौकीन नस्ल के गुस्से और उसके नापाक उच्छ्वास से जुड़े हुए हैं. इसे यदि त्यागें तो हमेशा के लिए युवा हो सकते हैं! हमेशा हम आनंदित रहेंगे और आत्मा के पास उम्र का ख्याल कभी आएगा भी नहीं. लेकिन यह क्रोध त्यागना इतना आसान नहीं है. जितनी आसानी से मैं लिख रहा हूँ. बहुत ही कठिन साधना है क्रोध को त्यागने की.

जब हमारी बदनामी हो, तब भी हमें संतुलन नहीं खोना चाहिए। अपशब्दों और लांछन वाली बातों को सामने रखें. क्रोध, साधना (आध्यात्मिक साधना ) का प्रमुख शत्रु है , जैसा कि विश्वामित्र ने बताया है. क्रोध, गर्व, घृणा, ईर्ष्या की ज्वाला अन्य आग की तुलना में अधिक विनाशकारी हैं; वे मन में चुपके से और विचारों में उठते रहते हैं; वे कभी भी अधिक से अधिक मांग कर लेते हैं. उस मांग को पूरा करने के लिए जब हमलोग लम्बी छलांग लगाते हैं, तो आग से घिर जाते हैं; तब इन भयानक लपटों से कैसे निकलना है हमें पता नहीं चलता है. ये भयानक लपटें भी हमारे भीतर ही हैं. इन भयानक लपटों को कैसे बाहर किया जाए? वैसे, सनातन धर्म (प्राचीन आध्यात्मिक संहिता) में कुछ अग्निरोधक हैं जिन्हें अनुभव द्वारा परीक्षण किया गया है और ऋषियों द्वारा इसकी गारंटी दी गई है। वे सत्य , धर्म, शांति ( और प्रेम हैं. इन अग्निरोधक के साथ हम अपने दिल को संतृप्त करें और जीवन को सफल बना सकते हैं. ये अग्निरोधक भी हमारे पास ईश्वर ने ही दिए हैं. इनका उपयोग भी कठिन नहीं है. लेकिन इसको चलाने के प्रशिक्षण हेतु कठिन साधना करनी पड़ती है. संसार में रहकर इन अग्निरोधक का प्रयोग करना बहुत ही दुरूह कार्य है.

गंगापुत्र स्वामी सानंद

अभी तमिलनाडु के महाबलीपुरम में दुनिया के दो महारथी मिले। एक महाबली जो कि हमारे अतिथि थे न केवल मिले बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत की झलक भी उन्होंने देखी। हमारे प्रधानमंत्री ने वहां समुद्री किनारे पर कचरे को साफ़ कर सफाई का सन्देश वहां की जनता तथा पर्यटक को दिया। हम जहाँ भी जाएं वहां कम से कम गंदगी न फैलाएं। मीडिया में इस मुलाकात का इतना शोर था कि पिछले साल एक मनुष्य को बचाने के लिए एक महामानव ने अपना सब कुछ दधीची ऋषि की तरह त्याग दिया। लेकिन उस महामानव को याद करने वाला आज कोई नहीं था। सृष्टि के लिए सोचनेवाला आज के समय में किसी काम का नहीं रहता है। ईश्वर ने धरती पर सृष्टि की रचना सब के लिए की थी और उनमें सभी की भागीदारी सुनिश्चित की थी। लेकिन उसमें मानव कुछ ज्यादा ही लालची निकल गया। धरती का कुछ ज्यादा ही इस्तेमाल मनुष्य करने लगा। अपने विनाश का मार्ग प्रशस्त करने लगा। ऐसे समय में कुछ लोग अवतरित इस हरी-भरी वसुंधरा को बचाने के लिए होते हैं। उनकी छाप धरती पर रह जाती है। लोग उनको उनके कार्यों से याद करते हैं। ऐसे लोग ही ईश्वर तुल्य हो जाते हैं। ऐसे ही महान व्यक्तित्व प्रो जी डी अग्रवाल (गुरु दास अग्रवाल) जी थे। जो बाद में स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद जी उर्फ़ गंगापुत्र के नाम से प्रसिद्ध हुए। पावन सुरसरि गंगा की रक्षा के लिए उन्होंने अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया। स्वामी बनने से पूर्व वे भारतीय प्रोद्योगिकी संस्थान कानपुर में प्राध्यापक का कार्य कर चुके थे। साथ ही वे अन्य पदों पर भी सुशोभित रहे – जिनमे राष्ट्रीय नदी संरक्षण निदेशालय के पूर्व सलाहकार, केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के प्रथम सचिव, चित्रकूट स्थित ग्रामोदय विश्वविद्यालय में अध्यापन और पानी-पर्यावरण इंजीनियरिंग के नामी सलाहकार के रूप में प्रमुख है। वास्तविक पहचान गंगा के लिए अपने प्राणों को दांव पर लगा देने वाले सन्यासी की रही। हमलोग गंगापुत्र स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद को ज्ञान, विज्ञान और संकल्प के एक संगम की तरह जानते हैं। वे हमारे देश के प्रसिद्ध पर्यावरणप्रेमी थे। उनका पूरा जीवन नदियों के संरक्षण को लेकर ही समर्पित रहा और भागीरथी की रक्षा के लिए ही उन्होंने पिछले वर्ष 11 अक्टूबर को अनशन के 112वे दिन ऋषिकेश में प्राण त्याग दिए थे। उन्होंने अपने इस पार्थिव शरीर के दान की बात की थी- उसके श्राद्ध करने के लिए मना किया था। लेकिन गंगा पुत्र (स्वामी सानंद) के निधन के एक वर्ष बाद भी कुछ नहीं बदला है। सरकार ने उनकी मांगों को अभी तक नहीं माना है। नदियों का प्राकृतिक प्रवाह निर्धारित नहीं किया गया। स्वामीजी जानते थे कि आज के समय में पर्यावरण के नाम पर कोई वोट नहीं देगा। वोट नहर के नाम पर मिलता है। उनके अनुसार विकास का नाम आजकल सुविधा हो गया है। उनकी कोशिश रही कि किसी प्रकार गंगा-संरक्षण के मुद्दा बने। वे एक इंजीनियर थे। मगर सरकार ने उनकी बातों की व्यावहारिकता या अव्यवहारिकता पर ध्यान ही नहीं दिया। अब हमें यह देखना है कि उन्होंने गंगा की रक्षा के लिए जो अपना सर्वस्व बलिदान दिया वह व्यर्थ न जाए। लौ जलती रहे- यह ध्यान रखना ही हमारा दायित्व है। इस भीड़ भरी दुनिया में सभी अपने में व्यस्त तथा मस्त हैं। सरकार पस्त है। व्यवस्था अस्त-व्यस्त है। ऐसे में उनके बलिदान को व्यर्थ नहीं जाना चाहिए। शासन-तंत्र जगे, लोग जगे, सभी उठे तथा केवल माँ गंगा ही क्यों – देश की सभी नदियों को बचाने के लिए प्रयास होना चाहिए। कितने लोग गंगा के नाम पर बन गए, वोट लेकर कहाँ से कहाँ पहुँच गए। आज गंगा बह रही है – मगर दुखी है। प्रवाह है – थका हुआ है। शायद ही अब कोई स्वामी सानंद जैसा कोई भगीरथ अब आए तथा अपना सर्वोत्तम त्याग कर ज़माने को दिखाए। ऐसी विभूति को शत-शत नमन।

गुरु गोविन्द सिंह – विलक्षण प्रतिभा

बिहार की धरती पर कई महापुरुष पैदा हुए हैं – जिनमे गुरु गोविन्द सिंह जी का नाम काफी श्रद्धा के साथ लिया जाता है। उनके बचपन का नाम गोविन्द राय था। पटना में जिस घर में उनका जन्म हुआ था और जिसमें उन्होने अपने प्रथम चार वर्ष बिताये थे, वहीं पर अब तख़्त पटना साहिब स्थित है। उन्होंने खालसा पंथ की स्थापना बैसाखी के दिन की जो सिखों के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण दिन माना जाता है। खालसा का अर्थ शुद्ध होता है। सिख समुदाय के एक सभा में उन्होंने सबके सामने पुछा – "कौन अपने सर का बलिदान देना चाहता है"? उस वक्त भारत के लगभग हर कोने से एक – एक स्वयंसेवकों ने अपनी हामी भरी और गुरूजी ने उन पाँचों स्वयंसेवकों को ‘पंज-प्यारे’ कहा। उन्होंने पांच ककारों का महत्व खालसा के लिए समझाया और हमेशा धारण करने के लिए कहा। ये पांच ककार हैं – केश, कंघा, कड़ा, किरपान, कच्चेरा। वे सिखों के दसवें गुरु हैं। उनके बाद कोई और दूसरा गुरु सिख के इतिहास में नहीं हुआ। उन्होंने गुरु ग्रन्थ साहिब को सर्वोच्च माना तथा गुरु रूप में स्थापित किया। बिचित्र नाटक को उनकी आत्मकथा माना जाता है। यही उनके जीवन के विषय में जानकारी का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत है। यह दसम ग्रन्थ का एक भाग है। दसम ग्रन्थ, गुरू गोबिन्द सिंह की कृतियों के संकलन का नाम है। इतिहास में उनका व्यक्तित्व विलक्षण है। वे एक महान कर्मप्रणेता तथा अद्वितीय धर्मरक्षक थे। उन्होने मुगलों या उनके सहयोगियों (जैसे, शिवालिक पहाडियों के राजा) के साथ 14 युद्ध लड़े। धर्म के लिए समस्त परिवार का बलिदान उन्होंने किया, जिसके लिए उन्हें 'सरबंसदानी' भी कहा जाता है। इसके अतिरिक्त जनसाधारण में वे कलगीधर, दशमेश, बाजांवाले आदि कई नाम, उपनाम व उपाधियों से भी जाने जाते हैं। वे वीर रस के कवि भी थे। योद्धा का गुण तो था ही। बहुमुखी प्रतिभा के धनी वे आजीवन हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए लड़ते रहे। उनका संकल्प दृढ था। एक बार जो संकल्प कर लिया – सो कर लिया। इसीलिए स्वामी विवेकानंद जी ने भी अपने देशवासियों से उनसे त्याग और बलिदान सीखने के लिए कहा है। आजकल के अधिकांश संत सब तो केवल दिखावे के लिए त्याग और बलिदान की बातें करते हैं। बात कहने से तो कडवी लगेगी मगर सच्चाई यही है कि आजकल के संतों में तो त्याग और बलिदान की बात रही ही नहीं। उनकी विलासिता की बात देखकर स्वर्ग के देवता भी शरमा जायें। केवल अपने भक्तों को त्याग और बलिदान की शिक्षा देने का कार्य आजकल के अधिकांश त्यागी संत – महात्मा करते हैं। हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए उन्होंने जो किया है वह इतिहास में एक मिसाल है। अपने पूरे परिवार सहित बलिदान देना कोई हंसी-मजाक का खले नहीं है। एक सप्ताह तक उनके परिवार से बलिदान चलते रहा। उनके पुत्रों को दुश्मनों ने दीवाल में चुनवा दिया मगर वे टस से मस नहीं हुए। वे विद्वानों के संरक्षक थे। उनके दरबार में अनेक कवियों तथा लेखकों की उपस्थिति बनी रहती थी, इसीलिए उन्हें 'संत सिपाही' भी कहा जाता था। वे भक्ति तथा शक्ति के अद्वितीय संगम थे। उनके बारे में जितना कहा जाए – उतना कम है। उनके जन्मदिन के अवसर पर उन्हें सादर नमन।

गोस्वामी तुलसीदास – 07 अगस्त जयंती

भारत भूमि देव भूमि है। यहाँ पर जन्म लेने के लिए देवता भी तरसते हैं। यहाँ की मिटटी बहुत ही पवित्र है। दुनिया में सारी संस्कृति मिट गयी लेकिन हमारी संस्कृति बनी रही। जब – जब इस धरती पर धर्म का पतन होने लगा, स्वयं भगवान ने विभिन्न रूपों में अवतार लेकर धर्म की रक्षा की। इस कारण से ही हमारा देश पुण्य क्षेत्र बन जाता है। ऐसे ही आज से लगभग 6 सौ साल पहले धर्म की हानि होने लगी। लोग कर्म कांड में व्यस्त होने लगे। दिखावा समाज में बढ़ने लगा। इस स्थिति से लोगों को निकालने के लिए गोस्वामी तुलसीदास जा प्रादुर्भाव हुआ। उन्होंने तत्कालीन भारतीय समाज की परिस्थिति को भली भांति समझा तथा अपनी कविताओं से भारतीय जनमानस को एक नयी राह दिखाने का प्रयास किया। केवल प्रयास कहना भी सही नहीं होगा – धर्म की नाव जो ड़ूब रही थी – इन्होने बचा लिया। रामचरितमानस को घर – घर में पहुंचा दिया। बाल्मीकि ने रामायण की रचना संस्कृत में की थी। संस्कृत सभी के समझ में आनेवाली भाषा नहीं थी। केवल विशिष्ट वर्ग ही पढ़ पाते थे। इन्होने राम के चरित को सरल एवं आम बोलचाल के शब्दों में पिरोकर हर घर में फैला दिया। मानस में सभी क्षेत्रों जैसे – धर्म, कर्म, राजनीति, परिवार, समाज, शासन इत्यादि सभी के बारे में विस्तार से बताया गया है। मानस पढने से पता चलता है कि भारतीय समाज का वह दर्पण है। बिना मानस के समाज चल नहीं सकता है। जो बात उन्होंने उस वक्त बताई है वह आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। ईश्वर को प्राप्त करने के लिए चार प्रकार के योग मनीषियों ने बताए हैं – ज्ञान, राज, कर्म तथा भक्ति। इनमे से भक्तियोग ही गोस्वामी तुलसीदासजी का प्रधान मार्ग है। उसमे भी ये श्रीराम के अनन्य उपासक हैं। श्र राम भक्ति-साधना का कोई एक मार्ग निश्चित नहीं है। तुलसीबाबा ने अनेक साधन गिनाए हैं। जिसमें भक्ति योग का ज्ञान शबरी को नवधा भक्ति के रूप में दिया है। उस नवधा भक्ति को प्रधान मान लेने में कोई हर्ज नहीं है। उन्होंने उत्तर काण्ड में काग भुशुण्डि प्रसंग में अन्य साधनों का भी उल्लेख किया है। वे साधन हैं - श्रद्धा, ज्ञान, मति, इंद्रीय, संयम और निष्ठा। भक्ति के 9 अंगों का वर्णन बाबा करते हैं – श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वंदन, दास्य, सख्य और आत्म निवेदन। किसी एक अंग को लेकर चलने से भी ईश्वर की प्राप्ति हो सकती है। भक्त के भी चार प्रकार उन्होंने बताए - आर्त, जिज्ञासु, अथार्थी और ज्ञानी। उनके समय में देश में भक्ति काल चल रहा था। सूरदास जैसे संतकवि भी उनके समकालीन हैं। मगर बाबा ने केवल श्रीराम की ही भक्ति की। हाँ, श्रीहनुमानजी को वे नहीं भूले। हनुमानचालीसा की रचना उन्होंने ही की है। आज जब हनुमानचालीसा का पाठ होता है तो उनके चातुर्य का बोध होता है। उन्होंने कितनी चतुराई से हनुमानजी की प्रशंसा की है – यह हनुमानचालीसा पढने से पता चलता है। हर 4-5 पंक्ति के बाद उन्हें श्रीराम की चर्चा करनी ही पड़ती है। उन्होंने दासभाव से उनकी पूजा की है। आज के सन्दर्भ में भी हम चर्चा करें तो संस्कृति रूपी सीता का हरण हो गया है। सूर्पनखा बाजार में फैली हुई है – जिससे की समाज को बचने की जरूरत है। श्रीराम जैसे धीर, वीर, गंभीर लोगों को कैकेयी जैसी माता निर्वासित करने के लिए व्याकुल है। लक्ष्मण – भरत जैसा भाई मिल ही नहीं रहा है। अभी अपने देश के चारों तरफ लंका ही लंका है। रावण की कमी नहीं है। इस प्रकार की स्थिति में बाबा तुलसीदासजी की तरह फिर से कोई आकर हमारी संस्कृति को बचाने की कोशिश करेंगे – ऐसा ही लगता है।

जयप्रकाश नारायण ( जयंती 11 अक्टूबर)

जयप्रकाश नारायण ने आजादी के बाद देश के सबसे बड़े आंदोलन का नेतृत्व किया था। यदि अपने देश में कच्छ से कामरूप तथा कश्मीर से कन्याकुमारी तक महात्मा गांधी के बाद किसी का नाम आता है तो निश्चित रूप से लोकनायक जयप्रकाश नारायण का नाम आता है। स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी करने वाले, सर्वहारा के हक के लिए जोरदार ढंग से आवाज उठाने वाले, इंदिरा गांधी की सत्ता को हिलाने वाले, आजादी के बाद सामाजिक समानता के सबसे बड़े पैरोकार जयप्रकाश नारायण थे। वे निश्छल, निष्कपट और गरीबों के लिए निरंतर चिंता करने वाले तथा भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष करने वाले व्यक्ति थे। कांग्रेस के अभिमान को इन्होने तोडा था। आज विभिन्न दलों में बड़े नेता उनके ही तैयार किये लोग हैं। उनमें मार्क्सवादी, गांधीवादी तथा सहिष्णुता आदि सभी गुण थे। आज स्कूल, कालेज प्रायः किसी स्थानीय जननायक की प्रेरणा से शिक्षा के प्रचार-प्रसार के नाम पर व्यापार और चुनाव जीतने की जमीन तैयार करने के उद्देश्य से खोले जा रहे हैं, जिनका कार्य छात्रों, शिक्षकों और सरकारी अनुदानों का दोहन करना है। उन्होंने सम्पूर्ण क्रांति का नारा भारतीय समाज को दिया। आज भारतीय राजनीति के गलियारे में यह नारा या विचार कहीं गुम हो गया है।उनके विचार सम्पूर्ण व्यवस्था को बदलने की थी। लोकनायक के अनुसार सम्पूर्ण क्रांति में सात क्रांतियाँ समाहित हैं – राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक, बौद्धिक तथा आध्यात्मिक। "भ्रष्टाचार मिटाना, बेरोजगारी दूर करना, शिक्षा में क्रांति लाना, आदि ऐसी चीजें हैं जो आज की व्यवस्था से पूरी नहीं हो सकतीं; क्योंकि वे इस व्यवस्था की ही उपज हैं। वे तभी पूरी हो सकती हैं जब सम्पूर्ण व्यवस्था बदल दी जाए और सम्पूर्ण व्यवस्था के परिवर्तन के लिए क्रान्ति, ’सम्पूर्ण क्रान्ति’ आवश्यक है। उन विचारों को लेकर उन्होंने कई नेताओं को तैयार किया जिनमे लालमुनि चौबे, लालू प्रसाद, नीतीश कुमार, रामविलास पासवान या फिर सुशील मोदी, रविशंकर प्रसाद आदि प्रमुख हैं। हम कह सकते हैं कि उनके उत्तराधिकारी अभी तक सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन को मुकाम तक नहीं पहुंचा सके। सम्पूर्ण क्रान्ति का आह्वान उन्होंने श्रीमती इंदिरा गांधी की सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए किया था। बिहार से उठी सम्पूर्ण क्रांति की चिंगारी देश के कोने-कोने में आग बनकर भड़क उठी थी। जे॰ पी॰ के नाम से मशहूर जयप्रकाश नारायण घर-घर में क्रांति का पर्याय बन चुके थे। जब कांगेस पहली बार सत्ता से बेदखल हुई थी तो राष्ट्रकवि दिनकर जी ने लिखा था-

सदियों की ठंढी-बुझी राख सुगबुगा उठी, मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो, सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

उनके व्यक्त्तित्व से प्रभावित होकर उनके सम्मान में दिनकर जी की यह पंक्ति काफी प्रेरणादायक है:-

अब 'जयप्रकाश' है नाम देश की, आतुर, हठी जवानी का।

कहते हैं उसको 'जयप्रकाश' जो नहीं मरण से डरता है,

ज्वाला को बुझते देख, कुण्ड में, स्वयं कूद जो पड़ता है।

उन्हें भारत रत्न, रमन मेगसेसे पुरस्कार, राष्ट्रभूषण सम्मान आदि अनेक पुरस्कार मिले। उनके प्रयासों से चम्बल के बहुत से डाकुओं जे आत्मसमर्पण किया था। यह घटना ऐतिहासिक थी। विदेश में शिक्षा प्राप्त की मगर उन्हें अभिमान नहीं था। पद तथा धनलिप्सा उन्हें नहीं थी। जनता पार्टी के अंतर्कलह से वे दुखी रहने लगे थे। अंत में राजनीति के इस योद्धा अथवा महात्मा ने 8 अक्टूबर 1979 को अपने इस लौकिक शरीर का त्याग कर दिया। उनकी सम्पूर्ण क्रांति अभी तक सफल नहीं हुई है। उन्होंने जो सपना देखा था, वह पूरा नहीं हो सका है। इसमें अभी थोड़ा वक्त लगेगा।

स्मृतिशेष - टी एन शेषन

इस धरा में लोग जाने के बाद ही याद आते हैं। जब तक वो इस धरा रूपी रंगमंच पर रहते हैं – लोग उनके अच्छे गुणों को विस्मृत कर देते हैं। लोग आते-जाते हैं, मगर थोड़े लोग ही अपनी पहचान बना पाते हैं। ऐसे ही थोड़े लोगों में यदि पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त टीएन शेषन का नाम लिया जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान अपने कार्यों से यह सिद्ध कर दिया की यदि इरादे नेक हों और मजबूत इच्छाशक्ति हो तो कोई नहीं हिला सकता है। अपने बेलाग बोलने के लिए वे प्रसिद्ध थे। चुनौतियों को स्वीकार करना उनकी आदत थी। किसी भी चुनौती से वे पीछे नहीं हटते थे। उनके मुताबिक 'भारत की राजनीति में तीन ‘एम’ हैं जिनसे गड़बड़ होती है- मनी, मसल-पावर और मिनिस्टर्स'। राजनेता उनके आगे गिड़गिड़ाते नज़र आते, वो कहते: मैं नाश्ते में राजनीतिज्ञों को खाता हूँ। उनके सख्त तेवरों से राजनेता खौफ में रहते थे। तब कहा जाता था,'राजनेता सिर्फ दो लोगों से डरते हैं, एक भगवान और दूसरे शेषन'। चुनाव व्यवस्था में पारदर्शिता और शुचिता लाने के लिए उन्हें भारतीय इतिहास में हमेशा याद किया जाएगा। चुनाव आयोग को अलग पहचान उन्होंने दिलायी। 87 वर्ष की उम्र में शेषन ने चेन्नई में अंतिम सांस ली। उनका पूरा नाम तिरुनेल्लाई नारायण अय्यर शेषन था। वे 12 दिसंबर 1990 से 11 दिसंबर, 1996 तक पद पर रहे। केरल में जन्मे शेषन ने मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर रहते हुए उन्होंने कई अहम बदलाव किए थे। मतदाता पहचान पत्र की शुरुआत उन्हीं के समय में हुई। कुछ नेताओं ने विरोध किया कि भारत में खर्चीली व्यवस्था संभव नहीं है तो शेषन का जवाब था-अगर पहचान पत्र नहीं बनाए तो 1995 के बाद कोई चुनाव नहीं होगा। कई चुनाव इसलिए स्थगित करवा दिए क्योंकि पहचान पत्र तैयार नहीं थे। उम्मीदवारों के खर्च पर लगाम हो या फिर सरकारी हेलीकॉप्टर से चुनाव प्रचार के लिए जाने पर रोक शेषन ने ही लगाई। दीवारों पर नारे, पोस्टर चिपकाना, लाउडस्पीकरों से शोर, प्रचार के नाम पर सांप्रदायिक तनाव पैदा करने वाले भाषण देना, उन्होंने सब पर सख्ती की। इन्हीं सुधारों की वजह से 1996 में उन्हें रैमन मैग्सेसे अवॉर्ड मिला था। उस जमाने में बिहार बूथ लूट के लिए बदनाम था। साफ़ सुथरे ढंग से चुनाव करवाना उस जमाने में एक टेढ़ी खीर थी। उन्होंने साफ़ सुथरे तथा निष्पक्ष ढंग से चुनाव करवा कर अपने को स्थापित किया। 1992 के यूपी चुनाव में शेषन ने करीब 50,000 अपराधियों को ये विकल्प दिया था कि या तो वो अग्रिम जमानत ले लें या खुद को पुलिस के हवाले कर दें। शेषन पर कांग्रेसी होने का ठप्पा लगा था। पर कांग्रेस खुद उनके फैसलों से परेशान थी। मप्र, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश में भाजपा सरकारों को भंग करने के बाद पूर्व मंत्री अर्जुन सिंह ने कहा था कि इन राज्यों में चुनाव सालभर बाद होंगे। शेषन ने तुरंत प्रेस विज्ञप्ति जारी की, याद दिलाया कि चुनाव की तारीख मंत्रिगण नहीं, चुनाव आयोग तय करता है। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव पर भी शेषन सख्त रहे। लालू, शेषन को जमकर कोसते रहते। अपने कार्यों से वे हमेशा याद आयेंगे।

नहीं रहे वशिष्ठ बाबू

बिहार ज्ञान की भूमि रही है। एक से बढ़ कर एक यशस्वी महापुरुषों ने यहाँ पर जन्म लेकर भारत भूमि का नाम रोशन किया है। भगवान बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति भी बिहार में ही हुई। ऐसे ही एक महापुरुष डॉ वशिष्ठ नारायण सिंह ने यहाँ पर जन्म लिया और कुछ कारणों से वे उपेक्षा का शिकार हुए। वे आर्यभट्‌ट-रामानुजन परंपरा के वे थे। हम कह सकते हैं कि आर्यभट्‌ट व रामानुजन परंपरा का सितारा कल व्योम में लीन हो गया। उनकी ख्याति एक प्रसिद्ध गणितज्ञ के रूप में थी। वे 73 साल के थे। गुरुवार की सुबह पटना में उनका निधन हुआ। उन्होंने शायद ही किसी परीक्षा में दूसरा स्थान प्राप्त किया। हमेशा टॉप रहे। उनकी प्रतिभा के दो नमूने हम देखें तो समझ जायेंगे - उनके चलते पटना विश्वविद्यालय को अपना कानून बदलना पड़ा था; सीधे उन्होंने सीधे स्नातक विज्ञान की परीक्षा दी थी। बर्कले यूनिवर्सिटी (कैलिफोर्निया) ने उनको 'जीनियसों का जीनियस' कहा था। मगर निजी जिंदगी में वे असफल रहे और सिस्टम के गैर मुनासिब माहौल से पेश चुनौतियों की परीक्षा में तो बिलकुल ही फेल से रहे। मानसिक संतुलन ऐसा गड़बड़ाया की गड़बड़ाता ही चला गया। बीच-बीच में दूसरी बीमारियां भी परेशान करती रहीं। बीमार हुए, ठीक हुए, गायब हुए, झोपड़ीनुमा होटल के बाहर जूठन खाते मिले, अंतत: उन्होंने हम सबसे हमेशा के लिए विदा ले लिया। परिजनों और गणितज्ञों के मुताबिक आइन्सटीन सिद्धांत को चुनौती देने वाली उनकी सबसे बड़ी थ्योरी भी अब नहीं मिल रही है। एक बार उन्होंने अकेले 31 कंप्यूटर को हरा दिया। सुनने में यह अतिशयोक्ति लग सकती है मगर घटना कुछ इस तरह से है - नासा के अपोलो स्पेस मिशन के समय अचानक 31 कंप्यूटर कुछ देर के लिए बंद हो गए। मिशन से जुड़े वैज्ञानिक और गणितज्ञों को काठ मार गया। इसी बीच डॉ।वशिष्ठ नारायण सिंह ने पल भर के लिए आंखें बंद कीं और कागज पर कुछ लिखा। जब कंप्यूटर ऑन हुए तो सभी यह देख हतप्रभ थे कि कंप्यूटर और वशिष्ठ बाबू की गणना एक ही थी। कभी – कभी किसी-किसी के जीवन में ऐसी बातें घट जाती हैं जो कि जीवन को प्रभावित करती हैं। ऐसी ही घटना उनके साथ घटी। उन्होंने प्रो। केली (बर्कले, कैलिफोर्निया) के मार्गदर्शन में पीएचडी की। प्रो। केली उनको दामाद बनाना चाहते थे। उन्होंने डॉ। नागेंद्र नाथ (साइंस कॉलेज, पटना के तत्कालीन प्रिंसिपल) से इसका आग्रह किया था। वशिष्ठ के घर वालों तक बात पहुंची। उनके घरवाले नहीं माने। प्रो।केली को सूचना भिजवा दी गई। वे मातृ-पितृभक्त थे। अगर प्रो। केली की बेटी से शादी हो जाती, तब शायद ऐसा कुछ नहीं होता, जिसे उन्होंने झेला और जिससे राज्य, समाज, देश को नहीं, बल्कि पूरी दुनिया को नुकसान हुआ। उन्हें नोबेल पुरस्कार भी मिल जाता। आज व्यवस्था तंत्र की नाकामी से देश ने एक होनहार गणितज्ञ को खो दिया। उनके महाप्रयाण के बाद ही व्यवस्था-तंत्र को उनके किये गए कार्यों की याद आयी। पर्वत-पुरुष दशरथ मांझी के जाने के बाद ही उनके ऊपर लोगों ने ध्यान दिया। जब तक मनुष्य धरती पर रहता है – उसकी उपेक्षा की जाती है। जाने के बाद ही लोग उन्हें याद करते हैं। प्रधानमंत्री जी ने ट्वीट कर उन्हें श्रद्धांजलि दी – “गणितज्ञ डॉ. वशिष्ठ नारायण सिंह जी के निधन के समाचार से अत्यंत दुख हुआ। उनके जाने से देश ने ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में अपनी एक विलक्षण प्रतिभा को खो दिया है। विनम्र श्रद्धांजलि!” डॉ. वशिष्ठ नारायण सिंह जैसे प्रतिभाशाली महापुरुषों की कमी हमेशा महसूस की जायेगी।

कहानी सम्राट – मुंशी प्रेमचंद’( 31 जुलाई – जन्मदिन)

जब-जब कहानी की बात उठती है तो मुंशी प्रेमचन्द का नाम आदर के साथ लिया जाता है। प्रेमचन्द ने जो भोगा है, जो देखा है- उसे निष्कपटता के साथ शब्दों में साकार कर दिया है। प्रेमचन्द ने जीवन के अनुभवों से शिक्षा प्राप्त की और सच्चे अर्थो में यही वास्तविक शिक्षा है, जो व्यक्ति को परिपक्व बनाती है। उनका सम्पूर्ण साहित्य उनके जीवनगत अनुभवों का निचोड़ है। हिंदी साहित्य की चर्चा मुंशी प्रेमचंद के बगैर की नहीं जा सकती है। उन्होंने पिछली सदी में भारतीय समाज का जो चित्रण किया है, कमोबेश अभी भी स्थिति उसी प्रकार की है। जून के महीने में ‘मन की बात’ कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद मोदीजी ने भी उनकी कहानियों की चर्चा की। उन्होंने हिन्दी के अमर कथाकार मुंशी प्रेमचन्द का उल्लेख करते हुए लोगों से अपने दैनिक जीवन में किताबें पढ़ने की आदत डालने का आह्वान किया। कार्यक्रम के दौरान उन्होंने उनकी तीन कहानियों का जिक्र किया-जिससे वे प्रभावित हुए। ये कहानियां हैं - ईदगाह, नशा और पूस की रात – तथा उन कहानियों में व्यक्त संवेदना की भी चर्चा की। सत्य भी है – इन तीन कहानियों की चर्चा तो हमारे प्रधानमंत्री ने की। लेकिन यदि देखा जाए तो इनकी 300 से ज्यादा लिखी सारी कहानियां कालजयी हैं। कोई भी रचना एक दूसरे से कम नहीं है। भारतीय जन मानस को पढने की उनकी क्षमता का तो लोहा मानना ही पड़ेगा। सहज, सरल भाषा में मानवीय संवेदनाओं को अभिव्यक्त करने में उनकी कहानियां बेजोड़ हैं। समूचे भारत का मनोभाव उनकी कहानियों में समाहित है। समाज में व्याप्त आर्थिक विषमताओं पर, बुरी संगति का असर, बालक का विशुद्ध प्रेम, बेईमान भी ईमानदारी चाहता है, जानवरों के प्रति प्रेम, पञ्च के हृदय में ईश्वर का वास, बड़े घर की बेटियां कैसी होती हैं – इत्यादि विषयों पर लिखी कहानियां अपने आप में बहुत कुछ कहती हैं। मुझे भी आश्चर्य होता है कि किस प्रकार उस ज़माने में उन्होंने अपनी लेखनी का उपयोग अपने दिमाग से किया? आज कंप्यूटर के ज़माने में भी चार पंक्ति लिखने में, सोचने में समय लगता है। शुरुआत में तो कहानी कहने-सुनने-पढ़ने के लिए हमारे ग्रंथो का उपयोग जैसे – रामायण, महाभारत, पंचतंत्र, हितोपदेश आदि का इस्तेमाल होता था। समय बदला और कहानी लिखने – पढने का ढंग बदला और इस तरीके को मुंशी प्रेमचंद ने बहुत ही सुंदर तरीके से पकड़ लिया। मनोविज्ञान पर आश्रित होने के कारण उनकी कहानियों में यथार्थवाद को विशेष स्थान मिला है। उनका दृष्टिकोण जीवन के संबंध में आदर्शवादी रहा है। प्रेमचन्द अपने पात्र के चरित्र-चित्रण और कथावस्तु में यथार्थवादी हैं, परन्त दृष्टिकोण में आदर्शवादी हैं। ‘पंच-परमेश्वर’ कहानी में जो उन्होंने पंच का फैसला सुनाया है – वह हर तरफ से स्वागत योग्य है। उस कहानी की एक पंक्ति – क्या दोस्ती के लिए सत्य नहीं बोलेगे- मन को झकझोर देती है। ‘नमक का दारोगा’ कहानी में ईमानदारी के महत्त्व को जो बताया गया है – वह भी मन को सोचने पर मजबूर करती है। वास्तव में दुनिया अभी भी शाश्वत मूल्यों पर चल रही है। वह मूल्य अभी भी भारतीय समाज में है। होता यह है कि डर से कोई उन मूल्यों को बाहर लाना नहीं चाहता। अन्याय के विरूद्ध कोई आवाज उठानेवाला नहीं रहता है। जब अन्याय के खिलाफ कोई खड़ा हो जाता है तो पूरा समाज फिर उस व्यक्ति के साथ चल पड़ता है। शासन करने में बहुतों को मजा मिलता है और उससे शक्ति प्राप्त होती है। कितने लोग समाज में शासन करने में अपनी शान समझते हैं। सेवा से अवकाश ग्रहण कर लिया है – फिर भी शासन करने की आदत गयी नहीं है। घर में शासन करना है तो छोटों पर ही रोब जमाना पड़ेगा। इस कड़ी में मुंशीजी का द्वन्द्व जितना वैयक्तिक है उतना सामाजिक भी। ‘बड़े भाई साहब’ कहानी इसका श्रेष्ठ उदाहरण है। दो भाइयों की इस कथा में दोनों एक दूसरे से स्वभाव में विपरीत हैं। बड़ा भाई कमजोर होता हुआ भी छोटे भाई पर शासन करने के लिए गंभीरता धारण करता है। मनोवैज्ञानिक धरातल पर विलक्षण ढंग इस कहानी को प्रस्तुत किया गया है। केवल कहानी ही इन्होने लिखी है – ऐसी बात नहीं है। इनके उपन्यास भी भारतीय समाज की कहानी बखूबी कहते हैं। कुछ उपन्यासों के नाम इस प्रकार हैं – सेवासदन, प्रेमाश्रम, निर्मला, कायाकल्प, गबन, कर्मभूमि, गोदान, मंगलसूत्र आदि। उर्दू साहित्य की तो मैं चर्चा भी नहीं कर रहा हूँ। उनके द्वारा उठाए गए कष्टों का तो जिक्र हुआ भी नहीं। उन्होंने अपने स्कूली जीवन का जिक्र जिस प्रकार किया है – पढने से आंसू आ जाते हैं। पारिवारिक जीवन में पहली पत्नी द्वारा इन्हें सुख की प्राप्ति नहीं हो सकी। दूसरी पत्नी ने इन्हें अच्चा सहयोग दिया।

इनकी सारी कहानियों का संकलन ‘मानसरोवर’ में दिया गया है। कुल आठ खंड में है। जन्मदिन, विवाह समारोह आदि में उपहार देने के लिए ये मानसरोवर संजीवनी का कार्य करेगी और हमें लोगों को प्रेरित करना चाहिए। अंत में हम इतना ही कह सकते हैं कि हिंदी कथा साहित्य के लिए ये पितामह हैं। जब भी हिंदी कथाकारों का जिक्र होगा-उनका नाम स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा।

मैथिलीशरण गुप्त ( जन्मदिन 3 अगस्त)

‘नर हो न निराश करो मन को, कुछ काम करो , कुछ काम करो’ पंक्तियाँ हो या ‘वही मनुष्य है जो मनुष्य के लिए मरे’ इत्यादि अमर कविता के रचयिता मैथिलीशरण गुप्त जी हैं। उन्होंने हिंदी साहित्य की जो सेवा की है – वह उनके संस्कारों को दिखाता है। साहित्य का अर्थ ही होता है जो हितकर हो। इस क्रम में उनकी रचनाएं मानव हित को बतानेवाली होती हैं। उनकी रचनाओं को पढ़ लेने से नैराश्य भाव में रहने वाले व्यक्ति को भी आशा की किरण जिन्दगी में नजर आने लगती है तथा वह व्यक्ति भी जीवन-समर में पूरे मनोयोग से कूद पड़ता है तथा सफल होने की कोशिश करने लगता है। सारा संसार माता कैकेयी को धिक्कारता है। कैकेयी के दूसरे पक्ष को काफी शालीनता के साथ उन्होंने अपनी पुस्तक ‘साकेत’ ने दिखाया है। ‘धन्य लाल की माई’ में कैकेयी का एक दूसरा रूप ही संसार के सामने लाया गया है। मनुष्य का क्या गुण है – यह उन्होंने अपनी कविता ‘वही मनुष्य है।।।’ में इतने नपे-तुले शब्दों में बताया है कि क्या कहने? उनकी कविताओं को पढने से उनके संस्कारों का पता चल जाता है। स्वयं महात्मा गाँधी ने उन्हें ‘राष्ट्रकवि’ की उपाधि दी थी। इनके दो काव्य ‘रहस्य रामायण’ और ‘सीता राम दम्पती’ काफी चर्चित थे। शायद पिता के द्वारा दिया गया यह काव्य-संस्कार मैथिली शरण गुप्त जी पर छाया बनकर उतर गया। माता काशी देवी भी गोस्वामी तुलसीदास का ‘रामचरित मानस’ नित्य पढ़ती थी और उनका भी संस्कार मैथिली शरण गुप्त जी पर बचपन से ही पड़ा। इन्हीं सुसंस्कारों के कारण मैथिली शरण गुप्त जी एक बड़े और अच्छे कवि बने। साथ ही साथ उन्होंने एक अच्छे इंसान के रूप में भी ख्याति पायी। उनकी रचनाओं की भाषा एकदम परिमार्जित होती है। एक नजर उनकी रचनाओं पर डालते हैं : तिलोत्तमा, शकुन्तला ,पंचवटी ,हिन्दू, त्रिपथगा, साकेत, यशोधरा, मंगलघाट, नहुष, विश्ववेदना, प्रदक्षिणा, जय भारत, रत्नावली आदि। भारत-भारती के प्रकाशन के बाद उन्हें काफी प्रसिद्धि मिली और पूर्णतया हिंदी के कवि के रूप में स्थापित हुए। ‘भारत भारती’ में भारत के गौरव का गान है। भारतीय संस्कृति को विहँसता हुआ दिखाया गया है। भारत का इतिहास राष्ट्रीयता का गान कर रहा है। ‘भारत भारती’ में समाज में व्याप्त कुरीतियों पर भी करारा प्रहार है। धर्म के नाम पर चलने वाले मिथ्याचार और अनाचार पर भी गहरी चोट की गई है। सबसे बढ़कर राष्ट्रीयता की भावना का प्रबल संचार इस पुस्तक में उफान पर है। गुप्त जी की रचनाओं का मूल राष्ट्र, राष्ट्र-प्रेम, राष्ट्रीय-एकता, राष्ट्र-रक्षा के लिए प्राणों का उत्सर्ग करना है। इसकी पहली पंक्ति को देखने से ही दर्द दिखायी देता है - ‘‘हम कौन थे, क्या हो गये और क्या होंगे अभी, आओ विचारें आज मिलकर, ये समस्याएँ सभी। इसमें उन्होंने नवयुवकों को भी ललकारने का काम किया है। कुल मिलकर इनकी यह पुस्तक कालजयी है। प्रकृति का भी चित्रण इन्होने बखूबी किया है - ‘चारुचंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं हैं जल थल में, स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है अवनि और अम्बरतल में’। हिंदी की सेवा करनेवालों को बार-बार इनकी रचनाओं का सेवन करना चाहिए। इन्होने हिंदी साहित्य की जो सेवा की है उसके लिए हिंदी साहित्य सदैव उनका ऋणी रहेगा। आज उनके जन्मदिन पर उनको शत-शत नमन।

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह’दिनकर’

समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल व्याध।

जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनके भी अपराध।।

आज जो तमाशा आम जनता के साथ चल रहा है। अन्याय का जो बोलबाला हो गया है। न्याय बेकसूरों को मिलना चाहिए। इसकी फ़िक्र आज किसी को नहीं है। कवि ने यह अच्‍छी तरह बता दिया है कि हमाम के भीतर सबके दृश्य बेशक अलग-अलग हैं मगर हर दृश्य पर तालियां पीटने वाले चाटुकार एक जैसे हैं। सांप-बिच्‍छुओं की किस्‍में भले ही भिन्‍न-भिन्‍न हैं मगर उनकी विष वमन करने की फ़ितरत एक समान हैं। देर है तो बस मौका मिलने की। जिनके हाथों में हम अपना वर्तमान और भविष्‍य सौंपते आये हैं, जिनके यहाँ हमने अपना पूरा जीवन दिया है, उनकी असलियत तो सामने आ ही रही है और आएगी मगर तटस्थ बैठने वाले भी दोषी भविष्य में कहलायेंगे।

अब दूसरी इन पंक्तियों को देखें।

"अच्छे लगते मार्क्स, किंतु है अधिक प्रेम गांधी से।
प्रिय है शीतल पवन, प्रेरणा लेता हूं आंधी से।।“

मार्क्स के विचारों से प्रभावित हैं लेकिन गांधी के मार्ग को छोड़ नहीं सकते हैं। अर्थात सामाजिक व्यवस्था सत्य, अहिंसा तथा प्रेम के ऊपर ही निर्भर करती है। इसके अतिरिक्त समाज में और किसी बात का स्थान नहीं है।

“तेजस्वी सम्मान खोजते नहीं गोत्र बतला के।

पाते हैं जग में प्रशस्ति अपना करतब दिखला के।।“

वास्तव में जिसके पास पुरुषार्थ होता है – वह दीख ही जाता है। प्रतिभा अपने आप दिखाई दे जाती है। यह उक्ति कर्ण के सन्दर्भ में की गयी है तथा कर्ण की प्रतिभा को बताया गया है।

उपरोक्त पंक्तियों के प्रणेता रामधारी सिंह ‘दिनकर’ अपनी प्रारंभिक कविताओं में क्रांति का उद्घोष करके युवकों में राष्ट्रीयता व देशप्रेम की भावनाओं का ज्वार उठाने वाले आगे चलकर राष्ट्रीयता का विसर्जन कर अंतरराष्ट्रीयता की भावना के विकास पर बल देते हैं। सत्ता के करीब होने के बावजूद भी दिनकर कभी जनता से दूर नहीं हुए। जनता के बीच उनकी लोकप्रियता हमेशा बनी रही। दिनकर पर हरिवंश राय बच्चन का कहना था, ‘दिनकर जी को एक नहीं बल्कि गद्य, पद्य, भाषा और हिंदी के सेवा के लिए अलग-अलग चार ज्ञानपीठ मिलने चाहिए थे'। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की कविताएं पूरे राष्ट्र में गूंजती हैं। उनके गृह जिला बेगूसराय में कोई भी कार्यक्रम आमसभा, गोष्ठी व सम्मेलन उनके नाम से ही शुरू होते हैं और उनके नाम से ही संपन्न। उनके गांव सिमरिया की बात ही निराली है। यहां प्रवेश करते ही यहां की हवाएं, दरो-दीवार, पेड़-पौधे कविता पाठ करते नजर आते हैं। गांव से गुजरने वाले मुख्य मार्ग के दोनों तरफ की दीवारें दिनकर की कविताओं से पटी पड़ीं हैं। गाँव का पूरा वातावरण ही दिनकरमय रहता है। बच्चे, युवा व बुजुर्ग सभी की जुबान पर उनकी ही कविताएं तैरती रहती हैं। दिनकरजी ने सामाजिक और आर्थिक समानता और शोषण के खिलाफ कविताओं की रचना की। एक प्रगतिवादी और मानववादी कवि के रूप में उन्होंने ऐतिहासिक पात्रों और घटनाओं को ओजस्वी और प्रखर शब्दों का तानाबाना दिया। उनकी महान रचनाओं में रश्मिरथी और परशुराम की प्रतीक्षा शामिल है। उर्वशी को छोड़कर दिनकर की अधिकतर रचनाएँ वीर रस से ओतप्रोत है। उन्हें वीर रस का सर्वश्रेष्ठ कवि माना जाता है। ज्ञानपीठ से सम्मानित उनकी रचना उर्वशी की कहानी मानवीय प्रेम, वासना और सम्बन्धों के इर्द-गिर्द घूमती है। उर्वशी स्वर्ग परित्यक्ता एक अप्सरा की कहानी है। वहीं, कुरुक्षेत्र, महाभारत के शान्ति-पर्व का कवितारूप है। यह दूसरे विश्वयुद्ध के बाद लिखी गयी रचना है। वहीं सामधेनी की रचना कवि के सामाजिक चिन्तन के अनुरुप हुई है। संस्कृति के चार अध्याय में दिनकरजी ने कहा कि सांस्कृतिक, भाषाई और क्षेत्रीय विविधताओं के बावजूद भारत एक देश है। क्योंकि सारी विविधताओं के बाद भी, हमारी सोच एक जैसी है। अन्य रचनाएं वरदलोई संघर्ष, हुंकार, नील कुसुम, रसवंती, रेणुका आदि हैं। दिनकरजी को उनकी रचना कुरुक्षेत्र के लिये काशी नागरी प्रचारिणी सभा, उत्तरप्रदेश सरकार और भारत सरकार से सम्मान मिला। संस्कृति के चार अध्याय के लिये उन्हें 1959 में साहित्य अकादमी से सम्मानित किया गया। भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने उन्हें 1959 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया। भागलपुर विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलाधिपति और बिहार के राज्यपाल जाकिर हुसैन, जो बाद में भारत के राष्ट्रपति बने, ने उन्हें डॉक्ट्रेट की मानद उपाधि से सम्मानित किया। गुरू महाविद्यालय ने उन्हें विद्या वाचस्पति के लिये चुना। 1968 में राजस्थान विद्यापीठ ने उन्हें साहित्य-चूड़ामणि से सम्मानित किया। वर्ष 1972 में काव्य रचना उर्वशी के लिये उन्हें ज्ञानपीठ से सम्मानित किया गया। 1952 में वे राज्यसभा के लिए चुने गये और लगातार तीन बार राज्यसभा के सदस्य रहे। सरकारी नौकरी में उनको परेशान ही किया गया. 4 साल की नौकरी में 22 बार स्थानान्तरण किया गया.
आज के संदर्भ में भी दिनकरजी की रचना प्रासंगिक है। उनकी रचनाओं में एक गजब का सन्देश है। ऐसे वीर रस के राष्ट्रकवि को शत-शत नमन।

लिसप्रिया कंगुजम

यह जानकार मन को काफी सुकून की प्राप्ति होती है कि जिस प्रक्रार स्वीडन की बालिका ग्रेटा ने जलवायु परिवर्तन के संरक्षण के लिए अपने आन्दोलन से दुनिया भर के नेताओं का ध्यान अपनी ओर खींचा, उसी प्रकार अपने देश के मणिपुर राज्य से आनेवाली लिसप्रिया कंगुजम ने भी किया है। उम्र और कद किसी भी नेक कार्य को करने में मायने नहीं रखता। केवल जीवन का उद्देश्य होना चाहिए। शंकराचार्य, स्वामी विवेकानंद आदि महापुरुषों ने अल्पायु में ही बड़े-बड़े कार्य कर दिए। आज हम उनके बताये रास्ते पर चलते हैं। उसी प्रकार लिसप्रिया ने भी पिछले हफ्ते किसी और से नहीं बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से देश में जलवायु परिवर्तन कानून को अमल में लाने और इससे संबंधित बिल को इन दिनों जारी संसद के शीत सत्र में पारित करने का अनुरोध किया है। मणिपुर की इस छोटी सी बच्ची ने 6 दिसंबर 2019 को ट्वीट करके कहा, “प्लीज हमारे भविष्य को बचाइए, मैं अपनी प्रेरणादायी ग्रेटा थनबर्ग के साथ आप पर और दुनिया के नेताओं पर दबाव बनाना चाहती हूं। आप हमें कमतर नहीं आंक सकते। प्लीज इस बिल को पास कर दीजिए”। वह वास्तव में एक स्कूल ड्रॉपआउट है। लिसप्रिया मणिपुर के एक छोटे से गांव बशीखांग में जन्मी, इसके बाद भुवनेश्वर पहुंची और वहां केआईईटी इंटरनेशनल स्कूल में पढ़ाई की और वर्तमान में हर जगह, हर किसी की स्कूलिंग कर रही है, जिन्हें जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर कदम उठाने की जरूरत है। वह जानती है कि विरोध प्रदर्शन जागरूकता के लिए अच्छा है, लेकिन यह भी महसूस करती है कि इसके लिए कदम उठाने की भी जरूरत है। जुलाई 2018 में उसे मंगोलिया की राजधानी उलानबटार में 'एशिया मिनिस्टिरल कॉन्फ्रेंस फॉर डिजास्टर रिस्क रिडक्शन 2018' के तीसरे सम्मेलन में भाग लेने का अवसर मिला और तभी से उसे लगता है कि हमें जलवायु संकट के लिए तुरंत कदम उठाने की जरूरत है। कॉन्फ्रेंस के दौरान, वह विश्व नेताओं और विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों से मिलीं, जिन्होंने कई विनाशकारी मुद्दों पर अपनी बात रखी। वह उस समय बहुत उदास हो गई जब उसने आपदाओं के कारण अपनी ही उम्र के बच्चों को अनाथ होते या बेघर होते देखा। अच्छी बात यह है कि बच्चों में भी जलवायु परिवर्तन से होने वाले खतरों के प्रति जागरूकता बढ़ रही है। मंगोलिया से घर लौटने के बाद, उसने 'द चाइल्ड मूवमेंट' नामक एक संगठन शुरू किया। अपनी आवाज बुलंद करने के लिए वह अब तक कई देशों की यात्रा कर चुकी है। यहां तक कि उसने इस साल मंगोलिया में 50,000 युवाओं के साथ एक मार्च का नेतृत्व भी किया। यह एक शुभ संकेत है। बच्चे अब समझने लगे हैं कि इस हरी-भरी वसुंधरा को बचाने के लिए संगठित होकर प्रयास करने होंगे। इसके लिए विश्व के जननेताओं को एक साथ एक मंच पर आना ही होगा – तभी हम इस संभावित खतरे से मनुष्य को बचा सकते हैं। अब यह देखना है कि हमारे प्रधानमंत्री जलवायु परिवर्तन से चिंतित इस बालिका के अनुरोध पर किस प्रकार ध्यान देते हैं। केवल चिंता करने से भी काम नहीं चलेगा। कुछ ठोस उपाय करने होंगे – जिससे लगे कि वास्तव में इस खतरे को रोकने के लिए सरकार कुछ कर रही है।

सदी के महानायक अमिताभ बच्चन

जैसे ही टीवी पर यह समाचार दिखाया गया कि अभिनेता अमिताभ बच्चन को भारतीय सिनेमा का सबसे बड़ा पुरस्कार दादा साहब फाल्के पुरस्कार दिया जाएगा – मन प्रसन्नता से झूम उठा। प्रशंसकों के बीच 'सदी के महानायक' के तौर पर मशहूर अमिताभ बच्चन बॉलीवुड में 50 साल पूरे कर चुके हैं। उन्हें ये पुरस्कार दिए जाने की जानकारी सूचना प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने ट्विटर दी। उन्होंने लिखा कि, "लीजेंड अमिताभ बच्चन, जिन्होंने दो पीढ़ियों का मनोरंजन किया और उन्हें प्रेरित किया, को एकमत से दादा साहब फाल्के पुरस्कार के लिए चुना गया है। पूरा देश और अंतरराष्ट्रीय समुदाय ख़ुश है। उन्हें मेरी हार्दिक बधाई।" सही मायने में वे पुरस्कार पाने के अधिकारी हैं। उनकी योग्यता पर किसी को संदेह नहीं होना चाहिए। नाम के अनुरूप उनका जीवन रहा है। अमिताभ नाम का अर्थ अतुलनीय वैभव तथा शानदार व्यवहार होता है। एक दूसरा अर्थ है ऐसा प्रकाश जो कभी नहीं बुझेगा। अमिताभ बच्चन ने अपने नाम को जीया है। छोटे तथा बड़े पर्दे पर जिस तरह से उन्होंने धूम मचाई है – वह आज के समय में विरले ही प्राप्त कर सकते हैं। आज जीवन के जिस मुकाम पर वे खड़े हैं उसके लिए निश्चित ही उन्होंने कड़ी मेहनत की होगी – इसमें कोई संदेह नहीं है। अमिताभ ने अपने करियर में अनेक पुरस्कार जीते हैं, जिनमें दादासाहेब फाल्के पुरस्कार की चर्चा शुरुआत में की जा चुकी है तथा इसके अलावे तीन राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार और बारह फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार सम्मिलित हैं। उनके नाम सर्वाधिक सर्वश्रेष्ठ अभिनेता फ़िल्मफेयर अवार्ड का रिकार्ड है। अभिनय के अलावा बच्चन ने पार्श्वगायक, फ़िल्म निर्माता, टीवी प्रस्तोता और भारतीय संसद के एक निर्वाचित सदस्य के रूप में 1984 से 1987 तक भूमिका निभाई हैं। ये प्रसिद्ध टी।वी। शो "कौन बनेगा करोड़पति" में सूत्रधार की भूमिका निभाते हैं जो कि बहुचर्चित, लोकप्रिय तथा सफल धारावाहिक है। राजनीति में ये सफल नहीं हो पाए। राजनीति तथा व्यापार करने इनको नहीं आया। व्यापार करने के लिए इन्होने ‘अमिताभ बच्चन कारपोरेशन लिमिटेड’ की स्थापना की थी लेकिन यह कम्पनी बुरी तरीके से असफल हो गयी। उस वक्त इनकी मदद इनके मित्रों ने की तथा उन्हें संकट से निकाला। इसके बाद इन्होने पीछे मुड़कर नहीं देखा तथा आज भी वे अभिनय के शीर्ष पर खड़े हैं। इनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि भी काफी शानदार रही है। प्रसिद्ध साहित्यकार हरिवंशराय बच्चन के सुपुत्र हैं तथा इनका जन्म 11 अक्टूबर 1942 को हुआ है। एक बार कुली फिल्म के शूटिंग के दौरान वे दुर्घटनाग्रस्त हो गए थे – उस वक्त पूरे देश ने उनके लम्बे जीवन के लिए दुआ मांगी थी। वे सकुशल फिर अभिनय में लौटे। उनके द्वारा की गयी सफल फिल्मों की सूची काफी लम्बी है। बच्चन अपनी जबरदस्त आवाज़ के लिए जाने जाते हैं। वे बहुत से कार्यक्रमों में वे एक वक्ता, पार्श्वगायक और प्रस्तोता रह चुके हैं। शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने उनको भारत रत्न देने की मांग कर सबको चौंका दिया था। इसीलिए दादा साहब फाल्के पुरस्कार के बाद हम उम्मीद कर सकते हैं कि आनेवाले दिनों में उन्हें भारत रत्न से भी नवाजा जाएगा। अभी तो परमपिता से उनके दीर्घायु होने की प्रार्थना करते हैं।

अलविदा सुषमा स्वराज

आज सुबह जैसे ही नींद खुली तो सुषमा जी के नहीं रहने का समाचार मिला। एक बारगी तो विश्वास नहीं हुआ। यह कैसे हो गया? लेकिन होनी को कौन टाल सकता है। जो होना है वह होकर रहता है। मृत्यु को वश में कर पाना अभी मनुष्य के हाथों में नहीं है। जैसा कि मुझे लगता है कि उन्हें अपने जाने का आभास हो गया था, इसीलिए 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने भाग नहीं लिया। वे राजनीतिक जीवन से बाहर हो गयीं। ऐसी शालीनता उनकी राजनीतिक जीवन में थीं कि उनके विरोधी भी सम्मान करते थे। काजल की कोठरी में बिना कालिख लगे कार्य करना कोई उनसे सीखे। संघ के विदेशमंत्री के रूप में उनके कार्यकाल को याद किया जाएगा। संयुक्त राष्ट्र संघ में दिया उनका भाषण यादगार बन गया। उनका कार्य में डिजिटल तकनीक का प्रयोग मुझे काफी प्रभावित करता था। एक ट्वीट कर देने से कार्य हो जाता था। एक फोन कर देने से भी उनका मंत्रालय हरकत में आ जाता था। बात कहने की शैली काफी प्रभावशाली थी। दिल्ली की मुख्यमंत्री भी वे थीं। ऐसा लगता है कि दिल्ली ने अपने विकास करने वाले महिला मुख्यमंत्री को बीते एक महीने में खोया है। पहले शीला दीक्षित का जाना और अभी सुषमा जी का। दोनों का जाना देश के लिए क्षति तो है ही – साथ ही साथ दिल्ली के लोगों के लिए भी है। अम्बाला में जन्म लेकर अपने मेहनत से केंद्र की राजनीति में ध्रुवतारा की तरह स्थान बना लेना कोई आसन कार्य नहीं है। एक आदर्श राजनेत्री, एक आदर्श नारी, पत्नी, माँ सभी तरह की भूमिका का निर्वहन उन्होंने बखूबी निभाया। कर्नाटक के बेल्लारी से वे के बार सोनिया गाँधी के खिलाफ भी चुनाव लड़ी थीं। सोनिया के विदेशी मूल के होने का मुद्दा उन्होंने काफी जोर-शोर से उठाया था। नारी सम्मान के लिए भी वे लडती थी। अभी आजम खान द्वारा लोकसभा में सभापति रमा देवी के खिलाफ की गई अभद्र टिप्पणी पर उन्होंने आजम की जम कर खिंचाई ट्वीट कर की थी। जो भी हो उनके जाने से भारतीय राजनीति में एक शून्य की स्थिति आ गयी।वे अप्रतिम तथा बेजोड़ थीं। हर विरोधी को अपने जवाब से लाजवाब करने वाली सुषमा का अंदाज बिल्कुल जुदा था। अंतिम ट्वीट उन्होंने धारा 370 के हटाने पर प्रधानमंत्रीजी को ख़ुशी व्यक्त करते ही किया था। सुषमाजी की शालीनता तथा उनकी बातचीत करने के ढंग को याद रखा जाएगा।

अच्छी आदतें

ईश्वर ने एक जीवन हर किसी को दिया है। अब उस ईश्वर प्रदत्त जीवन का सदुपयोग किस प्रकार करना है – वह हमारे ऊपर निर्भर करता है। हम चाहें तो इसे उद्देश्यपूर्ण बना सकते हैं। लेकिन इसके लिए हमें अपने में बाल्यावस्था से ही अच्छी आदतों का विकास करना होगा। एक बच्चे को हमेशा झूठ वोलने की आदत थी। उसने एक बार अपने सहपाठी के बारे में झूठी अफ़वाह फैला दी कि वह चोरी करता है। नतीजा यह हुआ कि अगली बार जब उसके वर्ग में चोरी हुई तो उस बच्चे के सहपाठी को पकड़कर प्राचार्य के सामने लाया गया। प्राचार्य ने जब पूरे मामले को देखा तो उसे समझ में असली मामला आ गया। प्राचार्य ने उस बच्चे के सहपाठी को जाने के लिए कह दिया। अब उस बच्चे को प्राचार्य ने बुलाया तथा पूछा कि ऐसा झूठ-मूठ वह किसी के बारे में अफ़वाह क्यों फैलता है? बच्चे ने कहा कि वह ऐसे ही मजाक में करता है तथा उसे प्रसन्नता होती है। यह सुनकर प्राचार्य ने कहा कि वह सभी बातें जो उसने अपने सहपाठी के बारे में कही थी , उसे एक कागज पर लिखे। फिर उस कागज को फाड़कर छोटे-छोटे टुकड़े कर रास्ते में फैला दे। बच्चे ने ऐसा ही किया। अगले दिन प्राचार्य को उस बच्चे ने बताया कि उसने उस कार्य पूरा कर दिया है। अब प्राचार्य ने कहा कि उस फाड़े हुए कागज के टुकड़े को समेट कर उनके सामने लाया जाए जो उसने रास्ते में फेंके थे। यह सुनते ही बच्चे ने कहा कि यह कार्य वह नहीं कर सकता। हवा उन कागज के टुकड़ों को न जाने कहाँ उड़ा ले गयी होगी। प्राचार्य ने कहा कि इसी तरह किसी के बारे में यूँ ही कह दी गयी झूठी और फिजूल बातें कहाँ- कहाँ उड़ जाती हैं। इससे कई बार कितनों को नुकसान हो जाता है। हालात इतने बिगड़ जाते हैं कि फिर मामला संभालना बहुत मुश्किल हो जाता है। अगर आप किसी के बारे में अच्छा नहीं सोच सकते तो चुप रहना ही बेहतर है। बच्चे को प्राचार्य की बात समझ में आ गयी थी। उस घटना के बाद जब तक वह बच्चा विद्यालय में रहा – तब तक किसी प्रकार की अफ़वाह को उसने नहीं फैलाया। आश्चर्य की बात यह रही कि एक सत्र में उस छात्र को सर्वश्रेष्ठ बालक का पुरस्कार भी मिला। इसीलिए हर किसी में देवत्व का वास होता है – यह उक्ति एकदम सही है। हुआ इस तरह की उसी विद्यालय में वर्ष का सर्वश्रेष्ठ होनहार बालक कौन है – इसके लिए चयन होना था। दिन भर बैठक होते रही लेकिन बर्ष का होनहार छात्र का चयन नहीं हो पाया। तब प्राचार्य ने होनहार छात्र का चयन प्रेमचंद की कहानी ‘परीक्षा’ के आधार पर लेने का सुझाव दिया तथा शेष शिक्षकों ने उस सुझाव को मान लिया। छात्रावास से विद्यालय तक के रास्ते में कचरे को फैला दिया गया तथा पारखी की तरह दो शिक्षकों को यह जिम्मेदारी दी गयी कि कौन बालक उन गंदगी को साफ़ करता है? बच्चे छात्रावास से विद्यालय जाने के लिए निकले तो उछलते – कूदते तथा पंक्ति को मिलाते हुए चले। अधिकांश छात्र तो अपने रास्ते निकल गए लेकिन उस छात्र ने रुक कर उस गंदगी को साफ़ किया। उस गंदगी को साफ़ करने के चक्कर में विद्यालय की प्रार्थना सभा में वह बच्चा शामिल नहीं हो सका। विद्यालय पहुंचने में थोडा बिलम्ब हुआ। अब परिणाम घोषित करने में परेशानी नहीं थी। वर्ष के होनहार छात्र का पुरस्कार उस छात्र को दे दिया गया था।कभी-कभी, कोई-कोई बात किसी-किसी को चुभ जाती है। वही बात बाद में किसी के जिन्द्गो में महत्त्वपूर्ण मोड़ लाती है। ये घटनाएँ छोटी हैं लेकिन यही छोटी – छोटी बातें जीवन में बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान रखती हैं।

अलविदा सुशांत

जब महेंद्रसिंह धोनी के जीवन पर आधारित फिल्म देखी थी, तभी समझ में आ गया था कि यह लड़का प्रतिभा का धनी है। किसी के जीवनी पर फिल्म में अभिनय करना, उसमे भी वह पात्र जीवित हो तो कार्य थोडा कठिन तो लगता है। बिहार से निकालकर मुम्बई के फिल्म उद्योग में जाकर अपने लिए जगह हासिल करना आसान कार्य नहीं है। मुंबई की मायानगरी ने बहुतों को छला है तथा बहुतोंको सहारा दिया है। इसीलिए प्रतिभा का होना तो मुम्बई जैसे जगह में काम करने की पहली शर्त है। सुशांत सिंह राजपूत ने अपनी मेहनत से जगह तो बनायी लेकिन उनका जाना उनके जैसे पात्र के लिए सोचने से दुखद रहा।

फिल्म ‘छिछोरे’ में उन्होंने ‘आत्महत्या’ नहीं करने का सन्देश दिया है और खुद आत्महत्या कर बैठे। जीवन में मान-सम्मान-अपमान लगा रहता है। सुख-दुःख आते-जाते रहता है। समय हमेशा एक-सा नहीं रहता है। लेकिन इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि दुःख में हम अपनी इहलीला समाप्त कर लें। भगवान ने एक जीवन दिया है और उसे अच्छे से जीयें। जीवन संघर्ष का ही नाम है। सुशांत सिंह राजपूत का इस तरह जाना एक चिंताजनक विषय है। हमारे प्रवासी भाई जो पूर्ण देशबंदी में भी अपने घर को बिना किसी साधन के लिए निकल पड़े। किसी को दोष नहीं दिया। नियति का खेल समझकर आत्मनिर्भर बनकर प्रकृति के खिलाफ अपने दम से निकल पड़े। किसी ने भी आत्महत्या नहीं की। सभी ने संघर्ष किया। मगर महज 34 साल में वह शख्स जिसे शोहरत-दौलत की कोई जरूरत नहीं थी – वह शख्स आत्महत्या कर लेता है। थोड़ी यह बात हजम नहीं होती है। उन्हें अभी काफी लम्बा जीवन जीना था। वे अब ऐसी जगह चले गए हैं – जहाँ से वापस बुलाया नहीं जा सकता है। अब हम कुछ नहीं कर सकते। एक झटके में सब ख़त्म हो गया। जाने के पहले कम से कम अपने वृद्ध पिता के बारे में सोचते। उनके वृद्ध पिता भी तो जीवन से संघर्ष ही कर रहे हैं।

सुशांत संघर्ष से भागते थे – ऐसा भी मेरा मानना नहीं है। उन्होंने भी फिल्म उद्योग में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष किया होगा- इसमें कोई संदेह नहीं। धारावाहिक ‘पवित्र रिश्ता’ से वे हमारे घर में आए। फिल्म ‘काय पो छे’ से लेकर ‘छिछोरे’ तक उनकी फिल्म को देखकर कभी ऐसा नहीं लगा कि वे काम को पूरी तन्मयता से नहीं करते हैं। उनकी फिल्मे भी लीक से थोडा हटकर हुआ करती थीं। अभिनय से फिल्म का पर्दा जीवंत हो उठता था। सुशांत आत्मविश्वास से भरपूर दमकते थे। उनकी फ़िल्में भी खूब चलती थी और सफलता का सारा श्रेय निश्चित रूप से उनका ही था। फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। ऐसा लग रहा था, भाग्य उनका साथ दे रहा है। जैसे फिल्म धीरे-धीरे आगे बढती है, वैसे ही उनकी जीवनी भी आगे बढ़ रही थी। चार बहनों वाला इकलौता भाई ने अपने लिए क्या कहानी लिखकर रखी थी – समझ में नहीं आया। मौके की कमी नहीं थी। सभी जगह चर्चित थे तथा चाहनेवाले लाखों-करोड़ों में थे। कम से कम एक आवाज लगाते तो लाखों करोड़ों हाथ मदद के लिए निकल पड़ते। फिर क्या जरूरत थी – एक दूसरे कार्यक्रम की? अब यह घरेलू मुस्कान बिखेरने वाला लड़का नहीं है। मगर हम लोगों को उन कारणों की तलाश करनी चाहिए, जिससे की हमें निराश होने पर जीवन भारी न लगे। हमें जीवन की उन गुफाओं की तलाश करनी चाहिए जहाँ सभी अपने जीवन को पूरी शिद्दत से जीयें।

असफलता से प्रेरणा

असफलता जीवन का एक अभिन्न अंग है। आवश्यक नहीं कि हम हमेशा सफल हों। कभी-कभी मन की इच्छानुसार कार्य की सिद्धि नहीं होती है। ऐसी स्थिति में ‘असफलता’ का मुंह देखना पड़ता है। इसरो के वैज्ञानिको को भी चंद्रयान 2 के अभियान में असफलता से दो-चार होना पड़ा। तो क्या असफलता से हम डर जाएँ – हरगिज नहीं। बल्कि हर असफलता के साथ, अपने आप से पूछें, कि इससे मैंने क्या सीखा? प्रायः देखा गया है कि असफलता के डर से कमजोर इच्छाशक्ति वाले कार्य की शुरुआत ही नहीं करते हैं। लेकिन जो असफल होने के बाद सीख लेते हैं वे बाद में काफी मजबूत होकर सफलता के रस का आनंद लेते हैं। मानसिक रूप से मजबूत लोग विभिन्न परिस्थितियों में भी सफल होकर निकलते हैं। वही आगे निकलते हैं जो असफल होने के बाद पराजित महसूस करने के बजाय, आत्म-आश्वासन के साथ आगे बढ़ते हैं। मजबूत इरादों वाले ‘असफलता’ को घूरते रहते हैं। वे जानते हैं कि असफलता उनके क्षमताओं या आत्मविश्वास को परिभाषित नहीं करता है। उनका ‘आत्म-मूल्य’ में विश्वास कायम रहता है। सीखने की ललक यदि होती है तो असफलता कुछ भी नहीं बिगाड़ सकती है।खुद पर भरोसा करते हुए आगे बढ़ने के लिए असफलता के दर्द को महसूस करना जरूरी है। यह दर्द दिमाग में जो असर पैदा करता है वो किसी शारीरिक दर्द से कम नहीं है। जो महसूस कर रहे हैं उसे नजरअंदाज ना करें। जो हुआ उसे समझने की कोशिश करें और खुद से ईमानदार रहें। इसीलिए असफल होने के बाद उससे सीखते हुए नए विचारों के साथ आगे बढ़ जाने की कोशिश करनी है।

आगे बढ़ने की सीख

मनुष्य कर्म करने के लिए ही जन्म लेता है। जब तक वह धरा पर है – कर्म करते ही रहता है। लेकिन कर्म करने के साथ होश का रखना जरुरी है। होता यह है कि मनुष्य कर्म करने के साथ जोश रखता है और होश खो बैठता है। तब मनुष्य विपरीत चक्र में फंस जाता है और उसे इस चक्र से बाहर निकलने का कोई मार्ग नहीं मिलता है। यह मनुष्य जीवन जो कि एक कर्मभूमि है बाद में युद्ध भूमि में बदल जाती है। युद्ध करना ही पड़ता है। युद्ध करने का कारण यह है कि हम दूसरे की इच्छा के अधीन कार्य करते हैं। जब दूसरे के अधीन रहेंगे तो तो नए कार्य के लिए हमें सहज मार्ग नहीं मिलेगा। नए कार्य के लिए हमें विरोध झेलना पड़ेगा। विरोध झेलने के क्रम में कभी – कभी हम उत्तेजना का भी शिकार हो जाते हैं। बाहर से जो चुनौती मिलती है – उसका सामना नहीं कर पाते। जो भी शान्ति जीवन में मिलती है – वह भी हमारी दृढ इच्छा – शक्ति की बदौलत मिलती है। कभी – कभी जीवन में संघर्ष के लिए घोड़े की पीठ पर बैठा दिया जाता है, लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि केवल घोड़े की पीठ पर बैठने से ही युद्ध नहीं जीता जा सकता है – उसके लिए अस्त्र-शस्त्र का होना भी बहुत जरुरी है। यदि हमारे पास लड़ने के लायक हथियार नहीं हैं तो भी लड़ना ही पड़ेगा। भगवान श्रीराम ने वन में रहकर अपने उद्योग से बानरों से मित्रता करके रावण पर विजय प्राप्त की। अपने राज्य अयोध्या पर आश्रित नहीं रहे। अब घोड़े पर चढ़ गए हैं तो उतर कर भाग भी नहीं सकते। राष्ट्र कवि दिनकर के अनुसार आधुनिक पुरुष ने प्रकृति के हर तत्व पर विजय पायी है। नर नदी, पहाड तथा समुद्र को एक समान लाँघ सकता है। आकाश से पाताल तक की सब-कुछ जानकारी इसे है। परंतु यह उसका सही परिचय नहीं है और न ही उसका श्रेय है। मनुष्य अमृत का पात्र है – कर्मठता उसकी पूंजी है। उनके अनुसार –

गुण बड़े एक से एक प्रखर,
हैं छिपे मानवों के भीतर,
मेंहदी में जैसे लाली हो,
वर्तिका-बीच उजियाली हो।

बत्ती जो नहीं जलाता है,
रोशनी नहीं वह पाता है।

मानव कुछ भी कर सकता है। उसके लिए असंभव नाम की कोई बात ही नहीं है। कवि आगे लिखते हैं - जब विघ्न सामने आते हैं, सोते से हमें जगाते हैं,
मन को मरोड़ते हैं पल-पल,
तन को झँझोरते हैं पल-पल ।

सत्पथ की ओर लगाकर ही,
जाते हैं हमें जगाकर ही।

संकटों – मुसीबतों से नहीं घबराए- वही सही अर्थो में मनुष्य है। जो डर गया – वह मृतक के समान है। जीवन में झंझावात आए या जाए – हमें सीख लेकर बढ़ते रहना ही है।

आधुनिक युग की चुनौतियाँ

आज के समय में चुनौती स्वीकार करना एक बड़ी बात है। सब के वश की बात नहीं है कि चुनौती स्वीकार की जाए। मेरे एक मित्र ने अपनी पत्नी को चुनौती दी कि वह दूध उबाल कर दिखा दे। मित्र महोदय ने कह दिया था कि पत्नी से दूध नहीं उबाला जाएगा और दूध गर्म होकर पतीले से बाहर आ जाएगा। मगर उस दिन मित्र की पत्नी भी तैश में आ गयी और मित्र की चुनौती को स्वीकार कर ली। वह दूध गर्म करने लगी इतने में काफी सलीके से मित्र ने उन्हें गप्प में लगा दिया और वही हुआ – जिसका डर था। दूध उबल कर पतीले से बाहर आ गया और शर्त मेरे मित्र ने जीत ली।

मेरे एक मित्र ने मुझे कहा कि उनकी पत्नी से जीत पाना बहुत ही कठिन है। चाहे कुछ भी हो जाए – उनकी पत्नी से कोई नहीं जीत सकता। एक दिन संयोग से मित्र की पत्नी के हाथ से एक फूलदान टूट कर गिर गया। फूलदान विदेश से मंगाया गया था। इसके पहले की मित्र अपनी पत्नी पर गुस्सा होते कि उनकी सहधर्मिणी गुर्रा उठी। काफी देर तक गर्मागर्म बहस होते रही। अंत में यही निष्कर्ष निकला की मित्र ने दो साल पहले वह फूलदान गलत जगह पर रख दिया था और फूलदान मित्र की गलती से टूट गया। मैंने मन ही मन मान लिया – मित्र की पत्नी से वाक्पटुता में सच में कोई नहीं जीत सकता है। यदि साक्षात ब्रह्म भी आ जाए तो भी नहीं।

आज की दुनिया में जहां बहुत से लोग बिना स्मार्टफोन के जीने की कल्पना नहीं कर सकते। सारे लोग दिन भर फोन में ही व्यस्त रहते थे। तो एक विशेष चुनौती हमारे एक मित्र ने अपने घर में दिन भर मोबाइल फोन नहीं छूने की रखी। शर्त यह थी कि फोन को बंद नहीं किया जाएगा। जो दिन भर फोन को नहीं छूएगा, उसे मुंहमांगी वस्तुएं इनाम में दी जायेगी। मित्र की दो बेटियां थी। मित्र महोदय के यहाँ मोबाइल की घंटियाँ सुबह से बजने लगी। केवल कौन फोन कर रहा है – यह देख कर फोन को छोड़ा जा रहा था। सुबह के दो घंटे तो फोन को नहीं छुआ गया। बाद में इतनी घंटियाँ बजने लगी की लाचार होकर फोन को पकड़ना ही पड़ा। मित्र की दोनों बेटियां भी तीन घंटे के अंदर फोन को अपने हाथों में लेकर नचा रही थी। केवल उनकी पत्नी ने दिन भर फोन से उपवास ले रखा था। पत्नी को लगा थी कि अब दिन भर फोन को नहीं हाथ लगाया है तो अब शाम हो ही गयी है तथा अब बनारसी सिल्क साडी तो शर्त के अनुसार आ ही जायगी। इस प्रकार के चैलेंज स्वीकार करने में कोई हर्ज नहीं है। अब मित्र महोदय से नहीं रहा गया और उन्हें लगा कि वे अब शर्त हारने वाले हैं। उन्होंने थोडा गंभीर होकर फोन के बारे में केवल इतना कहा कि उनके पिताजी का फोन है – कुछ सीरियस बात है। मित्र की पत्नी ने आव देखा न ताव – सीधे फोन पर झपट्टा मारा। वे अपना फोन नहीं छूने का प्रण या उपवास भूल गयीं।

इस तरह की छोटी-छोटी बातें पारिवारिक जीवन में बहुत आनंद देती हैं। बात भी सही है कि यदि परिवार की गाडी को सुचारू रूप से चलाना है तो इन सब चुनौतियों को स्वीकार करते हुए आगे बढ़ते रहना है।

एकाग्रता

अभी हाल ही में भारतीय प्रशासनिक सेवा में सफल हुए छात्रों का साक्षात्कार देख रहा था –प्रायः सभी सफल छात्रों ने एकाग्रता की बात की। सभी ने अपनी सफलता का श्रेय कमोबेश एकाग्रता को ही दिया। सच भी है – जीवन में एकाग्रता का बहुत अधिक महत्त्व है। प्राचीन ग्रंथों को यदि हम देखते हैं तो पाते हैं कि अर्जुन हो या एकलब्य या कर्ण। सभी ने सफलता एकाग्रता के बल पर ही हासिल की थी। अन्य गुण भी होंगे लेकिन एकाग्रता का महत्त्व उससे कम नहीं हो जाता है। स्वामी विवेकानंदजी एकाग्रता से ही किसी कार्य को करते थे। इसका अर्थ हम इस प्रकार लगा सकते हैं कि अन्य आकर्षण की तरफ आकर्षित न होते हुए अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित रहना। लक्ष्य से यदि हम विचलित हो गए तो एकाग्रता भंग हो जायेगी। जब एकाग्रता भंग हो जायेगी तो लक्ष्य से हम दूर होते चले जायेंगे। मनुष्य जिज्ञासा से भरा हुआ प्राणी है। अगल-बगल , पडोस में क्या हो रहा है? घर में कौन आ-जा रहा है – इसकी उत्सुकता लोगों को रहती है और यही से एकाग्रता टूटने लगती है। अब कुछ लोग कहते हैं कि इस प्रकार की जिज्ञासा की आवश्यकता है। बिना इस प्रकार की जिज्ञासा के मनुष्य देवता स्वरुप हो जाएगा। मनुष्य में जिज्ञासा हो लेकिन इस प्रकार की जिज्ञासा से वह लक्ष्य से विचलित हो जाएगा और उसे अभीष्ट उद्देश्य की प्राप्ति नहीं हो सकेगी। स्वामी विवेकानंदजी भी कहते हैं कि एक लक्ष्य लो – उसी में जीओ। एक ध्येय हो। कभी – कभी एकाग्रता को मनुष्य का उतावलापन भंग कर देता है। जल्दबाजी से भी अभीष्ट की प्राप्ति नहीं हो सकती है। एकाग्रता से मनुष्य मानसिक रूप से संयमी बन जाता है। संयमी बनने से उसमे धैर्य का संचार होता है। धैर्य से साहस का निर्माण होता है। साहस से मनुष्य निडर बनता है। हम देखते हैं कि ये सभी गुण एकाग्रता से ही सम्बंधित हैं। बचपन से हम सुनते आ रहे हैं कि हमें सभी काम ध्यान से करना चाहिए। यानी एकाग्रता के साथ। एकाग्रता उर्जा का असीम स्रोत या उद्गम विन्दु है। एकाग्रता का रूप बदलते रहता है। यदि जीवन – मरन का प्रश्न है तो एकाग्रता कुछ अलग प्रकार की होगी। क्षणिक संकट है – तो उस वक्त की एकाग्रता कुछ अलग होगी। घर में कभी-कभी बिजली गायब हो जाती है। उस वक्त अँधेरे में आँखे कुछ देखने की स्थिति में नहीं रहती है। धीरे-धीरे ऑंखें कुछ देखने की स्थिति में आ जाती है। यह एकाग्रता के कारण ही संभव हो पाता है। लेकिन वही यदि सामने में एक डाकू बंदूक ताने खड़ा हो तो उस वक्त की एकाग्रता कुछ अलग प्रकार की होगी। ईश्वर से ध्यान लगाने के वक्त की एकाग्रता अलग प्रकार की होती है। कार्यालय में कार्य करने की एकाग्रता कुछ अलग प्रकार की होती है। लेकिन सभी जगह एकाग्रता चाहिए ही। यदि हम एकाग्रता को भंग करेंगे तो लक्ष्य प्राप्ति की तरफ से हट जायेंगे। अध्यात्म का पहला कदम एकाग्रता ही है। ध्यान यदि विषय-वासना पर है और हम ईश्वर को याद कर रहे हैं तो कोई लाभ मिलने वाला नहीं है।

और संपर्क फिर जुड़ेगा

पूरा राष्ट्र देश के प्रधानमंत्री के साथ 6 सितम्बर की रात को चंद्रयान 2 मिशन के सफलता के ऐतिहासिक क्षणों का गवाह बनने के लिए तैयार था। सब कुछ तय कार्यक्रम के अनुसार चल रहा था। लेकिन तभी कुछ ऐसा हो गया कि बंगलौर स्थित इसरो के वैज्ञानिकों के चहरे मुरझा गए। रात को दो बजे के वक्त इसरो प्रमुख श्री शिवन ने प्रधानमंत्री जी को कुछ बारीकियों के बारे में समझाया और करीब 2.10 बजे काफी बुझे मन से इसरो प्रमुख ने लैंडर बिक्रम से संपर्क भंग होने की बात कही। इसके बाद तो मायूसी छा गयी। लेकिन उस वक्त प्रधानमंत्रीजी ने जिस ढंग से इसरो के वैज्ञानिको का हौसला और साहस बढाया – वही प्रधानमंत्रीजी को औरों से अलग करता है। सफल नेतृत्त्व किस प्रकार किया जाता है – वह हम सभी को प्रधानमंत्रीजी से सीखना चाहिए। प्रधानमंत्रीजी का इसरो प्रमुख श्री शिवन का गले लगकर हौसला देने वाला वीडियो काफी प्रेरणा दे गया। श्री शिवन काफी भावुक हो गये थे। उनके हौसले को प्रधानमंत्रीजी ने कायम रखा। उस कठिन वक्त में हौसला देते रहना और आगे बढ़ने की प्रेरणा देना अपने आप में बहुत कुछ कह जाता है। इसके बाद तो पूरा देश इसरो के साथ खड़ा हो गया। सभी लोग सोशल मीडिया पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे थे। फिल्म और खेल जगत के लोगों ने भी इसरो के इस प्रयास को सलाम किया। स्वर कोकिला लता मंगेशकर ने ट्वीट कर कहा, “सिर्फ संपर्क टूटा है, संकल्प नहीं। साहस अब भी बरकरार है। मुझे पूरा यकीन है कि हमें निश्चित तौर पर सफलता मिलेगी। बस आगे बढ़िए।“ अभिनेता शाहरुख खान ने कहा, कई बार हम जिस मंजिल पर पहुंचना चाहते हैं वहां नहीं पहुंच पाते हैं। महत्त्वपूर्ण यह है कि हमने मंजिल की तरफ बढ़ना शुरू किया और उम्मीदों एवं भरोसे को कायम रखा। हमें इसरो पर गर्व है। वहीं, भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली ने ट्वीट कर कहा, विज्ञान में असफलता जैसा कुछ नहीं है। हम प्रयोग करते हैं और हमें फायदा होता है। मन में इसरो के वैज्ञानिकों के लिए बहुत सम्मान है, जिन्होंने दिन-रात लगातार काम किया। राष्ट्र को आप पर गर्व है। पूर्व क्रिकेटर वीरेंद्र सहवाग ने कहा कि ख्वाब अधूरा रहा पर हौंसले जिंदा हैं, इसरो वो है, जहां मुश्किलें शर्मिंदा हैं। हम होंगे कामयाब। ट्विटर और फेसबुक पर तो संदेशों की भरमार लग गयी। समाचार चैनल इसरो के हौसलों की दाद दे रहे थे। ‘चांद को फिर से इसरो वैज्ञानिक पकड़ेंगे’ – ऐसा हमारा विश्वास है। मिशन पूरा होकर ही रहेगा। आज नहीं तो कल हमारा देश चाँद पर पहुंचेगा। अब आवश्यकता केवल उन चूक को पकड़ने की है – जिससे कि लैंडर ‘विक्रम’ का संपर्क टूटा। असफल अभियानों की समीक्षा कर इसे इसरो ठीक कर लेगा। चंद्रयान-1 के प्रक्षेपण से पूर्व दुनिया के सभी फेल अभियानों की समीक्षा की गई थी ताकि संभावित चूकों को पहले ही रोकने के उपाय किये जा सके। यही प्रकिया मंगलयान के वक्त भी अपनाई गई। इस अभियान से पूर्व भी चीन, रूस और अमेरिका के आरंभिक फेल अभियानों का अध्ययन हुआ था। यह अलग बात है कि चूक फिर भी हो गई। हमें प्रसिद्ध कवि हरिवंशराय बच्चन की उन पंक्तियों को याद रखना है - तू ना थकेगा कभी, तू ना मुड़ेगा कभी, तू ना थमेगा कभी कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ। अग्निपथ। अग्निपथ। अग्निपथ।

काम और आराम

एक आवासीय विद्यालय में मैं कार्यरत था। दिन-रात बच्चों के बीच में रहना और उनको देखना ही एकमात्र कार्य था। कब सुबह हुई और कब शाम हुई – कुछ पता ही नहीं चलता था। एक रात बीमार बच्चे के साथ अस्पताल में बिताना पड़ा। रात में उसे अकेला छोड़ कर आ नहीं सकता था। बच्चे के माता-पिता दूरदराज के क्षेत्र में रहते थे। किसी प्रकार उन्हें सूचना दे दी गयी थी। पता चला था कि बच्चे के माँ-पिताजी सुबह में ही आ सकेंगे। सुबह में बच्चे को माँ-पिताजी को सुपुर्द कर विद्यालय में आया। यहाँ पर पुनः कर्मक्षेत्र में आना पड़ा। अब कार्य की गुणवत्ता तो रह नहीं पाएगी। जिम्मेदारी की बात है। इसीलिए विद्यालय अध्ययन कार्य के लिए आ गया। उस दिन विद्यालय में बैठक थी। बैठक चल रही थी। अचानक प्राचार्य मुखातिब हुए, “नवीन विचारों की अभी सख्त आवश्यकता है। विद्यालय में शैक्षणिक प्रगति के लिए नवीन विचार सभी कोई दें। कोई नवीन विचार दे नहीं रहा था। तुम कुछ नहीं बोल रहे। कोई नया विचार नहीं आ रहा और न ही कोई दे रहा। क्या नवीन विचार नहीं आ रहा। बहुत थके-थके लग रहे हो। आज काम पर क्यों आ गए? रात में अस्पताल में थे। काम और आराम का एक रिश्ता होता है। काम और आराम में कोई दुश्मनी नहीं है। ठीक से आराम करना काम की रफ्तार को बढ़ा देता है। जाओ, जाकर आराम करो।”प्राचार्य ने बात सही की थी। मनुष्य बिना काम के रह नहीं सकता। हम सब काम करते हैं। उसके बिना हम जी नहीं सकते। लेकिन काम करते हुए हम कभी इतने डूब जाते हैं कि कुछ जरूरी चीजें छूट जाती हैं। परिवार, बाल-बच्चे, नाते-रिश्तेदार, संगी-साथी सभी छूट जाते हैं। देर-सवेर उनका असर हम पर ही होता है। उनसे हमारा रिश्ता समाप्त हो जाता है। काम करने की जगह सबसे तेज निकलने की प्रतियोगिता में हमारा वर्तमान समाप्त हो जाता है। जबकि यह सत्य है कि जिनका वर्णन ऊपर में किया है वे ही अपने हैं और मुसीबत में साथ देंगे। काम करते रहने से धीरे-धीरे हमारा शरीर थकने लगता है। और जब शरीर थकेगा तो फिर मन थकेगा। अति हर चीज की बुरी होती है। ज्यादा काम करते रहने से हम अपने तन-मन से ज्यादती करेंगे, तो उसका खामियाजा भी स्वयं भुगतेंगे। इस कारण हम थकान के शिकार हो जाएंगे। कभी-कभी हम अपने को खींच-खांचकर कुछ ज्यादा काम कर डालते हैं। लेकिन यह खींच-खांच बहुत दूर तक नहीं जानी चाहिए। हमें अपने को थकान से बचाना ही होगा। काम को गंभीरता से लेना या खूब मेहनत करने का यह मतलब नहीं कि थकान मोल ले लें। शरीर जवाब देने लगे। काम और आराम के बीच एक संतुलन जरूरी है। अगर वह नहीं होगा, तो काम पर भी उसका असर पडे़गा ही। बहुत ज्यादा काम में खुद को खपाने से हम एक ढर्रा पर या ढर्राई काम तो कर सकते हैं, लेकिन काम में नयापन नहीं ला सकते। प्रबंधन तो हमेशा नवीनता की बातें करता रहेगा। उसे अपने कर्मचारियों से अत्यधिक काम जो लेना है। यह सभी जगह चलता है। घर में भी यदि कोई दिहाड़ी पर काम करने के लिए रखता है तो उससे अधिक से अधिक कार्य लेने की प्रवृति जाग्रत होती है। यही भावना काम करने की जगह होती है। प्रबंधक अधिक से अधिक कार्य करने के लिए प्रेरित कर सकता है। कितने लोगों को घर में कोई काम नहीं होता है और वे कार्यालय में आकर बैठ जाते हैं। फिर वे सोचते हैं कि दूसरे भी समय के पहले आकर कार्यालय की शोभा बढ़ाएं। जिसकी कोई आवश्यकता नहीं है। यहीं से खींचतान शुरू होती है। लेकिन एक मानव होने के नाते हमारा उत्तरदायित्व सभी के प्रति है। इसमें कोई संदेह नहीं की हमें अपने कार्य करने की जगह को प्राथमिकता दें लेकिन अन्य की अनदेखी न कर दें। अगर हम अपने काम को गंभीरता से लेते हैं, तो अपने आराम को भी उतनी ही गंभीरता से लेना चाहिए।

क्रोध और आक्रोश

आजकल समाज में क्रोध और आक्रोश जैसी घटनाएँ बढ़ रही है। किसी में धैर्य नहीं रहा। मीडिया इन घटनाओं को बढ़ा – चढ़ा कर दिखाता है। ऐसा लगता है कि समाज की यही मूल भावनाएं है। समाज में इन्ही का स्थान है। जबकि हकीकत इसके विपरीत है। आज भी हमारे समाज का मूल्य त्याग और सेवा ही है। दया तथा करुणा है। लेकिन दया और करूणा केवल पढने भर के लिए रह गयी है। यदि हम अपने जीवन में आरम्भ से देखेंगे कि जीवन-मूल्यों के कारण ही हम आगे बढ़ सके। यदि माँ-पिताजी त्याग और सेवा हमारी नहीं करते तो हम कहीं के नहीं रहते। माँ ने अपने सुख की परवाह नहीं करके गर्भधारण से लेकर लालन-पालन तक केवल कष्ट ही उठाया। यदि माता और अन्य परिजन हमारे ऊपर स्नेह की वर्षा नहीं करते तो हम आगे कैसे बढ़ पाते? तो फिर जब हमारा विकास या जीवन ही इन मूल्यों के ऊपर हुआ है तो दुनिया में दंगे-फसाद, लड़ाई – झगडे आदि क्यों हो रहे हैं? यह एक विचारणीय प्रश्न है। जिधर देखते हैं – उधर ही मनमुटाव है। घर में पति-पत्नी के बीच बातचीत नहीं होती है। तलाक देने और लेने की घटनाए बढ़ रही है। दोनों जो कि सात फेरे लेकर जन्म-जन्मान्तर का साथ निभाने का प्रण लेते हैं- यहाँ देखते हैं कि प्राण लेने पर उतारू हो जाते हैं। समाज में एक वर्ग, दूसरे वर्ग के साथ रहने के लिए तैयार नहीं है। एक राज्य , दूसरे राज्य के साथ छोटी – छोटी बातों पर लड़ रहा है। एक देश , दूसरे देश के साथ लड़ रहा है। सीमाएं सुरक्षित नहीं है। कहीं भी शांति नहीं दिखाई पड़ती है। अब सवाल उठता है कि यह लड़ाई- झगडा किस लिए? निश्चित रूप से यह अपने अस्तित्व को बचाने की लड़ाई है। एक कार्यालय में यदि सभी कार्य ठीक ढंग से तथा सुचारू रूप से चल रहे हैं तो वहां पर कुछ लोग अपने अस्तित्व को बढ़ाने के लिए उसमें अपनी टांग अडा देंगे तथा उस कार्यालय को बर्वाद होने के कगार पर पहुंचा कर दम लेंगे। जब तक वे दूसरों के जड़ों को कमजोर नहीं करेंगे तो उनकी जड़ें मजबूत नहीं होंगी। यहाँ पर झगडे का कारण उच्च महत्त्वाकांक्षा का होना है। यदि कुछ रचनात्मक कार्य करना है तो मनुष्य की बुद्धि और उसके अच्छे स्वभाव का मेल होना ही होगा। मैंने अरुणाचल के दूर-दराज के क्षेत्र में कार्य किया है और पाया है कि जिस किसी ने सुदूर सीमावर्ती क्षेत्र में कार्य किया है – उनमे परोपकार की भावना अधिक होती है अथवा मानवीय संवेदना अधिक होती है। उनमे दूसरों के दुःख को समझ पाने की क्षमता अधिक होती है। इसके विपरीत शहरी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों में कम होती है। मैं ऐसा नहीं कह रहा हूँ कि शहरी क्षेत्रों में रहनेवाले बिलकुल संवेदना रहित होते हैं।इसीलिए यदि ईश्वर ने यह मानवीय शरीर दिया है तो इसका सदुपयोग मानव तथा अन्य प्राणियों से प्रेम करके हम कर सकते हैं। प्रेम अपने से भी करना होगा। यह नहीं कि अपने शरीर को हम कष्ट पहुंचाए। यदि हम अपने से प्रेम करेंगे तो हम ध्यान की अवस्था में पहुँच सकते हैं। ध्यान की अवस्था में आत्मा को शक्ति की प्राप्ति होती है। जो कि जीवन के लिए अति आवश्यक है। इसीलिए यदि क्रोध आए तो उसे नियंत्रण करना जरुरी है। अन्यथा बात बिगड़ सकती है और हम अनावश्यक रूप से किसी संकट में फंस सकते हैं।

खादी का महत्त्व

खादी महात्मा गांधी का पसंदीदा कपड़ा था। उन्होंने 'यंग इंडिया' में कहा, "खद्दर (खादी) हमें एकजुट कर सकता है और कुछ नहीं कर सकता"। 'यंग इंडिया' 1919 और 1931 के बीच महात्मा गांधी द्वारा प्रकाशित अंग्रेजी में एक साप्ताहिक पत्रिका थी। आज उष्मीकरण के युग में मनुष्य को एक बार पुनः खादी के वस्त्र को अपनाना होगा। खादी के महत्त्व को राष्ट्रपिता ने बहुत पहले पहचान लिया था। उन्हें पता था कि एक दिन ऐसा आएगा जब पर्यावरण के अस्तित्व पर संकट आएगा तब यही खादी मनुष्य को भयानक गर्मी से बचाने में मददगार होगा। एक युगद्रष्टा होने के नाते वे समझ चुके थे कि आनेवाला समय खादी का ही होगा। इतिहास साक्षी है कि स्वदेशी, स्वराज, सत्याग्रह के साथ चरखे और खादी ने भारत की आज़ादी की लड़ाई में कितनी अहम भूमिका निभायी है। खादी सिर्फ वस्त्र नहीं परिश्रम और स्वाभिमान का प्रतीक भी बनी। तभी तो कवि सोहनलाल द्विवेदी ने लिखा - खादी के धागे धागे में,अपनेपन का अभिमान भरा। माता का इसमें मान भरा, अन्यायी का अपमान भरा। खादी या खद्दर भारत में हाथ से बनने वाले वस्त्रों को कहते हैं। खादी वस्त्र सूती, रेशम या ऊन से बने हो सकते हैं। इनके लिये बनने वाला सूत चरखे की सहायता से बनाया जाता है। खादी वस्त्रों की विशेषता है कि ये शरीर को गर्मी में ठण्डे और सर्दी में गरम रखते हैं। भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन में खादी का बहुत महत्व रहा। गांधीजी ने 1920 के दशक में गावों को आत्मनिर्भर बनाने के लिये खादी के प्रचार-प्रसार पर बहुत जोर दिया था। खादी जो एक समय भारत के स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक हुआ करती थी, आज अपने अस्तित्व को बचाने की लड़ाई लड़ रही है। फिर भी लोग हैं जो इस धारणा के विपरीत यह मानते हैं कि आज का दौर सदाबहार खादी के इस्तेमाल की नई इबारत लिख रहा है। खादी चलन में तो हमेशा थी, पर अब फैशन में भी आगे की पंक्ति पर शुमार है। इसी कड़ी में केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने प्रस्ताव दिया है कि स्कूल सप्ताह, पखवाड़े या महीने में एक बार खादी-पहनने का दिन तय करें जिससे कि बापू की 150 वीं जयंती श्रद्धापूर्वक मनाया जा सके। स्कूलों को दिए गए अपने नोटिस में सीबीएसई ने महात्मा गांधी द्वारा लोगों को ग्रामीण भारत में आत्मनिर्भरता और जीविका को मजबूत करने के साधन के रूप में खादी पहनने और प्रोत्साहित करने के लिए अनुरोध किया है। "खादी, भारत की विरासत का कपड़ा है, जो न केवल हमारे देश के लाखों ग्रामीण कारीगरों को रोजगार के अवसर प्रदान करता है, बल्कि एकता और समानता को भी बढ़ावा देता है। सीबीएसई के इस प्रस्ताव से पर्यावरण की रक्षा हो सकेगी तथा छात्रों के बीच में खादी के महत्त्व का प्रचार-प्रसार होगा। आनेवाली पीढ़ी खादी के महत्त्व को समझ सकेगी। सीबीएसई के इस पहल को अन्य शिक्षा बोर्ड को अपनाना चाहिए तथा परोक्ष रूप से ही सही पर्यावरण रक्षण, पोषण तथा रोजगार सृजन में योगदान करना चाहिए।

शिक्षकों का नामकरण

कक्षा दसवीं में पाठ्यक्रम – बी में एक पाठ ‘सपनों के-से दिन’ पढाई जाती है। जो गुरुदयाल सिंहजी द्वारा लिखी गयी है। इसमें बाल सुलभ नैतिकता का पाठ काफी सुंदर से बताया गया है। पाठ एक संस्मरण है। लेखक अपने स्कूल के दिनों को याद करते हैं । लेखक बहुत संपन्न परिवार से न थे । वे ऐसे गाँव से थे जहाँ कुछ ही लड़के पढाई में रूचि रखते थे । कई बच्चे स्कूल कभी जाते ही नहीं या बीच में ही पढ़ाई छोड़ देते थे। बच्चों के बाल-सुलभ शरारतों को लेखक ने काफी रोचक अंदाज में प्रस्तुत किया है। पाठ पढ़ते – पढ़ाते समय मुझे भी अपना बचपन याद आ गया तथा सोचा क्यों न अपने विद्यालय के जीवन को स्मरण किया जाए।

इस सोच कर मेरे चेहरे पर मुस्कान आ गयी। क्योकि इस नेक काम मे , मैं बहुत आगे रहता था। हर समय मेरे मन मे खुराफात चलती रहती थी लेकिन शक्ल से बहुत सीधा था। मैंने अपनी कक्षा पांचवी से लेकर दसवीं तक की पढाई शारदा पाठशाला कहलगांव, भागलपुर से की हैं जो कि एक अनावासीय विद्यालय है।

शुभारम्भ हम प्रधानाचार्य से करते है हमने उनका नाम ‘वाइट एंड वाइट’ रखा था क्योंकि उनके कपडे एकदम सफ़ेद थे। मजे की बात यह थी कि इस बात का उन्हें भी पता था। जैसे ही वे दोपहर के समय हमारे कक्षा में आते और हमारी जब हमारी दोपहर की कक्षा का समय होता तो हमलोग सो रहे होते तो कुछ बच्चे उन्हें देख लेते थे तो साथी चिल्लाते, “ भागो भागो! ‘वाइट एंड वाइट’ आ रहे है डंडा लेकर और फिर चूहा बिल्ली का खेल शुरू हो जाता था। भागने-भगाने के क्रम में भी हमारे प्राचार्य अपने वस्त्र का बहुत ध्यान रखते थे और क्या मजाल कि उनके कपडे ख़राब हो जाएं। स्वच्छता में तो वे मुझे लगता है कि हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद मोदीजी को भी पीछे छोड़ते थे। देखने में भी वे एकदम सफ़ेद और ऊपर से सफ़ेद वस्त्र उनकी सुन्दरता में चार-चाँद लगा देता था।

अब आते हैं समाज विज्ञान के अध्यापक पर उनका नाम हमने ‘ लाफाटा’ रखा था। क्योंकि वे ज्यादा बोलने वाले छात्र को सीधे लाफाटा लगा देते थे। उनको जरा-सा भी डर नहीं लगता था। किसी से वे नहीं डरते थे लेकिन छात्रों को बेहद प्यार करते थे।

अब आते हैं भौतिक विज्ञान के अध्यापक पर। वे बहुत आलसी आदमी थे इनसे अगर हम प्रश्न पूछने जाते तो वे प्रश्न बताते-बताते सो जाया करते थे इसलिए हमने इनका नाम ‘निंदू सम्राट’ रखा था। पढ़ाने का तरीका उनका बहुत ही सरल था। बच्चों पढो – समझ में आया? यदि हमलोग ‘नहीं’ बोलते तो कहते फिर से पढो। पढ़ना अपने से ही होता था और यह क्रम तबतक चलते रहता जब तक हमलोग थक हार कर ‘समझ गए’ नहीं बोल देते थे।

अब आते हैं अंग्रेजी के अध्यापक पर। इनका नाम हमने ‘ऑटोमेटिक सर ’ रखा था। क्योंकि वे स्वचालित अंदाज में ही चला करते थे। बिल्कुल सीधे ना इधर न उधर देखते थे । ऐसा प्रतीत होता था कि अपने कमरे से चाबी भरकर आए हैं कक्षा तक आने के लिए। लेकिन बच्चों के लिए उनके दिल में बहुत प्यार था। अपने वेतन से छुपकर वे बच्चों के विद्यालय के शुल्क को जमा करते थी और वह भी छुपकर।

अब आते हैं क्रीडा अध्यापक के पास इनका नाम हमने ‘सीबीआई ऑफिसर’ रखा था क्योंकि ये छानबीन पर ज्यादा ध्यान देते थे विद्यालय में अगर कोई बात हो जाती तो यह बिल्कुल सीबीआई ऑफिसर की तरह जांच पड़ताल करते और अपराधी को पकड़ कर ही लाते। उनकी पारखी नजर से बचना-बचाना बहुत ही दुरूह कार्य था। यदि कोई छात्र कुछ भी अनैतिक कार्यो को करता तो सबसे पहले विद्यालय में यह खबर क्रीडा-अध्यापक के पास पहुँच जाती। विद्यालय में उनके मुखबिर भरे पड़े थे। किस जादू से वे अपराधी को धर दबोचते थे यह आज तक राज है। मैं आजतक उनके इस राज को नहीं जान पाया। आज के समय में बच्चे राज खोलते ही नहीं हैं। चाहे हम कितनी भी सख्ती कर लें। मगर हमारे क्रीडा-शिक्षक की बात ही निराली थी।

अब आते हैं संगीत अध्यापिका के पास इनका नाम हमने ‘रानी विक्टोरिया’ रखा था!! उनका रूप-रंग भी रानी की ही तरह था। वस्त्र –सज्जा एवं रूप सज्जा पर ज्यादा ध्यान देती थीं। उनके रूप-रंग को देखकर छात्र भी दंग रह जाते थे। मगर वे अपनी कक्षा में सबको प्रवेश नहीं देती थी। जो उनके जाँच में सफल होगा उसी को वे संगीत की शिक्षा देती थी। मुझे उनसे संगीत सीखने का अवसर प्राप्त नहीं हुआ। यह मलाल आज तक है।

उपप्राचार्य का नाम हम छात्रों ने दम्मा बाबू रखा था। उनको दमे की शिकायत थी। वे हमेशा बीमार रहा करते थे। उनका आना छात्रों को बहुत ही भाता था। हम बहुत से छात्र उनके सफरी एजेंट की तरह कार्य करते थे। पानी लाना, उनकी बछिया को खोज निकालना, उनके घर के लिए सब्जी खरीद कर लाना हम छात्रों को काफी अच्छा लगता था। घर पर सामान लेकर जाने से कुछ सुंदर खाने-पीने को भी मिल जाता था। हमलोग विद्यालय में आगे बढ़कर उनसे पूछ लेते थे कि सर घर में कुछ काम है क्या?

और यदि अपने संस्कृत अध्यापक की बात नहीं करूँ तो कथा अधूरी रह जायेगी। उनको हमलोग ‘पंडित सर’ ही कहते थे। सरस्वती पूजन के बाद उन्होंने सामान को समेटने की जिम्मेदारी मुझे दे दी। मैंने जानबूझकर या गलती से जो भी कहें थैले में नारियल की जगह एक आधा ईंट रख दिया। थैला भारी भी हो गया। पंडित सर काफी प्रसन्नता से थैला लेकर अपने घर गए। अगले दिन क्या हुआ होगा इसकी कल्पना आप कर सकते हैं। उस घटना को याद करने से आज भी मेरे शरीर में दर्द होने लगता है। जो कुटाई या धुनाई हुई उसकी याद काफी भयावह है। वह नारियल काफी मंहगा पड़ गया। हालाँकि नारियल मैंने अकेले नहीं खाया था बल्कि मित्रों के साथ ईमानदारी से बाँटकर खाया था। लेकिन धुनाई के वक्त एक भी मित्र सामने में नहीं आया।

जो भी हो विद्यालय में बिताए गए दिन आज भी याद आते हैं। यदि कोई छात्र गलती करते हुए पकड़ा जाता है और मेरे सामने लाया जाता है तो मैं अपने दिनों को याद करते हुए माफ़ करने में ही विश्वास रखता हूँ। मैं समझ जाता हूँ कि ये दिन शरारत करने के ही हैं।

सरकार का दायित्व

कक्षा नवीं में एक कहानी कथाकार यशपालजी द्वारा लिखित ‘ दुःख का अधिकार’ पढाई जाती है. इस कहानी में एक बूढ़ी औरत का जवान बेटा सांप के काटने से काल के पास चला जाता है और बूढ़ी औरत पेट की खातिर बाजार में तरबूजे लेकर बेचने के लिए बैठती है. राह चलते लोग उस बूढ़ी औरत को ताना मारते हैं लेकिन कोई भी उनकी मदद को नहीं आता है. लेखक उस वृद्धा की तुलना उसी शहर में एक अमीर महिला के बेटे की मौत के साथ जोड़ते हैं. उस अमीर महिला के बेटे की मौत पर शहर के तमाम लोग इकट्ठा हो गए थे. महीने भर तक उस शहर में मातम का माहौल रहा. लेखक यहाँ कहना चाहते हैं कि जब अमीर का बेटा मारा तो सारा शहर मातम मनाने लगा वही उस बूढ़ी के लिए कोई खड़ा नहीं हुआ. यह दुहरा चरित्र हमारे समाज का है. अमीर के साथ सारा समाज खड़ा हो जाता है. गरीब के साथ कोई नहीं आता है. कुछ दुख अनिवार्य और विराट होते हैं, क्योंकि वे बडे़ लोगों के दुख होते हैं. अत: स्वाभाविक तौर पर उन्हें भव्य होना होता है. यह उनकी नियति है. उन दुखों में बहुत से लोग शरीक होते हैं या होना चाहते हैं. यही उस दुख की सामाजिकता का सार है, दुख का भव्य, विराट उत्सव. लेखक यशपाल दोनों के दुखों को एक करना चाहते हैं. दोनों के दुःख में पीड़ा समान है. दर्द हाथी को हो या चींटी को – सहना या बर्दाश्त तो दोनों को करना है. यही दुःख की विशेषता है. किसी का दुःख छोटा या बड़ा नहीं होता है – दुःख तो दुःख होता है.

उसी प्रकार की स्थिति कमोबेश अभी हमारे राज्य बिहार में बनी है. अकेले मुजफ्फरपुर में 120 से ज्यादा बच्चों की मौत जापानी दिमागी बुखार चमकी या एक्यूट इंसेफलाइटिस सिंड्रोम से हो गयी है. सरकार ने 4 लाख मुआवजा का एलान करके अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली. मगर इन मौतों पर चीख – पुकार मचाने के लिए शुरुआत में कोई नहीं आया. समझ में नहीं आया कि हमारा समाज इतना संवेदना से रहित कैसे हो गया. बाद में केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रियों आदि का दौरा हुआ. बिहार के मुख्यमंत्री भी गए. लेकिन जाने में बहुत देर शासन तंत्र ने कर दी. तब तक कितने माँ की गोद सूनी हो चुकी थी. घर के चिराग बुझ चुके थे. किलकारियां बंद हो गयी थीं. यह बीमारी बिहार के लिए कोई नयी बात नहीं है. पिछले एक दशक से इसी समय यह बीमारी बिहार में आती है और कितने बच्चों को लील कर चली जाती है. सबसे ताज्जुब तो तब हुआ जब यह मालूम हुआ कि लीची खाने से बच्चे की मौत हुई. अब समझ में नहीं आता है कि लीची खाने का सम्बन्ध मौत से कैसे हो गया? पूछताछ पर पता चला कि खाली पेट लीची खाने से बच्चों की मौत हुई है. तो क्या जिन बच्चों का पेट भरा होगा – उन्हें यह खतरनाक बीमारी नहीं होगी? लीची तो एक प्राकृतिक फल है. यदि ऐसा वास्तव में है तो यह चिंतनीय विषय है. एक आश्चर्य और हुआ कि मुजफ्फरपुर के सांसद ने बच्चों की मौत का सम्बन्ध 4G से कर दिया. यहाँ 4G का सम्बन्ध गाँव, गरीबी, गंदगी तथा गर्मी से है. जब सरकार को पता है तो इन 4G से बचने का उपाय सरकार ने क्यों नहीं कर लिया? जब पता है तो उसका उपाय भी होना चाहिए. टीवी चैनलों को एक खबर मिल गया दिखाने के लिए. नुकसान तो उनका हुआ जिनका अपना कोई चला गया. अभी भी वक्त है कि हम सब सचेत हो जाएं तथा असमय होने वाली मौत को रोक सकें. बच्चे हमारे देश के कर्णधार हैं चाहे वे किसी भी वर्ग से आते हों. उनकी देखभाल करना हमारा तथा सरकार का दायित्व है.

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पर्यावरण-सरंक्षण का अनूठा उपहार

हमारी संस्कृति में राजा – महाराजा के सुख-दुःख में जनता अवश्य शामिल होती है। जब भी खुशियाँ सम्राट द्वारा मनायी जाती है तो जनता का हित सर्वोपरि देखा जाता है। इस हित में पर्यावरण का हित भी शामिल होता है। यदि पर्यावरण ठीक है तो जनता स्वस्थ रहेगी और यदि जनता स्वस्थ है तो फिर देश में किसी बात की चिंता ही नहीं है। इतिहास गवाह है कि जब श्रीराम वनवास की अवधि पूर्ण कर अयोध्या वापस आए तो पूरे अवध में खुशियों को व्यक्त करने के लिए दीपावली मनायी गयी। यह एक तरह से पर्यावरण को ठीक करने का एक माध्यम भी था।

पृथ्वी पर एक जगह है, शायद आखिरी में से एक, जहां प्रकृति और मनुष्य एक के रूप में मौजूद हैं; सरकार खुशी को प्राथमिकता देती है, और भूमि और वन्यजीवों का संरक्षण बहुत महत्वपूर्ण मानती है, इसकी रक्षा के लिए कानून बने हुए हैं। इस देश का नाम भूटान है। भूटान के मैदान में प्रवेश करना एक सपने में फंसने जैसा है। समय धीमा लगता है। हवा हिमालय के माध्यम से सांस लेती है। सब कुछ एक सामंजस्यपूर्ण अस्तित्व में रहता है। यह एक ऐसा राष्ट्र है जिसमें जनता का स्वागत एक परिवार की तरह किया जाता है।

इसी कड़ी में हमारे पडोसी देश भूटान में वहां के नरेश का जन्मदिन एक अलग तरह से मनाया गया। वहां के नरेश जिग्मे खेसर नामग्याल वांगचुक ने अपने देशवासियों से अपील की थी कि उन्हें किसी तरह का उपहार न दिया जाए। उनके जन्मदिन पर हर व्यक्ति एक पौधा लगाए या किसी आवारा पशु को गोद लेकर उसकी देभाल करे या अपने घर के आसपास खाली जगह पर या पड़ोसी के घर के आसपास साफ-सफाई करने की प्रतिज्ञा ले। यही उनके लिए सबसे बड़ा उपहार और सम्मान होगा। इस अपील का वहां की जनता ने तहेदिल से स्वागत किया। इस अपील से वहां पर्यावरण को कितना महत्त्व दिया जाता है – इसका पता भी चल गया। अभी दुनिया में पर्यावरण को सबसे अधिक महत्व देने वाला देश भूटान है। ऐसा पहली बार हो रहा है – ऐसा भी नहीं है। जब पहली बार भूटान नरेश को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई थी तो भूटान के सम्राट तथा सम्राज्ञी ने प्रत्येक घर में एक पौधा लगाने की अपील की थी। यह बात 2016 की है। अब लगभग 108,000 से अधिक लगाए गए पौधे पेड़ बन रहे हैं। केवल पौधा लगाने भर से नहीं होगा। नरेश ने यह भी अपील की थी कि उन पौधों की व्यक्तिगत रूप से देखभाल भी की जाए। देखभाल तब तक की जाए, जब तक वह पौधा पेड़ न बन जाए। साथ ही हमारे देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरह पूरे देश में स्वच्छता के प्रति भी उन्होंने अपने देश के नागरिकों को कार्य करने के लिए कहा। इसमें कचरा-प्रबंधन मुख्य था। जैसा कि पहले भी उल्लेख किये हैं कि किसी भी देश की अर्थव्यवस्था में पर्यावरण का स्वच्छ होना आवश्यक है। तभी उस देश में स्वास्थ्य, शिक्षा और उद्योगों का विकास हो सकेगा। भूटान के बच्चों पर नेश के इस अपील का सकारात्मक प्रभाव पड़ा। एक कार्यक्रम में खासकर स्कूली बच्चों ने दिल को छू लेनेवाले संकल्प लिए।

फिल्म गुलाबो-सिताबो

जैसी की आशंका थी – वही हुआ। भारतीय सिनेमा के इतिहास में 12 जून एक मील का पत्थर साबित हुआ। भारत में नयी फिल्म सिनेमाघरों में शुक्रवार को प्रदर्शित की जाती हैं। यह क्रम जब से मैंने होश संभाला तब से देखा है। पहले दिन फिल्म देखने का एक अलग क्रेज भी युवा वर्ग में देखा है। कितनों को तो यह नशा के रूप में लगते देखा है। पहला दिन तथा पहला शो – हर हाल में फिल्म के शौक़ीन देखना चाहते हैं। जिस रास्ते में सिनेमा घर स्थित रहता है, वह रास्ता शुक्रवार के दिन जाम से पीडित रहता है। लोग भी शुक्रवार के दिन वह रास्ता छोड़कर दूसरा रास्ता पकड़ना चाहते हैं। मगर परिस्थिति बदली। सिनेमा का जादू लोगों के दिमाग से उतरा तथा लोग घर में ही टीवी के सामने बैठकर फिल्म का आनंद उठाने लगे। इसी कड़ी में फिर समय बदला तथा पहली बार अपने देश में फिल्म डिजिटल अंदाज में रिलीज़ की गयी। इसमें पहला नाम गुलाबो-सिताबो का है। यह फिल्म सुजीत सरकार द्वारा निर्मित है। कोरोना संकट के कारण सिनेमा हॉल बंद पड़े थे। लगभग तीन महीनों से कोई फिल्म रिलीज़ नहीं हो रही थी। फिल्म उद्योग संकट से त्राहि – त्राहि कर रहा था। ऐसा लग रहा था कि निर्माता इसे सिनेमाघर में ही प्रदर्शित करेंगे। अब जब मॉल, सिनेमाघर और मल्टीप्लेक्स कब खुलेंगे, कोई नहीं जानता, तो मजबूर होकर गुलाबो सिताबो को अमेजन के जरिए दर्शकों तक पहुंचाना पड़ा है। यह भारत में किसी बड़ी फिल्म की पहली डिजिटल रिलीज है। इस रिलीज को अहम घटना इसलिए भी माना जाना चाहिए, क्योंकि इससे शायद अनेक बडे़ निर्माताओं का संकोच कम होगा। उन्हें कोरोना के दौर में नया साहस मिलेगा और वे ऐसी रिलीज के बारे में सोच सकेंगे।

फिल्म की कहानी में लखनऊ के रहने वाले एक किरायेदार और मकान मालिक के बीच की लड़ाई को हल्के तरीके से दिखाया गया है। इसमें अमिताभ बच्चन 78 साल के मालिक मिर्जा का किरदार निभा रहे हैं जबकि आयुष्मान खुराना किरायेदार बांके का किरदार निभा रहे हैं। फिल्म के निर्माता सुजीत सरकार ने एक ट्वीट कर बताया कि “गुलाबो-सिताबो” फुर्सत से देखिये और अगर फुर्सत ना हो तो फुर्सत निकाल कर इत्मीनान से देखिये। इस फिल्म से अभिनेता अमिताभ बच्चन जी अधिक खुश हुए होंगे। उनके सामने ही फिल्म अब डिजिटल प्लेटफार्म पर प्रदर्शित हो रही है। शायद उन्होंने भी कभी नहीं सोचा होगा कि सिनेमाघर एक दिन इतिहास बन जाएगा। आज पारम्परिक सिनेमाघर का निर्माण लगभग बंद हो चुका है।

गुलाबो-सिताबो 15 भाषाओं में 200 देशों में रिलीज हुई है। इससे साफ़ दिख रहा है कि फिल्म निर्माता डिजिटल प्लेटफॉर्म से अपनी पूरी कीमत वसूलने के लिए सौदेबाजी कर सकते हैं। लगता नहीं है कि इस प्लेटफार्म पर निर्माता को हानि उठाना पड़ेगा। हाँ बड़े कलाकार दुखी अवश्य हो सकते हैं। अब पहले की तरह टिकटों की कालाबाजारी नहीं होती है। पहले रात से ही सिनेमा के टिकट के लिए लोग पंक्तियों में खड़े हो जाते थे। वह अब इतिहास बन चुका है। लेकिन अच्छी बात यही है कि अब फिल्म उद्योग भी चल पड़ेगा। कलाकारों को काम मिल सकेगा। जो फिल्मे तैयार होकर प्रदर्शन के लिए अपनी बारी देख रही है वह अब डिजिटल प्लेटफार्म पर देखने के लिए मिल सकेगा। फिल्मों के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर रिलीज होने से पारंपरिक फिल्म उद्योग पर गहरा असर पडे़गा। फिल्म निर्माण से लेकर उसके प्रदर्शन तक का जो ढांचा अनेक दशकों की मेहनत से खड़ा हुआ है- उस पर चोट पड़ रही है। फिल्म कारोबार प्रभावित हुआ है, तो रोजगार भी चंद कमरों तक सिमट आया है। यह बदलाव आने वाले समय के लिए एक सुखद सन्देश दे रहा है।

बहुत बड़ा बदलाव

मई के पहले सप्ताह में जम्मू-कश्मीर से काफी दर्दनाक ख़बरें आयी। हमारे जवान आतंकवादियों से लोहा लेते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। उनकी शहादत की खबरों से मन एकदम व्यथित था। पिछले साल धारा 370 हटने के बाद कश्मीर से किसी प्रकार की अशांति की ख़बरें नहीं आ रही थी। ऐसा लग रहा था कि कश्मीर शान्ति की तरफ बढ़ रहा है। लेकिन ऐसा लगता है कि पडोसी देश अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है। वह कश्मीर मुद्दे को किसी न किसी रूप से जिन्दा रखना चाहता है। जहाँ दुनिया कोरोना से लड़ रही है वहीँ कश्मीर को लेकर पाकिस्तान के हुक्मरानों की नींद गायब है।

लेकिन अचानक फिर अच्छी ख़बरें आनी शुरू हुई। एक दुर्दांत आतंकवादी नायकू का खात्मा कर सेना ने अपना बदला पूरा किया। इससे सेना का मनोबल अवश्य ही बढ़ा होगा। लेकिन इसके अतिरिक्त शान्ति के साथ जो एक बहुत बड़ी खबर मिली वह यह कि अब हमारा देश पाकिस्तान को तोड़ने के लिए पूरी तरह से तैयार है। पाकिस्तान सरकार को यह बता दिया गया है तथा यह एक बहुत बड़ा कदम हमारे देश द्वारा उठाया गया है। ऐसा हुआ कि भारतीय मौसम विभाग ने पाक अधिकृत कश्मीर और गिलगित-बाल्टिस्तान के मौसम का पूर्वानुमान लगाया। यह कदम चुपचाप बिना किसी बड़ी घटना या समारोह के उठाया गया है। इससे लग रहा है कि हमारा भारत अपनी कश्मीर नीति पर गियर बदल रहा है। ऐसा लगता है कि अब बड़े कदम उठाने के लिए देश तैयार है। बात सिर्फ मौसम की नहीं लगती है। यह खबर बहुत ही बड़े परिवर्तन की तरफ साफ़ संकेत कर रही है। धारा 370 तो एक शुरुआत लग रही थी और उस वक्त भी लगा था कि जिस तरह से एक के बाद एक मुद्दों को सरकार हल करते जा रही है तो पाक अधिकृत कश्मीर पर हमारा कब्ज़ा भी अवश्य होगा। इस ख़ुशी के लिए कई निगाहें टकटकी लगाकर अभी सरकार के कदमों की ओर देख रही हैं। कल को सकता है कि पाकिस्तानी अवाम को भी वहां के अत्याचारों से हमारी सरकार मुक्त कराए। ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि एक सूक्ष्म बदलाव में, भारत के मौसम विभाग ने जम्मू और कश्मीर के अपने मौसम संबंधी घोषणाओं में उप-विभाजन का उल्लेख "जम्मू और कश्मीर, लद्दाख, गिलगित-बाल्टिस्तान और मुज़फ्फराबाद" के रूप में करना शुरू कर दिया है। जैसा कि हम जानते हैं कि मुजफ्फराबाद, गिलगित-बाल्टिस्तान पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर का हिस्सा है। नई दिल्ली से भारतीय मौसम विभाग द्वारा जारी उत्तर-पश्चिमी भारत के लिए दैनिक पूर्वानुमान में मंगलवार से नाम में परिवर्तन दिखाई देने लगा। दैनिक क्षेत्र-वार पूर्वानुमान पूरे उप-विभाजन के लिए हैं, न कि किसी विशिष्ट क्षेत्र के लिए। यह कदम न केवल एक अलग केंद्र शासित प्रदेश के रूप में लद्दाख की बदली हुई स्थिति को दर्शाता है बल्कि एक महत्वपूर्ण अंतर्निहित संदेश देता है। इधर हाल ही में पाकिस्तान की अदालत ने गिलगित-बाल्टिस्तान में चुनाव कराने की अनुमति दी थी जिसके बाद भारत सरकार के विदेश मंत्रालय ने जोरदार आपत्ति दर्ज की थी। इस प्रकार के किसी चुनाव को ख़ारिज करने की बात कही थी।अब सरकार के रुख से तो यही लगता है कि बहुत जल्द पाकिस्तान का मानचित्र बांग्लादेश विभाजन के बाद बदलने वाला है।

बात ‘आम’ की

‘आम’ का बहुत ही व्यापक अर्थ होता है। यह एक फल है जो खाया या चूसा जाता है। इसे दूसरे तरीके से ऐसे भी पढ़ा सकते हैं- गर्म प्रदेशों में पाया जाने वाला एक बड़ा, सदाबहार पेड़ जिसके रसीले फल खाए या चूसे जाते हैं। ‘आम’ का एक अर्थ जो उसकी विशेषता को कम या अधिक करता है वह है इसका सर्वसाधारण होना। जिसमें कोई विशेषता नहीं हो अथवा हलके दर्जे का हो -उसे भी ‘आम’ कहा जाता है। या प्रायः सभी व्यक्तियों, अवसरों, अवस्थाओं आदि में पाया जाने वाला या उनसे संबंध रखने वाला मामूली, साधारण जनता को भी ‘आम’ कहा जाता है

अब बात फल वाले ‘आम’ की करते हैं। फलों का राजा ‘आम’ ही है तथा मूल रूप से इसकी उत्पति हमारे देश में हुई है। संस्कृत भाषा में इसे आम्र: कहा जाता है। इसी से इसका नाम ‘आम’ पड़ गया। 1490 के अंत में पुर्तगाली केरल से मसालों के साथ ‘आम’ और इसका नाम भी ले गये। वे लोग इसे मांगा बोलते थे। मांगा से अंग्रेजी में मैंगो गया। कालिदास के साहित्य में भी ‘आम’ का जिक्र है। इनके अलावा ह्वेनसांग और इब्ने बतूता के विवरणों में भी ‘आम’ का उल्लेख मिलता है। मुगल वंश के संस्थापक बाबर ने ‘बाबरनामा’ में लिखा है कि हिंदुस्तान के अपने फलों में एक अंबा यानी ‘आम’ है। हमारे देश में इसकी कई किस्में मौजूद हैं।

· अलफांसो किस्म ‘आम’ फलों का राजा है, इसकी पैदावार खासतौर से महाराष्ट्र में होती है। कई और राज्यों में इसे बादामी, खादेर, हापुस और कगड़ी हापुस आदि नामों से भी जाना जाता है। इसकी गुठली भी छोटी होती है।बाकी किस्मों से यह ‘आम’ थोड़ा महंगा होता है।

· जर्दालु : बिहार होने वाले जर्दालु ‘आम’ की खुशबू इसे खाने के लिए मजबूर कर देती है। इसके गूदे में रेशे नहीं होते। इसका स्वाद ही कुछ ऐसा है कि एक बार जो इसे चख ले वह इसका दीवाना हो जाता है।

· तोतापरी इस ‘आम’ की तोते की चोंच जैसी नोक और रंग के कारण इसे तोतापरी कहा जाता है। यह मुख्यतः आंध्र प्रदेश की ‘आम’ की एक किस्म है।

· लंगड़ा ‘आम’ की यह वेराइटी ‘आम’तौर सभी जगह मिलती है। इसे ही बिहार व पश्चिम बंगाल में मालदा ‘आम’ के नाम से भी जाना जाता है।यह गूदेदार और बहुत मीठा होता है। उत्तर भारत में सबसे ज्यादा पसंद किया जानेवाला यही ‘आम’ है।

· हिमसागर : पश्चिम बंगाल में हिमसागरएक बहुत ही लोकप्रिय ‘आम’ की किस्म है। यह बांग्लादेश में भी काफी लोकप्रिय है।यह देखने में हरा होता है, लेकिन स्वाद में लाजवाब होता है

· दशहरी: दशहरी ‘आम’ का सबसे ज्यादा उत्पादन उत्तर प्रदेश में होता है। कहा जाता है कि दशहरी ‘आम’ का पहला पेड़ लखनऊ के पास काकोरी स्टेशन से सटे दशहरी गांव में लगाया गया था। इसी गांव के नाम पर इसका नाम दशहरी ‘आम’ पड़ा।

· बीजू इसका साइज छोटा होता है। इसे बीजू कहने का तात्पर्य है कि इस तरह के ‘आम’ का पौधा कलम की जगह सीधे ‘आम’ के बीज से पेड़ का रूप लेता है।

· इसके अलावा भी ‘आम’ की कई किस्में हैं, जिनमें सफेदा, चौसा, नीलम, केसर, किशन भोग, फजली, गुलाबखास, सिंदूरी आदि प्रमुख हैं, इन सबकी भी अपनी विशेषता है।

इस प्रकार ‘आम’ तो ‘आम’ है। अभी ‘आम’ का समय है। ‘आम’ खाएं तथा हम ‘आम’ हो जाएँ।

बारात का मौसम

आजकल मौसम के हिसाब से शादियाँ होती है. आज से लगभग 40 साल पहले गर्मियों में अधिक शादियाँ होती थी. मगर वैश्विक उष्मीकरण के कारण गर्मी की शादी को जाड़े में धीरे – धीरे किया जाने लगा. जहाँ तक मुझे याद है पहले दूल्हा धोती पहनकर ही शादी के लिए जाता था. मगर आजकल के नौजवान धोती के नाम से ही बिदक जाते हैं. शेरवानी, बाघवानी, बकरीवानी और न जाने क्या-क्या पोशाक आ गया है. सभी का नाम लेना भी मुश्किल है. महिला समाज भी सजने – संवरने में पीछे नहीं रहती है. वे गले में न जाने क्या पहन लेती है – जिससे देखने में वे ‘नीलगाय’ की तरह लगने लगती है. तो अभी जाड़े की शुरुआत हुई है और शादियों का मौसम आ गया है. मगर बारात में जाने का मजा आजकल नहीं मिलता है. बारात को रात में ही विदा कर दिया जाता है. सुबह में घर खाली हो जाता है. मैगी नुडल्स की तरह आज की शादी भी हो गयी है. निमंत्रण व्हाट्सएप्प पर भेज दिया जाता है. सुपाड़ी देने का रिवाज तो करीब-करीब समाप्त ही हो गया है. पूछने से लोग कहते हैं कि सुपाड़ी खाने से दांत ख़राब होता है. आज के इस इलेक्ट्रॉनिक युग में सभी कुछ जल्दबाजी में हो रहा है. आग्रह-भोज के नाम पर स्वरुचि-भोज हो गया है. वृद्ध जनों के लिए अलग से व्यवस्था कर दी जाती है. सब्जी, पूरी, लड्डु, दही और उन्हें पचाने के लिए लाल-मिर्च और न जाने कितने पकवान व्यवस्थित ढंग से सजा कर रख दिए जाते हैं.– मगर आग्रह खाने के लिए कोई नहीं करता है. लगता है कि सभी औपचारिकता ही निभाते हैं. पहले शादी का भोज खाने के लिए हफ़्तों इन्तजार होता था. दूर यदि कहीं गाँव में भोज खाने के लिए जाना है तो टॉर्च में बैटरी आदि भरवा लेते थे. हमारे बाबा तो पेट्रोमैक्स की व्यवस्था भी करवा लेते थे. ताकि सामने वाले गाँव वाले को पता चल जाए कि अमुक गाँव से लोग खाने के लिए अपने इंतजाम के साथ आए हैं. यदि नदी से बारात जानी है तो नदी किनारे बैठने के लिए दरी वगैरह आदि का भी इंतजाम होता था. परिवार के दामाद तथा फूफाजी के लिए अलग से इंतजाम होता था. हमारे एक फूफाजी काफी चाय पीते थे. हमारी सभी चाची उनके लिए हमेशा चाय-पान तैयार रखती थी. फूफाजी भी शादी में रौनक लगाते थे. हमारे एक बाबा ने गोत्र के नाम पर एक की शादी ‘हाडासंखन’ गोत्र पर करवा दी. हुआ ऐसा था कि लड़के का पिता और समूचा परिवार नशा में धुत था. पंडितजी गोत्र पूछ-पूछ कर परेशान थे. पास में ही बैठे हमारे बाबा ने तपाक से ‘हाडासंखन’ गोत्र का नाम लिया और पंडितजी ने भी बिना सोचे-बिचारे उसी गोत्र पर शादी करवा दी. सुबह में तो हंगामा होना ही था और हुआ. शादी तो अभी भी हो रही है, मगर पहले वाली आपसदारी नहीं है. पहले रात-रात भर औरते नाच-गाना करती थीं. आज के समय में सभी सोने के लिए होटल में चले जाते हैं. सभी को आराम चाहिए. संस्कृति विलुप्त होती जा रही है. शादियाँ तो होती रहेंगी. मगर उल्लास समाप्त हो जाएगा.

बुलंद हौसलों से विजय

कोरोना-काल में बहुतों ने बहुत कुछ खोया। जीवन बचाने की जद्दोजहद में एक लम्बी यात्रा तथा सब कुछ लुटाकर जब अपने घर पहुँचते हैं तो वहां पहले-से पांव जमाए अपने लोगों की बेरुखी दिल को तोड़ कर रख देती है। अपनों से अपने ही नफरत करने लगे हैं। पहले तो जातिवादी विचार से लोग परेशान होते थे तथा अस्पृश्यता आदि अनेक कुरीतियों से समाज भर गया था। लेकिन आज यदि देखता हूँ तो स्थिति और भी विकट होती जा रही है। कोरोना महामारी से जिंदगी की रफ्तार धीमी पड़ गयी। सभी जगह हाहाकार मचा है। चाहे वह आर्थिकी हो या शैक्षिक। सेवा क्षेत्र या व्यवसाय हो। सभी जगह लोग त्रस्त हैं। यह दौर लगता है कि पुरानी डायरी में छूट गए पेन-सा वाला है। विचार को और तेज करने का दौर है। सोच को पैनी बनाने का है। कभी-कभी घर की सफाई करते समय जब पुरानी धूल तथा तिलचट्टे लगी पुस्तकें अनायास सामने आ जाती हैं तो मन में एक उल्लास-सी उठती है। विद्यालय के दिनों में आध्यात्मिक तथा निश्छल प्रेम से ओतप्रोत चंद्रधर शर्मा द्वारा लिखित कहानी ‘ उसने कहा था’ पढ़ी थी। प्रेम का जैसा रूप कहानीकार ने उस कहानी में दिखाया है – वह निश्चय ही आज की युवा पीढ़ी को सीखना है। यहाँ तो आए दिन प्रेम-प्रसंग में आत्महत्या वाले समाचार को ही दिखाया-बताया जाता है। उसी तरह रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा रचित कहानी ‘काबुलीवाला’ की याद आती है। किस प्रकार रहमत अपनी बिटिया से प्यार करता है तथा वह भी बड़ी हो गयी होगी- यह भूल जाता है। ‘हार की जीत’ कहानी एक डाकू के हृदय परिवर्तन की कहानी है। बिना खून-खराबा किये एक संत ने डाकू का हृदय परिवर्तन कर दिया। इन सब कहानियों से दुबारा जुड़ने का अवसर कोरोना के कारण ही मिल पाया। किसी चलचित्र में जैसे नायक अपने अतीत में खो जाता है – वैसे ही अतीत में जाने लगता हूँ। अपने प्रदेश के घर-आंगन, कुएं-तालाब, गाय-भैंस आदि की याद आने लगती है। फिर सोचने लगते हैं कि क्या खोया-पाया? लगता है यह महामारी का दौर हमें या इंसान को उसके असली मकसद की याद दिलाने के लिए आया है। इस वैश्विक महामारी ने बहुत सारे लोगों को घर लौटाया है। तो बहुत सारे लोगों को उनके अपनों से मिलवाया है। अकेलेपन और एकांत का भेद समझाया है। समय लोगों के साथ बिताया जाए, तो अनुभव बनता-बनाता है, इस बुनियादी बात के अंतर को को बखूबी समझाया है। घर रहने की जगह है, कुछ को तो यह भी अभी समझ में आया है। घर के भोजन का स्वाद, अपनों का साथ, आसमान के रंग, मौसम की करवटें, सब के सब इस दौर के पन्नों पर रखे पेन को जब किसी डायरी में लिख पायें तो इन अनुभूतियों से दो-चार हुए बिना कैसे रह सकेंगे। मुखावरण, प्रक्षालक दूसरों से डरने और हर चीज़ को धोने का यह दौर फिलहाल हमें मज़बूत बना रहा है। पुराने नियम ही ठीक थे। विज्ञान की प्रगति कम थी लेकिन मनुष्य जाति थोड़े में प्रसन्न थी। संतुष्टि का वातावरण था। शायद यही बात हम सब को समझाने के लिए कोरोना आया हो? वाकई कठिन समय है लेकिन कामयाबी मिलेगी-इसमें संदेह नहीं है। आंतरिक व्यवस्था, चिकित्सा- सेवा का अभाव, आर्थिक स्थिति, रोजगार की कमी, आपसी विश्वास की कमी, प्राकृतिक आपदाएं तथा पडोसी देशों का रुख- इस समय ये सब हमारे सामने चुनौती हैं। हम सबको बुलंद हौसलों से इन सब पर विजय पाना है।

‘बेहतर’ नेतृत्व

‘बेहतर’ पाने के लिए ‘बेहतर’ देना होता है। ‘बेहतर’ वह है जो सभी में उत्कृष्ट हो। या अन्य सभी में सबसे ऊपर हो। सबसे बड़ा हो या वहां पर मौजूद या उपस्थित सबसे अच्छा हो। इसीलिए ‘बेहतर’ मनुष्य बनना, ‘बेहतर’ गुणों का विकास करना, ‘बेहतर’ वस्त्र धारण करना, ‘बेहतर’ व्यक्ति को कार्य पर लगाना, ‘बेहतर’ मार्ग का चयन करना, क्षमताओं का ‘बेहतर’ प्रयोग करना आदि बातें जीवन में आती हैं। यदि ‘बेहतर’ बनना है तो सभी जगह ‘बेहतर’ ही बनना होगा। चाहे वह घर हो, परिवार हो, कार्यस्थान हो या कहीं और हो। ऐसा नहीं है कि हम कार्यस्थल में ‘बेहतर’ कर्मचारी बने और घर में एक ‘बेहतर’ पुत्र नहीं बन सके। नेतृत्व का यही गुण है। हर जगह ‘बेहतर’। जितने भी महापुरुष हुए, उनकी जीवनी देखने से यही पता चला कि उन्होंने ‘बेहतरी’ का पाठ पढ़ा तथा जीवन में अपनाया। स्वामी विवेकानंदजी ठाकुर रामकृष्ण के ‘बेहतर’ शिष्य बने तभी वे दुनिया में ‘बेहतर’ संत साबित हुए। यदि उनकी गुरु में असीम भक्ति नहीं होती तो जगत में प्रतिष्ठित परिव्राजक नहीं बन सकते थे। उसी प्रकार अन्य महान विभूतियों के जीवनी से हम प्रेरणा ले सकते हैं। शिक्षक जो भी ‘बेहतर’ हुए हैं वे पहले ‘बेहतर’ छात्र बने हैं। उसी प्रकार व्यवसायी आदि हैं, उन्हें एक ग्राहक के स्तर पर जाकर सोचना पड़ता है कि ग्राहक को क्या चाहिए? ग्राहक क्या पसंद करता है? किस प्रकार की बातचीत से ग्राहक संतुष्ट हो सकता है और उसी में दिन-रात अपने को लगा कर सफल व्यवसायी बन जाता है। एक अच्छा नेता कभी भी अपना नेतृत्व लोगों पर नहीं थोपता। उसके दिमाग में हमेशा यह बात रहती है कि उसे लोगों को अच्छी राह दिखानी है। अच्छा नेता हमेशा अपने लोगों को आगे बढ़ने के अवसर प्रदान करता है। देश में अकाल पड़ा तो शास्त्रीजी जैसे प्रधानमंत्री ने एक वक्त उपवास रखना प्रारंभ कर दिया। ‘जय जवान – जय किसान’ का नारा देकर जवानों तथा किसानों का हौसला बढाया। उनका मान-सम्मान दिया तथा देश युद्ध की विभीषिका से बाहर निकला। उस वक्त शास्त्रीजी ने काफी कुशलता से देश को एक ‘बेहतर’ नेतृत्व प्रदान किया। आज हमारे देश में कोरोना का अभूतपूर्व संकट है। इस आपदा में देश में नेतृत्व का आगे आकर कोरोना-योद्धाओं का जिस तरह से मनोवल हमारे देशवासियों द्वारा बढाया जा रहा है – वह आपने आप में एक ‘बेहतर’ उदाहरण कहला सकता है। ताली-थाली-शंख बजकर तथा दीप प्रज्वलित कर विपदा से बाहर निकालने में लगे कर्मियों का हौसला बढाया तथा एकजुटता को दिखाया। साथ ही यह भी ध्यान में रखना है कि कोई छूट नहीं जाए। सभी को साथ लेकर चलना ही सफलता है। एक समूह में कई प्रकार के लोग रहते हैं। यह आवश्यक नहीं कि सभी समान रूप से एक ही बात सोचें। जिस प्रकार एक वर्ग में एक शिक्षक सभी छात्रों को साथ लेकर चलता है, उसी प्रकार ‘बेहतर’ नेतृत्व के लिए सभी को साथ लेकर चलना होता है। यह भी ध्यान में रखना होता है कि बेहतरी के लिए हम गलत दिशा में बढ़ रही भीड़ का हिस्सा न बन जाएँ, उससे ‘बेहतर’ है सही दिशा में अकेले चलना। अतः बेहतरी के लिए विवेक का रखना भी आवश्यक होता है। नहीं तो फिर इस संसार में जग-हंसाई ही होती है।

मच्छर

आजादी के बाद हमारे देश ने बहुत प्रगति की। बहुत से अभियान्त्रिकी तथा चिकित्सा महाविद्यालय अस्तित्व में आए। चंद्रयान 2 का भी सफल प्रक्षेपण कर लिया। प्रधानमंत्रीजी ने उन वैज्ञानिको को बधाई भी दे दिया – देना भी चाहिए। इंजीनियर और चिकित्सकों की कमी हमारे देश में नहीं है। मगर देश में चहुंमुखी विकास की चर्चा होते रहती है – इस कड़ी में मच्छरों का विकास भी उसी तेजी से हुआ है। पहले केवल मैं मलेरिया सुनता था। बाद में डेंगू सुना और अब चिकनगुनिया भी सुना। इन नए – नए बिमारियों के बारे में पता चला कि ये सभी मलेरिया के ही भाई – बहन है। मच्छर पहले भिनभिनाते थे और हम भुनभुनाते थे। गुरूजी कहते थे कि मच्छरों की तरह मत भिनभिनाओ। आजादी प्राप्त हुए 70 वर्ष से अधिक हो गए और मच्छर के मामले में हमारा देश आत्मनिर्भर हो गया है। तारीफ़ की बात देखिए – ये आत्मनिर्भरता हमने अपने से की है। किसी से कर्ज नहीं लिया है। अमेरिका, जापान, चीन किसी भी देश में हम नहीं गए और आत्मनिर्भर बन गए। किसी भी अन्तर्राष्ट्रीय संस्था जैसे विश्व बैंक तथा अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष किसी से एक डॉलर भी कर्ज नहीं लिया। इस आत्मनिर्भरता की स्थिति में पहुंचने के लिए स्वयं ही तकनीक विकसित कर ली। अभी तो हमारी यह स्थिति है कि हम मच्छरों का निर्यात भी कर सकते हैं। मांग से अधिक आपूर्ति हो रही है। जिस किसी देश को चाहिए वह हमारे देश से मच्छरों का आयात कर सकता है। सबसे अधिक आश्चर्य तो तब होता है कि इसके उत्पादन में हमारे देश के नामी-गिरामी कम्पनियाँ ने अभी तक अपनी पूंजी नहीं लगायी है। रिलायंस, टाटा जैसी कम्पनियां इसके व्यापार में अभी तक नहीं कूदी हैं। उनके आ जाने से तो इनके उत्पादन में दिन-दूनी रात चौगुनी वृद्धि होगी – ऐसा मेरा मानना है। मच्छरों की भी सभा होती है और वे सभी भी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं – ऐसा प्रतीत होता है। जिस तरह उनकी जनसंख्या में बेतहाशा वृद्धि हो रही है – उसी प्रकार इंसानों की जनसंख्या भी बढ़ते जा रही है। इंसानों ने मच्छरों को भगानेवाले अगरबत्ती की खोज कर ली है। जिस प्रकार मछली को जाल में फंसाया जाता है – उसी प्रकार का जाल का इस्तेमाल भी मनुष्य नामक प्राणी करने लगा है। तब मच्छरों के सभी भाई-बहन डेंगू, चिकनगुनिया आदि सभी ने मिलकर यह कसम खाई कि इंसानों को ठीक से नहीं रहने देंगे। परिवार – नियोजन को नहीं अपनाएंगे। मच्छर पहले मनुष्य के मित्र थे। जब सभी साथ छोड़ देते थे – उस वक्त एकांत देखकर सुख-दुःख की बातें करने के लिए मच्छर कानों के पास आते थे। दूसरों से बात करने का एक अपना अलग ही अंदाज है – कम से कम जानने और समझने का अवसर प्राप्त होता है। इन्सान को साहसिक और ईमानदार बनाता है। खालीपन का मित्र बनता है। इसके बाद भी इंसानों ने मच्छरों के ऊपर कुछ भी दया नहीं की। साधु-संन्यासी आदि भी जो कि ‘हत्या’ को जघन्य अपराध मानते हैं – वे सभी भी मच्छरों की हत्या में पीछे नहीं रहते हैं। अभी भी वक्त है कि मच्छरों से दोस्ती कर ली जाए। दुश्मनी निभाने से कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है। जीओ और जीने दो – हमारे देश का मूल मन्त्र है।

मनुष्य या देवता

राष्ट्रकवि ‘दिनकर’ जी के शब्दों में मनुष्य में काफी गुण होते हैं। मेंहदी में जैसे लाली छिपी होती है, बत्ती में लौ छिपी होती है उसी प्रकार मानव के गुण होते हैं। खुद जलकर भी प्रकाश देता है। आज के समय में किसी भी संगठन, दल, संस्था, समाज आदि के लिए यह आवश्यक है कि वहां पर मनुष्य का निवास हो, देवता का नहीं। यदि मनुष्य का निवास होगा तो निश्चित रूप से वह संगठन / संस्था तरक्की की सीढियों पर चढ़ता जाएगा। लेकिन संस्था में केवल देवताओं का वास हो जाए तो फिर मुसीबत ही आ जाएगी। क्योंकि मनुष्य क्षमा कर सकता है, देवता नहीं कर सकता। जो कार्य करेगा, उससे कुछ न कुछ त्रुटि अवश्य होगी और इंसान होने के नाते यदि उससे त्रुटि या त्रुटियाँ होती हैं तो उसके साथ कार्य करनेवाले माफ़ कर सकते हैं। क्योंकि मनुष्य हृदय से लाचार है, लेकिन देवता नियम का कठोर प्रवर्तक होता है। मनुष्य नियम से विचलित हो सकता है, पर देवता की कुटिल भृकुटि नियम की निरंतर रखवाली के लिए तनी ही रहती है। मनुष्य इसलिए बड़ा है, क्योंकि वह ग़लती कर सकता है और देवता इसलिए बड़ा होता है क्योंकि वह नियम का नियंता है। महाभारत में हम देखते हैं कि भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य आदि जैसे देवता या देवतुल्य व्यक्ति द्रौपदी के चीरहरण को देखते रहे क्योंकि वे प्रतिज्ञाबद्ध तथा नियमों से बंधे थे। वे चाहते तो दुर्योधन को कुकृत्य के लिए रोक सकते थे। मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया। मनुष्य में यह गुण है कि अच्छा कर्म करने से प्रशंसा करेंगा, दौड़ते वक्त यदि गिर जाएगा तो सांत्वना देगा, प्रोत्साहित करेगा, लेकिन देवता यदि साथ में है तो इन सब की कल्पना ही न करना श्रेष्ठ है। देवता अपने नियमों में बंधा होने के कारण गिरने से भी प्रश्नों की बौछार लगा देगा, पुनरुत्थान होने ही नहीं देगा – क्योंकि नियमों से बंधा है। जो पहले क्षमा मांगता है – वही बहादुर होता है। जो सबसे पहले क्षमा करता है वह शक्तिशाली होता है और जो इन सब बातों को भूल जाता है – वही सुखी है। मनुष्य इन सब बातों को भूल सकता है और संगठन तरक्की करने लगता है। लेकिन देवता तो सात पीढ़ी तक की बातों को याद रखता है, इसके लिए संगठन को झेलना पड़ता है। देवताओं के कारण कितने संगठन तैयार हो पाए हैं? जो भी संगठन तैयार हुआ है – वह मनुष्यों के कारण ही तैयार हुआ है। हम समझ सकते हैं कि देवताओं का साथ मनुष्य के लिए कितना हानिकारक है? मनुष्य का साथ धूप में तपने के जैसा है, वहीँ देवताओं का साथ छाया के समान है। सफलता पाने के लिए धूप में तपना ही पड़ेगा, छाँव में रहने से आराम करने का मन करने लगता है। अतः इस मृत्युलोक में मनुष्य का साथ ही श्रेयस्कर है। देवता कभी भी रूठ सकते हैं। स्वर्ग में भी यही खेल चलते रहता है। देवताओं के राजा इंद्र को हमेशा अपनी कुर्सी जाने का खतरा बना रहता है। इंद्र हमेशा सशंकित रहता है कि कहीं कोई उसकी गद्दी को हथिया न ले। जबकि मनुष्य में कर्म करने की प्रवृति होती है। वह धूप में तपने के लिए तैयार रहता है। अब संगठन के सामने यह विकल्प रहता है कि वह किसे चुनता हैं- मनुष्य को या देवता को? यदि आगे संगठन को आगे बढ़ाना है तो मनुष्य का साथ ही उपयुक्त है।

मर्यादा का ध्यान

मेरी नानी हमेशा कहती थी कि क्षमा बड़ेन को चाहिए – छोटन को उत्पात। जब शिक्षण के पेशे में आया तो उपरोक्त उक्ति को ध्यान में रखा। बच्चों की गलतियों को नजरअंदाज तो नहीं किया लेकिन क्षमा जरुर किया। प्रशासनिक कार्यों में भी अधीनस्थ कर्मचारियों को क्षमा करने का ख्याल रखा। ऐसा लगता है कि क्षमा करने से अधिक शक्ति का संचार होता है। एक नैसर्गिक उर्जा की प्राप्ति होती है। सेवा काल में कठोरतम दंड का भी प्रावधान किया गया है – लेकिन वह अपवाद जैसी स्थिति के लिए है। अपना मानना है कि किसी को दंड देने के लिए उपरवाला बैठा है। उपरवाला का दंड बहुत ही भयानक होता है। किसी का अमंगल मेरे द्वारा न हो – कम से कम इसका ख्याल तो रख ही सकते हैं। मनुष्यता को हमेशा सामने रखना है। बहुत बार ऐसा होता है कि जो दीखता है – वह सही होता नहीं है। सत्य कहीं और छिपा होता है। हमलोग एक बात मान लेते हैं और उस पर अड़ जाते हैं। इतने जोर से अड़ते हैं कि उसके आगे सोचने-देखने की शक्ति ही नहीं रहती है। महाभारत में दुर्योधन तथा पांडव कर्ण के वीरगति पाने के बाद ही जान सके कि वह उनका बड़ा भाई था। इतिहास गवाह है कि जिसने भी नेकी का कार्य किया है – वही अधिक रोया है। बाकी लोगों ने तो केवल मजे ही किए हैं। नेकी के काम करने वालों को किसी दर्जे या ग्रेड में नहीं बांटा जा सकता, क्योंकि ऐसे लोग ज़िंदगी बचाने के लिए दिन या दूरियां नहीं देखा करते। हम जहाँ भी रहते हों – चाहे वह घर हो, समाज हो – एक दंड विधान जरुर होगा। उसी दंड विधान के अन्दर सजा देना उचित रहता है। किसी को मारपीट कर, सजा देकर हम नहीं समझा सकते। समझाने से ही किसी के हृदय को हम बदल सकते हैं। इसीलिए दंड देते वक्त विवेक को जिन्दा रखना होता है। प्रेमचंद की कहानी ‘पंच-परमेश्वर’ पढ़ कर मन में काफी शांति मिलती है। पंचों ने न्याय को मित्रता से ऊपर रखा। यह सिद्ध कर दिया कि पंचों के हृदय में देवता का वास होता है। इसीलिए दंड देने का कार्य उपरवाले पर छोड़ देना है। उपरवाले के यहाँ न्याय जरुर होता है। धैर्य तथा विश्वास बनाए रखने की जरूरत होती है। उपरवाले के यहाँ न्याय कर्मफल के आधार पर होता है। अपने समय और ऊर्जा को महत्व देते हुए सांसारिक रूप से कुछ घटनाएं भूल जाना ही श्रेयस्कर है। यदि ईश्वर पर भरोसा है तो ऊपर वाले पर भरोसा रखिए। किए की सजा सबको जरूर मिलती है। दंड सुधारात्मक होना चाहिए न कि विध्वंसात्मक। भगवान श्रीराम ने इंद्र के बेटे जयंत को जो दंड दिया है – वह हर प्रकार से स्वागत योग्य कह सकते हैं। उसके बाद जयंत की धृष्टता फिर दिखायी नहीं दी। हर हाल में सहजता, सरलता तथा समझदारी को बनाए रखना है।

माँ-पिताजी की बढ़ेगी जिम्मेदारी

अमूमन हर दौर में तकनीक मनुष्य को चकित किया है तथा कुछ न कुछ दिया ही है। कोरोना के इस दौर में भी सभी प्रभावित हो रहे हैं। शिक्षा के क्षेत्र में भी इसका असर दिखने लगा है। अब शिक्षक-समूह वीडियो बनाने पर ध्यान दे रहे हैं। नए-नए फोन बदलते वक्त के हिसाब से खरीद रहे हैं। बच्चों को वीडियो गेम खेलने में कोई परेशानी नहीं हो – इसका भी ध्यान रख रहे हैं। अनुशासन और बच्चों के लिए ईमानदारी व सत्यनिष्ठा सिखाना अब परिवार की जिम्मेदारी बनने वाली है। पहले माता-पिता शिक्षकों के ऊपर यह दायित्व डाल कर निश्चिन्त हो जाते थे। अब बच्चे केवल कोरोना के साथ जीने के लिए नहीं, बल्कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता की देखरेख वाले संसार में रहने के लिए तैयार हो रहे हैं। कुल मिलाकर अब नैतिक शिक्षा देने का कार्य माँ-पिताजी करेंगे तथा उनकी तकलीफें अब बढ़ने वाली हैं। क्योंकि पढाई का तरीका बदलनेवाला है। हो सकता है कि अब बच्चे 230 दिन विद्यालय जाने की बजाय 115 दिन ही विद्यालय जाएँ। यानि बच्चों को सक्रिय रखने की जिम्मेदारी अब माता-पिता पर आने ही वाली है। जब शिक्षक जुलाई से सत्र प्रारंभ करेंगे तो माता-पिता को भी शिक्षण पर ध्यान देना होगा। जिन माता-पिता के स्कूल जाने वाले दो बच्चे हैं, उन्हें टीवी/मोबाइल स्क्रीन के सामने दोगुना समय बिताना होगा, दोनों बच्चों को मोबाईल फोन या टेबलेट देना पड़ेगा। इंटरनेट खपत के लिए अधिक डाटा वाला प्लान लेना पड़ेगा। हो सकता है कि इंटरनेट के डाटा पैक के दामों में वृद्धि कर दी जाए। बच्चे ऑनलाइन क्या कर रहे हैं – इसके लिए कुछ तेज-तर्रार माँ-पिताजी किसी को काम पर रख भी सकते हैं। लेकिन इसकी गुंजाइश कम ही दीखती है। परीक्षा लेने/देने का तरीका भी बदल सकता है। दुनियाभर में शैक्षणिक संस्थान इस बात पर माथापच्ची कर रहे हैं कि ऑनलाइन परीक्षाएं कैसे ली जाएं, वहीं ज्यादातर भारतीय संस्थान इसे लेकर आगे बढ़ रहे हैं। इतना तो तय है कि कोई ऑनलाइन परीक्षा में आसानी से नकल नहीं कर सकता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा निगरानी से ऑनलाइन नकल करना क्लास रूम में निरीक्षक की मौजूदगी में नकल से भी ज्यादा कठिन है। एक कृत्रिम बुद्धिमत्ता निरीक्षक वेबकैम के जरिये बच्चों की हर गतिविधि पर नजर रखता है और अगर कोई और फ्रेम में आता है या बात करता है तो यह रिकॉर्ड हो जाता है। अपनी जगह किसी और को बिठाने के बारे में तो सोचना ही नहीं है, क्योंकि ‘छवि पहचान तकनीक’ का इस्तेमाल होता है। निरीक्षक बच्चों को रियल टाइम में परीक्षा देते हुए देख सकते हैं और कृत्रिम बुद्धिमत्ता तकनीक उनके कार्यों और गतिविधियों की निगरानी करती है। अगर वे स्क्रीन से नजर हटाते हैं तो अधिकारियों को सावधान होने का मौक़ा मिल जाता है। इसी तरह अगर वे दूसरी टैब या विंडो खोलने की कोशिश करते हैं तो उन्हें बताया जाता है कि वे ऐसा नहीं कर सकते। संक्षेप में कह सकते हैं कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता से हमारी दृष्टि तक की निगरानी हो जाती है तो यह जानकारी प्राप्त हो जाती है कि बच्चे लगातार एक ही दिशा में देख रहे हैं या नहीं। इन नई परिस्थितियों में तो यह अब माँ-पिताजी की जिम्मेदारी बनती है वे ज्यादा अनुशासित होकर, अपने 24 घंटों को काम, घर के मुद्दों और बच्चों की शिक्षा में बांटने की कोशिश करें। बच्चों को भी अब ईमानदारी और सत्यनिष्ठा के महत्व को समझना जरूरी है। अब पढाई-लिखाई यंत्रनिष्ठ होने वाली है।

मानवता की रक्षा

कोरोना संकट इतना गहरा हो जाएगा – सोचा नहीं था। कल रात टीवी पर समाचार चैनलों द्वारा घर लौटते कामगारों को जब देखा तो कलेजा मुंह को आ गया। विदेशों में रहनेवालों को जब घर बुलाया जाता है तो हवाईजहाज का इंतजाम किया जाता है। यहाँ अपने ही देश में जब घर जाने की बात है तो एक बस भी भाग्य में नहीं है। सिर पर गठरी उठाए एक उम्मीद में कामगारों का घर की तरफ पलायन कहीं न कहीं व्यवस्था-तंत्र की खामी को बता रहा है। प्रधानमंत्रीजी द्वारा जनता कर्फ्यू का जब ऐलान किया गया तो यह मन में था कि यह संकट जल्द ही ख़त्म हो जाएगा। सब कुछ सामान्य हो जाएगा। लेकिन उम्मीद के खिलाफ ही बात हुई। अब 21 दिनों तक कहाँ रहेंगे, क्या खायेंगे, तथा कैसे घर जायेंगे – यह बात महत्वपूर्ण हो गयी है। घर लौटते इन कामगारों को देखकर जितना दुःख होता है उतनी ही ख़ुशी समाज के लोगों द्वारा इन भूखे लोगों को भोजन करवाने की व्यवस्था को देखकर होता है। समाज अच्छे लोगों से भरा पड़ा है। इस वैश्विक विपदा में समाज के लोग एकजुट होकर धर्म, सम्प्रदाय, जाति आदि को छोड़कर इस महामारी का सामना करने में जुटे हैं। एक आशा तथा उम्मीद इनके कार्य को देखकर जागती है। विभिन्न राज्य सरकारें, स्वयंसेवी संगठन आदि भी इस यज्ञ में अपना योगदान दे रहे हैं। इसे हम एक अच्छी तथा सकारात्मक शुरुआत कह सकते हैं। लेकिन इस सबके बीच इस पारिस्थितिकी तंत्र में एक बात छूट रही है और वह है – पशु-पक्षियों का ध्यान रखना। शहरों में होटल बंद है। वहां से निकलने वाला जूठन आदि जो आवारा कुत्ते आदि खा लेते थे, उनकी सुध लेनेवाला कोई नहीं है। चिड़िया भी अभी भूखी है। भगवान ने सभी के रहने के लिए यह धरती बनायीं। किसी को तकलीफ नहीं हो तथा सभी के भरण-पोषण का ध्यान रखा। भोजन-चक्र को प्रकृति आधारित बनाया। लेकिन हम मनुष्यों ने जीव-जंतुओं के हिस्से का अधिक भाग ले लिया। अब इन जीवों के भोजन का ध्यान रखना भी हम सब की जिम्मेदारी बनती है। ईश्वर भी उम्मीद करते हैं कि उनकी कृतियां संकट में एक-दूसरे की मदद करेंगी। सभी आपसी सहयोग के साथ जीने के ईश्वर के इस मिशन को पूरा करेंगे। साथ ही साथ हमें असंवेदनशील नहीं हो जाना है। जब यह खबर सामने आई कि कोरोना के खिलाफ इस लड़ाई में स्वास्थ्यकर्मियों को उनके मकान-मालिक घरों से निकाल रहे हैं तो थाली-ताली शंख बजाकर उनके प्रति धन्यवाद देने की बात ही बेमानी हो गयी। यह खबर भी आयी कि विदेशों में फंसे भारतीयों को लाने के लिए जो विमान गया था, उनके चालक दल के सदस्यों का भी सामाजिक बहिष्कार हो रहा है। इन लोगों ने अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों का निर्वहन पूरी निष्ठा के साथ किया है। इनके लिए हमलोगों को कृतज्ञता दिखाना चाहिए। यदि हमलोग अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेंगे तो कल को कोरोना पीडित की सहायता करने को कोई नहीं आएगा। नर्स, डॉक्टर, स्वास्थ्यकर्मी सभी अपने हाथ खड़े कर लेंगे। साथ ही सावधानी बरतनी भी बहुत जरुरी है। खासकर जब यह विषाणु बच्चों को पकड़ता है। यह स्थिति बहुत ही दुखदायी होती है। अतः हम सभी का यह दायित्व बनता है कि इस आपदा में एक होकर सभी मानवता की रक्षा करें।

मुसीबत का सामना

आज के ज़माने में केवल ज्ञान की बड़ी – बड़ी बातें ही करना है – उस पर अमल नहीं करना है। हम सब भी ज्ञान की बड़ी-बड़ी बातें सीखते और करते तो हैं किन्तु उनका मर्म नहीं समझ पाते और उचित समय तथा अवसर प्राप्त होने पर भी उसका लाभ नहीं उठा पाते और जहाँ के तहाँ रह जाते हैं। तोते की तरह रटते हैं और जब वक्त आता है तो तोते की तरह जाल में फंस जाते हैं। बाहर में मित्रों से आशा अधिक पाल लेते हैं और दुखों से घिर जाते हैं। श्रीराम और सुग्रीव की मित्रता भी स्वार्थवश हुई थी। दोनों को एक दूसरे से स्वार्थ था। दुर्योधन-कर्ण, अर्जुन-श्रीकृष्ण की मित्रता भी स्वार्थ प्रेरित ही थी। इसीलिए आत्मसम्मान बनाए रखना है। हम भी कुछ हैं – इसका ध्यान रखना ही रखना है। कोई हमारी मदद नहीं करेगा। किसी से तुलना या देखादेखी या शिकायत नहीं करना है। नर स्वयं ही अपना शत्रु या मित्र है। दूसरों से सीखने में भी परहेज नहीं करना चाहिए। उदार अथवा मानवीय बनने में अपना नुकसान ही होता है। परवाह, अपनापन, आदर और वक्त अभी किसी के पास नहीं है। इन मानवीय गुणों को लोग कमजोरी समझ लेते हैं। पैसे का सम्मान करना जरुरी है। सबसे अच्छी बात यह है कि अपने ऊपर ध्यान देना है और अपनी योग्यता को बढ़ाना है। पूर्व राष्ट्रपति कलाम साहब की बातों को ध्यान में रखना है। काम से प्यार करना है – संस्था से नहीं। काम करने से काबिलियत में इजाफा होगा – संस्था तो कभी भी लात मारकर निकाल सकती है। समझौता कर लेने से हर कदम परेशानी ही मिलती है। हर रोज मरना पड़ता है। हमेशा बेहतर है कि युद्ध के लिए तैयार रहना और शहीद हो जाना या विजय प्राप्त करना। डरना नहीं है – रुकना नहीं है। सोच-समझकर फैसला लेना है। सही लोगों से जुड़ना भी जरुरी है। इसके लिए सही लोगों की पहचान करने का तरीका भी आना चाहिए। हवाई बातें न करके लक्ष्य-केन्द्रित होकर चलने से सफलता अवश्य मिलेगी। जीवन में संतोष खोजना एक सड़क की तरह लगता है, हम सब ऐसे चलते हैं जो कभी भी अपना अंत नहीं पा सकता। यह एक अंतहीन यात्रा हो जाती है। संतोष हमें आगे बढ़ने से रोकती है। आगे बढ़ने के लिए हमें लालच नहीं करना है। किसी को गिराकर हमें ऊपर नहीं उठना है। संतोष और लालच में अंतर है। प्रयास से जो प्राप्त हुआ-वह संतोष है। किसी के हक़ को मारकर जो मिलता है – वह लालच की श्रेणी में आता है।, यदि हम छात्र बनने के लिए तैयार हैं तो जीवन में हमें कई शिक्षक मिलेंगे। बदलाव तभी आता है, जब हम उसे मानने के लिए तैयार होते हैं। एक जापानी कहावत है, ‘शिक्षक का जीवन में प्रवेश तभी होता है, जब विद्यार्थी तैयार होता है। पांच पांडवों में श्रीकृष्ण ने गीता का उपदेश केवल अर्जुन को ही दिया क्योंकि अर्जुन को ही जिज्ञासा हुई थी। जब हम सीखने और बदलाव के लिए तैयार रहेंगे तभी हमें योग्य गुरु अथवा शिक्षक मिलेंगे। बुरा दौर सबके जीवन में आता है और चला जाता है। कुछ लोग स्वयं बुरे दौर से गुजरते हैं और दूसरों को भी इसमें शामिल कर लेते हैं। मुसीबत का सामना करना है –घबराना नहीं है। समझदारी बनी रहे। मुश्किल समय को आसान समय बनाना हमारे हाथों में है। संशय में नहीं पड़ना है, खुद पर विश्वास रखना है। दूसरों पर विश्वास नहीं करना है। आँख-कान के कच्चे नहीं रहते हुए आत्मबल को बनाए रखना है। बुरे वक्त में भी कई लोग तरक्की के रास्ते पर निकले हैं। हम इन्सान है – सुंदर हैं तथा ईश्वर की संतान हैं। इस बात पर ध्यान देना है तथा ईश्वर के द्वारा ही यह शरीर प्राप्त हुआ है तो इसका सदुपयोग करना है।

मृत्यु का स्वरूप

मृत्यु का स्वरूप कैसा है? मरने के बाद क्या होता है? मरते समय कैसा लगता होगा? किसे मृत्यु से भय नहीं लगता है? इत्यादि प्रश्न मन में उठते रहते हैं। यह जानने की इच्छा समय के साथ बलवती होते जा रही है। फिर मन में यह ख्याल आता है कि इसके बारे में तो नचिकेता आदि भी बहुत यत्न करके ही जान सके। मृत्यु के सम्बन्ध में जानकारी के लिए नचिकेता को साक्षात यमराज से ही मुलाक़ात करनी पड़ी। मुझे तो यमराज के नाम से ही भय लगने लगता है। मृतक शरीर को बहुत देखा है लेकिन मरते हुए एक बार देखा है तथा वह भी अस्पताल में। एक अत्यंत वृद्ध को अंतिम सांस छोड़ते देखा और शरीर को शांत होते देखा। अपनों को मरते हुए केवल सुना है, देखा नहीं है। उसके बाद के क्रंदन को भी महसूस किया है।

गोस्वामी तुलसीदास जी रामचरितमानस में कहते हैं:

जनमत मरत दुसह दुख होई।

एहि स्वल्पउ नहिं ब्यापिहि सोई॥

जन्म लेने और मरने में जो दुःसह दुःख होता है, ज्ञानी पुरुष को वह दुःख जरा भी न व्यापेगा। अतः एक बात तो साफ है कि मृत्यु के रहस्य को जानने के लिए जीवन को जानना बहुत ही आवश्यक है। तभी शान्ति के साथ मृत्यु का इंतजार कर भीष्म पितामह की तरह बैठा जा सकता है। हमलोगों ने तो बड़े-बूढों के श्रीमुख से इतना सुना है कि जब हमारी सत्य, सनातन, शाश्वत आत्माएं अपने वस्त्र रूपी भौतिक शरीर, को छोड़ने के लिए तैयार होती हैं या छोड़ देती है – मृत्यु कहलाती है। मृत्यु ही हमें याद दिलाती है कि समय बड़ा बलवान है। इससे बड़ा कोई नहीं है। “समय बनाता है और समय ही मारता है यह समय का अपरिहार्य नियम है। ” फिर मृत्यु की प्रक्रिया का वर्णन करने के लिए बहुत-सी बातें है। कुछ लोग मृत्यु को चक्र से परिभाषित करते हैं। इस नश्वर काया का निर्माण आकाश, वायु, अग्नि, जल और मिट्टी या पृथ्वी से हुआ है। पहले आत्मा अपने मिट्टी के जाल को छोडती है। वह ऊपर की ओर जल की तरफ बढती है। हम व्यावहारिक जीवन में भी देखते हैं कि पृथ्वी जल से आच्छादित है।ज्ञानी बताते हैं कि मूल तत्व के निकल जाने के समय शरीर का तापमान ठंडा हो जाता है। यह जल का विघटन बताता है। फिर आत्मा अग्नि चक्र में प्रवेश करता है अर्थात नाभि में पहुँचता है। नाभि क्षेत्र गर्म हो जाता है। यानि की अग्नि का विघटन हो रहा है। यह अग्नि तत्व का विघटन है फिर, अग्नि धीरे-धीरेऔर ऊपर की तरफ बढती है तथा ह्रदय चक्र में पहुँचती है वहां पर प्राण है, यही मूल तत्व चरम अथवा परम है। जहाँ इसे वायु तत्व में परिवर्तित किया जाता है, हृदय क्षेत्र की सांस के साथ मिलाया जाता है मृत्यु के समय, पूरे शरीर में कम्पन प्रारम्भ हो जाता है यह वायु तत्व का विघटन है उसके बाद, , गले के पास से एक ध्वनि उत्पन्न होने लगती है, जो आकाश तत्व के विघटन का संकेत देती है यह बताता है कि शरीर अब मृत हो चुका है और ये पंच भूत, पाँच तत्व भंग हो चुके हैं एक बार जब गले में ध्वनि उत्पन्न होती है, तो आगे क्या होता है? इस सटीक क्षण में, 'आंखें वापस मुड़ जाती हैं' आत्मा आंख, कान या मुंह से बाहर निकल सकती है आत्मा मुक्त होने के समय सिर के पिछले भाग से निकलती है। हमलोगों ने देखा है कि पहले लोग अपने सिर के पीछे शिखा रखते थे। उसके रखने का मकसद यही रहता था कि आत्मा आसानी से मुक्त हो।

अब प्रश्न है कि मृत्यु के बाद क्या होता है? हमारे भौतिक शरीर का पुनर्नवीनीकरण जन्म के रूप में किया जाता है। लेकिन आत्मा के बारे में अलग-अलग व्याख्याएँ अथवा सम्भावनायें हैं। आत्मा अपने स्तर और उसके आयाम को शरीर की शुद्धता और उसकी शक्ति के स्तर के अनुसार पाती है अंत में इतना ही कह सकते हैं कि मृत्यु किसी भी क्षण हो सकती है - यह गारंटी कहां है कि हम 100 वर्ष की आयु में अंतिम सांस लेंगे? तो, अगले परम क्षेत्र में जाने के लिए तैयार होना है। इसके लिए, शुद्ध, परिष्कृत वातावरण को तैयार करना है। खुद को भी तथा परिवार को भी अच्छी तरह से तैयार करना बेहतर है माया-मोह रूपी प्रेम के बंधन से निकलना है तभी हम अनंत यात्रा के लिए तैयार हो सकते हैं। इस तरह की तैयारी का मतलब एक ऐसी जीवन शैली है जहाँ हम यमराज से डरे बिना हमेशा अंतिम क्षण के लिए तैयार रहते हैं।

आनंद मोहन मिश्र

अध्यापक,

विवेकानंद केंद्र विद्यालय यजाली

मोजेक अभियान

उष्मीकरण के ख़तरे से हम सब अच्छी तरह वाकिफ हैं। इंसानों ने प्रकृति को कुछ इस तरह नुकसान पहुंचाया है कि ऐसा लगता है जैसे पृथ्वी का हर कोना अब चीखें मार रहा है। पृथ्वी आज अपने जीवन, अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है और इंसानों से गुहार लगा रही है कि उसे बख्श दिया जाए। इसीलिए ये पृथ्वी कभी कभी अपना रौद्र रूप दिखाकर विरोध भी जताती है। और ऐसा खौफनाफ मंजर देखकर हमको एहसास होता है कि हमने वाकई अपनी पृथ्वी, अपने वायुमंडल को बहुत नुकसान पहुंचाया है। अभी महाराष्ट्र के आरे में मेट्रो के नाम पर जिस तरह पेड़ों को काटा गया – वह हृदय विदारक दृश्य था। सर्वोच्च न्यायालय ने समय पर दखल देकर आरे के जंगलों को काटने से बचा लिया। मगर फिर भी नुकसान काफी हो गया। इसी को देखते हुए जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग से आर्कटिक में होने वाली घटनाओं का अध्ययन करने के लिए इतिहास का अब तक का सबसे बड़ा ध्रुवीय अभियान शुरू किया गया है। इसे MOSAiC नाम दिया गया है। इस अभियान में 19 देशों के सौकड़ों वैज्ञानिक हिस्सा ले रहे हैं। MOSAiC मिशन का विस्तार है मल्टीडिसिप्लिनरी ड्रिफ़्टिंग ऑब्ज़रवेट्री फ़ॉर दि स्टडी ऑफ़ आर्कटिक क्लाईमेट। यह केंद्रीय आर्कटिक में किया जाने वाला एक साल का अभियान है, जो 2019 से 2020 तक आयोजित किया जाएगा। पहली बार एक आधुनिक शोध में, आइसब्रेकर पूरे वर्ष, उत्तरी ध्रुव के आसपास के क्षेत्र में काम करेगा, जिसमें सर्दियों के दौरान लगभग आधे साल ध्रुवीय रात रहती है। ऐसा कुछ 125 साल बाद होने जा रहा है जब नॉर्वेजियन खोजकर्ता फ्रिड्जॉफ नैनसेन ने उत्तरी ध्रुव पर तीन साल के अभियान के दौरान फ्रैम नामक लकड़ी के जहाज़ को बर्फ़ में पहली बार सील करने में कामयाब हासिल की थी। MOSAiC युग्मित आर्कटिक जलवायु प्रणाली और वैश्विक जलवायु मॉडल में प्रतिनिधित्व की हमारी समझ में महत्वपूर्ण योगदान देगा। MOSAiC का केंद्र, वातावरण, महासागर, समुद्री बर्फ, जैव-रसायन और पारिस्थितिकी तंत्र को जोड़े रखने वाली जलवायु प्रक्रियाओं की प्रत्यक्ष और आँखों देखी टिप्पणियों पर आधारित है। अतः हम कह सकते हैं कि अब विश्व जनमत पर्यावरण की रक्षा के लिए सजग हो गया है। अब हम लोग भी पर्यावरण संरक्षण पर ध्यान दें तो ठीक रहेगा। हम लोग भी अपना योगदान इस प्रकार दे सकते हैं - प्लास्टिक पॉलीथीन का उपयोग कम से कम करें तथा पेड़ काटने की जगह पेड़ लगायें। यदि अब नहीं चेते तो जिस तरह हम लोग अपने स्वार्थ सिद्धि हेतु प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन कर रहा है व बदले में इस हरित ग्रह का सत्यानाश, वो दिन दूर नही जब हम सबको इसका हिसाब चुकाना होगा। अतः अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जो प्रयास चल रहा है – वह तो होते रहेगा। मोजेक अभियान सफल होगा या नहीं – यह तो वक्त बताएगा लेकिन व्यक्तिगत स्तर पर भी हमलोग जागरूक रहें। इस कड़ी में स्वीडेन की ग्रेटा थनबर्ग का प्रयास अभी देखने के लायक है।

मोटर वाहन अधिनियम का पालन

किसी भी शासन-व्यवस्था की ताकत उसका कानून और कानून का ठीक से पालन करा लेना उसकी समझदारी होती है। इन दिनों देश में नए-नए कानून आ रहे हैं और परिवहन से जुड़े नए कानून ने लोगों को हिला दिया है। मोटर वाहन अधिनियम लागू होने के एक महीने से भी कम समय में असंतोष के स्वर उभरने लगे हैं। कुछ राज्यों ने इसे लागू करने से इनकार कर दिया है, तथा कुछ राज्य इसे दंड के साथ संशोधित कर रहे हैं। पत्र-पत्रिकाओं तथा सोशल मीडिया पर यह मुद्दा अभी गर्म लगता है। यह कानून मानव जीवन को बचाने के लिए या दुर्घटनाओं को रोकने के लिए लाया गया है। सड़क दुर्घटना की संख्या में सतत कमी लाने के लिए सरकार प्रतिबद्ध है। जुर्माना बढ़ाने से भय का वातावरण बन सकता है लेकिन इससे दुर्घटनाओं में कमी होगी – यह देखने वाली बात होगी। भारतीय सड़कों का हाल भी किसी से छुपा नहीं है। यातायात पुलिस के पास संसाधन कम हैं। सड़कों की स्थिति सुधारने के लिए कुछ उपाय करना चाहिए था। राजमार्गों के लिए अलग कानून बनाने से ठीक रहता। लोकनिर्माण विभाग को अधिक संसाधन उपलब्ध कराने की आवश्यकता थी। क्योंकि हम जानते ही हैं कि लोकनिर्माण विभाग के पास संसाधन का अभाव है। यातायात पुलिस, नगर पालिका, लोक निर्माण विभाग तथा अन्य संस्थानों के बीच के बीच समन्वय स्थापित करने की जरूरत आज के समय में है। सड़कों की हालत ऐसी है कि सायकिल सवार को चलने में मुश्किल है। सड़कों पर ही बाजार लग जाता है। दिन के समय यदि एक ट्रक बीच में आ जाए तो उससे बच कर निकलने से अधिक आसान हिमालय पर्वत पर चढ़ना है। ऐसे सड़कों पर ऐसे कानून का लागू कर पाना शासन-व्यवस्था के लिए भी एक चुनौती है। सब कुछ ठीक रहे तो कानून को लागू किया जा सकता है। यहाँ पर आधारभूत संरचना का सर्वथा अभाव है। यह उसी प्रकार हो गया है कि हम बच्चों को बिना पढाए – बिना पुस्तक के, पढने के लिए कहें तथा परीक्षा में बैठने के लिए कहें। इसका परिणाम यह होगा कि बच्चा या तो परीक्षा में नहीं बैठेगा या असफल होगा। अंत में इतना कह सकते हैं कि कानून का बनना गलत नहीं है लेकिन कानून का पालन आवश्यक है। ऐसा लग रहा है कि इस कानून के पालन में लोगों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। पहले जनमानस को इस कानून के पालन करने के अनुकूल वातावरण का निर्माण करना आवश्यक था। बिना अनुकूल वातवरण के इस कानून को लागू कर दिया गया। सरकार की चिंता भी सही है। जानमाल के नुकसान को रोकना किसी भी शासन तंत्र की पहली प्राथमिकता होती ही है। भ्रष्टाचार को कहीं बढ़ावा न मिल जाए – इसका भी ध्यान रखना होगा। जब तक यातायात की एक नई योजना नहीं आती है - शिक्षा, इंजीनियरिंग के क्षेत्र में निवेश करके एक सुदृढ़ यातयात नियमों को बनाने की आवश्यकता है। लोगों में जागरूकता अभियान चला कर यातयात के नियमों का पालन करने के लिए हम प्रेरित कर सकते हैं।

रंग बदलने वाले लोग

रंग बदलने में गिरगिट जैसा आज तक कोई नहीं है। लेकिन कुछ लोग बयान बदलने में इतने माहिर होते हैं कि गिरगिट भी उनके सामने शरमा जाए। जिस तरह आमों की कई प्रजातियाँ होती हैं उसी प्रकार मनुष्य की कई प्रजातियाँ होती हैं। आज जब भारत और न्यूजीलैंड के बीच विश्व कप क्रिकेट का सेमीफाइनल मैच चल रहा था और हमारी भारतीय क्रिकेट टीम हार रही थी तो अनेक लोग बोल रहे थे कि उन्हें पता था कि भारतीय क्रिकेट टीम मैच हारेगी। भाई , मेरे जब पता ही था कि भारतीय क्रिकेट टीम मैच हारने वाली है तो पहले से ही क्रिकेट बोर्ड को बता देना था। क्रिकेट बोर्ड पहले से तैयारी कर बैठता। यदि भारतीय क्रिकेट टीम मैच जीत जाती तो यही लोग कहते कि उन्हें पता था कि मैच भारतीय टीम जीतेगी। कहने का अर्थ है कि हर कदम – हर समय , परिस्थिति के अनुसार अपने बयान को ये लोग बदल लेते हैं। ये बयान बहादुर हैं। उन्हें भविष्य की घटनाओं का पूर्व ज्ञान होता है। ईश्वर ने उन्हें अलग से महाभारत के संजय की तरह दिव्य दृष्टि दी है। यदि भारतीय टीम मैच जीत रही होती तो सब कुछ ठीक रहता। ये तो ऐसा लगा जैसे चुनाव हो रहा हो। यदि सत्ताधारी दल जीत जाए तो वोटिंग मशीन ने धांधली कर दी। यदि हार जाए तो जनता की जीत। कुछ समझ में नहीं आता कि ऐसे लोग किस प्रकार अपने ब्यान को बदल देते हैं। सच में काबिलियत की कमी नहीं है , इस प्रकार के जमात में। एक महोदय जो मैच देख रहे थे – अचानक रोहित के आउट होते ही चिल्ला पड़े – जानता था कि आज रोहित नहीं खेलेगा। क्योंकि टीवी पर दिन-रात रोहित की तारीफ़ कर दी गयी थी। अब टीवी वाले रोहित की तारीफ़ तो अपनी रेटिंग बढ़ाने के लिए करेंगे ही। एक मित्र ने कहा कि – चल खुसरो घर आपने । अब खुसरो साहब को भी क्रिकेट में घसीट लिया गया। एक महोदय तो जडेजा के इतने दीवाने हो गए कि उन्हें ताकत देने के लिए ‘हनुमान चालीसा’ का पाठ पढने लगे। हनुमान जी भी इस वर्षा में कहीं आराम कर रहे होंगे लेकिन क्रिकेट के कारण उनको भी मेनचेस्टर जाना पड़ा होगा। जाते-जाते ही जडेजा आउट हो गए। एक मित्र तो अपनी पत्नी पर ही इतना उखड गए कि बताने की इच्छा ही नहीं होती है। एक महोदय तो यह गीत गुनगुना रहे थे , “जिंदा रहने के लिए एक हार भी जरूरी है सनम, ४ साल बाद जीत के दिखाना तुमको है कसम।” कुछ लोग प्रेस रिपोर्टर की तरह प्रश्न पूछ रहे थे कि सेमीफ़ाइनल में न्यूज़ीलैंड से भारत की हार की वजह क्या है? क्या हमारे प्रधानमंत्री जी मैच में कुछ कर सकते हैं। जो भी हो – भारतीय क्रिकेट टीम के हारने से बहुत से पलटी मार लोगों को देखा। ऐसे-ऐसे पलटी मार जो कि दिन में रोहित, विराट आदि की तारीफ़ में न जाने कितने पुलों का निर्माण कर चुके थे और जब टीम पराजित हुई तो वही पुल धराशायी हो चुके थे। अब उन पुलों के मरम्मत की जिम्मेदारी हम सब पर आ गयी थी। पलटीमार लोग यह भूल गए थे कि यह अंतर्राष्ट्रीय मुकाबला था। सामने वाली टीम भी कोई घास छीलने के लिए नहीं आयी थी। खैर जो होना था , वह हो गया। भारतीय क्रिकेट टीम अन्य पराजित टीमों की तरह अपने घर वापस आ जायेगी । दर्शक याद रखेंगे जडेजा की पारी , गप्टिल का थ्रो और पहले के तीन बल्लेबाज़- राहुल, कोहली और रोहित शर्मा को क्योंकि उन तीनों ने जितने रन बनाए उनसे ज्यादा रन चहल के रहे । मैच की बेहतर टीम और ज्यादा भाग्यशाली टीम जीती तो इसके लिए हम संस्कारी लोग तो बधाई देंगे ही। यही तो जिन्दगी है – कुछ पा लेने की बेचैनी तथा कुछ खोने का डर। हार-जीत तो जीवन का नियम है। हमारे देश की क्रिकेट टीम सेमीफाइनल में आशा के अनुरूप प्रदर्शन नहीं कर सकी – इसे स्वीकार करने में परेशानी नहीं है।

रसायन विज्ञान के लिए नोबल पुरस्कार

जंगल मे रोज सुबह होने पर हिरण सोचता है कि मुझे शेर से तेज भागना है और शेर यह सोचता है कि मुझे हिरण से तेज भागना है,वरना वह भूखा मर जायेगा। अतः हम शेर हो या हिरण उससे कोई मतलब नही है यदि सार्थक जिंदगी जीनी है तो रोज भागना पडेगा। संघर्ष के बिना कुछ भी नही मिलता है। इसी कड़ी में तीन असली नायक हैं जिन्हें रसायन विज्ञान में वर्ष 2019 के लिए दुनिया का सबसे प्रतिष्ठित सम्मान नोबल पुरस्कार मिला है।

स्टेनले व्हिटिंघम, जॉन गुडएनफ और अकीरा योशीनो को लिथियम-आयन बैटरी के विकास के लिए नोबेल पुरस्कार देने की घोषणा की गयी। बैटरी 30-साल पहले बनी थी तब किसी को पता न था कि इसका इस्तेमाल पेसमेकर, मोबाइल, इलेक्ट्रिक कार में होगा। यह हल्की, रिचार्जेबल और शक्तिशाली बैटरी अब मोबाइल फोन से लेकर लैपटॉप और इलेक्ट्रिक वाहनों तक सब कुछ में उपयोग की जाती है। यह सौर और पवन ऊर्जा से महत्वपूर्ण मात्रा में ऊर्जा का भंडारण भी कर सकता है, जिससे एक जीवाश्म ईंधन मुक्त समाज संभव है। अल्फ्रेड नोबेल ने अपने काम के लिए रसायन विज्ञान को सबसे महत्वपूर्ण विज्ञान माना था। उन्होंने अपने आविष्कारों के विकास के साथ-साथ जो औद्योगिक प्रक्रियाएँ भी नियोजित कीं, वे रासायनिक ज्ञान पर आधारित थीं। रसायन विज्ञान दूसरा पुरस्कार क्षेत्र था जिसका उल्लेख नोबेल ने अपनी वसीयत में किया था। इन तीनों वैज्ञानिकों ने दिन-रात मेहनत कर एक रिचार्जेबल समाज की ओर देखा और उसे पूरा करने के लिए दिन-रात भागना आरम्भ किया। बिना-रुके-थके एक फिर से चार्ज होनेवाले बैटरी की खोज कर डाली। यदि इस बैटरी की खोज 30 साल पहले नहीं की जाती तो आज के स्मार्ट फोन की संकल्पना संभव नहीं थी। आज हम बिना मोबाइल के जीवन की कल्पना नहीं कर सकते हैं। एक क्षण के लिए यदि नेटवर्क चला जाता है तो मन अशांत हो जाता है। अतः आज के रिचार्जेबल समाज बनाने के लिए उन्हें बहुत-बहुत बधाई।

वान्चो लिपि

जब समाचार पत्र में पढ़ा कि वांचो भाषा को विलुप्त होने से बचाने और संरक्षित करने के लिए, भाषाविद् छात्र बनवांग लोसू ने एक स्वतंत्र वांचो लिपि विकसित की है , तो मन प्रसन्नता से भर गया। अपने सेवाकाल के दौरान मुझे करीब 3 वर्षों तक आज के लोंग्डिंग जनपद स्थित(अरुणाचल) निऔसा ग्राम में कार्य करने का मौका मिला था। मैं रात्रि पाठशाला में ग्रामीणों के बीच में पढ़ाने के लिए जाता था। उस वक्त मुझे वान्चो भाषा नहीं जानने का दुःख होता था। प्रयास किया था कि एक वान्चो शब्द रोज सीखूंगा। बाद में स्थानान्तरण होने के बाद यह प्रयास छूट गया। सोचता था कि यदि वान्चो भाषा की अपनी लिपि होती तो अच्छा रहता। आज वह दिन आ ही गया। वान्चो लिपि के अभाव को छात्र बनवांग लोसू ने पूरा कर दिखाया। निश्चित रूप से यह भगीरथ प्रयास रहा होगा। छात्र बनवांग लोसू को करीब 12 वर्ष का समय लगा। आज यह लिपि ऑनलाइन उपयोग के लिए अमेरिका स्थित यूनिकोड कंसोर्टियम में मान्यता प्राप्त हो गयी है, अर्थात इस लिपि का उपयोग अब दुनिया भर में इंटरनेट पर भाषा के इस्तेमाल के लिए किया जा सकता है। बनवांग लोसू के अनुसार , "हम अपनी संस्कृति और भाषाओं को संरक्षित करने के लिए स्वयं जिम्मेदार हैं और यदि इसके संरक्षण के लिए उपाय नहीं किए तो दुनिया से गायब हो जाएगा। कोई श्रेष्ठ भाषा और हीन भाषा नहीं है; हर भाषा समान रूप से महत्वपूर्ण है।" इसे देखते हुए हम कह सकते हैं कि आनेवाले दिनों में अरुणाचल की अन्य भाषाओं की भी अपनी लिपि विकसित हो जायेगी।

विकृति का बाहर निकलना

बचपन रेलवे स्टेशन के पास बीता है। विद्यालय से छुट्टी होने के बाद शाम के समय अपने बंधु-बांधवों के साथ स्टेशन पर जाना होता था तथा स्टेशन मास्टर किस तरह कार्य करते हैं – इसका अवलोकन करता था। इसका मुझे फायदा यह हुआ कि रेल के बारे में जानने की इच्छा बढ़ी तथा मुझे यात्रा करना बहुत अच्छा लगने लगा। बाद में अपने कार्यस्थल में भी सहकर्मी रेलवे की जानकारी मुझसे प्राप्त करने की कोशिश करते। उन्हें पता होता था कि मेरे पास रेल-सम्बन्धी जानकारी सटीक मिलेगी। मुझे इस कार्य में मजा भी आता है।

एक बार मैं अपने गृहनगर कहलगांव ( भागलपुर) से दिल्ली की यात्रा पर जा रहा था। एक बुजुर्ग साधु थे जो सामने की सीट पर बैठे थे। मुझे याद है कि मैं उनसे कुछ बातचीत करने की कोशिश कर रहा था लेकिन उन्होंने मेरी तरफ ध्यान नहीं दिया। अधिकांश समय वे गहरे ध्यान में लग रहे थे। मुझे लगा कि उन्हें मौन की आवश्यकता थी इसलिए मैं पढ़ता रहा और अपने खुद के बारे में सोचता रहा।

किसी स्टेशन पर, दो बच्चों के साथ एक सज्जन हमारे डब्बे में शामिल हुए। बच्चे बहुत उपद्रवी थे। मुझे उनका उपद्रव अच्छी तरह से याद है क्योंकि वे पूरे डब्बे में कूदते-चीखते। चीखते भी इस प्रकार से थे कि किसी को सहन नहीं हो। इस बात से मुझे गुस्सा तो आ ही रहा था मगर वे साधु बाबा विचलित नहीं हो रहे थे। बच्चे साधु की दाढ़ी भी खीचने लगे तथा उनके कुछ फल भी लेकर खाने लगे। अगले 5-6 घंटे उन्होंने साधु बाबा को ध्यान नहीं ही करने दिया। मैं सोचने लगा कि ये बाबा कुछ प्रतिक्रिया क्यों नहीं दे रहे हैं? तभी उन बच्चों के पिता बाथरूम जाने के लिए उठे तथा मुझे उन बच्चों का ध्यान रखने के लिए कहा। मुझे उन उत्पाती बच्चों का ध्यान रखने की बात अच्छी नहीं लगी। इतने में साधु बाबा का स्टेशन मुगलसराय ( नया नाम दीनदयाल उपाध्याय ) आ गया तथा वे उतरने लगे।

मैंने उत्सुकता से बाबा से पूछा कि उन्होंने इन बच्चों को कैसे सहन कर लिया? इन बच्चों ने तो उन्हें ध्यान नहीं करने दिया?

साधु बाबा ने कहा, "हर स्थिति में प्रतिक्रिया देने की आवश्यकता नहीं होती है। कभी-कभी आपको बातों को उपरवाले पर छोड़ देना पड़ता है। मैं प्रतिक्रिया दे सकता हूं जब मुझे पता है कि वे बच्चे हैं। मुझे नहीं पता कि उन बच्चों की क्या जरूरत है? उनके दिमाग में क्या चल रहा है? शायद वे मेरा ध्यान चाह रहे थे। हो सकता है कि उनमें नकारात्मक ऊर्जा हो। चूंकि मुझे यकीन नहीं था कि उनकी समस्या क्या है, इसलिए प्रतिक्रिया नहीं देना ही मेरे लिए सही था। ”

लेकिन इतने लंबे समय तक आपने अपनी प्रतिक्रिया को नियंत्रित किया, मैं वास्तव में आपकी सहिष्णुता से प्रभावित हूं ”मैंने कहा।

“मैंने कुछ भी बर्दाश्त नहीं किया। मैंने उनकी सारी नकारात्मकता को दूर करने में मदद की। और वह मेरी प्राथमिकता थी।” मुस्कुरा कर उन्होंने मुझे कुछ केले दिए और वे उतर गए।

ट्रेन पुनः चलने लगी और मैं अपनी सीट पर जा बैठा, एक बच्चे ने मेरा स्मार्ट फोन छीन लिया जो उसके हाथ से फिसल गया और गिर गया। मैंने अपना नियंत्रण खोया और बच्चों पर चिल्लाया। उन बच्चों के पिता मेरे करीब आए और माफी मांगने लगे।

“सर मुझे वास्तव में काफी दुःख है। इन बच्चों की माँ का देहांत कुछ महीने पहले हुआ है। माँ के देहांत के बाद से ही ये बच्चे उपद्रवी हो गए हैं। पहले ये ऐसे नहीं थे। कृपया मुझे माफ़ कर दें।”

अब मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था।

अक्सर, एक गंभीर स्थिति में जहां कोई मुझे गलत तरीके से दोषी ठहराता है या मुझे धोखा देता है या मुझे पीठ में छुरा घोंपता है, मैं प्रतिक्रिया नहीं देने का विकल्प खोजता हूं। हमें यह कभी पता नहीं चलता कि वह व्यक्ति किसी अवसाद या मनोवैज्ञानिक समस्याओं से गुजर रहा है। चूंकि मुझे उस व्यक्ति का असली मकसद पता नहीं है कि झूठ बोल रहा है या मुझे धोखा दे रहा है, इसलिए उसे जाने देने या छोड़ देने में ही भलाई है।

कभी-कभी लोग हमें नुकसान पहुंचाने की कोशिश करते हैं क्योंकि उनकी किसी प्रकार की विकृति बाहर निकलने की तलाश कर रही होती है। प्रतिक्रिया करके हम उस विकृति को और मजबूत बनाते हैं। इसे जाने देने से, हम न केवल व्यक्ति को नकारात्मकता से बाहर निकलने में मदद करते हैं, बल्कि हम सत्य को स्वयं प्रकट करने की भी अनुमति देते हैं।

ऐसी स्थिति में केवल धैर्य को बनाये रखने में ही समझदारी है।

विनम्रता का महत्त्व

जल का बहाव उच्च स्तर से निचले स्तर की तरफ होता है। उसी प्रकार ईश्वर की कृपा भी उन्हें ही प्राप्त होती है – जो विनम्रता के साथ झुकता है। एक बार एक ऋषि ने अपने शिष्यों को बुलाया तथा बताया कि भयानक दुर्भिक्ष पड़ा है। सभी प्राणी प्यास से तड़प रहे हैं। फसल नहीं हुई है। दाने-दाने को लोग मोहताज हैं। मनुष्य को ही भोजन नहीं मिल रहा है तो पशुधन की रक्षा कौन करेगा। ऋषि ने कहा कि जानवरों को इस तरह भूख से तड़पते हुए नहीं देख सकते। इन पशुओं को कहीं और ले जाना होगा। सभी शिष्य एक दूसरे के पीछे छिपने लगे। कोई भी सामने नहीं इस चुनौती को स्वीकार करने के लिए आगे नहीं बढ़ रहा था। उसी समूह में एक सत्यकाम नाम का शिष्य था। सत्यकाम ने चुनौती स्वीकार कर ली। गुरूजी ने उसे आगाह किया कि उसे अकेले ही जाना होगा तथा इस कार्य को अनेकों विपत्तियों का सामना करना पड़ सकता है। अच्छा भोजन नहीं मिलेगा आदि। दूसरे मित्रों ने भी साथ जाने की इच्छा प्रकट की – मगर गुरूजी ने मना कर दिया। उन्होंने सत्यकाम को अकेले ही जाने के लिए कहा। सत्यकाम ने मुस्कराते हुए कहा कि कोई बात नहीं है और आशीर्वाद लेकर 500 गायों के साथ अपने लक्ष्य की तरफ चल पड़ा। चलते वक्त गुरूजी से पूछा कि वापस कब आना है। गुरूजी ने कहा कि जब गायों की संख्या 1000 हो जाए तो वापस आ सकता है। सत्यकाम गायों को लेकर एक सुन्दर घाटी में गया – जहाँ कि जानवरों के लिए घास की प्रचुरता थी। सत्यकाम ने वहां डेरा डाल दिया। वह रोज सुबह उठता, उगते हुए सूर्य को प्रणाम करता। ईश-वंदना करता, जप-तप करता और गायों के रख – रखाव की चिंता करता। उसे घर लौटने की चिंता नहीं थी। धैर्यपूर्वक वह जीवनयापन करने लगा। एक दिन देवताओँ के राजा उसकी दिनचर्या से प्रभावित होकर प्रकट हुए तथा उसे बताया कि गायों की संख्या 1000 तक पहुँच गयी है। अब वह अपने गुरूजी के आश्रम में लौट सकता है। इंद्र ने उसे वापस जाने के लिए कहा क्योंकि उसका लक्ष्य पूरा हो गया था। सत्यकाम अपने गुरूजी के आश्रम की तरफ लौट चला। रास्ते में उसे चार दिन लगे। रात में वह चार अलग-अलग गांवो में रुका। इंद्र ने प्रत्येक रात उसे एक – एक वेदों की शिक्षा दी। वह चारों वेदों का ज्ञाता बन गया। ऋग्वेद से उसे जीवन के उद्देश्य का ज्ञान हुआ। यजुर्वेद से पूजा की औपचारिक और अनुष्ठान की अन्य पहलुओं का बोध हुआ। सामवेद से उसे संगीत की शिक्षा प्राप्त हुई तथा अथर्ववेद से उसे स्वास्थ्य सम्बन्धी या शरीर की सुरक्षा का सूत्र प्राप्त हुआ। अब सत्यकाम चारों वेदों का ज्ञाता था। यह उसके विनम्रता का प्रतिफल था। जैसे पथरीली जमीन पर बीज अंकुरित नहीं होगा, उसी प्रकार ईश्वरीय आनंद को विनम्रता और ईमानदारी के बिना महसूस नहीं किया जा सकता है। ईश्वर करुणा का अवतार है। वह अच्छाई या विनम्रता को ठीक से परखते हैं। जो योग्य होता है उसे ही पुरस्कृत करते हैं। इसीलिए हम सब हर समय और सभी स्थानों पर विनम्रता, आज्ञाकारिता, अनुशासन और करुणा का अभ्यास करने में संकोच न करें। विनम्रता और आज्ञाकारिता का पालन करने वाला छात्र पूरी तरह से ज्ञान प्राप्त करने में सक्षम होता है। कहा भी गया है कि विद्या ददाति विनयम।

शक्ति के लिए प्रार्थना

बच्चों को पढ़ना और पढ़ाना इतना आसान नहीं होता है। कक्षा में अलग-अलग तरह के बच्चे होते हैं।किसी को 25 तक का पहाडा याद होता है तो किसी – किसी को 5 तक का भी याद नहीं होता। समूह में एक साथ चलना एक टेढ़ी खीर के समान है। मानसिक स्तर हर बच्चे का अलग-अलग होता है। उस आधार पर हर कक्षा में 5-6 समूह का निर्माण हो जायगा। एक समूह केवल तोड़-फोड़ पर ही ध्यान देता है। हालाँकि ऐसे बच्चों की संख्या 1-2 होती है लेकिन यही एक – दो सभी की नाक में दम किए रहते हैं और चर्चा का विषय बने रहते हैं। विद्यालय में इन्हें ‘मीजिया समूह’ से नवाजा जाता है। इस समूह के छात्र भी अपने को गौरवान्वित महसूस करते हैं। इनमे देवत्व का वास है लेकिन देवत्व की खोज कर पाना ही एक आविष्कार करने के जैसा है। आज के नियम के अनुसार बच्चों पर हाथ नहीं उठा सकते , जबकि हमलोगों के वक्त में तो गुरूजी कुछ देखते ही नहीं थे – जहाँ पाया वहां लगा दिया। नियम कहता है कि बच्चे विद्यालय से प्यार करें और बच्चे विद्यालय से इतना प्रेम करने लगते हैं कि एक-दो शीशे को बलिदान होना पड़ता है। एक – दो कक्षा में तो देखा है कि गुरूजी पढ़ा रहे होते हैं और चंचल बालक खिड़की से झूल रहे होते हैं। रचनात्मकता वे चित्रकारी या संगीत में दिखाने की जगह खिड़की आदि पर झूलने में दिखाते हैं। परियों की कहानी तो अब बीते दिनों की बात है। हाँ, PUBG खेल जरुर देखने में मजे लेते हैं। कुछ बच्चों के परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी दयनीय होती है कि सोचता हूँ कि बिहार के आनंद की सुपर 30 तरह मैं भी अपना एक कुछ सुपर-डुपर खोल लूँ – मगर पापी पेट का सवाल सामने आ जाता है और हिम्मत नही होती है कि कुछ अलग से किया जाए। सुपर – 30 के आनंद को उसकी माँ का समर्थन प्राप्त था। मुझे भी मेरी माँ का समर्थन तो है लेकिन मेरी माँ उम्र अधिक होने के कारण खाना नहीं पका सकती है। नन्हे बालक खाली पेट ही विद्यालय आ जाते हैं। इनके कपडे भी ऐसा लगता है कि बहुत दिनों से धुले नहीं गए हों। अब ऐसे बच्चों पर कठोरता दिखाकर कुछ हासिल नही होगा। इसी में से एकलव्य खोजना पड़ेगा। एक विद्यालय में प्रायः गुरूजी स्वच्छ पेयजल बाहर से लेकर आते थे – मगर बच्चों के लिए वही कीचड़ वाला जल उपलब्ध कराया जाता था। उस शर्म से मैं अपने लिए भी उसी कीचड़ वाले जल का उपयोग करता था। बीच में सरकारी नियम होने के कारण जन्म प्रमाण पत्र, जाति प्रमाण पत्र आदि चाहिए। बच्चों को कहने पर पता चलता है कि कौन बना कर लाएगा? क्यों – पिताजी नहीं है। माँ कहाँ है – पता नहीं है। कहाँ पर और किसके साथ रहते हो ? बूढी दादी के साथ रहता हूँ। अब मन सोच कर दुखी हो जाता है कि सही में बूढ़ी दादी इन कार्यालयों के चक्कर कैसे लगा सकेगी? फिर चुप रहने के सिवा और कोई उपाय नहीं रहता है। व्यवस्था – तंत्र को देखकर मन खिन्न हो जाता है। मगर महाभारत के विदुर की तरह कोई निर्णय ले पाने में असमर्थ रहता हूँ। विदुर नीतिज्ञ हुए भी हस्तिनापुर के सिंहासन से चिपके रहे। उसे छोड़कर जा नहीं सके। कुछ बच्चे तो दिव्यांग अथवा मंद बुद्धि के होते हैं। उन्हें अलग से ही ध्यान देकर पढाया जा सकता है। अलग प्रकार के विद्यालय में ही उनकी शिक्षा हो सकती है। मगर सभी को पढाना ही है और यही चुनौती है। इसे स्वीकार कर लेने में ही भलाई है। रवीन्द्रनाथ ठाकुर की तरह ईश्वर से इन चुनौतियों से सामना करने की शक्ति मांगता हूँ। ईश्वर इतनी ताकत दे कि राह में जो भी बाधा-विघ्न आए – उसका सामना हिम्मत के साथ कर सकूँ और अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन ईमानदारी के साथ कर सकूँ।

संकीर्ण दुनिया

अभी हाल में एक विवाह समारोह में भाग लेने के लिए अपने गृहनगर भागलपुर जाना पड़ा। यात्रा बस तथा रेल दोनों से पूरी की। रास्ते में बस से उतरकर ट्रेन पकड़ने के लिए घंटों इंतजार करना पड़ा। प्लेटफार्म पर तथा प्रतीक्षालय में कितने युवा तथा बड़े उम्र के लोग सब अपने – अपने मोबाईल में खो गए थे। प्रतीक्षालय में पहले समय बिताने के लिए दैनिक अखबार या समाचार पत्र खरीद कर पढ़ते थे। समाचार पत्र तो प्लेटफार्म पर बिक रहा था। हमेशा की तरह खरीदकर लाया और पढ़ लिए। आश्चर्य तब हुआ जब कोई भी समाचार पत्र को मांगने के लिए नहीं आया। आमतौर पर मांगने वालों की तादाद ज्यादा रहती है। कोई – कोई तो बीच का पेज मांग लेते हैं। फिर उन पेज को सहेजकर रखना हमारी जिम्मेदारी बनती है। लेकिन यहाँ तो किसी ने माँगा ही नहीं। सारे के सारे जन मोबाईल में तल्लीन थे। ऐसे लग रहा था कि वे सब हमारे बीच में हैं ही नहीं। सब अपने हाथ में चार्जर तथा पावर बैंक लेकर बैठे हुए थे। मुझे लगा कि यही 21वीं शताब्दी है। सब यंत्रवत हैं। सामने में सहयात्री कहाँ से है? क्या कर रहा है? मैं 30 साल पहले की दुनिया में चला गया। जब घर से निकलते थे तो रास्ते में कितने मित्र अनायास बन जाते थे। कभी – कभार तो उन मित्रों से उनके शहर में जाकर मिला भी। अब तो सोशल नेटवर्किंग का ज़माना है। फेसबुक, ट्विटर आदि पर एक-दो मित्र कौन कहे – मित्रों की भरमार लग जाती है। यह अलग बात है कि हम सामने वाले से अनजान रह जाते हैं और आभासी दुनिया में जीने लगते हैं। जबकि मुझे तो ये आभासी दुनिया में कुछ तथ्य लगता ही नहीं है। एक ट्विटर पर ट्वीट पढ़ा जो कि किसी के गुजरने पर लिखा गया था । मगर वहां पर जो ट्वीट करनेवाले की तस्वीर लगी थी वह हंसमुख वाली थी। इस बात का ध्यान आभासी दुनिया में नहीं रह पाता है और भूल हो जाती है। यदि हम वास्तव में किसी के यहाँ संवेदना व्यक्त करने जायेंगे तो क्या हंसमुख मुद्रा लेकर जायेंगे? कतई नहीं। तो फिर इस प्रकार की आभासी दुनिया से जुड़ने से क्या फायदा? एक मेरे सम्बन्धी के पिताजी का निधन हुआ। देखा कि फेसबुक पर उनके मरने की सूचना दी गयी है। नीचे ‘लाइक’ करने वाले की संख्या सैंकड़ो में है। क्या किसी के गुजरने पर हम ‘लाइक’ करेंगे? एक चाय के दुकान पर दो युवतियां आयीं। दोनों आमने-सामने एक ही टेबल पर बैठीं और चुपचाप अपने मोबाईल में व्यस्त हो गयी। दोनों ने अनमने ढंग से चाय पी और अपना-अपना बिल चुकाकर चलते बनी। मैं दूर में बैठा उन दोनों को देख रहा था। पहले सोचा कि दोनों अपनी बहनें या सखियाँ होंगी। बाद में उन लोगों के व्यवहार को देखकर पता चला कि दोनों अजनबी हैं और उनका आपस में कोई सम्बन्ध नहीं है।

विवाह समारोह में नयी पीढ़ी के बच्चे मोबाईल में व्यस्त थे। शादी को संपन्न कराने के लिए बहुत प्रकार के मांगलिक कार्य होते हैं। मंगल गीत गाए जाते हैं। बारात आने पर क्या – क्या रस्मे हैं – उनको पूरा किया जाता है। अग्नि के सामने सात फेरे लिए जाते हैं – तब जाकर विवाह का कार्यक्रम संपन्न होता है। मगर जैसा कि पहले ही बता चुका हूँ कि सारे के सारे युवा पीढ़ी अपने में मग्न थे। अब कौन सी रस्मे अभी निभानी है – उसकी जानकारी देने वाला भी कोई नहीं था। सारी जानकारी गूगल से खोज कर निकाली जा रही थी। मंगल-गीत गाने के लिए यूट्यूब का सहारा लिया जा रहा था। सब कुछ यन्त्र चालित था। समझ में मुझे आ गया कि समय परिवर्तनशील है। कल जो था वह आज नहीं है और आज जो है वह कल नहीं रहेगा। पुस्तक का महत्त्व तो कम नहीं होगा लेकिन मोबाईल के आविष्कार से पुस्तक की दुनिया आज पिछड़ते जा रही है। चूँकि मैं पुराने ज़माने का हूँ इसीलिए मुझे कुछ अटपटा सा लग रहा है लेकिन यह नयी पीढ़ी तो अपने में मग्न है। किसी को किसी की फ़िक्र नहीं है। समाचार पत्रों में पढ़ते रहता हूँ कि ‘पबजी’ गेम में हारने पर आज की युवा पीढ़ी आत्महत्या जैसे खतरनाक कदम उठाने से भी नहीं हिचकती है।

तो क्या ये संवादहीनता ही स्थिति बनते जा रही है? यदि ऐसी बात है तो निश्चय ही हम खतरनाक समय की तरफ बढ़ रहे हैं। इस दशा या समय को रोकना या नियंत्रण में करना जरुरी है। नहीं तो लगता है कि मनुष्य मनुष्य नहीं रहकर कुछ और हो जाएगा।

सकारात्मक कदम

अभी इस कोरोना के कारण हताशा के वातावरण में भी एक अच्छी खबर पढने को मिली कि भारतीय सेना में कम अवधि के लिए भी लोग जा सकेंगे। रोना काल में लोगों के बीच प्रबल होती राष्ट्रवाद और देशभक्ति की भावना को ध्यान में रखते हुए भारतीय सेना ने 'टूर ऑफ ड्यूटी’ का प्रस्ताव प्रस्तुत कर सकारात्मक दिशा में कदम बढ़ाया है। अब आम नागरिकों को भी देश की सेवा के लिए सेना में योगदान कर तीन साल की टूअर ऑफ ड्यूटी का मौका मिल सकेगा। इससे यही लगता है कि भारतीय सेना देश के प्रतिभाशाली युवाओं अपने साथ शामिल करना चाहती है। अभी के नियम के अनुसार शॉर्ट सर्विस कमीशन के जरिए सेना ज्वाइन करने वालों को कम-से-कम 10 वर्ष की नौकरी करनी होती है। सेना में इससे कम अवधि की ड्यूटी का प्रावधान अभी नहीं है। प्राप्त जानकारी के अनुसार सेना के शीर्ष अधिकारी अल्प सेवा कमीशन के प्रावधानों की भी समीक्षा कर रहे हैं, ताकि इसे युवाओं के लिए ज्यादा आकर्षक बनाया जा सके। इससे उन युवाओं के लिए संभावनाओं के नए द्वार खुलेंगे, जो सेना में शामिल होकर देश की सेवा तो करना चाहते हैं, लेकिन वहां स्थाई कॅरियर नहीं बनाना चाहते। प्रस्ताव के नाम से ही जाहिर है कि सेना ऐसे युवाओं को निश्चित मियाद (तीन साल) के लिए अपनी चुस्त-दुरुस्त सेवाओं की सैर करने का मौका देना चाहती है। कुछ देश जैसे चीन और इजराइल में कम मियाद के लिए युवाओं की सेना में भर्ती की जाती है। उसी तरह का प्रयोग अब अपने देश में किया जा रहा है। ऐसे दौर में, जब बेरोजगारी का संकट दिन-ब-दिन गहरा रहा हो, यह प्रस्ताव राहत देने वाला है। इससे भी बड़ी बात यह है कि युवाओं को सेना की वर्दी पहन कर अपनी जीवन-शैली को नई दिशा देने का मौका मिलेगा। हिम्मत और हौसले के साथ कड़ा अनुशासन सेना की पहली शर्त है। सेना में शामिल होने से युवाओं में ऐसे संस्कार विकसित होंगे जो उन्हें भावी जीवन की चुनौतियों के सामने ज्यादा सक्षम बनाएंगे। लेकिन जिस तरह से पूर्णबंदी अभी तक अपने लक्ष्यों को प्राप्त नहीं कर सका है, उसी तरह से सेना को जब भर्ती प्रक्रिया शुरू होगी तो बहुत ध्यान देना होगा। यह तय है कि बेरोजगारी के कारण हो सकता है कि भर्ती केन्द्रों पर बेतहाशा भीड़ उमड़ पड़े और कुछ घटित हो जाए। पूरी तैयारी के साथ ही सेना को इसके नियम बनाने होंगे। लोगों को अवसर प्राप्त होगा यह तो अच्छी बात है मगर कितने लोगों को सेना अवसर देगी – यह स्पष्ट नहीं है। इसकी जानकारी भी दे देने से ठीक रहेगा। सेना में अधिकारियों की कमी है – यह तो हम सभी जानते हैं और युवाओं को लुभाने के लिए तथा देश सेवा का अवसर प्राप्त करवाने के लिए यह विचार बहुत ही सराहनीय है। अधिकारियों यों की कमी को अब पूरा किया जा सकेगा। ‘सम्मान सहित सेवा’ हमारे देश के लोग कर पायेंगे। सेना किस तरह से कार्य करती है, इसे जान सकेंगे। सेना से बाहर निकलने के बाद उनके लिए फिर से काम करने के लिए कोई अन्य अवसर भी तैयार कर रखना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। नहीं तो हर तीन साल में बहुत से लोग बेरोजगार होकर बाहर बैठ जायेंगे। इसीलिए हमारा मत केवल पूरी योज़ना बनाकर ही इसके क्रियान्वयन से है। अन्यथा अन्य योजनाओं की तरह इसकी भी हवा न निकल जाए।

सकारात्मक सोच वाले व्यक्ति

मुझे बहुत सहकर्मी मिले लेकिन याद कुछ ही रहे। कारण व्यवहार था। कुछ का व्यवहार रुखा था तथा कुछ का एकदम मिलनसार। कई लोगों का सोचने का तरीका वाकई काफी अच्छा होता है। चाहे कितना भी तनाव हो वे परेशान नहीं होते। उनके चेहरे पर ज़रा-सी भी शिकन दिखायी नहीं देता। वे जिनसे मिलेंगे अच्छे से मिलेंगे, थोड़ी बहुत सबकी मदद कर देंगे। किसी के बारे में नकारात्मक बातें नहीं बोलेंगे। ऐसे लोगों का ‘सोचने का नजरिया’ मुझे बहुत अच्छा लगता है।’ इस तरह के व्यक्ति से दो फायदे होते हैं - एक, वह व्यक्ति भविष्य में और भी बेहतर काम करने को प्रेरित होते है और दूसरा, उस व्यक्ति के मन में औरों के लिए सद्भावना और बढ़ते रहती है।

एक विद्यालय में महाशय ‘क’ के खिलाफ पूरे शिक्षकों ने गोलबंदी कर दी। अब जो भी नया शिक्षक व्यवस्था में आता था, उसे केवल नकारात्मक उर्जा से भर दिया जाता था। उनके सद्गुणों पर ध्यान नहीं देकर केवल दोषों पर ही ध्यान दिलाया जाता था। बाहरी शक्तियों की मदद भी उनको नीचा दिखाने के लिए ली जाती थी। कोई अतिथि भी यदि आता था तो सभी लोग मिलकर महाशय ‘क’ की भरपूर शिकायत करते थे। महाशय ‘क’ की क्या गलती है? खोजबीन करने पर पता ही नहीं चलता है। महाशय ‘क’ आत्मविश्वास से भरपूर तथा दुनिया में क्या हो रहा है – इससे अनजान अपने कार्यों में तल्लीन रहते थे। भाषा पर उनका नियंत्रण बेजोड़ था। कार्य को कैसे अंजाम तक पहुंचाया जाता है – यह उनको बखूबी पता था। नतीजा महाशय ‘क’ आराम से अपना कार्य करते रहे तथा कोई भी उनका कुछ भी नहीं बिगाड़ सका। बाकी लोग केवल दांत पीसते रह गए। बहुत बार ऐसा मौका आया कि किसी सहकर्मी को कार्यालय सम्बन्धी कोई जानकारी चाहिए तो महाशय ‘क’ उनकी मदद करने के लिए तैयार रहते थे।

सकारात्मक सोच वाले व्यक्ति में अक्षय-उर्जा होती है। जो लोग जीवन में जमकर मेहनत करते हैं, उनके लिए जीवन में परीक्षा के अवसर आते रहते हैं। ये दुनिया सकारात्मक सोच वाले लोगों लोगों की वजह से खूबसूरत है। ये लोग वाकई सबके काम आते हैं, भीतर से अच्छे होते हैं। सकारात्मक सोच वाले उम्मीद, ऊर्जा तथा साहस भर देते हैं। इससे साथ काम करनेवाले व्यक्ति लोकप्रिय, शक्तिशाली और महत्वपूर्ण बन जाते हैं।

अब हमारे ऊपर यह निर्भर करता है कि हम महाशय ‘क’ की तरह बनें या अन्य लोगों की तरह भीड़ में शामिल हो जाएँ। ध्यान रहे कि वन में शेर एक ही होता है। यदि महाशय ‘क’ बनना है तो शेर वाले गुणों का समावेश करना ही होगा। निडर बनना इसके लिए पहली शर्त है। डर कर भाग जाने से उद्देश्य की प्राप्ति नहीं होगी। पीछे बात करनेवाले पीछे ही रह जाते हैं। आगे बढ़कर अपनी उपयोगिता को सिद्ध करना ही प्राथमिकता होनी चाहिए। यह हमेशा ध्यान में रखना होगा कि कार्यस्थल में प्रतियोगिता ‘सहयोग-भाव’ के साथ ही करनी है। बिगाड़ने वाले मिलेंगे और हो सकता है कि बिगाड़ ही दें लेकिन अपने लक्ष्य के प्रति अचल तथा अडिग रहना है।

समझदार लोग

अभी प्राय: मनुष्य में समझदारी कूट-कूट कर भर गयी है। कोई किसी से कम नहीं है। सलाह तो बिना मांगे ही मिल जाती है। सुबह होते ही मोबाईल पर ‘शुभ प्रभात’ सन्देश की झड़ी लग जाती है। मैं भी इस खेल में पीछे नहीं हूँ। जब दुनिया ही करती है तो मैं क्यों न अपने को जानकारी के मामले में अद्यतन रखूं। सब के साथ कदम मिलाकर चलने में ही समझदारी है। सभी समझदार हैं – इसकी जानकारी अभी हाल-फिलहाल में हमें अपने पड़ोस से देखने को मिली। पड़ोस में एक 2 साल की बच्ची बुरी तरह जल गयी थी। यह बात बिजली की तरह पूरे इलाके में फ़ैल गयी। अब बच्ची जली है – देखने के लिए तो जाना ही पड़ेगा। यह मानव धर्म है। विद्यालय में प्राचार्य को सूचना देकर पडोसी धर्म निभाने के लिए चला। मगर जब तक पहुंचू तब तक क्या देखता हूँ कि वहां पर ‘मेला’-सा लगा है। आगंतुकों की भीड़ से रास्ता में पूरा जाम लगा था। आना-जाना मोटर वाहन की बात ही छोड़ दीजिए – पैदल भी मुश्किल था। किसी प्रकार हटाते-हटाते रास्ता बनाया तथा मंजिल तक पहुंचा। वहां का दृश्य सचमुच बहुत ही दारुण था। बच्ची काफी जली हुई थी तथा उसकी माँ उसे गोद में लेकर शून्य में ताकती हुई बैठी थी। अब वहां पर आए हुए लोगों की बातचीत सुनने लगा। एक ने कहा कि बच्ची जली है या जलाई गयी है? मैं अवाक था। यह प्रश्न मेरी नजर में आने लायक नहीं था। भला कोई माँ-बाप अपनी फूल-सी बिटिया को क्यों जलाए? बच्ची की माँ चुपचाप प्रतिक्रिया दिए बिना बैठी रही। एक ने कहा कि क्यों नहीं डॉक्टर के पास लेकर गए हैं? जल्दी से डॉक्टर के पास लेकर जाइए। यहाँ क्यों बैठी है? अब बेचारी वह बच्ची की माँ यह भी नहीं बोल पा रही थी कि बिटिया के पापा डॉक्टर के यहाँ जाने के लिए गाडी की व्यवस्था करने गए हैं। तब तक एक महिला ने एक प्रश्न दाग दिया- कैसे जल गयी? आप क्या कर रही थी? बच्चे के पापा क्या कर रहे थे? आप सब ने ध्यान क्यों नहीं दिया? आप सभी एक नम्बर के आलसी हो? बच्चे को कैसे पाला जाता है - यह भी पता नहीं है? यदि पता नहीं है तो बच्चे को इस संसार में लाए ही क्यों? पता नहीं इस औरत के माँ-पिताजी ने कुछ काम सिखाया था या नहीं? बच्चों को कैसे पाला जाता है – इसके लिए कुछ ट्रेनिंग दे देने से ठीक रहता। बात अब उस महिला के माँ-पिताजी तक पहुँच गयी थी। एक महिला ने तो उस बच्ची की माँ को तो यह सलाह दे डाली कि आप अपने सास-ससुर को ही यहाँ बुला लीजिए। एक सज्जन ने कौन-सी दवा दिए हैं – यह बात पूछी। उस दवा का नाम सुनते ही उस सज्जन ने कहा कि नहीं-नहीं यह दवा नहीं दीजिए बल्कि दूसरी वाली अमुक दवा दीजिए। मैं चुपचाप उन सभी एक वार्तालाप को क्रिकेट खेल के ओवर की तरह सुन रहा था। एक ओवर खत्म होता नहीं था कि दूसरा ओवर शुरू हो जाता था। लोगों को इतना ज्ञान इस सोशल नेटवर्किंग के ज़माने में हो गया है – मुझे सच में पता नहीं था। उस जगह सामाजिक, धार्मिक और नैतिक ज्ञान की झड़ी लग गयी थी। चिकित्सा विज्ञान की तो इतनी जानकारी थी कि चिकित्सा शास्त्र पढने की आवश्यकता ही नहीं थी। डॉक्टर भी शायद शरमा जाते। लेकिन तारीफ तो उस महिला की करनी पड़ेगी जो सभी के बात को केवल ध्यान से सुन रही थी और कुछ भी प्रतिक्रिया देने से बच रही थी। जन समुदाय में कोई भी उस बच्ची को हॉस्पिटल लेकर जाने के लिए तैयार नहीं था। बच्ची उसी प्रकार दर्द से तड़प रही थी। इतनी देर में बच्ची के पिता कुछ गाडी की व्यवस्था कर लाए और भीड़ छंट गयी। मुझे समझ में आ गयी थी कि आज के समय में केवल ‘सलाह’ ही मुफ्त में मिलता है। किसी से मदद की आशा ही नहीं रखनी है।

समय कैसे बिताएं?

जिस दिन से भारतीय क्रिकेट टीम विश्वकप के सेमीफाइनल से बाहर हुई है – मेरी चिंता कुछ बढ़ गयी है। इधर मेरी 3-4 महीने से चांदी थी। पहले देश में आम चुनाव के कारण घर का कार्य नहीं करता था। श्रीमती जी के कुछ कहने से ‘चुनाव’ कार्य में व्यस्त हूँ, कह कर टाल देता था। वे भी सोचती थी कि देश सेवा के कार्य में उनके श्रीमान लगे हैं। आम चुनाव का कार्य घर के कार्य से अधिक महत्त्वपूर्ण है और वे सहधर्मिणी के धर्म को बहुत ही सधे हुए अंदाज में पूर्ण करती जाती थीं।मोदीजी और राहुल गाँधी के साक्षात्कार बंद हो गए तो श्रीमती जी ने राहत की साँस ली क्योंकि उन्हें अब मनचाहा धारावाहिक देखने के लिए टीवी मिल जाएगा। चुनाव के ठीक बाद ही आईपीएल का मैच आ गया। फिर तो क्या कहने? अब श्रीमतीजी काफी नाराज रहने लगी। उसकी कुछ समझ में नहीं आ रहा था। वह करे तो क्या करे? हमेशा उसकी सोच मुझे कुछ कार्य सौपने की रहती है। मैं उसे आईपीएल का महत्त्व समझाने की कोशिश में लगा रहता। वह भी सामान्य भारतीय नारी की तरह ज्यादा जिरह नहीं करती थी। लेकिन सोचती रहती थी कि कुछ कार्य सौंप कर वह भी अपनी महिलाओं की मित्र-मण्डली में अपनी शौर्य-गाथा का वर्णन करेगी। आईपीएल भी समाप्त हो गया और आम चुनाव भी बीत गया। फिर मैंने कुछ समय मंत्रिमंडल के गठन होने तक के लिए मांग लिया। मैं मन ही मन अपनी चालाकी पर खुश था कि चलो श्रीमतीजी मान गयी। जैसे ही मंत्रिमंडल का गठन हो गया तो क्रिकेट विश्व कप का रंगारंग आगाज हो गया। अब श्रीमतीजी तो काफी जल-भुन गयी। वो पूछ रही हैं कि कब से घर के काम में हाथ बटायेंगे? मैंने कहा कि बस जरा यह विश्वकप समाप्त हो जाने दो। अब मैं विजेता की भांति अपने को महसूस कर रहा था। लेकिन सब कुछ तो ठीक ही चल रहा था। सोचा था कि क्रिकेट विश्वकप हमारी भारतीय टीम जीत ही जायेगी तथा इसकी खुशियाँ 10-15 दिन तक तो मना ही लेंगे। लेकिन विधाता को कुछ और ही मंजूर था। विधाता ने साथ नहीं दिया और एक खौफ की तरह भारतीय क्रिकेट टीम क्रिकेट के विश्वकप से बाहर हो गयी। बस यहीं से मेरी परेशानी शुरू हो गयी। पहले से तय कार्यक्रम था। काफी शान-शौकत से तथा आराम से जिन्दगी कट रही थी। समय कैसे पंख लगा कर बीत रहा था – पता नहीं चल रहा था। अब तो समय बिताये नहीं बीतता है। समय से डर लगने लगा है। ‘बीती न बिताई रैना’ वाला गाना गाता हूँ – फिर भी समय नहीं कटता। अपने सहकर्मियों से पूछा कि समय बिताने के लिए क्या करें? सहकर्मियों की सलाह हुई कि ‘शांति पाठ’ किया जाए। मैंने पूछा कि शांति-पाठ किस लिए? सहकर्मियों ने कहा कि घर में शान्ति रखने के लिए। फिर पता किया कि कुछ कार्यक्रम अभी खोजना पड़ेगा जिससे कि कम से कम दो-तीन महीने आसानी से निकल सकें। विद्यालय के दिनों में तो समय आसानी से बीत जाता था – गर्मी की छुट्टियों में कही सैर – सपाटे पर निकल जाते थे। अब वह विद्यालय वाले दिन मिलने से रहे। घर के कामो से बच नहीं सकते। यदि श्रीमतीजी किसी प्रकार कोई काम बताती थी तो कुछ न कुछ बहाना , कोई न कोई कार्यक्रम निकल ही आता था। कुछ कार्यक्रम नहीं होने से कुछ बना लिया जाता था। अभी तो एकदम खाली – खाली है। यह खाली समय सुरसा के मुंह की तरह बढ़ते ही जा रहा है। साथियों ने बताया कि चातुर्मास प्रारंभ होने वाला है – तो विश्राम में चले जाना ठीक रहेगा। बारिश का मौसम भी है। इसीलिए अभी कोई बड़ा काम होने वाला नहीं है। बेहतर है कि घर के कामों में आप हाथ लगाएं – मातम न मनाएं। समय काटने के नए – नए उपाय सोचने से अच्छा है कि ससुराल ही चला जाए और इस उपाय से श्रीमतीजी निश्चित रूप से प्रसन्न होंगी – इसमें कोई शक नहीं है। यह ख्याल आते ही मैं आर्कीमिडिज के अंदाज में विजेता की तरह घर की तरफ निकला।

समय पर उठाया गया कदम

बदलाव समय की मांग है। हर क्षेत्र में बदलाव होते रहते हैं। शिक्षा के क्षेत्र में भी भारतीय परम्परा से हटकर बहुत बदलाव आए। पहले कानून की पढाई अच्छी मानी जाती थी। बहुत सारे नेता कानून की पढाई से निकले। भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन के इतिहास को पढ़कर हम समझ सकते हैं कि किस प्रकार के कानून के जानकारों ने स्वाधीनता आन्दोलनों में भाग लिया। अब इसी कड़ी में देशभर के इंजीनियरिंग कॉलेजों में प्रवेश के नियम बदल गए हैं। अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद ने शैक्षणिक सत्र 2020-21 के लिए नियमों में बदलाव किया है। अब 12वीं वर्ग में भौतिक विज्ञान और गणित के अलावा तीसरे विषय के लिए रसायन विज्ञान, बायो टेक्नोलॉजी, जीव विज्ञान और टेक्निकल वोकेशनल कोर्स के साथ-साथ कंप्यूटर साइंस, आईटी, इंफॉर्मेटिक्स प्रैक्टिस, कृषि, इंजीनियरिंग ग्राफिक्स और व्यापारिक- अध्ययन करने वाले छात्रों को भी शामिल कर लिया गया है।

अभियान्त्रिकी तथा तकनीकी महाविद्यालय अब केवल रोबोटिक्स और कृत्रिम मेधा, यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे नए उभरते क्षेत्रों में ही पाठ्यक्रमों की पेशकश कर सकते हैं। पुराने यानी पारंपरिक क्षेत्रों में ऐसा करने की इजाजत नहीं होगी। अभियान्त्रिकी शिक्षा का यह क्षेत्र जिस तरह के संकट में फंस गया है, उसके बीच हर साल लाखों नए इंजीनियर तैयार करने का औचित्य अब नहीं रह गया है। छात्र भी अब नए जमाने के कोर्स करना चाहते हैं। इंजीनियरिंग शिक्षा क्षेत्र में मांग से ज्यादा सप्लाई की समस्या पर भी विचार होना जरूरी है। देश में हर साल लगभग आधी सीटें खाली रह जा रही हैं। इसलिए कि इंजीनियरिंग का पेशा अब आकर्षक नहीं रह गया है, जबकि बड़ी संख्या में इंजीनियरिंग कॉलेज गुजरे दशकों में खोले गए। शायद उतनी संख्या की आवश्यकता नहीं थी। इसीलिए हालिया दिशा-निर्देश में यह साफ कहा गया कि जो इंस्टीट्यूट ज्यादा छात्र लेना चाहते हैं या नए अतिरिक्त कोर्स शुरू करना चाहते हैं, उनको इसकी अनुमति केवल उभरते क्षेत्रों में दी जाएगी। उभरते क्षेत्र शिक्षा के नए क्षेत्र हैं। अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद ने इसमें आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (एआई)। इंटरनेट ऑफ थिंग्स (आईओटी), ब्लॉकचेन (बिटकॉयन के पीछे लगने वाली तकनीक), रोबोटिक्स, वांटम कंप्यूटिंग, डाटा साइंसेज, साइबर सुरक्षा, थ्री-डी प्रिंटिंग और डिजाइन तथा ऑगमेंटेड रियलिटी, वर्चुअल रियलिटी को नए क्षेत्रों के रूप में चिह्नित किया है। अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद का यह नवीनतम नियमन शिक्षा का माहौल बनाएगा, जो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को बढ़ावा देगा। मकसद है कि देश की तकनीकी शिक्षा दुनिया में सबसे अच्छी हो जाए। दिशा-निर्देश में इस बात को दोहराया गया है कि नई संस्थाएं अपना नाम ऐसा नहीं रख सकती कि उसका संक्षिप्त नाम आईआईटी, आईआईएम, एनआईटी (नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी) या आईआईएससी (इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस) से मिलता-जुलता हो।

यह नियम अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद के अनुसार छात्रों को भ्रमित होने से बचाएगा। कई पाठ्यक्रम में सीटें न भरने के मद्देनजर और आगामी मांग को ध्यान में रखते हुए नई तकनीकी संस्थाओ को डिप्लोमा, अंडर ग्रैजुएट और पोस्टग्रैजुएट लेवल पर सीटें बढ़ाने की अनुमति पहले से नहीं दी जा रही है। आशा है कि इस पहल से भारतीय छात्र बदले माहौल में अपने को प्रतिस्पर्धा में स्थापित कर पायेंगे।

सरलीकृत पंचांग

अपने देश में प्रायः सामान्य जन को पंचांग के सम्बन्ध में बहुत-सी भ्रांतियां होती हैं. तिथि की गणना आदि में उन्हें परेशानियों का सामना करना पड़ता है. मगर हमारा पंचांग बहुत ही वैज्ञानिक है. इसी के कारण हमारे ज्योतिष / खगोल आदि विज्ञानों/शास्त्रों का डंका पूरे विश्व में बजता है. पंचांग को समझना कठिन नहीं है. पाँच प्रमुख भागों से बने होने के कारण इसम हमलोग पंचांग कहते हैं. ये पांच हैं - तिथि, वार, नक्षत्र, करण तथा अयन। इसकी गणना के आधार पर पंचांग की तीन व्यवस्थाएं हैं- चंद्र, नक्षत्र और सूर्य आधारित कैलेंडर पद्धति। इसे भिन्न-भिन्न रूप में पूरे भारत में माना जाता है। एक साल में बारह महीने होते हैं। प्रत्येक महीने में पंद्रह दिन के दो पक्ष होते हैं- शुक्ल और कृष्ण। प्रत्येक साल में दो अयन उत्तरायण तथा दक्षिणायन होते हैं। इन दो अयनों की राशियों में 27 नक्षत्र भ्रमण करते रहते हैं।
एक दिन को तिथि कहा गया है जो पंचांग के आधार पर उन्नीस घंटे से लेकर चौबीस घंटे तक की होती है। चंद्र मास में 30 तिथियाँ होती हैं, जो दो पक्षों में बँटी हैं। शुक्ल पक्ष में 1-14 और फिर पूर्णिमा आती है। पूर्णिमा सहित कुल मिलाकर पंद्रह तिथि। कृष्ण पक्ष में 1-14 और फिर अमावस्या आती है। अमावस्या सहित पंद्रह तिथि।

हिन्दू पंचांग की उत्पत्ति वैदिक काल में ही हो चुकी थी। सूर्य को जगत की आत्मा मानकर उक्त काल में सूर्य व नक्षत्र सिद्धांत पर आधारित पंचांग होता था। वैदिक काल के पश्चात् आर्यभट, वराहमिहिर, भास्कर आदि जैसे खगोलशास्त्रियों ने पंचांग को विकसित कर उसमें चंद्र की कलाओं का भी वर्णन किया।

वेदों और अन्य ग्रंथों में सूर्य, चंद्र, पृथ्वी और नक्षत्र सभी की स्थिति, दूरी और गति का वर्णन किया गया है। स्थिति, दूरी और गति के मान से ही पृथ्वी पर होने वाले दिन-रात और अन्य संधिकाल को विभाजित कर एक पूर्ण सटीक पंचांग बनाया गया है। जानते हैं हिंदू पंचांग की अवधारणा क्या है?

प्रत्येक महीने में तीस दिन होते हैं। तीस दिनों को चंद्रमा की कलाओं के घटने और बढ़ने के आधार पर दो पक्षों यानी शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष में विभाजित किया गया है। एक पक्ष में लगभग पंद्रह दिन या दो सप्ताह होते हैं। एक सप्ताह में सात दिन होते हैं। शुक्ल पक्ष में चंद्र की कलाएँ बढ़ती हैं और कृष्ण पक्ष में घटती हैं।

सौरमास का आरम्भ सूर्य की संक्रांति से होता है। सूर्य की एक संक्रांति से दूसरी संक्रांति का समय सौरमास कहलाता है। यह मास प्राय: तीस, इकतीस दिन का होता है। कभी-कभी अट्ठाईस और उन्तीस दिन का भी होता है। मूलत: सौरमास (सौर-वर्ष) 365 दिन का होता है।
12 राशियों को बारह सौरमास माना जाता है। जिस दिन सूर्य जिस राशि में प्रवेश करता है उसी दिन की संक्रांति होती है। इस राशि प्रवेश से ही सौरमास का नया महीना ‍शुरू माना गया है। सौर-वर्ष के दो भाग हैं- उत्तरायण छह माह का और दक्षिणायन भी छह मास का। जब सूर्य उत्तरायण होता है तब अनुसार यह तीर्थ यात्रा व उत्सवों का समय होता है। पुराणों अनुसार अश्विन, कार्तिक मास में तीर्थ का महत्व बताया गया है। उत्तरायण के समय पौष-माघ मास चल रहा होता है।
मकर संक्रांति के दिन सूर्य उत्तरायण होता है जबकि सूर्य कुंभ से मकर राशि में प्रवेश करता है। सूर्य कर्क राशि में प्रवेश करता है तब सूर्य दक्षिणायन होता है। दक्षिणायन व्रतों का समय होता है जबकि चंद्रमास अनुसार अषाढ़ या श्रावण मास चल रहा होता है। व्रत से रोग और शोक मिटते हैं।
राशियों के नाम ही सौरमास के नाम होते हैं.

चंद्रमा की कला की घट-बढ़ वाले दो पक्षों (कृष्‍ण और शुक्ल) का जो एक मास होता है वही चंद्रमास कहलाता है। यह दो प्रकार का शुक्ल प्रतिपदा से प्रारंभ होकर अमावस्या को पूर्ण होने वाला 'अमांत' मास मुख्‍य चंद्रमास है। कृष्‍ण प्रतिपदा से 'पूर्णिमात' पूरा होने वाला गौण चंद्रमास है। यह तिथि की घट-बढ़ के अनुसार 29, 30 व 28 एवं 27 दिनों का भी होता है।
पूर्णिमा के दिन, चंद्रमा जिस नक्षत्र में होता है उसी आधार पर महीनों का नामकरण हुआ है। सौर-वर्ष से 11 दिन 3 घटी 48 पल छोटा है चंद्र-वर्ष इसीलिए हर 3 वर्ष में इसमें 1 महीना जोड़ दिया जाता है।

सौरमास 365 दिन का और चंद्रमास 355 दिन का होने से प्रतिवर्ष 10 दिन का अंतर आ जाता है। इन दस दिनों को चंद्रमास ही माना जाता है। फिर भी ऐसे बड़े हुए दिनों को 'मलमास' या 'अधिमास' कहते हैं।

सहकर्मी के साथ रिश्ता

अगर ध्यान ना दिया जाए तो सहकर्मी के साथ हुई एक छोटी सी झड़प भी बड़ी लड़ाई में तब्दील हो जाती है। जब तनाव का माहौल होता है तो कई समूह उस तनाव को बढ़ाने का कार्य करते हैं। बजाय तनाव का माहौल घटाने के और बढ़ा देते हैं। हाथ की सभी उंगुलियां समान नहीं होती हैं, उसी प्रकार सभी सहकर्मी भी समान विचारों वाले नही होंगे। उनसे सामंजस्य रखना हमारी जिम्मेदारी बनती है। दोनों पक्ष तनाव को ख़त्म करने पर ध्यान दें तो बहुत सुंदर। देखा गया है कि एक पक्ष तो भूल जाता है मगर दूसरा पक्ष उसे दिल में बसा लेता है तथा सोते-जागते उसी एक छोटी सी घटना को याद करते रहता है। कार्यस्थल के दोस्ताना माहौल को बर्बाद करके ही छोड़ता है। कभी-कभी तीसरे पक्ष को भी हिस्सेदार बनाने की कोशिश करता है, जिसकी आवश्यकता नहीं होती है। ऐसी स्थिति में बेहतर होता है कि दोबारा बात शुरू करने के बारे में विचार करें। सकारात्मक भविष्य की ओर कदम बढ़ाने के प्रयास करें। हम चाहें तो यह बोल सकते हैं कि ‘मुझे पता है अभी हमारे बीच तनाव है, जो हम दोनों के लिए ही बुरा है। पर मुझे यकीन है कि हम इस पर काम कर सकते हैं।’ कुछ दिन बाद एक मीटिंग रखें कि आपको अपनी भावनाओं को समझने का वक्त मिल सके। कॉफी पर एक छोटी-सी मुलाकात भी हमारे बीच के तनाव को दूर कर सकती है। अपने सहकर्मी को भरोसा दिलाएं कि हमें इस रिश्ते की कदर है और वे आगे भी इस तरह की बातचीत की उम्मीद रख सकते हैं। इस तरह हम वर्तमान तनाव को अनदेखा कर रिश्ते को मजबूती दे सकते हैं।

कुछ सहकर्मी ऐसे होते हैं जो मानते हैं कि वे कभी गलत नहीं होते, तब हम निराश हो जाते हैं। कुछ बातों का ध्यान रखकर हम अपने रिश्ते को ज्यादा उत्पादक बना सकते हैं। अगली बार यदि हम ऐसे व्यक्ति के साथ बहस में फंस जाएं तो जवाब देने की बजाय बहस को खत्म करने की कोशिश की जा सकती है। कुछ देर रुकने के बाद उनसे मुलाकात कर और उन्हें बताकर कि उनका व्यवहार किस तरह हमें प्रभावित करता है। हम यह कह सकते हैं कि ‘जब हमारे मत अलग-अलग होते हैं तो हम पूरा जोर लगाकर अपने विचारों को थोपने की कोशिश करते हैं कि हमें चुप होना पड़ता है। यदि आप सहमत ना भी हों तो भी हमारे विचार सुनने जरूर चाहिए।

बातचीत से अच्छा तो कोई और विकल्प नहीं हो सकता है। लेकिन कभी-कभी ये सारे प्रयास निष्फल हो जाते हैं तथा हमारी अच्छाईयों को कमजोरी मान लिया जाता है। इसलिए इस प्रकार के सहयोगी के लिए सबसे अच्छी बात यही है कि बातचीत से भी यदि बात नहीं बनती है तो दूरी बना ली जाए। इससे और कोई दूसरा विकल्प तो नहीं दिखता है। दूरी बनाकर रखने से तकरार की संभावना समाप्त तो नहीं होगी मगर कुछ दिनों के लिए शान्ति अवश्य मिल जायेगी। स्थायी शान्ति का प्रयास करते रहना चाहिए। हो सकता है कि एक दिन ऐसी स्थिति आ जाए तथा सहकर्मी को अपनी गलती का पता चले और शान्ति स्थापित हो जाए।

सही वक्त पर सही कदम

रेल परिवहन ने राष्ट्र को एक करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। पूर्णबंदी में भी भारतीय रेलवे ने जिस तरह से मालगाड़ियों द्वारा देश के कोने-कोने तक सामानों को पहुंचाया तथा किसी सामान की कमी नहीं होने दी, वह काबिलेतारीफ है। देशबंदी की अधिक मार हमारे मजदूर ट्रेन के बंद होने से उठा रहे थे। मई के पहले सप्ताह में जिस तरह से श्रमिक ट्रेन का परिचालन शुरू किया गया उससे यह उम्मीद तो जग ही गई थी कि अब देर-सवेर ही सही, यह जीवन-रेखा फिर से शुरू होने जा रही है। अतः यह रेल परिवहन को फिर से शुरू करना, प्रवासी श्रमिक भाइयों के लिए एक समाधान की तरह है। जैसे ही यह समाचार मिला कि 12 मई से यात्री ट्रेनों के सीमित संचालन को फिर से शुरू करने का निर्णय लिया गया है तो लगा कि सरकार अब सही दिशा में है। हाल के घटनाक्रमों में बढ़ते हुए प्रवासी मजदूरों की अशांति की ख़बरें आ रही थी। गुजरात के सूरत में तो पुलिस और श्रमिकों के बीच झडप की भी खबर आ रही थी। डेड महीने से बिना काम-धंधे के बैठे रहने से प्रवासी श्रमिकों का धैर्य जवाब दे रहा था। अतः और कोई साधन नहीं होने से वे लोग पैदल ही अपने गृह राज्य की तरफ निकल पड़े। इसी कड़ी में महाराष्ट्र के औरंगाबाद के पास शुक्रवार को एक मालगाड़ी द्वारा 16 प्रवासी मजदूरों की दुखद मौत की खबर से मन दहल उठा। ये मजदूर थकान से चूर होकर रेल की पटरी पर ही आराम कर रहे थे। उन्हें पता नहीं चला और जिस भूख से वे अपने घर की तरफ निकले थे, उस भूख ने उनकी जीवन-लीला समाप्त कर दी। सार्वजनिक परिवहन को फिर से शुरू करना मानवीय और आर्थिक अर्थों को भी आसान बना देता है, अब लॉकडाउन आराम से औद्योगिक गतिविधि के लगभग हर क्षेत्र को छूने की कोशिश कर रहा है। यह व्यवस्था प्रवासी श्रमिकों के लिए चलाए जा रहे विशेष गाड़ियों के अतिरिक्त है। इसकी आवश्यकता भी महसूस की जा रही थी। अब कोरोना के साथ जो जीवन जीना ही पड़ेगा। दूसरा और कोई उपाय नहीं है। अब प्रवासी श्रमिकों को उनके गृह राज्यों में फेरी लगाने या रोजगार सृजन केंद्रों में वापस आने-जाने में ज्यादा सोचने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। अपने घर से दूर रहने की चिंता प्रवासियों में काफी सताती है। यदि वन्दे भारत योजना चलायी जा सकती है तो घर में अपने कामगारों के लिए भी कुछ न कुछ योजना लाने-पहुंचाने के लिए तो चलाई ही जा सकती है। सार्वजनिक रेल परिवहन को फिर से शुरू करने से विश्वास के वातावरण का निर्माण होगा और कई प्रवासी श्रमिक घर जाने के बजाय वापस जाने के लिए तैयार होंगे। ऐसा लगता है क्योंकि रोजी-रोटी का भी सवाल सामने आ जाता है। पूर्णबंदी की शुरुआत से, प्रवासियों ने वायरस के प्रसार को रोकने का कार्य किया है। अब इस महामारी के कारण, पैसे के कारण, हफ्तों से बेरोजगारी के कारण, वे अपना धैर्य खो चुके हैं। यही कारण है कि वे पैदल यात्रा उनके लिए खतरनाक से भी खतरनाक बनती जा रही है। बदले में, सरकारें दोषपूर्ण नीतियों के कारण आपस में एक निर्णय तक नहीं पहुँच पा रही है। प्रवासी श्रमिकों को कोई राज्य बुलाने के लिए तैयार है तो कोई नहीं। कोई राज्य भाड़ा में उलझ जाता है। विचित्र स्थिति पैदा होने दी जाती है। कठोर सीमा-प्रवेश का नियम, अपने ही लोगों को राज्य की सीमा में प्रवेश नहीं करने देने का नियम किसी भी हालत में उचित तो नहीं है। सार्वजनिक परिवहन की सेवा एक बार शुरू हो जाने के बाद, प्रवासी इस ज्ञान में सुरक्षित रहेंगे कि वे जब चाहें तब निकल सकते हैं। यह धारणा सामान्यता की स्थिति तेजी से लाने में मददगार साबित होगी। कई प्रवासियों को खाली जेब को फिर से भरने के लिए ये परिवहन व्यवस्था तैयार करेगी। अतः सामाजिक दूरी के मानदंडों के साथ भारतीय रेल की सेवा को पुनः बहाल करना इस वक्त के लिए एक सही कदम है।

सायकिल की विशेषता

एक समय था जब विवाह के लिए सायकिल दहेज़ के रूप में दी जाती थी। बिना सायकिल के विवाह संपन्न नहीं होता था। सायकिल समाज में सम्पन्नता का सूचक था। साहित्यकारों का समूह भी कहीं जाने-आने के लिए सायकिल का उपयोग करते थे। राजनेता आदि भी सभाओं में जाने के लिए सायकिल का प्रयोग करते थे। सांस्कृतिक मंच की शुरुआत सायकिल के साथ होती थी। सायकिल शायद मध्यवर्गीय लोगों के लिए पसंदीदा वस्तु थी। आज तो शायद यह अपने नए अवतार में और अधिक उपयोगी सिद्ध होता। या आज का समय सायकिल का होता लेकिन दुर्भाग्य से इसका समय चला गया। पारिस्थितिकी रूप से, शांत, फिटनेस मशीन के रूप में कोरोनावायरस समय में परिवहन का एक सामाजिक रूप से सबसे अच्छा उत्तम साधन है। कम वित्त में भी सायकिल खरीदी जा सकती है। इसकी लोकप्रियता तथा सर्वव्यापकता सर्वविदित है। इसका आविष्कार यूरोप में हुआ। भारत में शुरू में यूरोपियों का संरक्षण साइकिलों ने किया, फिर धीरे-धीरे भारतीयों का भला हुआ और फिर, सायकिल आम नागरिकों के लिए कम महंगे हो गए। सायकिल ने भारतीयों को कई नई स्वतंत्रताएं प्रदान कीं, जिनमें शामिल होने की क्षमता सार्वजनिक परिवहन के अनिश्चित या गैर-मौजूद होने के कारण था और वस्तुओं, लोगों और कभी-कभी जानवरों - लंचबॉक्स, परिवार, मुर्गियों आदि को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के लिए प्रयोग किया जाता था। शानदार युवा विद्वान अनुसन्धान करने को शांत, पेड़-पौधों वाली सड़कों पर पैदल चलने के लिए, विश्वविद्यालय जाने के लिए, अपने दोस्तों से मिलने या महत्वपूर्ण कामों को पूरा करने के लिए सायकिल चलाते हुए देखा जा सकता है । सायकिल रोमांस और आनंद के साधन के रूप में है। इसमें नायक एकदम विनम्र होकर सायकिल चलाता है तथा लोकप्रिय कल्पना संसार में विचरण करता है। सायकिल के दोनों पहिये आधुनिक युवा पुरुषों और महिलाओं की एक नई पीढ़ी का प्रतीक है जो मनोरंजन के लिए सायकिल चलाते हैं। रोमांस खिलता है और जब पहिए और हैंडलबार के आपस में टकराते हैं तो रोमांस समाप्त होता है। लेकिन इतना तो पता चल ही जाता है कि सायकिल-चक्र ने इंसान को स्वतंत्रता और गतिशीलता प्रदान की। एक कहानी विद्यालय के दिनों में सायकिल की सवारी पढ़ी थी तथा उसमे नायक सायकिल चलाने के लिए किस प्रकार सपने देखता है तथा अपने उस्ताद से सायकिल चलाना सीखता है – एकदम बारीकी से बताया गया है। हालांकि यह कहानी हास्य-व्यंग्य से भरपूर है लेकिन मध्यवर्ग में जीवन-संतुलन बनाने के लिए सायकिल की उपयोगिता को बताया गया है। कहानीकार सुदर्शन जी की ये पंक्तियाँ सायकिल के सन्दर्भ में एकदम सटीक बैठती हैं – “भगवान ने ये दोनों विद्याएँ भी खूब बनाई हैं। एक से समय बचता है, दूसरी से समय कटता है। मगर तमाशा देखिए, हमारे प्रारब्ध में कलियुग की ये दोनों विद्याएँ नहीं लिखी गईं। न साइकिल चला सकते हैं, न बाजा ही बजा सकते हैं। पता नहीं, कब से यह धारणा हमारे मन में बैठ गई है कि हम सब कुछ कर सकते हैं, मगर ये दोनों काम नहीं कर सकते हैं।“ इससे नायक की छटपटाहट का अंदाजा लगता है।

साइकिल उद्योग पर भी कोरोना महामारी का असर हुआ। देश की एक प्रतिष्ठित सायकिल कंपनी एटलस बंद हो गयी। यह क्षण एकदम दुखदायी प्रतीत हुआ। मैंने भी पहली सायकिल एटलस ही खरीदी थी तथा कॉलेज के दिनों में सायकिल ने मेरी बहुत सेवा की थी। हर क्षण-पल सायकिल मेरे साथ रहती थी। अतः सरकार कम से कम उन कामगारों के हित में यदि संभव हो तो पुनः एटलस सायकिल को देश के एटलस पर लाए।

सावधानी की कमी

दुनिया की अधिकांश समस्या यदि हम ध्यानपूर्वक देखते हैं तो पाते हैं कि ‘असावधानी’ के कारण पैदा हुई हैं। ‘असावधानी’ के कारण समस्या उत्पन्न हो जाती हैं तथा बाद में उसका दुष्परिणाम सभी को भुगतना पड़ता है। हमारा देश फिलहाल महामारी के जिस संकट से गुजर रहा है, उसकी गंभीरता का अंदाजा सबको है। तकलीफ यह है कि उस गंभीरता के कारण न्यूनतम मानवोचित मूल्य का ह्रास हो रहा है। उदाहरण के लिए यदि परिवार में कोई बाहर से आया तो अब सतर्कता के कारण उससे दूरी बनानी पड़ेगी। यदि दूरी नहीं बनायेंगे तो संक्रमण का खतरा है। यहाँ तक तो बात समझ में आती है। समस्या तब उत्पन्न हो जाती है जब उस मेहमान से चाय-पानी तक नहीं पूछा जाता है। यहीं पर हमारी सभ्यता या मूल्य का ह्रास होना प्रारंभ हो जाता है। अस्पतालों में मरीज को भर्ती नहीं किया जाता है। मरीज अस्पताल के मुख्य द्वार से ही दुनिया को अलविदा कह देता है। बहुत बार देखा है कि शव को घर ले जाने के लिए एम्बुलेंस भी अस्पताल प्रशासन की तरफ से उपलब्ध नहीं कराया जाता है। कंधे पर मृतक के शरीर को उठाकर लोग ले जाते हैं। कोरोना काल में तो एम्बुलेंस का सारथी या चालक कोरोना संक्रमित मरीजों को लेकर जाने के लिए आनाकानी कर सकता है। इसके लिए चालकों को प्रशिक्षित करना निहायत ही आवश्यक है। हमारा देश इस महामारी के संकट से दो-चार हाथ कर रहा है। इस दो-चार हाथ करने में कोरोना योद्धाओ की महती भूमिका है। हम उनके योगदान को कम करके नहीं बता रहे हैं। लेकिन हमलोग असावधानी यदि रखेंगे तो फिर परेशानी ही बढ़ेगी। लगभग दो महीने पूर्णबंदी का पालन किया और अभी आर्थिक गतिविधियों को खोलना समय की आवश्यकता बन गयी। पेट को तो बंद करके नहीं रखा जा सकता है। लेकिन इसका परिणाम हमारे सामने है। संक्रमितों की संख्या दिन-दूनी रात चौगुनी बढ़ते जा रही है। टीवी पर समाचारों में कोरोना संक्रमितों की संख्या को गिरते हुए नहीं दिखाया जा रहा है और इससे निराशा बढ़ते ही जा रही है। इस निराशा के वातावरण में लोगों के व्यवहार में परिवर्तन आ रहा है। लोगों की आपस में ही कहा-सुनी हो रही है। एक दूसरे के बीच संवादहीनता की स्थिति बन रही है। लोगों को डराने वाली घटनाओं से रूबरू कराया जाता है। कई इलाकों से ऐसी खबरें सुनने को मिली कि जब कोई गरीब मजदूर गांव पहुंचा तो उसे लेकर आसपास के लोग कई तरह की आशंका से भर गए। कई जगहों पर लोगों के साथ दुर्व्यवहार भी हुआ। इस प्रकार की अवस्था में यह एक स्वाभाविक सवाल है कि हमारा देश और खासतौर पर यहां का चिकित्सा तंत्र अगर कोरोना संदिग्धों या संक्रमितों के साथ उपेक्षापूर्ण तरीके से पेश आएगा, तब कहां से उम्मीद की जाएगी? यों सरकार की ओर से बार-बार यह कहा जा रहा है कि कोरोना संक्रमित मरीजों के साथ सकारात्मक तरीके से पेश आया जाए। संचार माध्यमों के जरिए से भी जनता का बीच यह संदेश पहंचाया जा रहा है कि हमें बीमारी से लड़ना है, बीमार से नहीं। लेकिन इसके संक्रमण के स्वरूप और असर के खतरे से सबंधित सूचनाओं को जिस रूप में व्यापक पैमाने पर प्रचारित किया गया है, उसकी वजह से बहत सारे लोगों के भीतर एक अनावश्यक डर बैठ गया है। अतएव, लोकव्यवहार में कोरोना के मामले का सामना कर रहे व्यक्ति के प्रति ‘दूरी बनाने’ का भाव बैठ गया है। बचाव के लिए लोगों का आपस में ‘दूरी बनाना’ एक सावधानी का उपाय हो सकता है, लेकिन अगर यह 'मन की दूरी' और व्यवहार की उपेक्षा में परिवर्तित होने लगे तो दरगामी दृष्टि से मनुष्य समाज के लिए घातक साबित होगा। अतः इस मामले में ‘सावधान’ रहने की नितांत आवश्यकता है जिससे कि सभी का बचाव हो।

एक सिक्के के दो पहलू

स्त्री आज के ज़माने में पुरुषों से कंधे से कन्धा मिलकर चलती है। आज के जमाने में कौन सा ऐसा कार्य है जो स्त्री नहीं कर सकती। रक्षा के क्षेत्र में भी आज के समय में स्त्री किसी भी तरह पीछे नहीं है। अन्तरिक्ष की दुनिया में भी स्त्री ने अपने दिमाग का लोहा मनवाया है। लेकिन कुछ लोग अभी भी दोनों में भेद देखते हैं। शारीरिक रूप से दोनों में अंतर तो रहेगा ही। वह ईश्वर प्रदत्त है और उसे हम दूर नहीं कर सकते। हालाँकि पोशाक वगैरह देखने से पता चलता है कि यह शारीरिक भेद कम हो रहा है। सृष्टि के लिए दोनों का होना जरुरी है। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। कौन एक दूसरे से श्रेष्ठ है – इस झंझट में पड़ने की आवश्यकता नहीं है। एक के बगैर दूसरे की कल्पना हो ही नहीं सकती है। मन के स्तर पर भी दोनों में अंतर है। सास-बहू में झगडे की खबर तो टीवी पर चलते ही रहती है। इस मामले में पुरुष आगे रहता है। दामाद-ससुर में झगडे की खबर नहीं मिलती है। एक स्त्री दूसरे स्त्री की दुश्मन अधिकार क्षेत्र को लेकर हो जाती है। प्रायः पुरुष एक बार में केवल एक काम को कर सकने में कामयाब हो पाता है। लेकिन इसके विपरीत महिला एक साथ कई जिम्मेदारियों का निर्वहन काफी कुशलता के साथ करती है। इस मामले में महिला श्रेष्ठ है – यह कहना भी मैं नहीं चाहता हूँ। महिला दिल से सोचती है और पुरुष दिमाग से। हमारे समाज में स्त्री की पूजा शक्ति के रूप में की गयी है। पुराणों को देखने से पता चलता है कि यदि स्त्री ठान ले तो यमराज को भी झुकना पड़ता है। यदि आत्मा के साथ देखें तो दोनों में समानता है। हमारे समाज में आत्मा की प्रधानता है। आत्मा दोनों में समान है। नैनं छिन्द्ति शस्त्राणि वाली बात दोनों पर एक समान लागू होती है। इसीलिए एक श्रेष्ठ है तथा दूसरा हीन है – यह तो गैरबराबरी वाली बात हो जायेगी। जैसा कि पहले बताया जा चुका है कि शारीरिक अंतर तो प्राकृतिक है लेकिन सामाजिक और सांस्कृतिक अंतर मनुष्य द्वारा निर्मित है। अब यह समाज पर निर्भर करता है कि वह इन अंतरों को समाप्त करने की दिशा में कदम उठाए।

सूचना के अधिकार का विस्तार

भारत एक दुनिया का सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक देश है। लोकतान्त्रिक व्यवस्था में आम आदमी ही देश का असली मालिक होता है। इसलिए मालिक होने के नाते जनता को यह जानने का हक है कि जो सरकार उसकी सेवा के लिए बनाई गई है। वह क्या, कहां और कैसे कर रही है। इसके साथ ही हर नागरिक इस सरकार को चलाने के लिए टैक्स देता है, इसलिए भी नागरिकों को यह जानने का हक है कि उनका पैसा कहां खर्च किया जा रहा है। जनता के यह जानने का अधिकार ही सूचना का अधिकार है। जनता सरकार से कोई भी सवाल पूछ सकती है या कोई भी सूचना ले सकती है, किसी भी सरकारी दस्तावेज़ की प्रमाणित प्रति ले सकती है, किसी भी सरकारी दस्तावेज की जांच करा सकती है आदि। इस अधिकार के आ जाने से जनता के हाथों में एक अमोघ अस्त्र आ गया। जनता सरकार से प्रश्न पूछने लगी। लोक-सेवक जनता के प्रति जवाबदेह हो गए। उन्हें इस कानून का भय लगने लगा। पहले निरंकुश होने का खतरा बढ़ गया था। इधर हाल ही में सरकार ने सूचना के अधिकार में संशोधन किया था – इससे यह भय व्याप्त हो गया था कि सरकार इस अधिकार में कटौती करने जा रही है। मगर 13 नवंबर को सर्वोच्च न्यायालय ने अपने ऐतिहासिक फैसलों से यह सुनिश्चित किया कि सूचना के अधिकार में किसी प्रकार की कटौती नहीं की गयी है। अपने फैसले में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया कि मुख्य न्यायाधीश का कार्यालय एक सार्वजनिक संस्था है और यह सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून के दायरे में है। 2010 में दिल्ली हाईकोर्ट ने मुख्य न्यायाधीश के कार्यालय को आरटीआई के दायरे में करार दिया था। इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के सेक्रेटरी जनरल और जन सूचना अफसरों की याचिकाओं को संविधान पीठ ने खारिज कर दिया। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली 5 सदस्यीय संविधान पीठ ने हाईकोर्ट का फैसला बरकरार रखा। पीठ ने कहा, सुप्रीम कोर्ट की निगरानी के लिए आरटीआई का इस्तेमाल न हो। पीठ ने कहा कि उच्च न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति के लिए कोलेजियम द्वारा सिफारिश किए गए जजों के नाम का खुलासा किया जा सकता है, पर कारणों को सार्वजनिक नहीं किया जा सकता है। मुख्य न्यायाधीश के कार्यालय को सूचना अधिकार कानून के तहत लाने वाला फैसला यह एक जरूरी संदेश दे रहा है कि लोकतंत्र में कोई भी और यहां तक कि शीर्ष अदालत के न्यायाधीश भी कानून से परे नहीं हो सकते। अब खतरे की घंटी राजनीतिक दलों के लिए बजी है क्योंकि अभी तक सभी राजनीतिक दल जोर दे रहे हैं कि उन्हें सूचना अधिकार कानून के दायरे में लाना ठीक नहीं। राजनीतिक दल सूचना अधिकार कानून से बाहर रहना चाहते हैं। राजनीतिक दलों का यह रवैया लोकतंत्र के बुनियादी सिद्धांतों के विरुद्ध है। अभी के पारदर्शिता के युग में राजनीतिक दल सूचना अधिकार कानून से बाहर रहें थोडा ठीक नहीं लगता है। राजनीतिक दलों का यह रवैया लोकतंत्र के बुनियादी सिद्धांत ‘पारदर्शिता’ के विरुद्ध है। इस फैसले से निश्चित ही जनता में विश्वसनीयता बढे़गी। न्यायालय की गरिमा इससे स्थापित और सुदृढ़ हुई। यह फैसला एक मील का पत्थर साबित होगी। कानून से ऊपर कोई नहीं है। कानून का पालन करना देश के हर नागरिक का अधिकार है।

सोशल मीडिया को बाय-बाय

प्रधानमंत्री हमेशा अपने फैसलों से देश को चौकाते रहते हैं। उनके मन में क्या चल रहा होता है – पता नहीं चलता है। उनके मन को पढ़ पाना बहुत ही मुश्किल कार्य है। सोमवार की रात लगभग 9 बजे टीवी पर प्रधानमंत्री द्वारा सोशल मीडिया को छोड़ने की बात दिखाई जा रही थी। छोड़ने के क्या कारण हैं – इसके बारे में कोई बात नहीं बतायी जा रही थी। केवल आनेवाले रविवार को प्रधानमंत्री इस विषय पर अपनी बात रखेंगे – ऐसी जानकारी दी जा रही थी। यह जानकारी स्वयं प्रधानमंत्री ने ट्वीट कर बतायी थी। सोशल मीडिया पर बेहद सक्रिय रहने वाले हमारे प्रधानमंत्री ने सचमुच में हम सभी को चौंका दिया। वे तकनीक का बेहद इस्तेमाल करते हैं। सोशल मीडिया के जरिये उन्होंने कई अभियान चलाए तथा वे सभी सफल हुए। स्वच्छ भारत मिशन भी सोशल मीडिया के कारण हिट रहा। आज हमारे देश में स्वच्छता के प्रति एक वातावरण बना है। इस वातावरण को बनाने में सोशल मीडिया की काफी भूमिका रही थी। अपनी बातों को पहुंचाने का एक सशक्त माध्यम सोशल मीडिया है। मुझे अच्छी तरह याद है कि पिछले लोकसभा में चुनावों में उन्होंने ‘चौकीदार चोर है’ नारे का जवाब ‘मैं भी चौकीदार’ से दिया था। यह काफी चर्चा में रहा तथा लोकसभा चुनाव में बाजी पलट कर रख दी। दिल्ली दंगो के समय उन्होंने दंगो के साझीदार नहीं बनने की सलाह सोशल मीडिया पर ही दी थी। अब जब अगले रविवार को वे फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यू-ट्यूब जैसे सोशल मीडिया को छोड़ने के विषय में बताएँगे तो उनके चाहनेवालों के ऊपर बिजली ही गिरेगी। ट्विटर पर प्रधानमंत्री के 5.33 करोड़ फालोअर हैं। फेसबुक पर लगभग 4.4 करोड़ फोलोअर हैं। अब तो अटकलों का दौर प्रारंभ हो गया है। समर्थकों ने उनसे ऐसा नहीं करने का आग्रह किया। हो सकता है कि सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही नफरत से आहत होकर मोदीजी ने यह इच्छा जताई हो। हो सकता है कि इस घोषणा के बाद सोशल मीडिया कंपनियों पर सख्ती को हो सकती है। या हमारे देश में सोशल मीडिया का अपना प्लेटफार्म तैयार हो। यह अलग बात है कि उन्होंने लगभग दो वर्ष पहले कहा था कि - ‘सोशल मीडिया पर कई बार लोग मर्यादाएं भूल जाते हैं। किसी भी झूठी बात को सुनकर उसे साझा कर देते हैं। एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में सभी का कर्तव्य है कि इस प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल गंदगी फैलाने के लिए नहीं करें। इसका इस्तेमाल सिर्फ सकारात्मक चीजों के लिए किया जाना चाहिए।’ बीते वर्ष अक्टूबर 2019 में सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में कहा था- ‘सोशल मीडिया पर हेट स्पीच, फेक न्यूज और अपमानजनक पोस्ट बढ़ी हैं। यह देश की अखंडता, संप्रभुता और सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा है। जस्टिस दीपक गुप्ता ने कहा था- ‘राज्य खुद को ट्रोल होने से बचा सकता है, लेकिन जब किसी व्यक्ति के बारे में झूठ फैलाया जाता है तो वह क्या कर सकता है? मेरी निजती की भी सुरक्षा होनी चाहिए। मैं स्मार्टफोन छोड़ने की सोच रहा हूं।’ राहुल गाँधी ने उन्हें नफरत छोड़ने की सलाह दे डाली। जो भी हो सभी व्यवस्था के अपने-अपने गुण-दोष होते हैं। किसी भी बात की ‘अति’ तो अंत में विनाश की तरफ ही ले जाती है। हो सकता है कि हमारे प्रधानमंत्री ने इस ‘अति’ को समय रहते ही महसूस कर लिया और सोशल मीडिया को बाय-बाय कहने की सोच ली। अभी इन्तजार तो आनेवाले रविवार का है।

सोशल मीडिया पर नकेल

एक दिन विद्यालय में छुट्टी होने के बाद अपने निवास की तरफ जा रहा था। आगे-आगे बच्चे उछलते-कूदते जा रहे थे। उनकी बातचीत को मैं सुन नहीं रहा था लेकिन कुछ बात कानों में जा रही थी। उसी बात में एक बच्चे ने दूसरे बच्चे से कहा कि दोनों आपस में शाम को फेसबुक पर बातचीत करेंगे। उनकी बातों को सुनकर मैं अवाक् रह गया। यह एक चिंताजनक स्थिति है। मगर इस विषय में हमारी न्यायपालिका भी चिंतित है। अभी हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए हो रहे अपराधों पर चिंता जताई है। शीर्ष न्यायालय ने 24 सितम्बर को कहा कि देश में तकनीकी का इस्तेमाल खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है। न्यायमूर्तियों ने सोशल मीडिया के गलत इस्तेमाल को रोकने के लिए सरकार को गाइडलाइन बनाने के निर्देश दिए। पीठ ने कहा कि सरकार 3 हफ्ते के अंदर हलफनामा दायर कर बताए कि वह गाइडलाइन कब तक तैयार कर सकती है। दरअसल,सर्वोच्च न्यायालय में साइबर अपराध करने वालों को खोजने और सोशल मीडिया के माध्यम से भ्रामक और गलत तथ्य वाले खबर को प्रचारित कर जनसामान्य तक पहुंचाने के बारे में मुद्दा उठा। इस पर न्यायाधीशने कहा कि सोशल मीडिया का दुरुपयोग बेहद खतरनाक है। उन्होंने कहा कि लगता है स्मार्टफोन छोड़ दूं और फीचर फोन पर लौट जाऊं। इस पर सरकार की तरफ से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल कहा कि यही सही होगा। हम में से कुछ पहले ही स्मार्टफोन छोड़ चुके हैं। न्यायाधीशों ने कहा कि "यह न्यायालय की जिम्मेदारी नहीं है कि वह इस तरह के अपराधों को रोकने के लिए गाइडलाइन जारी करे। निजता बचाए रखने के लिए सोशल मीडिया पर भ्रामक जानकारी डालने वालों को खोज निकालना चाहिए। अगर सरकार ऐसा नहीं करती है तो कल को लोग ऑनलाइन एके-47 जैसे खतरनाक हथियार भी खरीदने लगेंगे।“ न्यायाधीशों ने कहा, हमने सुना है कि केंद्र सरकार यह सब रोकने के लिए गाइडलाइन ला रही है। इस पर सॉलीसिटर जनरल ने जवाब दिया, "केंद्र सरकार गाइडलाइन का ड्राफ्ट तैयार करा रही है, पर यह कब तक लागू होगी, इसकी समय सीमा नहीं पता है।' यह सब जान कर मन को सुकून मिला की आने वाली पीढ़ी को बचाने के लिए हमारे शासन व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तम्भ न्यायपालिका सतर्क है और अब कार्यपालिका तथा विधायिका को गाइडलाइन बनाने का निर्देश दे रही है। न्यायपालिका की चिंता भी सही है। यदि समय रहते इस पर लगाम नहीं लगाया गया तो हमारे समाज को बांटने वाले तत्व काफी अराजकता फ़ैलाने लगेंगे और उस वक्त उन पर नकेल लगाना काफी कष्टकर होगा। समय रहते ही मर्ज को पहचान कर उसका इलाज कर देना एक स्वस्थ परंपरा होगी। जितनी जल्दी हो सके – सरकार इस मामले में कानून जल्द से जल्द बनाए और समाज में भ्रामक खबरों को फ़ैलाने वाले पर अंकुश लगाए। आने वाली पीढ़ी भी तकनीक के खतरों से परिचित रहे तथा हमेशा सोशल मीडिया से चिपकी न रहे। हम उम्मीद करते हैं कि जल्द ही सरकार सोशल मीडिया के लिए एक दिशा-निर्देश लेकर आएगी।

स्वच्छ नदियाँ

मुझे याद है बचपन में गंगा कितनी स्वच्छ थी। हमलोग प्रतिदिन गंगास्नान करते थे। गंगा में विचरण करती डॉलफिन देखकर मन प्रफुल्लित हो जाता था। धीरे-धीरे गंगा औद्योगीकरण तथा शहरीकरण के कारण प्रदूषित होती चली गयी। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी से लेकर वर्तमान प्रधानमंत्री तक ने गंगा की सफाई के लिए अभियान चलाये मगर अपेक्षित सफलता नहीं मिली। इस देवनदी को बचाने के लिए कई संगठन आगे आए तथा केंद्र सरकार के ‘नमामि गंगे’ परियोजना से के आशा भी जगी। मगर परिणाम वही ढाक के तीन पात वाली रही। गंगा मैली की मैली ही रही। डॉलफिन की संख्या में भी कमी आयी।

लेकिन अभी पूर्णबंदी ने कमाल कर दिया। देश की प्रायः समस्त नदियाँ स्वच्छ हो गयी हैं। इसका श्रेय तो कोरोना महामारी को ही जाता है। कोरोना ने अधिकांश सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों को सीमित कर दिया। अर्थव्यवस्था में एक ठहराव की स्थिति आयी। इससे एक लाभ यह हुआ कि गंगा तथा अन्य नदियों का जल अब पीने लायक हो गया। गंगा नदी में फिर से डॉलफिन दिखायी देने लगे हैं। यह सुखद समाचार है।

इस पर यदि गहराई से विचार करेंगे तो देखेंगे कि इस पूर्णबंदी की अवधि में कोई खनन,

कोई विनिर्माण, कोई वाणिज्यिक गतिविधि का मतलब कोई औद्योगिक निर्वहन या कार्य नहीं हुआ है। शवों को नहीं जलाया जा रहा है। नौकायन नहीं हो रहा है। जहाज जा चलना बंद है। केवल शहरों की नालियों के गन्दे जल का गिरना जारी है। इसका सीधा असर प्रत्यक्ष या परोक्ष तो नदियों पर पड़ता ही है। नदियों में रासायनिक प्रदूषण को नदी में बहनेवाले तत्वों ने साफ़ कर दिया।

देश का जल संसाधन विभाग को पूर्णबंदी की अवधि के समय में नदियों के गुणवत्ता में किस कदर सुधार हुआ है – इसके ऊपर अवश्य विस्तृत अध्ययन करे तथा सोचे। स्थायी रूप से आर्थिक गतिविधियों को तो बंद नहीं किया जा सकता है लेकिन नदियों के किनारे बसे शहरों में कितनी गतिविधियों को बढ़ावा दिया जा सकता है, जिससे कि हमारी नदियाँ फिर से प्रदूषित न हो जाएँ – इसका अध्ययन तो हम कर ही सकते हैं। अब जल की खपत तो बढ़ेगी – इसमें कोई शक नहीं। कोरोना के कारण हाथ धोने के लिए जल की आवश्यकता पड़ेगी। इससे जल की मांग बढ़ेगी। अतः हमारी समझदारी इसी में है कि हम जल को बर्बाद नहीं करें। इस प्रकार की परियोजना केन्द्रीय संस्थाएं बनायें जिससे कि नालियों का पानी सीधे नदी में न गिरे। गंदे पानी को साफ़ करके ही नदियों में गिराया जाए – इस प्रकार से जलविज्ञान में परिवर्तन लाया जा सकता है।

जल ही जीवन है- और जल संरक्षण हमारा दायित्व है। नहीं तो वह दिन दूर नहीं जब कोई और विषाणु प्रदूषित जल के कारण समाज में आ जाए तो दुनिया को ठप कर दे। अभी भी वक्त है कि भविष्य को बचाने या सुरक्षित करने के लिए प्रकृति को संरक्षण देना प्रारंभ कर दें। ऋषि-मुनियों ने कहा है, “ नदी को माता मानो, वृक्ष-पूजन करो”। जब तक धर्म का पालन हमलोगों ने किया- साफ पानी और शुद्ध हवा मिलती रही, जैसे ही हम वैज्ञानिक हो गये – हमें स्वच्छ पेयजल के लिए ‘आर ओ’ तथा स्वच्छ हवा के लिए मास्क लगाना पड़ गया। अतः प्रकृति की सुन्दरता के वर्णन के लिए शब्दों की अपेक्षा नहीं होती। प्राकृतिक सुन्दरता का वर्णन मनोरम स्थल ओर ये स्वच्छ जलवाली नदियाँ स्वयं करती हैं।

स्वच्छता का सन्देश

पूरी दुनिया में अभी कोरोना को लेकर सोशल मीडिया पर सन्देश प्रसारित किये जा रहे हैं। हिंदी, अंग्रेजी तथा सभी क्षेत्रीय भाषाओं में भी अपने देश में सन्देश प्रसारित किये जा रहे हैं। दूरभाष सेवा प्रदाता कम्पनियाँ भी फ़ोन करने के पहले कोरोना के प्रति जागरूकता सन्देश प्रसारित कर रही है। कुल मिलकर देश में कोरोना वायरस से लेकर हाहाकार की स्थिति बनी है। चारो तरफ डर का वातावरण है। सभी कुछ न कुछ उपाय को बता रहे हैं। जितने मुंह हैं उतने उपाय भी निकला आ रहे हैं। हर एक के अपने-अपने उपाय। मगर ठीक से देखा जाए तो यह बीमारी केवल एक उपाय बता रही है और वह उपाय है स्वच्छता। इस दवाई का प्रयोग आज से लगभग 6 वर्ष पूर्व ही हमारे प्रधानमंत्री ने स्वच्छ भारत मिशन के रूप में देशवासियों को दे दिया था। हालाँकि हमारी संस्कृति में स्वच्छता का ख्याल हमेशा रखा जाता रहा है। हमारी संस्कृति आरण्यक रही है। ऋषि – मुनि अरण्यों में रहकर यज्ञ आदि द्वारा पर्यावरण को भी स्वच्छ रखने का कार्य करते थे। इससे यह वसुंधरा हमेशा हरी-भरी रहती थी। धीरे-धीरे मनुष्य ने अपने लालच में इस धरा को ठीक से रखने की बात भुला दी। नहीं तो हमारा इतिहास रहा है कि यक्ष हो चाहे रक्ष हो, गन्धर्व हो या देव हों, मनुष्य हों – किसी ने भी पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने की नहीं सोची है। सभी आपस में भले लड़ेंगे लेकिन पर्यावरण के प्रति उनकी सजगता निरंतर बनी रहती थी। मनुष्य ने सतर्कता को जीवित नहीं रखा तो प्रकृति ने उसे पुनर्जीवित करने के लिए कोरोना नाम के विषाणु को हम सब के समक्ष प्रस्तुत कर दिया। आज समाज नकारात्मक भय में जी रहा है। कार्यालयों में छुट्टी घोषित की जा रही है। बड़े-बड़े विज्ञापन केवल हाथ-मुंह धोने तथा ढकने के लिए दिखाए जा रहे हैं। यह विषाणु जानलेवा है इसीलिए इसके बारे में और अधिक जानकारी देने की योजना बनायी जानी चाहिए। अपने देश में इस विषाणु के जरिए ही सही स्वच्छता का आरम्भ हो जाए तो आने वाले समय में ऐसे कई विषाणु से न केवल हमारा देश निपट लेगा बल्कि और भी कई प्रकार के विषाणु को निपटा ही देंगे। स्वच्छता की शुरुआत घर से मोहल्ले तक और गांव से लेकर शहर तक पहुंच जाए तो फिर कोई कोरोना रूपी विषाणु हमारे देश में नहीं आने वाला है। लेकिन हमलोग उलटा ही कार्य कर रहे हैं। मास्क आदि की कालाबाजारी की शुरुआत हो चुकी है। नकली सेनेटाइजर बाजार में आ गए हैं। इसके लिए कोई नियन्त्रण नहीं। कोई रोकथाम का प्रयास नहीं। कई लोग अब ताबीज बेचने लग जायेंगे जिससे यह बीमारी भाग जाए। अतः स्वच्छता के प्रति जागरूकता फैलाना ही आवश्यक है।चीन आदि देशों में इस भयानक विषाणु का सामना कैसे किया गया? यह केस स्टडी हमलोगों को करना चाहिए। उन देशों से कुछ सीखने की आवश्यकता अभी हमलोगों को है। साथ ही साथ एकता का प्रदर्शन करके भी हम भगा सकते हैं। अभी धरना-प्रदर्शन आदि स्वच्छता के लिए किया जाए। हमारा गाँव, शहर स्वच्छता की मिसाल कायम करें। सरकारें इस दिशा में कार्य करें। तभी बात बनेगी। सतत, सजग, निरंतर जागरूक रहकर ही कोरोना रूपी जीवाणु हमेशा के लिए हमारे समाज से गायब हो जाएगा।

स्वभाव

कुछ नया करना है तो लकीर से हटकर कार्य करना होगा – ऐसा शुरू से महापुरुषों द्वारा बताया जाता है। कोई भी मौका आए तो गंवाना नहीं चाहिए। थोडा-सा हटकर कार्य करने से सफलता मिल ही जाती है और इतिहास में नाम अमर हो जाता है। लकीर के फ़क़ीर बने रहने से कोई लाभ मिलनेवाला नहीं है। यदि इस संसार में आए हैं और कुछ नाम करना है तो बड़ा सोचना ही होगा। अन्यथा हम हाथ ही मलते रह जायेंगे। जोखिम उठाना जरुरी है। श्री नायक को ऐसे ही कार्य करने की सनक सवार थी। वे भी कुछ कर गुजरने की सोचते थे। जोखिम लेने में ही मजा है। उनकी भी नियुकित के विद्यालय में हुई। उन्हें लगा कि इस विद्यालय में अपने मेहनत के दम पर सभी को वे इंजीनियरिंग अथवा चिकित्सा विज्ञान में पारंगत बना देंगे। सुपर-30 की सफलता से वे प्रभावित थे। उन्हें लगा था कि एक अकेला यदि 30 बच्चों को सफल करा सकता है तो विद्यालय में तो पूरी टीम मौजूद है। सब संभव है – कुछ भी असंभव नहीं है। बाधाएं आती हैं तो आएं – कोई बात नहीं है। कामयाबी जरुर चरण छुएगी। वे अपने मिशन में लग गए। अब होना वही था – वे अपनी टीम के सदस्यों को प्रेरित करते थे लकिन सदस्य प्रेरित होंगे तभी तो जाकर बात बनेगी। जब टीम के सदस्य आराम तलब हैं तो उनके निर्देशानुसार कौन जाकर मेहनत करे? साथ ही साथ जितना पारिश्रमिक मिलेगा लोग उतना ही मेहनत करेंगे। अपने घर की तरह कोई करने से रहा। लोग केवल बोलेंगे – करेंगे नहीं। जब मासिक बैठक होगी तो लम्बे – चौड़े भाषण दिए जायेंगे और हमें ऐसा करना चाहिए – वैसा करना चाहिए आदि बातों को लिया जाएगा। लेकिन होनेवाला कुछ भी नहीं है। सदस्यों को यह बात अच्छी तरह पता थी। प्रायः ऐसा देखा जाता है कि नया काम करने में नहीं, किसी के पीछे चलने में लोगों को अच्छा लगता है। हर समूह में विभिन्न प्रकार के लोग रहते हैं – सज्जन भी रहेंगे और दुर्जन भी रहेंगे। समस्या उनकी पहचान करने में होती है। प्रायः देखा जाता है कि सज्जन नेक और दुर्जन उद्दंड तथा हिंसक स्वभाव के होते हैं। लेकिन श्री नायक यही पर मात खा गए। उन्हें स्वभाव देखकर मनुष्य की पहचान होती थी – परन्तु ये संसार है – यहाँ पर एक चेहरे पर कई चेहरे लोग लगा लेते हैं। वे भूल गए कि उन्हें अभिमन्यु की तरह जाल में फंसा लिया गया है और चक्रव्यूह में घेरकर उन्हें शहीद कर दिया जायेगा। सोवियत संघ में आर्थिक सुधारों को लागू करने के लिए गोर्बाचोव ने पेरेस्त्रोइका और ग्लासनोस्त जैसी योजनाओं को चलाया था। योजनायें काफी अच्छी थी लेकिन इस योजना को चलाने में ही गोर्बाचोव की गद्दी चली गयी। सोवियत संघ का विघटन हो गया और सोवियत संघ कई हिस्सों में खंड – खंड हो गया। श्री नायक भी मकडजाल में बुरी तरह से फंस गए और उनके ऊपर कई तरह के आरोप लगा। विभागीय जाँच उनके ऊपर चलने लगी और अंत में उन्हें दोषी ठहरा दिया गया। उनकी कुछ अलग से कर गुजरने वाली सोच वही पर दफ़न हो गयी। सही है कि सोच केवल सही रखने से कुछ नही होता है। सतत, सजग, सतर्क, सावधान एवं जागरूक रहना ज़रूरी है। अन्यथा चक्रव्यूह में सभी महारथी होते हैं और जैसा कि हमें पता है वे किसी का वध करने में भी संकोच नहीं करते हैं। इसीलिए व्यक्ति की पहचान केवल स्वभाव से नहीं हो सकती है। चेहरे के पीछे छिपे चेहरे को भी पढने की कला आनी ही चाहिए तभी सफलता मिल सकती है। व्यक्ति नम्र, नेक, सुशील, सभ्य दीख सकता है लेकिन वह साधु के वेश में रावण भी हो सकता है। स्वभाव में सद्गुणों से भरपूर दिखेगा लेकिन अन्दर से उतना ही काला-कलूटा होगा। इसीलिए सावधान रहना ही उचित है।

हर नियम के अपवाद

हर शाख पर उल्लू बैठा है – अंजाम – ए – गुलिस्तां क्या होगा? प्रबंधन के स्तर पर हमेशा पुस्तकों में पढता आया कि अपने साथ काम करने वालों को आगे बढ़ाना है. मेरे एक मित्र ने अपने सहकर्मियों को आगे बढ़ाने के लिए कुछ प्रयास किया. उनके प्रयासों से प्रबंधन ने उन सहकर्मियों के वेतन में कटौती की तथा मित्र के वार्षिक वेतन वृद्धि को रोक दिया. कहीं न कही प्रबंधन सिद्धांत सभी जगह कार्य नहीं करता है. सामाजिक विज्ञान होने के नाते इनके कुछ अपवाद हैं.

प्रशंसा करने पर:

हर व्यक्ति सुनना चाहता है कि वो अच्छा दिखता है। लोग कपड़े खरीदते हैं, बाल सेट करवाते हैं, वजन कम करते हैं, व्यायाम करते हैं क्योंकि वे अपने बारे में बेहतर महसूस करना चाहते हैं। वे ये भी चाहते हैं कि उन्हें दूसरे देखें। बेहतर दिखने में किए गए निवेश के बदले में लोग यह भी चाहते हैं कि हम उनकी तारीफ करें। जो लोग खुद को आकर्षक बनाने के लिए प्रयास कर रहे हैं उनकी तरफ ध्यान देना पड़ेगा. यह बताना पड़ेगा कि वे कितने अच्छे दिख रहे हैं। इससे फायदा यह होता है कि हम जिसकी तारीफ करते हैं उस व्यक्ति को तो अच्छा महसूस होता ही है,हमें भी खुशी होती है। अगर हम ऐसा करेंगे तो लोग खुद पर अधिक गर्व महसूस करेंगे। किसी चीज़ को हासिल करने के लिए प्रमुख प्रेरणा होती है दूसरों की प्रशंसा पाना। लेकिन किसी किसी संस्थान में इसे ‘तेल मारना / मक्खन लगाना’ समझ लिया जाता है.

हम किसी चीज़ के बारे में जितना अधिक जानने लगते हैं उसके बारे में हमारी जिज्ञासा उतनी ही बढ़ती जाती है। हमारे पास अपने सपने की तस्वीर जितनी स्पष्ट होगी हम उसके बारे में उतना ही अधिक उत्साहित होंगे। सपने को स्वीकार करने के लिए दिमाग को तैयार करने का एक जरूरी हिस्सा है- सपने को पूरी स्पष्टता से देखना। अगर हम किसी विशेष घर का सपना देख रहे हैं तो नजदीक जाकर एक बार अपने सपने के घर को जरूर देखेंगे। अपने बच्चों के लिए बेहतर शिक्षा का सपना देख रहे हैं तो उस विद्यालय का भ्रमण करेंगे जहां हमारा सपना सच होगा। अपने दम पर कोई नया व्यवसाय शुरू करने का सपना देख रहे हैं तो जितना संभव हो उतना अध्ययन करेंगे। उस क्षेत्र में पहले से काम करने वाले लोगों से बात करेंगे। इस तरह हम अपने सपने के बीज को विकसित कर सकते हैं। लेकिन यदि नयी जगह में खाली समय में विद्यालय देखने के लिए शिक्षक को भेजना – प्रबंधन की नजर में एक गलत परम्परा है और इसके लिए दण्डित किया जा सकता है।

अपने हर काम में उत्कृष्टता का प्रयास करेंगे। इसी बात के आधार पर एक पुरानी कहावत भी है कि अगर कोई काम करने काबिल है, तो वह अच्छी तरह से करने काबिल है। हर काम महत्वपूर्ण होता है और उसे सर्वश्रेष्ठ तरीके से ही किया जाना चाहिए। इससे काम तो अच्छा होता ही है, हमें भी संतुष्टि मिलती है। औसत सोच कभी हमारे सपने साकार करने में हमारी मदद नहीं करेगी। हमेशा सर्वश्रेष्ठ के साथ प्रतियोगिता करने की इच्छा रखेंगे। जब तक हम किसी बड़ी चुनौती का सामना नहीं करते हैं तब तक हम यह नहीं जान पाते हैं कि हम में कितना दम है। अपने व्यवहार को सर्वश्रेष्ठ व्यक्तियों के व्यवहार के अनुरूप ही ढालना आवश्यक है। केवल उन्हीं लोगों पर दांव लगाएं जो हमेशा उत्कृष्टता चाहते हैं।लेकिन प्रबंधन की नजर में अलग से हटकर कोई कार्य करना समय और धन की बर्बादी बन जाता है. प्रबंधन इसे पचा नहीं पाता है. प्रबंधन को लगता है कि सोचने का कार्य उसका है. नियम को लागू करने का कार्य मातहत का है. मातहत यदि प्रबंधन के कार्य को करेगा तो ‘अहम्’ की संतुष्टि नहीं होगी.

हाउडी मोदी

‘हाउडी’ शब्द पहली बार 1712 में इस्तेमाल हुआ था, इसका अर्थ टेक्सास में अभिवादन करने के लिए उपयोग होता है। इसी ‘हाउडी’ से ‘हाउडी मोदी’ कार्यक्रम 22 सितम्बर 2019 को संयुक्त राज्य अमेरिका के टेक्सास प्रान्त के ह्यूस्टन शहर में हुआ जिसमे विश्व इतिहास में पहली बार प्रधानमंत्री श्रीनरेंद्र मोदी तथा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने 50 हजार से अधिक प्रवासी भारतीयों को संबोधित किया। एनआरजी स्टेडियम में 400 लोगों ने सांस्कृतिक कार्यक्रम में शिरकत की। ह्यूस्टन में 4 घंटे चले हाउडी मोदी शो में , मोदी 2 बार में करीब 65 मिनट बोले, राष्ट्रपति ट्रम्प 26 मिनट तक बोले। अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत में सब अच्छा है। पाकिस्तान का नाम लिए बगैर उन्होंने हमला किया। उन्होंने कहा कि भारत के क़दमों से कुछ लोगों को परेशानी है। उनसे अपना देश तो संभल नहीं रहा। इन साजिशकर्ताओं के खिलाफ अब निर्णायक लड़ाई होगी। भारत अब चुनौतियों को टाल नहीं रहा है बल्कि उससे टकरा रहा है। अब देश 5 ट्रिलियन डॉलर वाली अर्थव्यवस्था बनने की तरफ अग्रसर है। हमारे देश की विकास दर 7।5% रही है जो पहले कभी नहीं थीट्रम्प ने कहा- मोदी की मौजूदगी मेरे लिए सौभाग्य की बात है। हमदोनो उन बातों के जश्न मनाने के लिए आए हैं जो हमें आपस में जोडती हैं। हमारे सपने साझे हैं। भारत में होने वाले बास्केटबाल मैच देखने के लिए प्रधानमंत्री ने उन्हें सपरिवार आने का निमंत्रण दिया। कार्यक्रम की शुरुआत स्पर्श ने राष्ट्रगान गाकर की। जानकारी के अनुसार स्पर्श के शरीर में 130 जगह फ्रैक्चर है और वे न सिर्फ गायक हैं बल्कि प्रेरणा देने वाले कुशल वक्ता हैं। मोदी ने हाउडी मोदी से पहले कई कार्यक्रमों में शिरकत की। यहां सिख और बोहरा समुदाय ने उनसे मुलाकात की। मोदी कश्मीरी पंडितों से भी मिले। एक सदस्य ने उनका हाथ चूमते हुए 7 लाख कश्मीरी पंडितों की तरफ से मोदी को धन्यवाद किया। इस दौरान मोदी ने 'नमस्ते शारदे देवी' का श्लोक का पाठ किया।यह क्षण काफी भावुक था। प्रधानमंत्री ने उनके दर्द को महसूस किया। जैसा की हर बार होता है – हमारे देश में कुछ लोगों ने इस कार्यक्रम की आलोचना की। उनलोगों के अनुसार यह कार्यक्रम मोदीजी का ट्रम्प का चुनाव प्रचार था। चुनाव प्रचार करने के लिए मोदीजी अमेरिका गए हैं। लेकिन ऐसी कोई बात नहीं है – अमेरिकी राष्ट्रपति के सामने हमारे प्रधानमंत्रीजी ने धारा 370 पर जिस तरह से पाकिस्तान की बखिया उखाड़ डाली वह तो स्वागत योग्य है ही। साथ ही साथ भारतीयों को एक नयी पहचान दिलाने में भी यह कार्यक्रम एक मील का पत्थर साबित होगा। भारतीयों का उत्साह तो देखते ही बनता था। राष्ट्र प्रेम से सराबोर पूरा प्रांगन था। यह उत्साह होना भी चाहिए। हमारे प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान को जिस तरह से बेनकाब किया है, उससे तो पाकिस्तान पस्त हो गया होगा। निश्चित रूप से यह संबोधन दोनों देशों के बीच आपसी संबंधों को बढ़ाने में मददगार होगा। शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद अमेरिका तथा भारत के सम्बन्ध मजबूत हुए हैं तथा भारतीय काफी संख्या में वहां पर रोजी-रोटी के लिए जा रहे हैं तथा अमेरिका के विकास में योगदान कर रहे हैं।

हिंदी दिवस पर उपजा विवाद

एक कर , एक संविधान, एक राशन कार्ड के बाद अब हिंदी को पूरे देश की भाषा बनाने पर सरकार आगे बढ़ेगी। हिंदी दिवस पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सभी भारतीय भाषाओं को तरजीह देते हुए कहा कि हिंद भारत की पहचान बन सकती है। सभी को इसे इज्जत देनी चाहिए और सरकार भी यह कोशिश करेगी कि हिंदी हर घर तक पहुंचे। उन्होंने कहा कि भाषा की सरलता, सहजता और शालीनता अभिव्यक्ति को सार्थकता प्रदान करती है। हिंदी ने इन पहलुओं को खूबसूरती से समाहित किया है। बस यहीं से परेशानी प्रारंभ हो गयी। सरकार की हिंदी की यह वकालत दक्षिण के राज्यों को रास नहीं आई। तमिलनाडु में सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक ने जहां केंद्र को हिंदी थोपने के प्रति चेताया, वहीं विपक्षी दल द्रमुक ने शाह से बयान वापस लेने की मांग की। अन्य विपक्षी दलों के नेताओं ने भी अमित शाह पर निशाना साधा। 1960 के दशक में, हिंदी को एकमात्र आधिकारिक भाषा बनाने पर तमिलनाडु में अफरातफरी मच गई। और केंद्र को पीछे हटना पड़ा। भारत आखिरकार तीन भाषाओं के फॉर्मूले पर पहुंचा - अंग्रेजी, हिंदी और एक क्षेत्रीय भाषा का उपयोग पर सहमति बनी।

वास्तव में स्वतंत्र भारत की सबसे प्रमुख चुनौतियों में से एक भाषा का सवाल थी। संविधान सभा ने किसी एक राष्ट्रभाषा के लिए निर्णय नहीं लिया। जब चर्चा संघीय ढांचे पर शुरू हुआ था, तो बहुत से नेता पहचान आधारित राज्यों के विचार के साथ सहज नहीं थे। लेकिन बाद में राज्य-गठन के लिए एक सिद्धांत के रूप में जीत भाषा-आधारित विचार की ही हुई। सभी भाषा को बढ़ने का अधिकार है। विकास समान रूप से होना चाहिए। हमें याद रखना होगा कि जबरदस्ती जब उर्दू को पूर्वी पाकिस्तान पर थोपा गया तो बांग्लादेश का जन्म हो गया। बल-प्रयोग या अन्य किसी तरीके से लागू किए गए फैसले टिकाऊ नहीं होते हैं। वे असंतोष को जन्म देते है। स्वीकार्यता अंतर्मन से होनी चाहिए। इसीलिए सरकार को अभी त्रिभाषीय व्यवस्था पर ही चलते रहना चाहिए। हिंदी का प्रयोग-उपयोग तो बढ़ा है। हिंदी को किसी और तरीके से विकसित करने के उपाय सोचने होंगे। देश को एकजुट रखना हमारी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। भाषाई विविधता को पहचानना ही हमें आगे बढ़ने में मदद कर सकता है। भारत को एकजुट रखने के लिए एक भाषा की आवश्यकता तो पड़ेगी-यह सत्य है। लेकिन इस चिंता को अभी एक विवाद को जन्म देकर बढ़ाना उपयुक्त नहीं होगा। सांस्कृतिक और भाषाई विशिष्टता को पहचानने से ही एक सुदृढ़ राष्ट्र का निर्माण संभव है। हमें इतिहास से सबक सीखने की जरूरत है – घर्म के नाम पर तथा भाषा के नाम पर देश का निर्माण हो चुका है। विघटनकारी तत्व हमारे देश में मौजूद है। जरा सी बात पर लोग लड़ने-भिड़ने तथा आन्दोलन करने के लिए तैयार हो जाते हैं। इन विघटनकारी तत्त्वों से सावधान रहने की जरूरत है। इसीलिए एक सर्वमान्य हाल भाषा को बढ़ाने के लिए निकालने की आवश्यकता है।

हिंदी दिवस

यह कैसी बिडम्बना है कि हमारे देश में हिंदी को बढ़ावा देने के लिए ‘हिंदी दिवस’ को मनाने की आवश्यकता पड़ती है। इस स्थिति के लिए हम हिंदी बोलने वाले ही जिम्मेदार हैं। यदि ध्यान से अंग्रेजी भाषा को देखते हैं तो पाते हैं कि इसमें दुनिया की प्रायः सभी भाषाओं के शब्दों को शामिल करने की कोशिश की गयी है। जिसका परिणाम यह हुआ कि दुनिया में अंग्रेजी अन्य भाषाओं की अपेक्षा अधिक तेजी से फली-फूली। यदि अंग्रेजों ने हम पर शासन भी किया तो इसका एक कारण अंग्रेजी भाषा ही थी। प्रायः भारतीय भाषाएँ संस्कृत से निकली हैं। संस्कृत किसी ख़ास समुदाय के लोगों की भाषा रह गयी। इसका विस्तार नहीं हो पाया। वैज्ञानिक भाषा होते हुए भी यह सिमट कर रह गयी। इसी प्रकार हिंदी भी समूचे भारत में नहीं फल-फूल रही है। मुझे लगता है कि अंग्रेजी का अनुवाद हिंदी में करना इस स्थिति के लिए एक कारण है। बहुत से सारे शब्द अंग्रेजी में स्वीकार्य है। उसे हिंदी का शब्द बना लेने से कोई समस्या नहीं होगी। उदाहरण के लिए ‘डॉक्टर’ शब्द को बोलने से सभी समझ जाते हैं। अब उस शब्द का अनुवाद हिंदी में ‘चिकित्सक’ करने की आवश्यकता नहीं है। ‘बैंक’ कहने से सभी समझ जाते हैं। अब उसका अनुवाद यदि बोलचाल में हम ‘बचतघर’ करने लगें तो लोगों को समझने में परेशानी तो आएगी ही। हिंदी सीखने के लिए प्रेरित करना आवश्यक है। हिंदी को बढ़ावा देने के लिए हम किसी भाषा का अपमान न करें। सभी भाषाओं को आगे बढ़ने का हक़ है। यह हमारी जिम्मेदारी बनती है कि हिंदी को किस प्रकार आज के समय में आगे लेकर जाएँ। केवल हिंदी दिवस मना लेने से उद्देश्य सफल नहीं हो जाता है। हम अंग्रेजी भी सीखें लेकिन हिंदी को भूल नहीं जाएँ। हिन्दी को आगे बढ़ाने के लिए कई कार्यक्रम हम कर सकते हैं। छात्र-छात्राओं को हिन्दी के प्रति सम्मान और दैनिक व्यवहार में हिन्दी के उपयोग करने आदि की शिक्षा दे सकते हैं। जिसमें हिन्दी निबंध लेखन, वाद-विवाद हिन्दी टंकण प्रतियोगिता, कवि सम्मलेन, विचारगोष्ठी, कविता लेखन, कहानी लेखन आदि को शामिल कर सकते हैं। हिन्दी दिवस पर हिन्दी के प्रति लोगों को प्रेरित करने हेतु भाषा सम्मान की शुरुआत की गई है। यह सम्मान प्रतिवर्ष देश के ऐसे व्यक्तित्व को दिया जाएगा जिसने जन-जन में हिन्दी भाषा के प्रयोग एवं उत्थान के लिए विशेष योगदान दिया है। इसके लिए सम्मान स्वरूप एक लाख एक हजार रुपये दिये जाते हैं। हिन्दी में निबंध लेखन प्रतियोगिता के द्वारा कई जगह पर हिन्दी भाषा के विकास और विस्तार हेतु कई सुझाव भी प्राप्त किए जाते हैं। लेकिन अगले दिन सभी हिन्दी भाषा को भूल जाते हैं। हिन्दी भाषा को कुछ और दिन याद रखें इस कारण राष्ट्रभाषा सप्ताह का भी आयोजन होता है। जिससे यह कम से कम वर्ष में एक सप्ताह के लिए तो रहती ही है। हिंदी दिवस मनाने का अर्थ है विलुप्त हो रही हिन्दी भाषा को बचाने और सम्मान देने के लिए प्रयास करना। हिंदी विश्व की सबसे सुंदर एंव सरल भाषा में से एक है। हिंदी हमारे देश और भाषा की प्रभावशाली विरासत है। हिंदी भाषा अपने आप में बेहद अद्भुत है। इसलिए हमें हमारी भाषा को सम्मान देना चाहिए।

कर्ण और अर्जुन

आज हमारे एक सहकर्मी ने मुझसे महाभारत के दो पात्र कर्ण और अर्जुन के बारे में प्रश्न किए: कर्ण और अर्जुन दो भाइयों में से कौन मजबूत था ? बेहतर धनुर्धर कौन था? कौन अधिक वीर और दानी था? दोनों में से कौन श्रेष्ठ है? कर्ण की हार क्यों हुई? इन सवालों का एक उपयुक्त उत्तर खोजने के लिए, हमें सबसे पहले इन दोनों महान के जीवन की प्रमुख घटनाओं को जानना होगा। जो बातें बताई, उसका जिक्र करना मैंने जरुरी समझा। कर्ण और अर्जुन दो बहादुर योद्धा हैं। इन दोनों की माता का नाम कुंती था। फिर भी दोनों सौतेले भाई थे क्योंकि पिता अलग थे। उनकी आपसी दुश्मनी और व्यक्तित्व महाभारत के प्रमुख कारणों में से एक है। दोनों की कहानी महाभारत के युद्ध में काफी भयंकर तथा मनोरंजक है। लोग कहते हैं कि इन दोनों महारथियों के प्रलयंकारी युद्ध को देवताओं ने भी देखा। महाभारत के युद्ध में केवल पांच महारथियों का वर्णन है: - श्रीकृष्ण, भीष्म , द्रोण , कर्ण और अर्जुन । जिसमे श्रीकृष्ण ने हथियार न उठाने की प्रतिज्ञा कर रखी थी। दुर्योधन अपने महारथियों के दम पर ही अभिमान करता था। कर्ण को महारथी होने की मान्यता भीष्म पितामह ने नहीं दी थी। आज के सन्दर्भ में हम इसे लाइसेंस कह सकते हैं। कुंती की भक्ति से प्रसन्न होकर ऋषि दुर्वासा ने उन्हें वरदान दिया कि वह अपनी पसंद के किसी भी देवता का आह्वान कर सकते हैं, और उसके माध्यम से एक संतान पैदा कर सकते हैं। एक जिज्ञासु, फिर भी अविवाहित, कुंती ने वरदान की शक्ति का परीक्षण करने का फैसला किया। उसने सूर्य को देखा और मंत्र का आह्वान किया। सूर्य तुरंत उनके सामने उपस्थित हुए और उन्हें एक पुत्र सौंप दिया, जो स्वयं सूर्य देव के समान तेजस्वी और बलवान था। बच्चा एक रक्षा कवच और कुंडल के साथ जन्म के साथ ही पैदा हुआ था।

कुंती जानती थी कि वह एक अदम्य माँ के रूप में दुनिया का सामना करने की हिम्मत नहीं जुटा पाएगी। अपनी दासी की मदद से , कुंती ने एक टोकरी में बच्चे कर्ण को रखा और उसे नदी में बहा दिया। कर्ण नदी में बहता हुआ धृतराष्ट्र के सारथी अधिरथ को मिला। कर्ण का लालन-पालन अधिरथ तथा उसकी पत्नी राधा ने किया। कर्ण ने झूठ बोलकर परशुराम से शिक्षा प्राप्त की। लेकिन परशुराम ने उसका झूठ पकड लिया और शाप दे दिया कि जो शिक्षा कर्ण ने ग्रहण की है वह जरुरत पड़ने पर काम नहीं आएगी। इसके बाद दो-तीन शाप कर्ण को और मिला और आश्चर्य की बात यह है कि सभी शाप एक ही साथ महाभारत के युद्ध में ही देखने को मिले।

प्रायः यह देखा जाता है कि जब मुसीबत आती है तो एक साथ कई संकटों को लेकर आती है। ऐसा ही कर्ण के साथ हुआ। सामान्य मनुष्य के जीवन में भी यह होता है। मुसीबत आने से उसे फिर कोई नहीं बचाता है। चाहे वह कितना ही दयालु क्यों न हो?

महाभारत के युद्ध में पहले के दस दिन भीष्म पितामह के कारण कर्ण ने युद्ध ही नहीं किया क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि कर्ण लड़े। केवल दो दिन 16वें और 17वें दिन कर्ण के सेनापतित्व में युद्ध हुआ। उस वक्त श्रीकृष्ण ने अर्जुन को युद्ध के मैदान में सावधानी बरतने की चेतावनी दी , क्योंकि कर्ण उनके समान हैं और कई बार उनसे भी श्रेष्ठ। श्रीकृष्ण भी जानते थे कि कर्ण लगभग अजेय था और वह अर्जुन को नष्ट करने में आसानी से सफल हो सकता था यदि कर्ण वास्तव में उस पर ध्यान केन्द्रित करता। इसीलिए श्रीकृष्ण जल्दी से कर्ण का वध करने के लिए अर्जुन को तैयार करते हैं। उस दो दिनों में भी कर्ण ने कुन्ती के अन्य चार पुत्रों को जानबूझ कर नहीं मारा क्योंकि उसने अपनी माँ को वचन दिया था।

युद्ध में कर्ण का पहिया कीचड़ में फंस जाता है। इस सुअवसर को जान श्रीकृष्ण कर्ण का काम तमाम करने की बात कहते हैं। मगर भगवान जरा सा न पिघले। उन्होंने अभिमन्यु वध की याद दिलाई। कर्ण को मिले शापों ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया और अर्जुन ने निहत्थे कर्ण को ऊपर भेज दिया।

इसमें कोई शक नहीं की अर्जुन एक महान धनुर्धर और एकाग्रता का प्रतीक था। वह दिव्य अनुग्रह से भरा था। स्वयं नारायण उसके साथ थे। हनुमानजी अर्जुन की रक्षा कर्ण के बाणों से कर रहे थे। इसीलिए वह महाभारत के युद्ध में विजयी हुआ। अर्जुन का कई बार हमें घमंडी पक्ष भी देखने को मिला। युद्ध को जीतने के लिए अधर्म का सहारा भी लिया गया।

दुर्योधन के साथ कर्ण की दोस्ती अंततः उसे अपने विनाश की ओर ले गयी। उसने अपने सभी धार्मिक कार्यों में अपने मित्र का अनिच्छा से समर्थन किया था , और इसलिए, उसे उसी की भारी कीमत चुकानी पड़ी। वधूजन का कर्ण ने सम्मान नहीं किया। अभिमन्यु वध भी कर्ण के लिए ठीक नहीं था। किसी भी गलत कार्य को करने के लिए कर्ण ने दुर्योधन को रोका नहीं। हमेशा कर्ण ने अपने मित्र की प्रशंसा ही की। उसके दम पर ही दुर्योधन ने युद्ध करने की ठानी थी और दुर्योधन ही एकमात्र ऐसा था जिसने कर्ण को सम्मान दिया था। कर्ण को कई बार ठगा गया या छला गया। प्रायः सभी ने कर्ण के साथ धोखा किया।अपने पूरे जीवन के दौरान कर्ण को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। जीवन भर वह कुंठाओं में रहा। कर्ण वास्तव में सहानुभूति का पात्र है। कर्ण अपने अद्भुत व्यक्तित्व के लिए जाना है और सभी बाधाओं के खिलाफ लड़ने के लिए उसमे अदम्य इच्छा और साहस है । इसी के लिए वह सम्मान और प्रशंसा का पात्र है।

अर्जुन के बारे में जो खास बात थी, वह यह कि जीवन के हर क्षेत्र में उसे पूर्णता की तलाश थी। कर्तव्य के प्रति अर्जुन एकदम सचेत रहता था। गुरु के प्रति समर्पित था। अर्जुन का यह रूप वास्तव में सराहनीय था। वह अकेले ही कई सेनाओं पर और एक ही समय में विजय प्राप्त कर सकता था। श्रीकृष्ण के प्रति अर्जुन की निर्विवाद भक्ति ने अंततः उन्हें विजय और सफलता के पथ पर अग्रसर किया।भगवान शिव द्वारा दिए गए पाशुपतास्त्र का प्रयोग अर्जुन ने नहीं किया। सामान्य युद्ध से ही विजय प्राप्त की। अर्जुन से हमें धर्म के मार्ग पर चलने की सीख मिलती है।

आभार व्यक्त करना

जब भी समस्याएं आती है – हमलोग ईश्वर को याद करते हैं। सुख में परमपिता की याद आती ही नहीं है। मेरे के मित्र तो हमेशा ही ईश्वर को याद करते थे। उन्हें भी मुसीबत आ गयी। अब यह बैठे-बिठाए मुसीबत क्यों आयी? इसका कारण वे सोच नहीं पा रहे थे। यदि मुसीबत आयी है तो उसका कारण भी अवश्य होगा, मित्र अब काफी सोच-विचार करने लगे। अंत में वे अपने गुरूजी के पास गए और उन्हें मुसीबत के आने का कारण पूछा। गुरूजी ने ध्यान से सारी बातें सुनी और कहा कि उन्होंने ईश्वर को ‘धन्यवाद’ नहीं कहा। जो भी कृपा ईश्वर करते हैं उसके लिए उनका धन्यवाद करना भी जरुरी है। हमलोग धन्यवाद ज्ञापित करना भूल जाते हैं। बाद में कारण खोजना प्रारंभ करते हैं। बात भी सही है हमलोग सर्वशक्तिमान से अच्छे स्वास्थ्य, समृद्धि, मन की शान्ति, संतान की प्राप्ति इत्यादि के लिए प्रार्थना करते हैं और अभीष्ट की प्राप्ति पर धन्यवाद देना भूल जाते हैं। हमलोग जीवन में कठिन परिस्थितियों का सामना करते हैं और सर्वशक्तिमान में विश्वास रखते हुए, उन चुनौतियों पर काबू पाते हैं। यहीं पर हमारा अहं सामने आ जाता है और हमें लगता है कि ‘मैंने’ किया है। जबकि वास्तविकता इसके विपरीत होती है। सभी समस्याओं का समाधान ऊपरवाले ने किया है या समस्याओं के निवारण के लिए शक्ति उन्होंने प्रदान की है – यह बात दिमाग से उतर जाती है और फिर समस्याओं के बवंडर में फंस जाते हैं। प्रार्थना हम संक्षिप्त ही करें – मगर उसमे धन्यवाद की गुंजाईश रखें। यह धन्यवाद ‘जादू’ का कार्य करेगा। महाभारत में भी हमने देखा ही कि पांचाली अपनी रक्षा के बाद श्रीकृष्ण का धन्यवाद देती है। कुल मिलकर हम इतना ही कह सकते हैं कि जिस प्रकार हम किसी से धन्यवाद की अपेक्षा रखते हैं उसी प्रकार परमात्मा भी हमसे आभार व्यक्त करने की उम्मीद रखते हैं।

खुद को पाना

सूरज की पहली किरण के साथ ही उस दिन का लक्ष्य प्रारंभ हो जाता है। लक्ष्य प्राप्ति के लिए मानव श्रम करने का श्रीगणेश करता है। सब जनों का लक्ष्य अलग-अलग होगा। किसी को पढाई अधिक करना होगा , किसी को जीवनसाथी की तलाश होगी, किसी को धन-प्राप्ति

की आश होगी इत्यादि। किसी का लक्ष्य पहले से स्थापित लोगों को किस प्रकार गिराया जाए – इसके ऊपर केन्द्रित होगी। उनके बिना षड्यंत्र रचने के दूसरा कोई लक्ष्य सूझता ही नहीं होगा। क्योंकि षड्यन्त्र रचने और दूसरों को परेशान करने से ही उनकी जीविका चलती है। यह षड्यंत्र उनके सीधे क्षुधा-संतुष्टि से जुड़ा है। इसे हम गलत भी नहीं कह सकते हैं। उपरी तौर पर यह लक्ष्य सामाजिक लक्ष्य है। इससे अधिक भी अध्यात्म प्रेरित लक्ष्य हो सकता है – जैसे ईश्वर को कैसे प्राप्त किया जाए या ईश्वर तक पहुंचने के उपाय क्या – क्या हो सकते हैं? क्या हम परमात्मा को पाने के लिए कोई रचना का निर्माण कर रहे हैं? या कुछ और कर रहे हैं? जो भी हो मानव उन लक्ष्यों को प्राप्त करना के लिए समझदारी पूर्वक योजना भी बनाते हैं तथा सूझबूझ से भरा कदम उठाने की सोच रखते है। यदि एकदम सूक्ष्मता से देखें तो पायेंगे कि लक्ष्य को हासिल करने के लिए इच्छा का होना जरुरी है तथा उन इच्छा की पूर्ति हेतु उद्यम का होना भी जरुरी है। यदि हम उद्यम नहीं करेंगे तो लक्ष्य की प्राप्ति नहीं होगी। तो लक्ष्य प्राप्ति के लिए उद्यमशीलता काफी महत्वपूर्ण है। हम अपने आसपास नजर दौडाते हैं तो पाते हैं कि वही सफल हुए हैं जिनमे उद्यमशीलता है। जिस किसी में उद्यमशीलता नहीं है – वह असफल ही जीवन में हुए है। यदि षड्यंत्रकारी ही सफल होता है तो इसके पीछे उसकी उद्यमशीलता होती है। वह दिन-रात इसी तिकड़म में लगा रहता है और उसे सफलता मिल जाती है। अब उद्यमशीलता है , लक्ष्य है तो क्या हम जीवन में आगे बढ़ते रहेंगे? इसमें भी एक अवरोध लगाना आवश्यक है- वह अवरोध है – इच्छा को नियंत्रण में रखने की। यदि इच्छा अनियंत्रित है तो फिर जीवन में संकट आनेवाला ही है। इसको समझने के लिए हम रावण जैसे दुष्ट का उदाहरण रख सकते हैं। रावण में उद्यमशीलता है – लक्ष्य है लेकिन वह अपनी इच्छा को नियंत्रण में नहीं रख सकता है। उसका परिणाम हम सभी के सामने है। रावण का अंत हुआ। जीवन में आगे बढ़ने के लिए धैर्य का होना भी जरुरी है। शबरी का उदाहरण हम लें – वह वर्षो से झाड़ू लगा रही है कि भगवान आयेंगे। लक्ष्य को वह निश्चित कर चुकी है। उसी लक्ष्य को लेकर वह जी रही है। यदि शबरी में धैर्य नहीं होता तो उसे ईश्वर की प्राप्ति या दर्शन नहीं होते। असीम धैर्य का परिचय सबरी ने दिया और अपने लक्ष्य की प्राप्ति की। अंत में हम इतना ही कह सकते हैं कि लक्ष्य को प्राप्त करना कठिन नहीं है। इसके लिए ‘पूर्ण नियोजन और पूर्व नियोजन’ का होना अनिवार्य है। यदि ये बातें हमारे जीवन में है तो लक्ष्य की प्राप्ति कठिन नहीं बल्कि आसान हो जायेगी।

सच्चा त्याग

जो किसी दूसरे की मदद करने के लिए अपने आराम का त्याग करने के लिए तैयार है, वह एक सच्चा भक्त है। लोग ‘त्याग-त्याग’ कहते रहते हैं। सभाओं में , नेताओं के भाषण में - जब भी सुनते हैं, तो ‘त्याग-त्याग’ की ही आवाज सुनाई देती है। मगर जब आचरण और व्यवहार की बात आती है तो ‘त्याग’ कहीं दिखाई नहीं पड़ता है। लगता है कि वह केवल सुनने और सुनाने के लिए है। अपने जीवन में अमल करने के लिए नहीं है। एक विद्यालय में एक दादी अपने पोते को पढ़ाने के लिए बकरी लेकर आयी थी। दादी के पास धन-संपत्ति के नाम पर सिवा उस बकरी के कुछ और नहीं था। दादी को उम्मीद थी कि इस बकरी को विद्यालय में देने से उसका पोता पढ़-लिख लेगा। दादी के विश्वास को देखकर उस विद्यालय के शिक्षकों ने यह निर्णय लिया कि सभी मिलकर उस बच्चे के पढने का खर्च उठाएंगे। इस स्थिति में शिक्षकों द्वारा किए गए मदद को हम ‘त्याग’ की श्रेणी में रख सकते हैं। अपने कम वेतन में भी कुछ बचाकर दूसरों को दे पाना त्याग है। इस सन्दर्भ में भगवान बुद्ध द्वारा बताई एक कहानी याद आती है।

भगवान बुद्ध अपने साथ हमेशा एक ढोल रखते थे। उनके शिष्यों ने एक बार उनसे पूछा: "गुरुजी ! आप इस ढोल को हमेशा अपनी तरफ क्यों रखते हैं?" बुद्ध ने उत्तर दिया: "मैं इस ढोल को उस दिन बजाऊंगा जिस दिन कोई बड़ा त्याग करने वाला मुझे दिखाई देगा अथवा मिलेगा। जिस दिन वह व्यक्ति मुझे मिलेगा – उसी दिन यह ढोल बजाऊंगा। अब तो हर शिष्य की उत्सुकता बढ़ गयी कि वह ढोल कब बजता है। सभी उस शुभ घडी का इन्तजार करने लगे। यह बात उस इलाके के राजा को प्राप्त हुआ। राजा खुश हो गया और एक हाथी में अपना खजाना रखकर भगवान बुद्ध को समर्पित करने चला। राजा के मन में यह बात थी कि खजाना को पाने के बाद भगवान बुद्ध ढोल को बजा देंगे और राजा काफी भाग्यशाली हो जाएगा कि उसने अपना सर्वस्व त्याग कर दिया है। राजा की इच्छा प्रशंसा अर्जित करने की थी। उसी बीच क्षुधा से पीड़ित एक बूढ़ी औरत आयी। बूढी औरत ने राजा का अभिवादन किया और राजा ने अपनी पालकी से एक अनार निकालकर उस बूढ़ी औरत को खाने के लिए दिया। लेकिन उस बूढ़ी औरत ने वह फल भगवान बुद्ध के चरणों में समर्पित कर दिया। भगवान बुद्ध ने उस फल को ले लिया और अपने शिष्य को ढोल बजाने के लिए कहा।

महाराजा ने बुद्ध से पूछा: "मैंने आपको इतना धन दिया लेकिन आपने ढोल नहीं बजाया। लेकिन आपने एक छोटा सा फल पाकर इसे बजा दिया। क्या यही महान त्याग है? भगवान बुद्ध ने कहा – “राजन ! त्याग मात्रा में नहीं बल्कि भावना पर निर्भर करता है। त्याग का यही गुण है।” एक महाराजा के लिए सोना चढ़ाना स्वाभाविक है। लेकिन जब एक भूखी बूढ़ी औरत अपनी भूख के बावजूद अनार का फल गुरु को अर्पित करती हैं तो क्या यह बड़ा त्याग नहीं हो जाता है। उसने अपनी भूख और जान की भी परवाह नहीं की और फल को समर्पित कर दिया। इससे बड़ा त्याग और क्या हो सकता है? आपके लिए यह सोना-चंडी, हीरे – मोती आदि तो छोटी – मोटी बातें है। इसे देना तो कतई भी त्याग की श्रेणी में नहीं आता है। सच्चा त्याग का मतलब है वह चीज जो आपको सबसे ज्यादा प्रिय हो , जिसे हम सबसे ज्यादा महत्व देते हैं।

त्याग का अर्थ बहुत ही विस्तृत है। विभिन्न महापुरुषों ने त्याग की परिभाषा अलग – अलग प्रकार से दी है। चाणक्य के मुताबिक जिस जगह में मान नहीं, जीविका नहीं, बंधु नहीं और विद्या का लाभ भी नहीं है, वहां नहीं रहना चाहिए अर्थात उस जगह का त्याग कर देना चाहिए। यहाँ पर त्याग का अलग अर्थ लगाया जा रहा है। भले ही वहां पर अधिक धन मिल रहा हो लेकिन मान – सम्मान भी चाहिए। जहाँ विद्या की क़द्र नहीं हो – वैसी जगह का त्याग कर देना चाहिए। बिनोवा भावे के अनुसार त्याग पीने की दवा है, दान सिर पर लगाने की सौंठ। त्याग में अन्याय के प्रति चिढ़ है, दान में नाम का लिहाज है।इसी प्रकार हर महापुरुषों ने त्याग की परिभाषा अलग – अलग ढंग से दी है।
मनुष्य के मन में त्याग का होना अति आवश्यक है। त्याग मानव जीवन की शोभा है और सही अर्थो में यही ईश्वर की सच्ची अराधना भी है। मनुष्य त्याग से ईश्वर तुल्य हो जाता है। ईश्वर सभी से प्रेम एवं सबके प्रति समभाव रखते हैं और जब मनुष्य भी उनके बताए मार्ग पर चलता है तो वे उससे बहुत प्रसन्न होते हैं। त्याग के लिए उठे हाथ उतने ही महान होते हैं, जितने ईश्वर की प्रार्थना में उठने वाले हाथ होते हैं। दूसरों के लिए त्याग करने वाले जीव पर ईश्वर की सदैव कृपा बनी रहती है। हमारे त्याग से खुश होने वाले लोग हमें प्यार, स्नेह, आशीर्वाद और दुआएं देते हैं, जिससे हमारे कष्ट अप्रभावी हो जाते हैं। ईश्वर भी हमें कष्ट सहन करने की असीम शक्ति प्रदान करते हैं। त्याग मनुष्य को सरल और नि:स्वार्थ बनाए रखती है। त्याग से मनुष्य के मन में कभी यह विचार नहीं आता है कि किसी चीज पर केवल उसका ही अधिकार है। भगवान श्रीराम ने पिता की ख़ुशी के लिए अपने राज-पाट का त्याग किया था। पिता के एक आदेश पर वे सब कुछ छोड़ने के लिए राजी हो गए। महर्षि दधिची ने जन कल्याण के लिए अपने शरीर का त्याग कर दिया। राजा शिवि ने शरणागत की रक्षा के लिए अपने प्राणों का त्याग कर दिया। सिख – गुरु ने धर्म की रक्षा के लिए अपने प्राणों का त्याग कर दिया। अंत में हम इतना ही कह सकते हैं कि त्याग का दायरा बहुत बड़ा है।

धैर्य की महानता

समय महत्त्वपूर्ण होता है। व्यक्ति महत्त्वपूर्ण नहीं होता है। समय बदलते देर नहीं लगती। राजा दशरथ ने गुरु वशिष्ठ के साथ शाम को निर्णय लिया कि श्रीराम का राज्याभिषेक अगले दिन सुबह में कर दिया जाएगा। लेकिन समय ने ऐसा खेल खेला कि सुबह होते-होते श्रीराम को वन में जाना पड़ गया। लूडो के खेल की तरह कब सांप द्वारा काटे जाने पर धडाम से नीचे आ जायेंगे – सिवा विधाता के कोई नहीं जानता। उस विपरीत परिस्थिति में धैर्य को बनाये रखना नितांत आवश्यक होता है। यदि श्रीराम उस वक्त धैर्य न बनाए रखते तो आज वे मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं कहलाते। उनका विपरीत समय चल रहा था – लेकिन उन्होंने असीमित धैर्य का परिचय दिया। धैर्य रखने से उन्हें यह एक फायदा हुआ कि भरत जैसे भाई ने उनके धन की रक्षा की तथा लक्ष्मण जैसे भाई ने वन में उनका साथ देकर हर प्रकार की सहायता की। सुग्रीव के द्वारा जब वचन-पालन में बिलम्ब होने लगा तो धैर्य का पालन करते हुए उन्होंने लक्ष्मणजी को उनके पास समझाने के लिए भेजा। समुद्र से रास्ता मांगने पर भी उन्होंने धैर्य का पहले परिचय दिया तथा बाद में अपना क्रोधित रूप दिखाया। इसी प्रकार हनुमानजी तथा भरतजी ने भी धैर्य का परिचय दिया है। भरतजी के द्वारा जब उन्हें शक्तिबाण लगा और जब हनुमानजी का परिचय प्राप्त हुआ तो धैर्य बनाते हुए उन्होंने हनुमानजी को विदा किया। दोनों आपस में लड़ने नहीं लगे। इसीलिए विषम स्थिति में हमेशा सच्चा मददगार धैर्य ही होता है। धैर्य को खोने से संकट से बाहर निकलने का रास्ता नहीं मिलता है तथा मनुष्य गलती पर गलती करते चला जाता है।

नकल के नुकसान

यदि हम जीवन में दूसरों की नक़ल करेंगे तो हमारी मौलिकता समाप्त हो जायेगी। यदि हमें जीवन को सुखकारी बनाना है तो हमें जो भी कार्य मिला है – उसमे पूरी तरह से रम जाना ही हितकारी है। ऐसा हमें बचपन में ही सिखाया गया था। कार्य कोई भी छोटा या बड़ा नहीं होता है। कार्य ईश्वर द्वारा प्रदत्त है तथा इसे ईश्वर का कार्य समझ कर ही करना चाहिए। इस भाव से यदि हम कार्य का सम्पादन करेंगे तो निश्चित ही हमारा जीवन स्वर्ग में रहने के जैसा हो जाएगा। काम में रमने से लाभ यह होता है कि उस कार्य का अभ्यास हम निरंतर करेंगे तथा हमें उस मेहनत से निपुणता प्राप्त हो जाएगी। नक़ल करके या दूसरों की देखा-देखी हम किसी कार्य को करेंगे तो हम उस कार्य को अनमने ढंग से करेंगे तथा निपुणता हमें प्राप्त नहीं होगी। होता ऐसा है कि लोग हमेशा दूसरों को ही देखते रहते हैं – कौन , कब , क्या कर रहा है? हम दूसरों की गलतियों को देखने के अभ्यस्त हो जाते हैं और हमारा ध्यान अपनी गलतियों की तरफ नहीं जाता है। जब ध्यान जाता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है और उसे सुधारना बहुत ही दुरूह हो जाता है। दूसरों को गलतियों को देखने की जगह यदि हम उनकी अच्छाइयों को देखने की आदत डाल लें तो हमारा कल्याण ही हो जाए। अपने कर्तव्य पथ पर यदि दृष्टि रहे तो सुख प्राप्त होने में देर थोड़े ही लगेगी। अपना स्वभाव यदि अच्छा रखेंगे तो दूसरों का दिल आसानी से जीत लेंगे। यदि नक़ल बिना सोचे – बिचारे कर रहे हैं तो यह घोड़े और गधे वाली कहानी को पढ़ना जरुरी है। एक व्यापारी एक घोड़े पर नमक और एक गधे पर रुई की गांठ लादे जा रहा था। रास्ते मेंएक नदी मिली। पानी में घुसते ही घोड़े ने पानी में डुबकी लगाई। इससे काफी नमक पानी में घुल गया। गधे ने घोड़े से पूछा।'यह क्या कर रहे हो?'घोड़े ने बताया कि वजन हल्का कर रहा हूँ। यह सुन कर गधे ने भी दो डुबकी लगाई, पर उससे रुई की गांठ भीग कर इतनी भारी हो गई कि उसे ढोने में गधे की जान आफत में पड़ गई।बिना समझे -बूझे की गई नकल कठिनाइयां बढ़ाती है, सुविधा नहीं। कई मामलों में यह देखा गया है कि जितनी मेहनत हम नक़ल करने में करते हैं यदि उतनी मेहनत हम कार्य में करें तो अधिक सफलता प्राप्त होगी। अंत में हम इतना ही कह सकते हैं कि नक़ल के नुकसान ही अधिक हैं। हम जैसे हैं – वैसे ही रहें। अपनी मौलिकता को नहीं छोड़ें। यदि हम अपनी मौलिकता को छोड़ देंगे तो कहीं के नहीं रहेंगे। इतिहास साक्षी है कि जिस किसी ने अपनी मौलिकता को छोड़ा है – उसका पतन ही हुआ है। चाहे वह मनुष्य हो या पशु – पक्षी। अपने गुण पर कायम रहना तथा उसमे उत्तरोतर विकास करना ही सच्चा सुख है। इधर – उधर भटकने से या दूसरों को देखते रहने से कोई लाभ या फायदा नहीं है।

प्रार्थना या सेवा

समझ में नही आता है कि प्रार्थना महत्त्वपूर्ण है या सेवा। दोनों में तो अंतर है यह नाम से ही स्पष्ट है। लेकिन जीवन में किसे चुनूँ? इस जगह पर आकर बुद्धि काम नहीं करने लगती है। बहुत से संगठन ‘सेवा’ को सर्वोपरि मानते हैं। बहुत से संगठन में ‘प्रार्थना’ को प्राथमिकता देते हैं। सवाल है कि केवल प्रार्थना करने से ईश्वर तक पहुंचा जा सकता है या ठीक इसके उलट केवल सेवा करने से ईश्वर तक? सहकर्मियों से वार्तालाप करने से एक मत में सबका विचार आता है कि सेवा का स्थान ही महत्वपूर्ण है। तो फिर प्रार्थना का महत्त्व क्या है ? बहुत से सहकर्मियों का मानना था कि प्रार्थना और सेवा दोनों ही महत्त्वपूर्ण हैं। प्रार्थना श्रद्धा को बताता है। प्रार्थना एक संस्कार है। यह हमें ईश्वर से जोड़ता है। हम अपने आपको ईश्वर से किस प्रकार जोड़ सकते हैं –यह प्रार्थना ही बताता है। अपनी आध्यात्मिक उन्नति को समझने हेतु एक महत्त्वपूर्ण मापदंड यह है कि, हमारे मन, बुद्धि तथा अहं का किस सीमा तक लय हुआ है। सेवा हमारे चरित्र को ताकतवर बनाती है। एक सम्पूर्ण मानव होने के लिए सेवा का होना जरुरी है। सेवा के बिना मानव अपूर्ण है। जीवन का सच्चा आनंद सेवा से ही मिलता है। जो केवल अपने बारे में सोचता है – वह कवि मैथिलीशरण गुप्तजी के अनुसार पशु से भी गया गुजरा है। संगीत का आलाप, कवि की रचना, नृत्य की तल्लीनता और किसी कलाकार का अपने अभ्यास में खो जाना - जब कानन में कुसुम निरुद्देश्य खिलने की तरह एक नित्य-नियम बन जाए तो उसे हम सेवा संज्ञा से सुसज्जित करते हैं। अर्थात सेवा हमारे जीवन का एक अंग होना चाहिए। जीवन में प्रार्थना और सेवा दोनों का होना जरुरी है। लेकिन कब, क्या और कौन जरुरी है – इसके लिए विवेक होना चाहिए। इसे एक उदहारण से समझ सकते हैं – एक बीमार तड़प रहा है और मेरे लिए प्रार्थना का समय हो रहा है। अब प्रार्थना करूँ या अस्पताल जाऊं? ऐसी स्थिति में अस्पताल जाना ही सच्ची प्रार्थना है। अस्पताल नहीं जाने से वह बीमार व्यक्ति अपने जीवन को खो देगा। यदि हम किसी के प्राण को बचा सके तो वह हजार प्रार्थनाओं से बढ़कर है। लेकिन हम सेवा कर अहंकार को नहीं पाल सकते। प्रायः यह देखा गया है कि सेवा के नाम पर लोग अहंकार पाल लेते हैं। उनमे एक गुरुर आ जाता है। अपने सामने वे दूसरों को तुच्छ समझने लगते हैं। सेवा करने के बाद उनमे विनम्रता आनी ही चाहिए। यदि विनम्रता नहीं है तो ऐसी सेवा बेकार है। किसी की सेवा करने के बाद ईश्वर को धन्यवाद देना भी जरुरी है – क्योंकि उन्होंने ही सेवा करने का अवसर प्रदान किया। यदि ईश्वर हमें सेवा करने का अवसर नहीं देते तो हम सेवा नहीं कर पाते। सेवा लेनेवाला ज्यादा महत्त्वपूर्ण है न कि सेवा देनेवाला। रामचरितमानस में हनुमानजी की सेवा देखते ही बनती है। हनुमानजी अपने प्रयत्नों से शरीर-निर्वाह के लिए कुछ ले लेते हैं अपने आपको श्रीराम की सेवा में लगाए रखते हैं। उनकी सेवा एक प्रकार से सच्ची तथा सर्वोपरि सेवा है। कुछ भी आशा वे प्रभु श्रीराम से नहीं रखते हैं।

प्रेम की जीत

क्रोध से क्रोध बढ़ता है तथा ईर्ष्या से ईर्ष्या । यदि इन दोनों के ऊपर इंसान को विजय पानी है तो इन दोनों को जीतने का एक ही उपाय है – और वह है प्रेम। प्रेम से ही हम क्रोध और ईर्ष्या के ऊपर विजय पा सकते हैं। यदि इंसान में प्रेम की भावना है तो क्रोध और ईर्ष्या रूपी दुर्गुण इंसान में समाप्त हो जाएगा। एक कहानी के माध्यम से हम इसे समझने का प्रयास करेंगे और देखेंगे कि कितने सहजता से क्रोध और ईर्ष्या के ऊपर विजय प्राप्त की गयी। महाभारत में एक महान योद्धा हैं – जिनका नाम सात्यकी है। सात्यकी की गिनती महारथियों में होती है। सात्यकी श्रीकृष्ण और उनके सबसे अच्छे मित्र अर्जुन को समर्पित हैं। पांडवों की तरफ से उन्होंने युद्ध में भाग लिया। सैन्य कला का प्रशिक्षण उन्होंने आचार्य द्रोणाचार्य से प्राप्त किया। एक बार ऐसा हुआ कि कृष्ण, बलराम और सात्यकी, जो उस समय छोटे लड़के थे, घने जंगल में भटक गए। जब काफी अँधेरा छा गया, हाथ को हाथ नहीं दिखाई देने लगा तो कोई उपाय नहीं देख तीनों ने उसी जगह रात बिताने का फैसला किया। श्रीकृष्ण ने बाकी दोनों को भूत-प्रेत की कहानी सुनकर भयभीत कर दिया। वे कहने लगे कि मानव शिकार की तलाश में यहाँ पर रात में भूत-प्रेत आते हैं और उनका शिकार करते हैं। यह सब सुनकर उन लोगों ने फैसला किया कि वे सब बारी-बारी से पहरे पर बैठेंगे। पहरे की अवधि ३ घंटे की होगी। जब एक पहरे पर रहेगा तो बाकी के अन्य सो जायेंगे। इस प्रकार रात्रि बिना किसी बाधा के दूर हो जायेगी। पहरे की अवधि रात के 7 से 10 सात्यकी की तथा 10 से 1 बजे तक बलराम की तथा 1 बजे से 4 बजे तक श्रीकृष्ण की लगनी तय हुई। तय कार्यक्रम के अनुसार सात्यकी ने अपने हिस्से का पहरा देना शुरू कर दिया। श्रीकृष्ण और बलराम वही पर सूखे पत्ते पर आराम से सो गए। इसी बीच एक राक्षस ने सात्यकी पर हमला कर दिया। सात्यकी भी राक्षस से भिड गए। दोनों में काफी युद्ध हुआ। अंत में दैत्य को पीछे हटना पड़ा। सात्यकी काफी खुश थे कि दोनों भाई सो रहे हैं और किसी को उन्होंने परेशान नहीं किया तथा अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन काफी तल्लीनता के साथ किया। लेकिन राक्षस से लड़ने के चक्कर में वे काफी घायल हो गए थे। शरीर काफी लहूलुहान हो गया था। इस मुठभेड़ से वे काफी परेशान तथा थक गए थे।

रात 10 बजे, सात्यकी ने बलराम को जगाया और अपने शरीर को पत्तियों के ढेर पर फैला दिया, जैसे कि कुछ भी नहीं हुआ था। अब राक्षस ने बलराम को युद्ध के लिए भी आमंत्रित किया और अंत में उसे अपमानित होकर पीछे हटना पड़ा। कारण यह था कि बलराम भी काफी बलवान थे और उनका वार सात्यकी की तुलना में अधिक भयंकर था। रात को 1 बजे बलरामजी ने श्रीकृष्ण को उठाया तथा वे सोने के लिए चले गए। दानव एक घायल बाघ की तरह दहाड़ते हुए आया और श्रीकृष्ण के ऊपर आक्रमण कर दिया। श्रीकृष्ण ने उस पर अपना आकर्षक मुस्कान बिखेर दिया। मुस्कान देखकर दानव अचंभित हुआ। उसका क्रोध घटने लगा। श्रीकृष्ण के मुस्कान से दानव उनके प्रभाव में आ गया तथा एक बालक के रूप में आ गया। दानव एकदम विनम्र हो गया था। सुबह में बाकी दोनों उठे तो उन्होंने पाया कि दानव श्रीकृष्ण के सामने एक बालक के समान बैठा है। दोनों आश्चर्यचकित थे कि कैसे यह संभव हुआ। श्रीकृष्ण ने दानव को जीतने की कहानी उनको सुनाई कि किस प्रकार प्रेम के हथियार से उन्होंने दैत्य के ऊपर विजय पायी थी।

वास्तव में हमारे जीवन में भी राक्षस चुनौतियों के रूप में आते रहते हैं। यदि इन चुनौती रूपी राक्षस का सामना क्रोध तथा ईर्ष्या से करेंगे तो इन राक्षसों को हरा नहीं पायेंगे बल्कि इनका आकार बढ़ते ही चला जाएगा। चुनौतियाँ बढती चली जायेंगी तथा वे ही हमारी जिन्दगी को नियंत्रित करने लगेंगी। लेकिन यदि उन्हीं चुनौतियों का सामना हम यदि काफी ठन्डे मन से करेंगे तो वे काफी छोटी होती जायेंगी और उनको हम वश में कर सकते हैं। क्योंकि प्रेम से चुनौतियों का सामना करने की हिम्मत हममें आएगी और उनका समाधान हम निकाल सकेंगे। इसीलिए समस्याओं का सामना करना है , उससे भागना नहीं है। भागने से वे बड़ी होती चली जायेंगी और समस्या का समाधान नहीं निकलेगा। ठीक इसके विपरीत यदि हम उन समस्याओं को प्रेम से सुलझाने का प्रयास करेंगे तो समाधान अवश्य निकलेगा।

फ़िक्र

पता नहीं यह गाना कैसे गाया गया होगा - ‘मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया- हर फिक्र को धुएं में उड़ाता चला गया।’ जितना भी मैंने ‘फ़िक्र’ को दूर करने की कोशिश की, ‘फ़िक्र’ उतना ही करीब आते गया। जितना सोचा - उतना ही दबोचा। एक बार कबीरदासजी को पढ़ा - जो सोचता है - वही दुखी है। जो सोचता ही नहीं है - वह क्यों दुखी होगा? इस ख्याल से तो गाना ठीक ही है। जब ‘फ़िक्र’ को धूएँ की तरह उड़ाने लगा तो सभी जगह से ‘‘फ़िक्र’’ सीबीआई की तरह मुझे खोजने लगे। अब सीबीआई रूपी ‘फ़िक्र’ से कैसे बचा जाए? बड़े-बुजुर्ग और मित्र-परिचित हमें बार-बार समझाते हैं कि चिंता मत करो, सब कुछ ठीक हो जाएगा, लेकिन ‘फ़िक्र’ है कि जा ही नहीं रहा है। कुछ उर्जा का संचार हो तो भी ठीक है। लेकिन लगता है कि उर्जा का भी क्षरण हो रहा है। इसीलिए देवानंदजी को तो नमन ही करना पड़ेगा क्योंकि उन्हीं से धुएं की तरह ‘फ़िक्र’ उड़ेगा। जैसे दिल है कि मानता नहीं, वैसे ‘फ़िक्र’ है कि जाता नहीं। जिन्दगी में जब से होश संभाला है – केवल ‘फ़िक्र’ ही ‘फ़िक्र’ मिला है। बचपन में विद्यालय में जाने की ‘फ़िक्र’। कक्षा-कार्य करने की ‘फ़िक्र’। अध्यापकों के गाय के बछड़े को खोजने की ‘फ़िक्र’। परीक्षा में अच्छे अंक लाने की ‘फ़िक्र’। बड़े हुए तो नौकरी प्राप्त करने की ‘फ़िक्र’। नौकरी मिल गयी तो शादी करने की ‘फ़िक्र’। शादी हो गयी तो बच्चे की ‘फ़िक्र’। बच्चे बड़े हो रहे हैं तो उनकी ‘फ़िक्र’। श्रीमतीजी क्यों गुस्से में हैं – उनकी ‘फ़िक्र’। ससुराल में कोई गुस्सा न हो जाए – उसकी ‘फ़िक्र’। कितनी ‘फ़िक्र’ की चिंता करूँ? मौज-मस्ती , हंसी-ख़ुशी , आनंद-विनोद को तो दूरबीन से खोज रहा हूँ। किसी मित्र ने सलाह दी कि योग-वर्ग में जाओ। वहां पर ‘फ़िक्र’ नहीं होगी। योगवर्ग में जाना शुरू किया – यहाँ पर भी सारे योगी ‘फ़िक्र’ लेकर ही आए थे।योग वाले तो बड़े व्यापारी होते हैं- यह पता ही नहीं था। बिना ‘फ़िक्र’ वाला जगह मिलता ही नहीं है। बहुराष्ट्रीय निगमों में तो ‘फ़िक्र’ नहीं करने के लिए बड़े-बड़े पदाधिकारियों की नियुक्ति भी की गयी है। हमारे पदाधिकारीगण ‘फ़िक्र’ को बढ़ा देने में ही शान समझते हैं। दबाब इतना बढ़ा देते हैं कि ‘फ़िक्र’ को भी ‘फ़िक्र’ होने लगती है। चिड़चिड़ापन और अवसाद जैसे मित्र मिलने लगते हैं। हमारे एक मित्र को तो मधुमेह जैसा मित्र मिल गया। पूछने से पता चला कि मधुमेह रूपी मित्र ‘फ़िक्र’ से आता है। मधुमेह एक ऐसा मित्र है जो आता है तो फिर सुग्रीब की तरह रहने के लिए ही मांगता है – जाने का नाम नहीं लेता है। अब मुझे तो समझ में आ ही नहीं रहा है कि ‘फ़िक्र’ सकारात्मक है या नकारात्मक। इससे दक्षता बढती है या घटती है? नयी-नयी किताबों को पढता हूँ और ‘फ़िक्र’ को पास नहीं आने देने की कोशिश करता हूँ। आ जाने से धुआं की तरह उड़ाने के प्रयत्न में लगा रहता हूँ। परेशानी यह है कि धुआं बनाने के चक्कर में जब दियासलाई को निकालता हूँ तो दियासलाई भी किसी काम की नहीं रहती है। बरसात के मौसम के कारण दियासलाई की क्षमता प्रभावित हो चुकी होती है। ‘फ़िक्र’ से राहत की उम्मीद करना अभी फिलहाल तो संभव नहीं दीखता है। ‘फ़िक्र’ से चतुराई का घटना निश्चित है। व्याधि से शरीर का घटना भी निश्चित है। इससे कोई भी नहीं बच पाया है।

ब्रह्म और जगत

हमारे देश में अध्यात्म को अधिक महत्त्व दिया गया है। यहाँ सभी क्रियाएँ ईश्वर के लिए होती हैं। सभी में ईश्वर का वास है – ऐसी मान्यता हमारी संस्कृति की रही है। हमारे देश के पास पास इतनी अमूल्य संपदाएं हैं कि हमें उसका अंदाजा तक भी नहीं। आज हम न संस्कृति का अर्थ जानते हैं और न संस्कृत का। हमारा सांस्कृतिक वटवृक्ष कटता, छंटता जा रहा है। अब उसकी जड़ें भी नष्ट होने वाली हैं। पुराने भारत से सीखे बगैर कोई नवनिर्माण नहीं हो सकता। हमारी संस्कृति में सभी के विचारों को स्थान दिया गया है। विचारों में मतभेद हो सकता है लेकिन मनभेद नहीं होना चाहिए। विश्वामित्र तथा वशिष्ठ मिलकर जन कल्याण के लिए सोचते थे – जबकि दोनों के विचार नहीं मिलते थे। मनुष्य तथा पशुवत प्राणी सभी के साथ प्रेम का बर्ताव किया गया है। रामायण इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। भगवान श्रीराम ने सुग्रीव,जामवंत तथा विभीषण से मित्रता कर एक मिसाल कायम की। दुनिया को मर्यादा, अध्यात्म, विचार और सहिष्णुता भारत की ही देन है। एक समय जब शंकराचार्यजी मंडन मिश्र का घर का पता पूछ रहे थे तो लोगों ने उन्हें बताया था कि जिस घर में तोते शास्त्रार्थ कर रहे हों – वही घर मंडन मिश्रजी का है। इस प्रकार हमारे देश में पशु-पक्षी भी शास्त्रार्थ करते थे। पश्चिम की संस्कृति में तर्क, प्रमाण ,युक्ति आदि के लिए कोई स्थान नहीं है। हम कौन हैं? क्यों हैं? भ्रष्टाचार क्यों? पाप क्यों? सृष्टि का उद्देश्य क्या है? इन तमाम विषयों के ज्ञान के बिना जीवन निरर्थक है। तमाम भौतिक संसाधन क्षणभंगुर हैं। शांति और संतुष्टि ही अप्रतिम भाव हैं इत्यादि। कुछ लोगों का मानना है कि इस जगत का कारण ईश्वर नहीं हो सकता है। ईश्वर ने समस्त प्राणियों के ऊपर समदृष्टि नहीं रखी। ईश्वर ने देवताओं को ज्यादा सुख और पशु-पक्षियों को ज्यादा दुख दिया। मनुष्य को मध्यम में रखते हुए सुख-दुख दोनों दिया। इसके विपरीत का पक्ष भी है – उनके मुताबिक परमेश्वर ही प्राणियों का सृष्टिकर्ता है। पाप-पुण्य के कारण ही कुछ प्राणी देवता होते हैं, और कुछ मनुष्य पशु-पक्षी आदि। समाज में अपनी संस्कृति को बचाना जरूरी है। हमारी पुरानी परंपरा को वापस लाने के लिए चर्चाएँ होती रहनी चाहिए। तब जाकर समाज में बदलाव आएगा। यहाँ पर टीवी आदि पर चर्चाएँ भी निरर्थक-सी होती हैं। समाज में इसका क्या प्रभाव पड़ेगा, इसकी चिंता नहीं होती है। अभी हाल के दिनों में एक बालिका अपनी मर्जी से परिणय-सूत्र में बंध जाती है तो लगातार तीन दिनों तक प्रायः हर चैनल पर उसी की चर्चा थी। समाज में उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण मुद्दे थे – जिस पर चर्चाएँ हो सकती थी। पर हम सब इतने पढ़-लिख गए हैं कि वे मुद्दे गौण हो गए तथा उस प्रेम-प्रसंग के चर्चे को बताना मुख्य समझा। अब जो बच्चे टीवी के सामने माँ-पिताजी के साथ देख रहे होंगे, उनकी मानसिकता के ऊपर क्या प्रभाव पड़ा होगा? इसको जांचने का कोई पैमाना हमारे पास नहीं है। संसार को समझें – ब्रह्म को समझें, जगत को समझें – इन सबके स्वरूप को समझें। इसकी सत्यता, व्यापकता का प्रचार आपस में तथ्यपूर्ण चर्चाएं कर करें तभी ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ के पथ पर चल सकेंगे।

भगवान की कृपा

इस संसार में जो कुछ भी होता है – सब ईश्वर की मर्जी से होता है। बिना ईश्वर की मर्जी से के पत्ता भी नहीं हिल सकता है। थोड़ी देर के लिए हम सब परेशान हो सकते हैं कि भगवान हम सबको दंड दे रहा है। या ऐसा लगता है कि सर्वशक्तिमान हम सब की बातों को नहीं सुन रहा है। मगर वस्तु स्थिति इसके उलट होती है। यदि महाभारत का युद्ध हुआ तो वह भी ईश्वर की मर्जी से ही हुआ। लीला प्रभु की ही थी। पांडव और कौरव एक निमित्त मात्र थे। इस प्रकार की सोच ही हमें रखनी होगी। तभी हम इस कष्ट से दूर हो सकेंगे। अन्यथा यह कष्ट हमें होता रहेगा और ईश्वर की कृपा नहीं हो रही है – ऐसा लगता रहेगा। किसी स्थान पर संतों की एक सभा चल रही थी, किसी ने एक घड़े में गंगाजल भरकर वहां रखवा दिया ताकि संतजन को जब प्यास लगे तो गंगाजल पी सकें। वहां पर एक सज्जन ने उस गंगाजल से भरे घड़े को देखा तो उसे तरह-तरह के विचार आने लगे। वह गंगाजल से भरे घड़े को देखकर मन ही मन जलने लगा। उसे लगा कि उस घड़े को संतों का स्पर्श मिलेगा, उनकी सेवा का अवसर मिलेगा, ऐसी किस्मत किसी-किसी की ही होती है। घड़े ने उस व्यक्ति के मन के विचारों को पढ़ लिया और कहा कि भाई, मैं तो एक मिट्टी के रूप में खेत में पड़ा था, एक बर्तन बनानेवाले ने फावड़े से उझे काटा , मुझे रौंदा, चाक पर चढ़ाया, आंवे में पकाया, ठोका- बजाया तब मैं जाकर बाजार में बिका। बहुत कष्ट सहा – तब जाकर मेरी कीमत लगी। किसी सज्जन ने मुझे ख़रीदा और आज जाकर गंगाजल का स्पर्श हुआ है। इतने कष्ट सहने के बाद मेरा जीवन सफल हुआ है। मैं ईश्वर को हमेशा कहता था कि हे भगवान, क्या सारे कष्ट मेरे लिए ही हैं? आज जाकर मुझे पता चला है कि ये कुम्हार द्वारा कुदाल से मुझे काटना, रौंदना आदि सब ईश्वरीय प्रेरणा से हो रहे थे। सब उनकी इच्छा से हो रहा है। घड़े की यह बात सुनकर उस व्यक्ति की ऑंखें खुल गयी। बात भी सही है- सब भगवान् की कृपा ही कृपा है। परिस्थितियां हमें तोड़ देती हैं, विचलित कर देती हैं- इतनी विचलित की भगवान के अस्तित्व पर भी प्रश्न उठाने लगते हैं। हम ईश्वर की लीला को समझ नहीं पाते हैं। हमारे एक मित्र को उनके ऑफिस में किसी बात के लिए बहुत सताया गया, मित्र भीतर से एकदम टूट गए। उनको समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें। वे एकदम परेशान थे। मित्र को लग रहा था कि केवल उन्हें ही क्यों परेशान किया जा रहा है? प्रतिष्ठान में तो और भी बहुत से सारे व्यक्ति हैं। तब जाकर उनको इस घड़े वाली कहानी को बताई गयी। बात उनकी समझ में आ गयी। सब खेल ईश्वर ही रच रहे हैं। हमलोग समझ नहीं पाते हैं। जरुर कुछ न कुछ अच्छाई उनको परेशान करने में छिपी होगी। विचलित होने की जगह यदि ऊपर वाले पर भरोसा रखें तो निश्चित ही कोई न कोई उपाय निकल आएगा। क्योंकि भविष्य में क्या होगा – यह हमलोग देख नहीं सकते। केवल ऊपर वाला ही देख – सुन सकता है। हमलोगों का विश्वास ईश्वर से उठ जाता है और उनको दोष देना आरम्भ कर देते हैं। इतने मूर्ख बन जाते हैं कि उनके द्वारा किए जा रहे पूर्व तैयारी को समझ नहीं पाते। बाद में पछताना पड़ता है। मन में संत का भाव रखना पड़ेगा। प्रसाद – बुद्धि रखनी होगी। जो हो रहा है – ठीक हो रहा है। जो होगा – ठीक ही होगा। इसी भाव से जीवन जीना है। हमारी जिंदगी में सुख और दुःख दोनों लगे हुए है, सुख के समय तो हम खुश रहते है लेकिन दुःख के समय यह हमे पहाड़ सा लगने लगता है और हम भगवान को इसका जिम्मेंदार ठहराने लगते है। परन्तु दुःख या संकट हमारे जिंदगी के लिए आवशयक है क्योकि ये हमे हमारे आगे की जिंदगी के लिए महत्वपूर्ण सबक दे कर जाते है तथा जब भी हमारे जिंदगी में दुःख या संकट आते है तब भगवान हमारी मदद करते है व हमे उससे लड़ने की ताकत देते है। अपने कर्म में लगे रहना ही हमारा धर्म है। किसी बात के लिए किसी को दोष नहीं देना है। कर्मो का फल तो हर प्राणी को भोगना ही पड़ता है। सत्य पथ पर चलते रहना है। हर एक पल कुछ सिखाता है:- मनुष्य को उसके जिंदगी में घटित हो रहे हर एक छोटी-बड़ी चीज़ कुछ न कुछ सिख देकर जाती है। भगवद गीता में कहा गया ही की इस जीवन में न कुछ खोता है और न ही कुछ व्यर्थ होता है। हमेशा समान भाव सबके प्रति रखने से निश्चित ही घड़े के समान कृपा हम सब को प्राप्त होगी। इसमें कुछ भी संदेह नहीं है।

भय का स्वरुप

अभी हाल – फिलहाल हमारे केन्द्रीय गृहमंत्री ने संसद में कहा कि यदि देशविरोधी बातें करनेवाले को डर लगता है – तो ठीक है। डर लगना भी चाहिए। कहा भी गया है - बिनु भय होई न प्रीति। प्रेम जताने के लिए डर आवश्यक है। रामायण में समुद्र के किनारे श्रीराम समुद्र से रास्ता मांगते रहे – लेकिन समुद्र के कानों पर जूँ तक नहीं रेंगी। थक-हार कर जब श्रीराम ने लक्ष्मण से धनुष-बाण लाने को कहा तो समुद्र उनके पैरों पर गिर पड़ा। यदि समुद्र को भय नहीं दिखाया जाता तो समुद्र कभी नहीं झुकता। प्रायः यह देखा जाता है कि मनुष्य स्वभाव से ही भयभीत होता है। कोई खुलकर कबूल करता है और कोई नहीं करता है। भय प्रकृति ने प्रायः हर प्राणी को दिया है और शायद आत्मरक्षा के कवच के रूप में दिया हो। जिसे भय नहीं रहता है वह या तो समाज विरोधी कार्य करता है अथवा समाजोपयोगी कार्य करता है। उदाहरण के लिए जिस किसी ने हवाई-जहाज का आविष्कार किया – उसे उस जहाज का परीक्षण करने में निश्चित रूप से पहली बार भय लगा होगा। लेकिन भय को दरकिनार करते हुए आविष्कारक ने उसका परीक्षण किया और सफलता प्राप्त की। एक विज्ञापन भी टीवी पर दिखाया जाता है – डर के आगे जीत है।यदि किसी प्राणी को भय नहीं है तो फिर वह असाधारण की श्रेणी में आ जाएगा। यदि सिंह सड़क पर निकल गया तो वह चलते ही रहेगा। सिंह को भी भय है- इसीलिए वह दौड़ लगाकर जंगल में चला जाएगा और अपने मांद में आराम करेगा। हाँ, वन में उसे भय नहीं लगेगा क्योंकि वहां का वह राजा है। भय हमारी बुद्धि या विवेक का ही अंश है। लेकिन आश्चर्य तो तब होता है कि मृत्यु का भय होते हुए भी मानव-बुद्धि उसे स्वीकार नहीं कर पाती है। फिर सोचता हूँ कि मुझे आश्चर्य हुआ तो क्या हुआ? यह तो प्राचीन काल से चला आ रहा है। महाभारत युग में युधिष्ठिर को इसी बात को लेकर आश्चर्य हुआ था। हम सभी अपने – अपने किरदार को निभा रहे हैं लेकिन यह बात पचा नहीं पा रहे हैं कि एक दिन सभी को इस रंगमंच से प्रस्थान करना है। मनुष्य जब उत्पन्न संकट का उचित रूप से सामना न कर पाता है या हानि की आशंका उसे होती है तो भय लगने लगता है। कभी- कभी देखा जाता है कि यदि व्यक्ति को यह आशंका रहती है कि अन्य लोग उसका मूल्यांकन करेंगे तो वे अन्दर ही अन्दर घबरा जाते हैं या भयभीत हो जाते हैं। यह स्थिति बच्चों में या सहकर्मियों में अधिक देखने को मिलती है। भय से भयभीत होकर बहुत से लोग अनुचित कदम भी उठा लेते हैं। उन्हें अपने पद का डर लगने लगता है। उन्हें प्रतियोगिता में बने रहने के लिए दूसरे को येन – केन – प्रकारेण षड्यंत्र रचने में आनंद आता है तथा उसका मजा लेते हैं। इतिहास इसके अनेक उदाहरणों से भरा पड़ा है। विभीषण, जयचंद, मीरजाफर आदि ऐसे ही पात्र हैं जिन्हें कि अपने साथ काम करने वाले से भय लगता था। उन्होंने अनुचित कार्य कर अपने साथवालो को पराजित किया। अंत में हम इतना ही कह सकते हैं कि भय एक प्रकार की बीमारी है। भय से ऊपर उठकर हम मनुष्यों को सोचना चाहिए। जब तक भय से ऊपर नहीं उठेंगे हमारी तरक्की नहीं होगी।

भरोसा

जब तक मनुष्य को दूसरे पर भरोसा रहता है – वह परेशान ही रहता है। प्रायः यह देखा गया है कि ‘कोई अन्य मेरे कार्य को करेगा’ वाला भाव यदि मन में रहता है तो असफलता ही हाथ लगती है। कोई अन्य हमारे कार्य को करेगा नहीं और हमें केवल क्रोध एवं छटपटाहट ही हाथ लगती है। अपना रक्त-चाप ही बढ़ता है। कोई भी मनुष्य हो – इतिहास गवाह है कि उसे

देर-सवेर अपनी समस्याओं को स्वयं सुलझाना पड़ा है। यदि हम किसी कार्यालय में काम करते हैं और अपने सहकर्मी की तरफ आशा भरी नजरों से देखते हैं कि वे हमारा कार्य कर देंगे तो यह हमारी भूल है। कारण साफ़ है कि उस सहकर्मी को भी तो अपने हिस्से का कार्य करना है। पहले वह अपनी नौकरी बचाए या हमारे हिस्से का कार्य करे? उसके सामने भी तो यही प्रश्न है। एक हमारे सहयोगी हमेशा चालाकी से अपने अन्य सहकर्मी से अपने हिस्से का कार्य करवा लेते थे। वह सहकर्मी भी शिष्टाचार के कारण कुछ नहीं कहता था तथा उनका कार्य ख़ुशी – ख़ुशी कर दिया करता था। यह क्रम बहुत दिनों से चला आ रहा था। दोनों में किसी को परेशानी नहीं थी। लेकिन इस तरह कार्य करने से परिणाम यह हुआ कि पहले वाले को कैसे कार्य का निपटारा करना है – यह बात समझ में नहीं आयी और वे बिना सीखे ही रह गए। दूसरे को कार्य करने का तरीका तो मालूम था ही। अब समस्या यह उत्पन्न हो गयी कि जो महानुभाव कार्य का संपादन आसानी से कर दिया करते थे – उनका तबादला हो गया। उनकी जगह जो नए सहकर्मी आये तो उन्होंने बहुत ही नम्रतापूर्वक दूसरे का कार्य करने से मना कर दिया। अब परेशानी यहीं से आरम्भ हुई। नए वाले के साथ असहयोग का भाव फैला दिया गया। नया वाला घमंडी है – इसका प्रचार – प्रसार किया जाने लगा। नए वाले को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। पहले वाले को कार्य करने का ढंग मालूम ही नहीं था। अब तो बेचारे बुरे फंसे। समस्या मेरे सामने आयी। मैंने तो कह दिया कि कार्य तो आपको सीखना ही पड़ेगा। कोई कितने दिनों तक आपकी मदद करेगा। अंत में थक – हार कर उन्होंने कार्य को करना सीखा। हम अधिक दिनों तक किसी को बेवकूफ नहीं बना सकते। एक दिन न एक दिन राज का पता चल ही जाता है। इसीलिए अपने हिस्से के कामों को निपटाना ही समाधान होता है। लोग यह जानते हैं लेकिन जानते हुए भी अनजान बने रहते हैं। ऐसा इसीलिए होता है कि लोगों को अपने ऊपर भरोसा नहीं रहता है। उन्हें पता नहीं चल पाता है कि वे भी यह कार्य कर सकते हैं। भरोसे की कमी के चलते ऐसे लोग कार्य करने से पीछे भागते हैं। कभी – कभी भरोसे को जगाना भी पड़ता है। इसका सर्वश्रेष्ठ उदहारण रामयण और महाभारत में है। श्रीहनुमान जी के भरोसे को जगाने का कार्य जामवंतजी ने बहुत ही सुन्दर ढंग से किया है। रामचरितमानस में एक चौपाई है , जब जामवंत जी श्रीहनुमानजी से कहते हैं।

कहइ रीछपति सुनु हनुमाना। का चुप साधि रहेहु बलवाना।।
पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना।।
कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं।।
राम काज लगि तब अवतारा। सुनतहिं भयउ पर्वताकारा।।

चौपाई को पढने से ही स्पष्ट है कि श्रीहनुमानजी के भरोसे को जगाया गया। नहीं तो श्रीहनुमानजी एक कोने में चुपचाप बैठे थे और सभी की बातें सुन रहे थे। महाभारत में हम देखते हैं कि अर्जुन के भरोसे को जगाने का कार्य श्रीकृष्ण ने स्वयं किया। अर्जुन के अंग शिथिल हो गए। अर्जुन युद्ध करने से भागने लगा। वह श्रीकृष्ण के भरोसे में था। लेकिन भगवान ने उसे उसके कर्तव्य की याद दिलाई और युद्ध करने के लिए प्रेरित किया।भगवान अर्जुन से कहते हैं:

क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।

क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्तवोत्तिष्ठ परंतप।

हे अर्जुन ! नपुंसकता को मत प्राप्त हो, तुझमें यह उचित नहीं जान पड़ती। हे परंतप ! हृदय की तुच्छ दुर्बलता को त्यागकर युद्ध के लिए खड़ा हो जा। अर्जुन युद्ध के लिए तैयार होता है और अपने लक्ष्य में सफल भी होता है। उस भरोसे को जिस प्रकार भगवान ने जगाने का कार्य किया है वह आज ‘गीता’ के रूप में हम सब के सामने है। इसीलिए अपने को जानना जरुरी है। हम किसी से कम नहीं है। यदि दूसरा एक कार्य कर सकता है तो हम भी वह कार्य कर सकते हैं। किसी को भी हम कमतर न समझें। हमारे एक मित्र हमें हमेशा कहा करते हैं कि जो कोई खाना खा सकता है – वह कोई भी कार्य कर सकता है। जिसे भूख – प्यास की चिंता नहीं है – वही देवता है। अब ऐसा व्यक्ति तो मिलने से रहा। यानी की दिमाग तो ईश्वर ने सभी को दिया है। कुछ लोग छोटी – छोटी बातों में गुस्सा हो जाते हैं। मुझे भी गुस्सा आ जाता है। बाद में जब उसका कारण खोजते हैं तो लगता है कि कारण मैं खुद था। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। पछतावा होता है कि बेकार में गुस्सा किया। इसीलिए हमेशा समान भाव से जिन्दगी को जीना है। कोई हमारी लाख बुराई करे तो करे – हमारे ऊपर उसका प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए। हम जैसे हैं – वैसे रहें तथा अपना विकास करें। हम भी कुछ हैं – यह हमेशा ध्यान में रहना चाहिए। अपने ऊपर भरोसा रखते हुए अपना कार्य खुद करना चाहिए।

भलाई के फायदे

लोगों का मानना है कि भलाई करने वाले लोग ज्यादा खुश रहते हैं। भलाई करने से मन प्रफुल्लित रहता है तथा यह बात रहती है कि चलिए एक नेक कार्य किया है। लेकिन कभी – कभी सद्गुण विकृति हो जाती है। जैसे ही भलाई के लिए आगे बढ़ेंगे तो लोग टीका – टिप्पणी शुरू कर देंगे। हमारे के मित्र ने जो कि काफी दूर – दराज के क्षेत्र में कार्य करते हैं – इस मूल भावना को ध्यान में रखा और भलाई के कार्य में लग गए। किसी के घर में बच्चा बीमार है , किसी को आर्थिक संकट है – या किसी अन्य प्रकार की परेशानी है तो मित्र हमारे हमेशा आगे रहते थे। चूँकि वे हमेशा भलाई के कार्य में लगे रहते थे इसीलिए उनका स्वास्थ्य हमेशा अच्छा रहा। कारण यही था कि परोपकार करने से उनका मन हमेशा प्रफुल्लित रहता था। इससे उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता काफी मजबूत थी। इसीलिए किसी प्रकार की बीमारी उनके पास नहीं थी। उन्हें आत्मसंतुष्टि होती थी। हर व्यक्ति अलग-अलग प्रकार से खुश होता है। किसी को मद्यपान से ख़ुशी मिलती है , किसी को ईश्वर भजन से ख़ुशी मिलती है – हमारे मित्र को भलाई करने से आत्मसंतुष्टि प्राप्त होती थी। लेकिन अन्य जनों के मन में यह बात खटक जाती थी और उन्हें लगता था कि निश्चित रूप से इन्हें आर्थिक लाभ होता होगा। धीरे-धीरे वे समाज तथा कार्यस्थल पर बदनाम होते गए। उन्हें पता ही नहीं चला कि वे संसार में रहते हैं। वे इस प्रकार बदनाम हुए कि उतनी बदनामी तो विजय माल्या या नीरव मोदी की भी नहीं हुई है। विजय माल्या और नीरव मोदी तो मैदान छोड़ कर भाग गए लेकिन मित्र ने मैदान नहीं छोड़ा और वे लड़ते रहे लेकिन इस संसार में बेकसूर को फंसाने में अधिक समय नहीं लगता है। इसका कई उदहारण हमारे सामने हैं। मित्र निरपराध होते हुए भी अपराधी घोषित कर दिए गए। उनके ऊपर आर्थिक दंड लगा दिया गया। आर्थिक दंड भी इतना कि जिन्दगी भर इसे चुका नहीं सकते। तब उन्होंने अपने ऊपर आत्मनिरीक्षण किया कि कहाँ पर चूक हो गयी ? उन्हें अकारण बिना मांगे जो मदद की – वह उनके जीवन के लिए घातक सिद्ध हुई। इस घटना से यही सीख मिली कि बिना मांगे किसी की मदद भी नहीं करनी चाहिए। विवेक को जाग्रत रखना हर मानव का दायित्व है। बिना विवेक यदि कोई कार्य किए तो परेशानी अवश्यंभावी है। ऐसा नहीं है कि दया हमें नहीं दिखानी चाहिए लेकिन उसके लिए समय और पात्र का चयन करना हमारे विवेक में होना ही नहीं चाहिए नहीं तो बिना बुलाए मुसीबत में फंसेगे और असहाय होकर देखते रहेंगे तथा दुनिया को हंसने का अवसर प्रदान करेंगे।

संतोष

कहा गया है कि - संतोष सबसे कीमती धन है। लालच करने से दुःख होता है। जो है – जितना है – उसमें प्रसन्न रहना है – यही संतोष है। सुदामा के पास संतोष था। जबकि सुदामा के मित्र द्वारकानाथ थे। लेकिन सुदामा का स्वाभिमान वहां जाने से और जाकर कुछ मांगने से उनको रोक रहा था। लेकिन जब सुदामा की सहधर्मिणी हठ करती है, तब सुदामा मान जाते हैं और द्वारिकाधीश के पास उपस्थित हो जाते हैं। सुदामा चकाचौंध में पड़ते हैं – लेकिन फिर भी संतोष की सीमा देखिए – सुदामा अपने मित्र श्रीकृष्ण से कुछ नहीं मांगते हैं। यही संतोष को बताता है। संतोष की ऊंचाई कितनी है। स्वाभिमान सामने में आ रहा है। मित्र का अर्थ बराबरी है। जब दोनों मित्र हैं तो बराबर है और जब बराबर हैं तो लेन=देन का खयाल ही नहीं होगा। याचना और भी मित्र के सामने – यह तो कोई न्यायसंगत बात ही नहीं हुई। कड़ी मेहनत कभी थकान नही लाती वह संतोष लाती है। सुदामा मेहनत करके अपने मित्र के यहाँ गए थे – थकान तो अवश्य आयी होगी। लेकिन श्रीकृष्ण ने अपने हाथों से उनके पैर धोए तथा दबाए। सुदामा संतोषी मुद्रा में बैठे थे। यदि सुदामा क्रोध करते कि मित्र ने कुछ नहीं दिया तो बहुत कुछ बिगड़ सकता था। हो सकता था कि श्रीकृष्ण उन्हें कुछ भी नहीं देते। लेकिन चूँकि सुदामा को संतोष था – इसीलिए उनके पास बहुत कुछ था। क्रोध बहुत कुछ लेकर जाता है – वही संतोष बहुत कुछ देकर जाता है। संस्कृत में कहा भी कहा गया है कि

शान्तितुल्यं तपो नास्ति , न संतोषात्परं सुखम्।

न तृष्णया: परो व्याधिर्न, च धर्मो दया परा:।।

अर्थात शान्ति के समान कोई तप नही है, संतोष से श्रेष्ठ कोई सुख नही, तृष्णा से बढकर कोई रोग नही और दया से बढकर कोई धर्म नहीं।

लेकिन कर्तव्य करने में संतोष नहीं कर लेना है। सुदामा से यहीं भूल हो गयी है। सुदामा कुछ उद्योग कर सकते थे। लेकिन वे हाथ पर हाथ धरे बैठे थे। यह प्रवृत्ति सुदामा के समय में तो सफल हो गयी और सुदामा भाग्यशाली थे कि उनके मित्र ने उनका साथ दिया। लेकिन आज के समय में समस्या तब उत्पन्न होती है – जब संतोषी व्यक्ति को ही परेशानी हो जाए – तब क्या किया जाए? उस संतोषी स्वभाव वाले व्यक्ति को कष्ट से फिर छुटकारा कैसे मिलेगा? नित उद्योग रत रहना ही उस संतोषी को कष्ट से छुटकारा दिला सकता है। संतोष का मतलब चुपचाप बैठे रहना, भाग्य के भरोसे रहना, उन्नति का प्रयत्न न करना नहीं है। संतोष का अर्थ नियंत्रण है। हमेशा आनंदित रहना, दुखदायी स्थिति में भी खिन्न न होना – यही असली संतोष है। जो प्राप्त हैं – उसका प्रसन्नतापूर्वक उपभोग करना तथा ईश्वर को धन्यवाद देना – यही संतोष है।

संशय

मैंने एक शिक्षक होने के नाते विद्यालय में महाराणा प्रताप की कहानियों को बच्चों को बहुत बार बताया है। कैसे उन्होंने जंगलो-गुफाओं-कंदराओं में ख़ाक छानी, समय बिताया, परिवार को भटकने के लिए मजबूर किया लेकिन दिल्ली सल्तनत की अधीनता स्वीकार नहीं की। उन्हें अपनी काबिलियत पर भरोसा था। उनका परिवार हमेशा उनके सुख-दुःख में खड़ा था। यही पूंजी प्रताप के पास थी और मुझे लगता है कि इसी के बदौलत उन्होंने अकबर की अधीनता स्वीकार जीते जी नहीं की। वे लड़ते रहे – लड़ते रहे मगर झुके नहीं। इसीलिए आज ज़माना उनको याद करता है। कमोवेश ऐसी ही परिस्थितियों से प्रायः सभी को गुजरना पड़ता है। घर के बड़े-बूढ़े कहते थे कि कायदे से रहोगे तो फायदे में रहोगे। बहुत से लोग हमेशा कायदे में रहते हैं लेकिन संसार में रहने के कारण फायदा नुकसान में बदल जाता है। कभी – कभी व्यक्ति असंशय का शिकार हो जाता है। कार्य को शुरू करने के पहले ही वह सोचता है कि कार्य सफल होगा या नहीं? अब यह स्थिति काफी भयावह हो जाती है। ध्यान से सोचकर देखें तो पायेंगे कि इस प्रकार की सोच रखने से तो सफलता मिलने से रही। जिस किसी ने हवाईजहाज का आविष्कार किया होगा , उसे अपनी काबिलियत पर संदेह नहीं होगा। क्योंकि परीक्षण के दौरान आविष्कारकर्ताओं को डर लगा होगा कि कहीं हवाईजहाज नीचे नहीं गिर जाए। हवाईजहाज का आविष्कार हुआ और आज हम सभी उड़ते हैं। कितने लोगों को जल में उतरने में डर लगता है, कहीं ड़ूब न जाएं। नदी या सागर किनारे खड़े रह जाते हैं और प्रकृति की सुन्दरता का आनंद नहीं ले पाते हैं। हमारे के मित्र की बिटिया परीक्षा देने के लिए जानेवाली थी। मगर उन मित्र की पत्नी पहले से डर गयी थी कि कहीं रास्ते में कहीं उल्टा-सीधा न हो जाए। काफी डरी हुई थी, बहुत समझाने का प्रयास किया लेकिन नहीं समझा पाया। बिटिया से बात की तो मन काफी प्रसन्न हुआ। बिटिया को कोई परेशानी ही नहीं थी। वह हर प्रकार के परिस्थितियों का सामना करने के लिए मानसिक रूप से तैयार थी। अब मन में ख्याल आया कि दोनों माँ-बेटी के व्यवहार या सोच में इतना अंतर क्यों? इसका सीधा उत्तर मुझे मिला कि मेरे मित्र भी मानसिक रूप से काफी मजबूत हैं और हमेशा विपरीत परिस्थितियों का सामना करने के लिए तैयार रहते हैं। यदि कार्य आरम्भ करने के पहले असंशय की स्थिति आ गयी तो हमारे बढ़ते हुए कदम रुक जायेंगे और हमलोग ही अपने सपनों का गला घोंट देंगे। मानव जीवन का यह अवगुण उसे अपने जीवन में किसी भी क्षेत्र में सफलता पाने की राह में सबसे बड़े अवरोध के रूप में काम करता है, क्योंकि जब हम खुद ही अपनी क्षमता के बारे में विश्वस्त नहीं होते हैं तो कामयाबियों के सफर में हम बड़ी तेजी से आगे नहीं बढ़ पाते हैं। मन में एक दीप इसलिए जलाना चाहिए ताकि कभी संशय न हो और एक दीप भय का दानव मन में न बैठ जाए इसके लिए जलाना चाहिए। अब हम अपने वर्तमान प्रधानमंत्रीजी का उदाहरण देते हैं – उन्होंने त्याग, गुरुसेवा, साधना, जनसेवा, आदि को अपना लिया और उन्हें जरा-सा भी संशय नहीं था कि वे चुनाव नहीं जीतेंगे। त्याग, तपस्या तथा साधना का बल उनके आत्मविश्वास को बढ़ा रहा था। हर चुनावी सभा में उन्होंने पूरे आत्मविश्वास का परिचय दिया और चुनाव में विजयी होकर दुबारे सत्ता वापिस ली। यदि उन्हें संशय हो जाता तो हो सकता है कि विजय नहीं मिलती। संदेह या संशय ज्ञान के उपकरण है। इनमें दर्शन और विज्ञान की भूमिका है। बहुत से लोग कहते हैं कि जीवन में करना क्या है? मौज करने ही आए हैं। पूरा जीवन ईश्वर के चरणों में समर्पित कर देना है। केवल ईश्वर का भजन करते रहना है। यह सही है, इससे इंकार नहीं करता हूँ। लेकिन क्या केवल ईश्वर का भजन करने से जीवन गुजर जाएगा? परिवार का भरण-पोषण करने के लिए उद्योग तो करना ही पड़ेगा। जो उद्योग करने से भागता है वही कायर कहलाता है। असंशय की स्थिति को भगवान श्रीकृष्ण ने इस प्रकार बताया है:

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्येते। ।
निस्सन्देह चंचल मन को वश में करना अत्यन्त कठिन है; किन्तु उपयुक्त अभ्यास द्वारा

तथा विरक्ति द्वारा ऐसा सम्भव है। यहाँ भगवान निरंतर अभ्यास तथा बैराग्य को महत्त्व देते हैं। यहाँ अभ्यास का अर्थ ईश्वर में अपने को लगा देने से है तथा बैराग्य का अर्थ पदार्थ से विरक्ति से लगा सकते हैं। पूरी तरह से मन को संसार से अलग कर लेने से यह असंशय की स्थिति नहीं रहेगी।

सत्य की प्रतिज्ञा

बचपन में नानी कहानियां सुनाई करती थीं और हम सभी भाई – बहन इकट्ठे बैठ कर कहानियां सुनते थे। नानीजी के पास कोई लैपटॉप वगैरह नहीं था और नानी प्रतिदिन एक कहानी सुनाई करती थी। हम सभी को रात्रि का इन्तजार रहता था और प्रतिदिन नयी-नयी कहानियों को सुनते थे। इसी कड़ी में एक दिन राजा सत्य हरिश्चंद्र की कहानी को नानी ने बताया तथा कहा कि सत्य की प्रतिज्ञा को कभी नहीं तोड़ना चाहिए चाहे जो जाए। जान जाए तो जाए पर वचन नहीं जाए। नानी के अनुसार राजा हरिश्चंद्र लाख प्रलोभन के बावजूद भी सत्य से चिपके रहे और अपने द्वारा असत्य को स्वीकार करने से मना किया। विश्वामित्र ने उन्हें परेशान किया और उनके राज्य में सूखे, अकाल, बाढ़, आग, भूकंप जैसी तबाही मचाई। फिर भी सम्राट हरिश्चंद्र अपने सत्य पर कायम रहे और उन्होंने साड़ी तकलीफों को झेला, एक दिन स्वप्न में उन्होंने अपना सारा साम्राज्य ऋषि विश्वामित्र को दान में दे दी। नानी तो कहानी सुनती थी- कौतूहल भी होता था कि स्वप्न में कैसे दी होगी? लेकिन कहानी सुनने में जो रस मिलता था – उसका ध्यान करके चुप रह जाता था। अगले दिन ऋषि विश्वामित्र अपना साम्राज्य मांगने के लिए आ गए। उन्होंने स्वप्न में दान की हुई बात को मान कर अपना पूरा राज्य मुनि के चरणों में रख दिया। लेकिन अपने बात पर कायम रहे। इसके बाद उनका दुर्दिन शुरू हुआ। उन्होंने सत्य की रक्षा के लिए अपने को बेच दिया। अपनी पत्नी और बेटे को बेच दिया और खुद एक पहरेदार बनकर नौकरी करने लगे ताकि जिससे जो लिया है उसे दिया जा सके। राजा हरिश्चंद्र ने सारा त्याग और बलिदान सत्य की रक्षा के लिए किया। आखिर में जो कहानी में दुखद भाग आता है कि उन्हें अपने ही मृत बेटे को जलाए जाने के अधिकार से इंकार करना पड़ा और अपनी पत्नी से अग्नि देने के रूप में शुल्क की मांग की। अपने निश्चय पर वे अटल रहे। उनकी पत्नी ने बहुत अनुनय – विनय की, मगर वे अपने प्रतिज्ञा से डिगे नहीं। अंत में ईश्वर स्वयं प्रकट हुए और उन्हें दर्शन दिया। उन्हें उनका राज्य वापस मिल गया। उनके पुत्र को जीवन मिल गया। लोग उन्हें सत्यवादी हरिश्चंद्र के रूप में याद करने लगे।

महाभारत में एक वाक्य आया है – सत्यमेव जयते। लेकिन आजकल इस बात का महत्त्व लगता है कि थोडा धुंधला हो गया है। उस वक्त तो सत्य की जीत हो गयी थी। मेरी नानी कहती थी कि यदि सत्य हारने लगे तो समझ लेना चाहिए कि घोर कलयुग आ गया है। घोर कलयुग का अर्थ नानी के अनुसार जब व्यक्ति से घृणा करे, परिवार में सभी एक दूसरे पर अविश्वास करे, मौसम चक्र में परिवर्तन आए तो समझ लेना चाहिए कि कलयुग का आतंक चरम पर है।

लेकिन जो भी हो कहानी के अनुसार हमारे वादे पवित्र बंधन हैं। यदि सत्य का व्रत लिया है तो हमें कभी नहीं तोड़ना चाहिए। एक बार यदि प्रतिज्ञा ली तो उस पर आजन्म रहना चाहिए। जीवन भर उस पर कायम रहना चाहिए तभी दुनिया नाम लेती है। आजकल के नेताओं को देखते हैं तो काफी लम्बे – चौड़े वादे कर डालते हैं , पर उस पर कायम नहीं रहते। उस वादे को निभाना नहीं जानते। वादों को दफ़न कर दिया जाता है। बाद में उस नेता पर से लोगों का विश्वास उठ जाता है।

सफलता के मन्त्र

मेरे एक मित्र ने मुझे जीवन में आगे बढ़ने के लिए एक नेक सलाह दी। उनके अनुसार यदि जीवन में आगे बढ़ना है तो किसी की मदद नहीं करनी है। परोपकार के चक्कर में यदि पड़ेंगे तो अपना विकास रुक जाएगा। उस वक्त तो मैंने उनकी बातों पर गौर नहीं किया , मगर जब ध्यान से देखा तो पाया कि सही में जिन्होंने केवल अपने ऊपर ध्यान दिया है , वही कर्म-क्षेत्र में आगे बढे हैं। जिन्होंने सेवा आदि को अपना ध्येय बनाया उनका जीवन खाली ही रह गया। सुनने या पढने में थोडा अटपटा जरुर लग रहा होगा, मगर जीवन की सच्चाई यही है। सोच स्व-केन्द्रित हो। दूसरे के लिए जगह नहीं हो। इसी कड़ी में एक दुर्घटना देखने को मिली। उसमे ख़ास बात यह थी कि जो इंसान पीड़ित था – उसकी सहायता करने वाला कोई नही था। बेचारा दर्द से कराह रहा था। मीडिया या टीवी चैनल वाले अलग-अलग कोण से उस शख्स की तस्वीर खीचने में व्यस्त थे। इतने संवेदनहीन हम हो चुके थे कि किसी को यह याद नहीं रहा कि इस घायल को अस्पताल भी लेकर जाना है। बेचारा घायल भी कातर भाव से यह देख रहा था कि दर्शक मण्डली में से कोई उसे अपनी गाडी से डॉक्टर के पास इलाज के लिए लेकर जायेगा। मगर बच्चे, बूढ़े तथा जवान सभी उस महानुभाव के वीडियो बनाने में मशगूल थे। बेचारे की हड्डी – पसली एक हो गयी थी और लोग फोटो खीचने में कोण बदल रहे थे। अंत में थक-हार कर घायल बेचारा बोला कि मुझे कम से कम इस गाडी से बाहर निकालो। लेकिन एक लड़के ने कहा कि आज ही उसने अपना नेट पैक भरवाया है तथा पिताजी ने नया मोबाइल फोन दिया है तो एक वीडियो बनाने दीजिए , उसके बाद आपको अस्पताल पहुंचा दूंगा। इस वीडियो को मुझे फेसबुक पर डालना है। यह तस्वीर एकदम जीवंत लगेगी। ऐसा मौका बार-बार नहीं आता है। इसे ही मौके का फायदा उठाना कहते हैं। उस घायल आदमी ने कहा कि बेटा कुछ भलाई के काम भी कर लेना चाहिए। वह लड़का थोडा चिढ कर बोला – भलाई का ज़माना अब नहीं रहा। हमारे एक अंकल ने जीवन भर भलाई की – इसका बदला उन्हें क्या मिला? हमारे अंकल के परिवार को बर्बाद कर दिया गया। अंकल कहीं के नहीं रहे। इसीलिए भलाई का पाठ नहीं पढाएं। आपके एक्सीडेंट का वीडियो हम टीवी वालों को भेजेंगे, यूटूब में डाल कर पैसे कमाएंगे। बेचारा घायल कराह रहा था। किसी का ध्यान नहीं था उस बेचारे पर। मुझे अपने मित्र के कहे की बात याद आ गयी। जब तक एम्बुलेंस आती, तब तक वह घायल ईश्वर के पास जा चुका था। दुनिया पहले की भांति चल रही थी। किसी को किसी से कोई मतलब नहीं था। पहले जहाँ एक दूसरे के दुःख को देखकर लोग दुखी हो जाते थे – वह समय निकल चुका था। जिस मूल्यों पर हमारा समाज चलता है – वह मूल्य ही ख़त्म हो चुका है। सच्चाई, ईमानदारी आदि अब ताकतवर को ही शोभा देती है। निरीह, कमजोर आदि के लिए यह शब्द किसी काम के लिए नहीं है। भलाई करने के पहले अपना स्वार्थ देखना है। यदि हमारे पास 100 रूपये हैं और घर में बेटा बीमार है। दवाई लाने के वक्त रास्ते में क्षुधा से पीड़ित के भिखारी मिल जाता है। प्रश्न उठता है कि भिखारी की मदद की जाए या पुत्र के लिए दवाई ली जाए। एक तरफ धर्म है तथा दूसरी तरफ कर्म है। ऐसी अवस्था में पुत्र के लिए दवाई खरीदना ही सर्वश्रेष्ठ कार्य है। दोनों महत्त्वपूर्ण है। परोपकार का सही अर्थ समझ में आ रहा था। सब के कार्य अलग-अलग होते हैं। हर मनुष्य की प्राथमिकताए भी अलग-अलग होती हैं। सभी एक जैसे नहीं होंगे। मुझे समझ में आ गया था कि मेरे मित्र तो सही मायने में समझदार थे। उन्होंने मुझे शुरू में ही जीवन में सफल होने का मन्त्र दे दिया था।


परम श्रद्धेय स्वामी विवेकानंदजी,

सादर प्रणाम।

आज बहुत दिनों के बाद किसी को पत्र लिखने बैठा हूं। आप तो जानते हैं कि आजकल के लोग पत्र लिखना छोड़ दिए हैं , सारा काम फोन तथा इन्टरनेट के माध्यम से कर लेते हैं। अब बातचीत के दूसरे तेज माध्यम उपलब्ध हैं। मगर चिट्ठी लिखने का अपना ही आनंद है।आप यह मत सोचिए कि मैं आपसे कुछ शिकायत करूँगा, मैं दूसरों के जैसा नहीं हूँ. मैं मुन्नाभाई नही हूँ जो कि गांधीजी से अपने प्रश्नों का जवाब ले लूँ. आप हमारे दिल में रहते है. इसीलिए आज इस आनंद को बरसों बाद महसूस कर रहा हूं और इसके लिए आपका आभारी हूं।

परम श्रद्धेय स्वामीजी, आपसे कई बातें करनी हैं। आपके और आपके द्वारा बनाई हुई दुनिया के बारे में। मेरी कुछ जिज्ञासाएं हैं, कुछ सवाल हैं। कई ऐसी बातें हैं, जिन्हें मैं समझ नहीं पाता, पर समझना चाहता हूं। आपने अपने शिष्यों का भाग्य इतना विविधतापूर्ण क्यों लिखा कि एक आदमी दिन भर कमर तोड़ मेहनत करता है और दूसरा वातानुकूलित दफ्तर में केवल गप्पें मारता है? आप इसमें कर्मफल की बात करेंगे, मगर यह उचित नहीं है. अपने शिष्यों को इतने भेदभावपूर्ण तरीके से तो मनुष्य भी नहीं पालता, आप तो स्वामीजी हैं ? क्यों कुछ लोग कत्ल होने और कुछ कत्ल करने के लिए पैदा होते हैं? आपकी इस दुनिया में इतना शोषण, अन्याय और भुखमरी क्यों है? आपके शिष्य छोटी-छोटी बातों जैसे जाति-धर्म, प्रांत-भाषा, रंग-रूप और न जाने किन-किन बातों पर लड़ते हैं, एक-दूसरे से नफरत करते हैं, आप ऐसा होने ही क्यों देते है? आपके शिष्य आपके नाम का व्यापार कर रहे हैं और दूसरे मनुष्यों का शोषण कर रहे हैं। आपने शोषण के खिलाफ लड़ने के लिए कहा था। मगर आपके नाम के ही संस्था में ही शोषण एवं अत्याचार हो रहा है। यहाँ आपसी सम्बन्ध को ‘भाई-भाई’ कहा जाता है लेकिन व्यवहार दुश्मन जैसा होता है। चारों तरफ हजारों दुर्योधन ही दिखाई दे रहा है जो कि श्रीकृष्ण को भी नहीं समझते हैं तो उनको कैसे समझाया जाए? यह यक्ष प्रश्न सामने है। अब आपको प्रार्थना करके सुदर्शन चक्रधारी श्रीकृष्ण को भेजना ही पड़ेगा। आपके विचार केवल बोलने के लिए हैं – जीवन में अपनाने के लिए नहीं? आपने सुविचार तो दे दिए लेकिन उन आपके सुविचारों का मजाक उड़ता नजर आ रहा है। यह संसार अब मायावी नजर आ रहा है। इस मायाजाल से निकलने का उपाय नहीं सूझ रहा है। आप इसे शिकायती पत्र नहीं समझेंगे। अपने मन की व्यथा किसे सुनाऊं , इसीलिए आज पत्र लिखने बैठा। शेष कुशल है। आप जरा इन बातों पर ध्यान देंगे और प्रत्युत्तर की आस लगाए बैठा हूँ।

आपका ही प्यारा शिष्य,

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ANJALI MISHRA

ANJALI MISHRA 2 साल पहले

Bohot acha!

Niki Roy

Niki Roy 2 साल पहले