जनजीवन - 2 Rajesh Maheshwari द्वारा कविता में हिंदी पीडीएफ

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जनजीवन - 2

दूध और पानी

प्रभु ने पूछा-

नारद!

भारत की संस्कारधानी

जबलपुर की ओर

क्या देख रहे हो?

नारद बोले-

प्रभु !

देख रहा हूँ

गौ माता को नसीब नहीं है

चारा, भूसा या सानी,

बेखौफ मिलाया जा रहा है

दूध में पानी।

स्वर्ग में नहीं मिलता देखने

ऐसा बुद्धिमत्तापूर्ण हुनर,

मैं भी इसे सीखने

जा रहा हूँ धरती पर।

प्रभु बोले-

पहले अपना बीमा करवा लो

अपने हाथ और पैर

मजबूत बना लो।

ग्वाला तो गाय लेकर भाग जाएगा,

अनियंत्रित यातायात में

कोई कार या डम्पर वाला

तुम्हें टक्कर मारकर

यमलोक पहुँचाएगा।

दूध को छोड़ो

और अपनी सोचो

यहाँ रह रहे हो

यहीं सुरक्षित रहो।

सुप्त चेतना

धर्म, मत, जाति के

बदल जाने से

‘हम’

नहीं बदलते

जब तक

हृदय परिवर्तन न हो

नहीं हो सकती

सत्य की स्थापना।

हिरण की कुलाँच में

विलास तो है

परन्तु ... दिग्ज्ञान नहीं।

लावा

बहती हुई नदी की तरह

दौड़ने लगता

मन...

सतत प्रदीप्त-ग्रह की तरह

एक विचार!

अब एल्बम मे कैद है

वह बचपन!

निर्विकार

निष्कलंक

उजली सुबह की तरह।

इन्द्रधनुषी सपनों की उत्कण्ठा

प्रतीक्षा

सब कुछ था,

सहेजे हूँ आज भी

उनको

किसी खजाने की तरह।

मानव और संत

धरती

आकाश

सूर्य के प्रकाश का ताप

चांदनी की शीतलता

और हमारा सृजन,

प्रभु के द्वारा हुआ सम्पन्न।

हमने बनाए

मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा और चर्च

उसकी आराधना के लिए

दीपक जलाए

मोमबत्तियाँ जलाईं

शीष झुकाकर प्रार्थना की

लेकिन सुख-समृद्धि और वैभव की कामना

मिट न सकी

इसी चाहत में

श्रृद्धा, भक्ति और सेवा

समर्पित रही

इसी भाव से करते रहे प्रार्थना

अपने स्वार्थ में डूबे

चाहत की आशा में खोए रहे

कभी व्यक्त नहीं कर सके

मन, हृदय और आत्मा से

प्रभु के प्रति कृतज्ञता

इसीलिये मानव

संत नहीं बन पाता

संत तो

कृतज्ञता में बिताता है अपना समय

और मानव का

प्रतीक्षाओं और अपेक्षाओं में

होता है जीवन का अंत।

मंहगाई

सबेरे-सबेरे

कौए की कांव-कांव,

हम समझ गए

आज आ रहा है

कोई मेहमान।

तभी पत्नी ने किया टीवी आन।

उसे देखते ही हम सकपका गए,

बिस्तर से गिरे और

धरती पर आ गए।

पेट्रोल, डीजल, कैरोसिन और

गैस की टंकी के बढ़ गए

अनाप-शनाप दाम,

नेताजी से दूरभाष पर

पूछ बैठे

यह आपने क्या कर दिया काम?

वे बोले-

यह नहीं है हमारा काम

लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा में

हम जितने पहले थे

उतने ही अब भी हैं,

हमारी संख्या स्थिर है

पर तुम्हारे घर की जनसंख्या

बढ़ती ही जा रही है।

हम जितना उत्पादन बढ़ाते हैं

तुम उससे चार गुना

जनसंख्या बढ़ाते हो।

ऐसे में कैसे कम होंगे दाम?

तुम कम करो जनसंख्या

तो अपने आप दाम कम हो जाएंगे,

तुमको भी मिलेगी राहत और

हम भी चैन की बंसी बजाएंगे।

जीवन का आधार

जीवन में

असफलताओं को करो स्वीकार

मत हो निराश

इससे होगा

वास्तविकता का अहसास

असफलता को सफलता में

बदलने का करो प्रयास

समय कितना भी विपरीत हो

मत डरना

रखना विश्वास

साहस और भाग्य पर

अपने पौरुष को जाग्रत कर

धैर्य और साहस से

करना प्रतीक्षा सफलता की

पौरुष दर्पण है

भाग्य है उसका प्रतिबिम्ब

दोनों का समन्वय बनेगा

सफलता का आधार

कठोर-श्रम, दूर-दृष्टि और पक्का इरादा

कठिनाइयों को करेगा समाप्त

होगा खुशियों के नए संसार का आगमन

विपरीत परिस्थितियों का होगा निर्गमन

पराजित होंगी कुरीतियां

होगा नए सूर्य का उदय

पूरी होंगी सभी अभिलाषाएं

यही है जीवन का आधार

कल भी था

आज भी है और

कल भी रहेगा।